अभियान –52 : रबाब से नगाड़े तक सिख इतिहास की अमर यात्रा 

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अभियान –52 : रबाब से नगाड़े तक सिख इतिहास की अमर यात्रा 

पंजाबी की एक अत्यंत सारगर्भित कहावत है— “सो हाथ रस्सा, सिरे ते गंड”, अर्थात किसी विस्तृत और गहन विषय को उसके मूल भाव सहित संक्षेप में प्रस्तुत करना। सिख इतिहास के विशाल सागर में ऐसे अनेक अभियान विद्यमान हैं, जिन्होंने समय की सीमाओं को पार कर युगों – युगों तक मानवता का मार्गदर्शन किया। उन्हीं में से एक है -अभियान –52! (मलय भाषा का शब्द “लीमा पोलो दुआ” संख्या 52 का द्योतक है), किंतु सिख इतिहास में यह संख्या मात्र एक अंक नहीं, अपितु एक निरंतर चलने वाली आध्यात्मिक, सामाजिक, शारीरिक और सांस्कृतिक यात्रा का प्रतीक बन जाती है।

जब श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने मानवता को सत्य, सेवा और नाम का संदेश देने हेतु अपनी चार महान उदासियों का आरंभ किया, तब उनके साथ एक अद्भुत सहयात्री थे, -भाई मरदाना जी। इतिहास के पृष्ठ बताते हैं कि जब भी गुरु साहिब के अंतर्मन से दिव्य वाणी प्रकट होती, वे प्रेमपूर्वक उच्चारित करते “मरदानियां, रबाब बजा, वाणी आई है।” और तब रबाब के सुरों पर उतरता था दिव्यता का अमृत। यह केवल गुरमत संगीत नहीं था; यह मानव चेतना को जागृत करने का अभियान था। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भाई मरदाना जी ने लगभग 52 वर्षों तक गुरु साहिब के साथ इस दिव्य सेवा को निभाया। क्या यह केवल संयोग था, या किसी गहरे संदेश का संकेत? यहीं से आरंभ होता है  -अभियान –52

समय आगे बढ़ा और श्री गुरु अंगद देव साहिब जी ने इस अभियान को एक नए आयाम में परिवर्तित किया। उन्होंने केवल आत्मिक शक्ति पर नहीं, अपितु शरीर और मन के संतुलित विकास पर भी बल दिया। उन्होंने व्यायाम, अनुशासन और मल्ल विद्या को समाज में प्रतिष्ठित किया। गुरु-वाणी का संदेश भी इसी संतुलित जीवन की ओर संकेत करता है—

“घटि वसहि चरणारबिंद रसना जपै गुपाल॥
नानक सो प्रभु सिमरीऐ तिसु देहो कउ पालि॥”
(अंग 554)

अर्थात जिस मानव के अंतःकरण में प्रभु के चरण-कमल बसते हैं और जिसकी वाणी ईश्वर का स्मरण करती है, वो ही जीवन का वास्तविक पोषण प्राप्त करता है।

इसी दृष्टि को मूर्त रूप देते हुए श्री गुरु अंगद देव साहिब जी ने मल्ल अखाड़ों की स्थापना की और अनेक पहलवान तैयार किए। इतिहास कहता है कि उस समय असंख्य योद्धा और पहलवान थे, किंतु गुरु साहिब ने विशेष रूप से 52 प्रमुख मल्लों को तैयार कर उन्हें समाज और गुरु पंथ खालसा की सेवा के लिए समर्पित किया। यह केवल शरीर निर्माण नहीं था, अपितु राष्ट्र और समाज निर्माण की योजना थी। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं तो प्रश्न उठता है –क्या हमने गुरु साहिब की इस परंपरा को पर्याप्त रूप से आगे बढ़ाया? कितने गुरु घर आज भी व्यायाम, अनुशासन और शारीरिक संस्कार के केंद्र बने हुए हैं?

