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बीसवीं शताब्दी में गुरुधामों का अभिलेखन: भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) की साइकिल यात्राओं का ऐतिहासिक विश्लेषण

बीसवीं शताब्दी में गुरुधामों का अभिलेखन: भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) की साइकिल यात्राओं का ऐतिहासिक विश्लेषण सारांश (Abstract) बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जब भारत अखंड भू-राजनीतिक स्वरूप में विद्यमान था और संचार-सुविधाएं अत्यंत सीमित थीं, उस समय भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) ने 11 मार्च 1930 से 26 जून 1935 तक लगभग पाँच […]

भूले-बिसरे सतनामी सिख: इतिहास की उपेक्षित धरोहर

भूले-बिसरे नानक पंथी: उड़ीसा की धरती पर गुरु चरणों की स्मृति (जय सतनाम) सतनामियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। सतनामी सदा से शांतिपूर्ण और सादे जीवन को प्राथमिकता देने वाले लोग रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि सतनामियों की एक पुरानी और गौरवशाली परंपरा रही है। सतनामी पंथ प्रारंभ से ही

नानक लामा: हिमालय की वादियों में गूंजती गुरुवाणी

नानक लामा: हिमालय की वादियों में गूंजती गुरुवाणी जब-जब मानवता मार्ग से भटकी, तब-तब किसी महापुरुष ने सत्य का दीप प्रज्वलित किया। पंद्रहवीं शताब