इसके पश्चात श्री गुरु अमर दास साहिब जी ने इस अभियान को संगठन और नेतृत्व के रूप में नई दिशा दी। उन्होंने 22 मँजियों की स्थापना की परंतु यह केवल 22 आसनों की व्यवस्था नहीं थी। उन मँजियों से जुड़े 52 परगनों में धर्म, सेवा और नाम प्रचार की ज्योति स्थापित की गई। इन पीठों पर बैठने वाले सेवक गुरु के प्रतिनिधि थे, वह समाज को जोड़ते थे, गुरबाणी का प्रचार – प्रसार करते थे, लोगों को प्रेरित करते थे, परंतु इसमे एक विशेष तथ्य यह था कि- गुरु पद का स्थान सदा अद्वितीय बना रहा। यहाँ भी इतिहास के भीतर से वही संख्या उभरती दिखाई देती है -अभियान –52

और फिर समय आया श्री गुरु रामदास साहिब जी का। उन्होंने सिख समाज को केवल आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक सीमित नहीं रखा, अपितु जीवनोपयोगी कौशल, श्रम और व्यापार की गरिमा को भी प्रतिष्ठित किया। उन्होंने समाज को 52 प्रकार की कलाओं और व्यवसायों में दक्ष बनने की प्रेरणा दी। उनका संदेश स्पष्ट था कि- धर्म और कर्म एक-दूसरे के पूरक हैं। आज यदि सिख समाज अपनी सामूहिक शक्ति, अनुशासन और संगठन को पुनः जागृत करे, तो वह आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में नई दिशा स्थापित कर सकता है।

श्री गुरु नानक देव साहिब जी की पाँचवीं ज्योत, श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी के समय यह अभियान ज्ञान, वाणी और लिपि की दिव्य परंपरा के रूप में आगे बढ़ता दिखाई देता है। जब गुरु साहिब ने सन् 1601 ईस्वी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के संपादन का पावन कार्य प्रारंभ किया, तब भाई गुरदास जी ने सहयोगी लेखक के रूप में अपनी अमूल्य सेवाएँ अर्पित कीं। यह केवल ग्रंथ-संपादन नहीं था, अपितु आने वाली पीढ़ियों के लिए आध्यात्मिक चेतना, भाषिक अनुशासन और गुरमत मर्यादा को स्थायी रूप देने वाला महान कार्य था।

इसी संदर्भ में 52 अखरी वाणी का उल्लेख विशेष रूप से विचारणीय है। सामान्यतः गुरमुखी लिपि में 35 अक्षर माने जाते हैं और पंजाबी भाषा की वर्ण-व्यवस्था में 41 अक्षरों का उल्लेख मिलता है; किंतु गुरुवाणी की ध्वनि-संपन्नता और भाषिक विस्तार को समझते हुए विद्वानों ने अक्षरों की व्यापक परंपरा पर गंभीर विचार किया। प्रसिद्ध सिख इतिहासकार भाई काहन सिंह नाभा, ज्ञानी गुरदित्त सिंह जी, ज्ञानी गुरमुख सिंह जी आदि विद्वानों की परंपरा में पंजाबी के ‘ਸ’ (स) अक्षर पर बिंदी लगाकर ‘ਸ਼’ (श) ध्वनि के प्रयोग को भी विशेष महत्त्व दिया गया। इस प्रकार गुरुवाणी की अभिव्यक्ति में अक्षर केवल ध्वनि नहीं रहते, वे आध्यात्मिक अर्थ और भाषिक संस्कार के वाहक बन जाते हैं।

इस दृष्टि से जब 52 अखरी वाणी और अक्षर-परंपरा को देखा जाता है, तो अभियान–52 का एक और सूक्ष्म आयाम हमारे सामने आता है। यहाँ 52 केवल संख्या नहीं, अपितु वाणी, भाषा, ज्ञान और आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की पूर्णता का प्रतीक बन जाता है।

अर्थात— अभियान–52

क्या यह सब केवल घटनाएँ हैं? या फिर कोई अदृश्य सूत्र इन सबको जोड़ता है?
जब समय आया श्री गुरु नानक देव साहिब जी की छठी ज्योत, श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का, तब सिख इतिहास में सेवा और आध्यात्मिकता के साथ-साथ स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा का एक ऐसा अध्याय जुड़ा जिसने आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित किया।

इतिहास में वर्णित है कि ग्वालियर के किले में 52 हिंदू राजा बंदी बनाकर रखे गए थे। उस समय श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने केवल अपनी मुक्ति को स्वीकार नहीं किया, अपितु उन राजाओं की स्वतंत्रता को भी अपना धर्म समझा। परंपरा के अनुसार उन 52 राजाओं को साथ लेकर बाहर लाने के लिए एक विशेष चोला तैयार करवाया गया। इस चोले की विशेषता यह थी कि उसमें 52 कलियाँ बनाई गई थीं और प्रत्येक राजा ने उस चोले की एक-एक कली को पकड़कर गुरु साहिब के साथ किले से बाहर आकर स्वतंत्रता प्राप्त की।

यह घटना केवल बंदियों की मुक्ति नहीं थी; यह उस विचार का उद्घोष थी कि गुरु का मार्ग केवल स्वयं के उद्धार तक सीमित नहीं होता, अपितु दूसरों को भी बंधनों से मुक्त करने का संकल्प रखता है। यही कारण है कि श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी को इतिहास में बंदी छोड़ दाता के रूप में श्रद्धा पूर्वक स्मरण किया जाता है।

विशेष बात यह है कि इस प्रसंग में भी इतिहास उसी संकेत की ओर लौटता दिखाई देता है, मानो अभियान –52 केवल संख्या न होकर सेवा, संरक्षण और स्वतंत्रता की जीवंत परंपरा बन गया हो।

वर्तमान समय में पंजाब की धरती पर आज भी ऐसे ऐतिहासिक स्थल विद्यमान हैं जिन्होंने अपनी मूल पहचान और ऐतिहासिक स्वरूप को यथासंभव सुरक्षित रखा है। ऐसे ही स्थलों में गुरुद्वारा कुड़ानी साहिब का नाम भी श्रद्धा से लिया जाता है, जो लुधियाना के समीप स्थित माना जाता है। परंपरा में यह विश्वास किया जाता है कि इस गुरुद्वारा साहिब में 52 कलियों वाला चोला आज भी श्रद्धा और इतिहास के प्रतीक के रूप में सुशोभित है।

और इस प्रकार-
52 वर्षों की रबाब, 52 प्रमुख मल्ल, 52 परगने, 52 व्यावसायिक सेवाओं की परंपरा, 52 अखरी वाणी और 52 कलियों का यह चोला आज भी इस सत्य का साक्षी है कि अभियान –52 जारी है।

इस इतिहास को अवलोकित करते हुए अब तक हमने देखा कि किस प्रकार रबाब के सुरों से आरंभ हुआ यह अद्भुत अभियान समय के साथ व्यायाम, संगठन, सेवा, व्यापार, ज्ञान और समाज निर्माण की अनेक धाराओं में प्रवाहित होता चला गया। परंतु प्रश्न अभी भी शेष है; क्या यह संख्या केवल एक संयोग थी, या इसके पीछे कोई गहन आध्यात्मिक संकेत छिपा हुआ था? इतिहास के अगले अध्याय इस रहस्य को और अधिक रोचक बना देते हैं।

जब श्री गुरु नानक देव साहिब जी की सातवीं ज्योत, श्री गुरु हर राय साहिब जी का समय आया, तब यह अभियान एक नए रूप में सामने आया; सेवा और चिकित्सा के रूप में। गुरु साहिब ने प्रकृति को केवल सौंदर्य का विषय नहीं माना, अपितु उसे मानवता की सेवा का माध्यम बनाया। इतिहास में उल्लेख मिलता है कि गुरु साहिब के संरक्षण में अनेक औषधीय उद्यान स्थापित किए गए और इस परंपरा में 52 नौलखा बागों का उल्लेख मिलता है। इन बागों में औषधीय वनस्पतियों और दुर्लभ जड़ी-बूटियाँ संरक्षित की जाती थीं, जिनके माध्यम से दवाखानों में पीड़ित मानवों और पशुओं की सेवा की जाती थी।

यह विचार अपने आप में अद्भुत है, यदि उद्देश्य केवल उद्यान निर्माण होता तो संख्या कम या अधिक भी हो सकती थी, परंतु इतिहास बार – बार उसी संख्या की ओर संकेत करता दिखाई देता है -अभियान –52 क्या यह केवल व्यवस्था थी या सेवा को संगठित करने की कोई परंपरा?

इतिहास का एक प्रसिद्ध प्रसंग हमें और भी अधिक विचार करने पर विवश करता है। जब मुगल सम्राट औरंगजेब का पुत्र दारा शिकोह गंभीर रूप से अस्वस्थ हुआ, तब उसके उपचार के लिए भी गुरु हर राय साहिब जी की औषधीय व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। यह वही परंपरा थी जहाँ सेवा धर्म, जाति और सत्ता से ऊपर थी। जो भी पीड़ित था, गुरु के द्वार पर उसके लिए स्थान था।

इसके पश्चात श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी का संक्षिप्त किंतु तेजस्वी काल आता है। यद्यपि उनकी आयु अल्प रही, परंतु उन्होंने पूर्ववर्ती सात गुरुओं द्वारा रोपे गए इस सेवा, करुणा और लोक कल्याण के वृक्ष को अपनी निर्मल चेतना से और अधिक पुष्पित किया। इतिहास ने उनके जीवन को समय से नहीं, प्रभाव से मापा।

इतिहास साक्षी है कि श्री गुरु नानक साहिब जी की नौवीं ज्योत जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने धर्म, मानवता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता की रक्षा हेतु अपना पावन शीश अर्पित किया, तब वह केवल एक शहादत नहीं थी, वह सत्य, साहस और आत्मबल की ऐसी अमर ज्योति थी जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रकाशमान कर दिया।

शहादत के उस अत्यंत संवेदनशील क्षण में, जब भय और आतंक का वातावरण था, तब गुरु के सेवकों ने अपनी निष्ठा और साहस का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। भाई जैता जी ने अद्भुत चातुर्य, धैर्य और गुरु-प्रेम के साथ श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का पावन शीश उठाया और उस शीश को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने का महान कार्य किया। दूसरी ओर गुरु-भक्ति और सेवा के प्रतीक भाई लक्खी शाह बंजारा ने गुरु साहिब के पवित्र धड़ को अपने घर ले जाकर उस सेवा को निभाया जिसे इतिहास सदैव श्रद्धा से स्मरण करता रहेगा।

यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है, लक्खी शाह बंजारा कौन थे?

लक्खी शाह बंजारा केवल उस समय के प्रतिष्ठित व्यापारी नहीं थे, अपितु उनका परिवार प्राचीन काल से गुरु घर और धर्म परंपरा से जुड़ा हुआ माना जाता है। पारंपरिक वंशावली के अनुसार इस कुल की धारा राजा धज से प्रारंभ होकर उनके पुत्र कोधज तक पहुँची; कोधज से कर्ण, कर्ण से चाड्डा, चाड्डा से बाबा बोरा, बाबा बोरा से सावन नायक, सावन नायक से बिन्ना, बिन्ना से अर्था, अर्था से दास और दासा से प्रसिद्ध व्यापारी मक्खन शाह का जन्म हुआ। इसी वंश और पारिवारिक संबंधों में लक्खी शाह बंजारा का स्थान अत्यंत सम्मानित माना जाता है। परंपरा के अनुसार मक्खन शाह बंजारे के साढ़ू के रूप में लक्खी शाह बंजारा उस समय के अत्यंत प्रभावशाली और समृद्ध व्यापारियों में गिने जाते थे। यदि आधुनिक संदर्भ में तुलना की जाए तो उनका व्यापारिक वैभव आज के बड़े औद्योगिक घरानों के समान माना जा सकता है। 

यह परिवार केवल व्यापारिक समृद्धि के कारण नहीं, अपितु गुरु घर के प्रति श्रद्धा और समर्पण के कारण भी विशेष माना जाता है। परंपरा में वर्णित है कि लक्खी शाह बंजारा ने अपनी पुत्री सितो का परिणय संस्कार / आनंद कारज अत्यंत सम्मानित धार्मिक परंपरा के अंतर्गत भाई मणी सिंघ जी से संपन्न करवाया। इस प्रसंग में बाबा गुरदित्ता जी और भाई मणि सिंह जी का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

बाबा गुरदित्ता जी सिख परंपरा में अत्यंत सम्मानित स्थान रखते हैं और गुरु घर की मर्यादा तथा आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े हुए माने जाते हैं, आप जी का महत्वपूर्ण योगदान दमदमी बीड़ (ग्रंथ) की संपादना में था, वहीं आप जी को इस ग्रंथ के प्रथम प्रकाश के समय प्रथम हेड ग्रंथी के रुप में मनोनीत किया था। साथ ही भाई मणि सिंह जी का व्यक्तित्व सिख इतिहास में असाधारण ऊँचाई रखता है। वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सेवा, गुरमत प्रचार, लेखन, विद्वत्ता के कारण श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रकाश के समय प्रथम हेड ग्रंथी के रुप में मनोनीत हुए थे और अंततः अपनी महान शहादत के लिए इतिहास में स्मरण किए जाते हैं। परंपरागत वर्णनों के अनुसार इसी सम्मानित धार्मिक वातावरण में बीबी सितो का परिणय भाई मणि सिंह जी के साथ भाई गुरुदित्ता जी ने स्वयं अपने कर – कमलों से संपन्न करवाया था।

अब इतिहास उस क्षण पर पहुँचता है जहाँ भावनाएँ शब्दों से बड़ी हो जाती हैं।

लक्खी शाह बंजारा के घर में उस समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का पवित्र धड़ विराजमान था। वातावरण गंभीर था, प्रत्येक हृदय शोक और श्रद्धा से भरा हुआ था। उसी समय उनकी पुत्री बीबी सितो ने अपने पिता के समीप आकर अत्यंत विनम्रता से हाथ जोड़कर निवेदन किया-

“पिताजी, क्या आज मैं गुरु महाराज से कुछ मांग सकती हूँ?”

लक्खी शाह बंजारा ने बेटी की ओर देखा और अत्यंत भावुक स्वर में कहा—

“बेटी, हमें गुरु साहिब से सब कुछ प्राप्त हुआ है। ध्यान रखना- ऐसा कुछ मत मांग लेना जो गुरु की बख्शीश की महिमा से छोटा हो और जिससे कहीं हमारा मान कम प्रतीत हो।”

तब बीबी सितो ने अत्यंत दृढ़ और भावपूर्ण स्वर में कहा—

“पिताजी, जो मैं मांगूँगी, उसे संसार सदैव याद रखेगा।”

यह कहकर उन्होंने धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के चरणों में नमन किया, अरदास की और विनम्रता पूर्वक प्रार्थना की-

“हे सच्चे पातशाह! कोई व्यापार मांगता है, कोई धन मांगता है, कोई दहेज और सुख की कामना करता है; परंतु आपकी यह बेटी आज कुछ और मांगने आई है। आज जब आप शहीद होकर मेरे निवास पर आए हो, तो मुझ पर इतनी कृपा करना कि यह शहादत की परंपरा कभी समाप्त न हो। मुझे और मेरे पूरे कुल को ऐसा आशीर्वाद देना कि आपकी राह पर चलते हुए मेरा संपूर्ण खानदान धर्म, देश और कौम की सेवा के लिए आवश्यकता पड़ने पर शहादत का जाम पीकर अपना जीवन समर्पित कर सके।”

परंपरा में वर्णित है कि आगे चलकर भाई मणि सिंह जी की पत्नी अर्थात बीबी सितो से जुड़े परिवार के अनेक सदस्य धर्म और राष्ट्र की रक्षा हेतु शहादत के मार्ग पर चले और उन शहादतों की संख्या भी 52 थी, इन महान शहादतों को भी अभियान–52 की अवधारणा से जोड़ा जाता है।

यदि इस संपूर्ण प्रसंग को व्यापक दृष्टि से देखा जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल शहादत का इतिहास नहीं, अपितु उस आध्यात्मिक धारा का प्रवाह है जो रबाब के मधुर सुरों से प्रारंभ होकर नगाड़े की वीर उद्घोषणा तक पहुँचती है।

इतिहास आगे बढ़ता है और बैसाखी 1699 के निकट पहुँचता है। यह वह काल था जब श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने केवल शस्त्र ही नहीं, शास्त्र की भी महिमा स्थापित की। पांवटा साहिब की धरती पर विद्वानों, कवियों और लेखकों का एक अद्भुत संगम हुआ। परंपरा में वर्णित है कि वहाँ 52 कवियों और साहित्यकारों ने अपनी सेवाएँ अर्पित कीं। यह संख्या यहाँ भी केवल गणना नहीं थी; यह ज्ञान, चिंतन और वैचारिक शक्ति के संगठन का प्रतीक बन गई।

इसके बाद जब हम सचखंड श्री हजूर साहिब के इतिहास की ओर दृष्टि डालते हैं, तो गुरु साहिब द्वारा दिए गए अनेक आदेशों और शिक्षाओं का उल्लेख मिलता है। परंपरा में प्रसिद्ध 52 हुक्मनामे (बावन हुक्मनामे) आज भी सिख जीवन के अनुशासन, सेवा और चरित्र निर्माण के आधार माने जाते हैं। यह वह चरण था जहाँ रबाब का संगीत अब नगाड़े की उद्घोषणा में परिवर्तित हो चुका था।

जब सिख इतिहास में बंदा सिंघ बहादुर जी का उदय हुआ, तब ऐसा प्रतीत हुआ मानो गुरु परंपरा द्वारा आरंभ किया गया वह दीर्घ अभियान -जो रबाब के मधुर स्वरों से प्रारंभ होकर संगठन, सेवा, शौर्य और शहादत के विभिन्न चरणों से गुज़रा था, अब राज और स्वाभिमान की उद्घोषणा में रूपांतरित हो रहा हो। बंदा सिंह बहादुर जी ने अपने संघर्ष, संगठन और आक्रामक नेतृत्व शैली में भी मानो इसी अभियान–52 की चेतना को आगे बढ़ाया।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. गगनदीप सिंह जी द्वारा रचित पुस्तक “GURU NANAK PATSHAS’S HALIMII RAJ (1469–1716) – LOH GARH SIKH STATE CAPITAL” में उल्लेख मिलता है कि लोहागढ़ की राजधानी लगभग 4000 एकड़ क्षेत्र में विस्तृत थी। शोध और ऐतिहासिक अन्वेषण के माध्यम से इस विशाल परिसर के आसपास स्थित किलों और सुरक्षा संरचनाओं की खोज की गई तथा उनके स्थानों की पहचान भी की जा चुकी है और आश्चर्य यह कि परंपरागत व्याख्याओं में लोहागढ़ से जुड़े इन किलों की संख्या भी 52 बताई जाती है। इस पुस्तक में एक और विशेष उल्लेख मिलता है कि- भाई लक्खी शाह बंजारे ने इस लोहगढ़ की राजधानी के विस्तृत 4000 एकड़ के क्षेत्र में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की स्मृति में -52 भव्य कुओं का निर्माण भी किया था, मानो इतिहास फिर उसी संकेत की ओर लौट रहा हो— 52 वर्षों की रबाब, 52 सेवाएँ, 52 संकल्प, 52 कुएं और अब 52 किलों एवं से सुरक्षित खालसा चेतना।

निश्चित ही यह केवल संख्या का संयोग नहीं प्रतीत होता, अपितु उस दीर्घ ऐतिहासिक यात्रा का प्रतीक बन जाता है जिसमें धन्य श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा आरंभ की गई आध्यात्मिक चेतना ने रबाब से नगाड़े तक का सफर तय करते हुए कौम को राज–पाट का आत्मविश्वास प्रदान किया।

अर्थात— अभियान–52।

जब हम इतिहास के विशाल पृष्ठों से निकलकर अपने घरों, परिवारों और लोकजीवन की ओर दृष्टि डालते हैं, तब आश्चर्य होता है कि गुरु परंपरा और पंजाबी सभ्यता की अनेक स्मृतियाँ आज भी हमारी दैनिक संस्कृति में कहीं न कहीं जीवित हैं। पंजाबी सभ्याचार में हमारी माताएँ, बहनें और बेटियाँ परंपरागत रूप से अपने सिर पर जिस चुन्नी अथवा दुपट्टे को धारण करती आई हैं, उसे बाग चुन्नी के नाम से जाना जाता है। विशेष रूप से खद्दर के वस्त्र पर निर्मित यह बाघ केवल पहनावे का एक अंग नहीं माना जाता, अपितु श्रम, सौंदर्य, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी रहा है।

बाग फुलकारी की उस विशिष्ट शैली को कहा जाता है, जिसमें गहरे लाल अथवा नाभी (गाढ़े सुर्ख) रंग के खद्दर के कपड़े पर रेशमी धागों से संपूर्ण सतह पर कढ़ाई की जाती है। इस पर अत्यंत सघन और भरी हुई कढ़ाई की जाती है। सामान्यतः बाग दो प्रमुख रंगों के संयोजन में तैयार किया जाता है। इसके किनारों पर भी अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर भराव युक्त बारीक कढ़ाई की जाती है।

फुलकारियों में बाग को कढ़ाई कला का सर्वश्रेष्ठ और उत्कृष्ट नमूना माना जाता है। इसे गुलाबी, किरमची, पीले, हरे तथा नीले रंग के रेशमी धागों से सजाया जाता है। बाग की कढ़ाई में अनेक प्रकार के अलंकरण और कलात्मक आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जैसे बेल-बूटे, पुष्प, शेर, हिरण, हाथी, मोर और यहाँ तक कि श्री हरिमंदिर साहिब जी की दर्शनी ड्योढ़ी के चित्रात्मक रूप भी इसमें उकेरे जाते हैं।

इस बाग चुन्नी की सबसे विशिष्ट पहचान उसकी कढ़ाई और कलात्मक विन्यास मानी जाती है। लोक परंपराओं में वर्णन मिलता है कि इस बाघ चुन्नी पर 52 पुष्पों अथवा पुष्प आकृतियों की कढ़ाई की जाती थी। यह संख्या केवल अलंकरण का विषय नहीं प्रतीत होती, अपितु मानो उस सांस्कृतिक चेतना का भी संकेत बन जाती है जो पीढ़ियों से समाज के भीतर जीवित रही। यदि अभियान–52 की दृष्टि से इस लोक परंपरा को देखा जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि जो यात्रा कभी रबाब के स्वरों से प्रारंभ हुई, जिसने सेवा, शौर्य, संगठन, साहित्य, शहादत और राज्य व्यवस्था तक अपना विस्तार किया, उस अभियान की झलक हमारे घरों की इस साधारण दिखाई देने वाली चुन्नी तक भी पहुँच गई।

संभवतः यही कारण है कि बाघ चुन्नी की इस परंपरा को भी अभियान–52 की सांस्कृतिक अनुगूंज के रूप में देखा जाता है, रबाब से लेकर नगाड़े तक का यह सफर आज भी कहीं न कहीं हमारे घरों तक पहुँचा हुआ है।

52 वर्षों की रबाब, 52 प्रमुख मल्ल, 52 परगने, 52 व्यावसायिक सेवाओं की परंपरा, 52 अखरी वाणी और 52 कलियों का यह चोला, 52 नौ लखा बाग, एक ही परिवार के 52 शहीद, 52 साहित्यकार, 52 हुक्मनामे (संदेश), 52 पुष्प आकृतियों की कढ़ाई वाली बाग चुन्नी आज भी इस सत्य का साक्षी है कि अभियान –52 जारी है।

शायद अभियान–52 का वास्तविक अर्थ संख्या नहीं, अपितु यह है कि गुरु का प्रत्येक अभियान पूर्णता, संगठन, सेवा और मानव कल्याण की दिशा में हो।

और निश्चित ही यह रबाब से लेकर नगाड़े तक का सफर है… अभियान–52।

विशेष— प्रस्तुत आलेख सिख इतिहास के प्रतिष्ठित इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ जी द्वारा हाल ही में मलेशिया में आयोजित खालसा साजना दिवस के पावन अवसर पर प्रस्तुत की गई कथा एवं ऐतिहासिक व्याख्यानमाला पर आधारित है। इस कथा में विशेष रूप से “सिख इतिहास में मिशन–52” की अवधारणा को केंद्र में रखकर गुरु परंपरा, सेवा, संगठन, शहादत, संस्कृति तथा खालसा चेतना के विविध आयामों को ऐतिहासिक संदर्भों सहित प्रस्तुत किया गया। यह आलेख उसी प्रेरणादायी चिंतन, ऐतिहासिक दृष्टि और शोधपरक व्याख्या का साहित्यिक पुनः प्रस्तुतीकरण है।


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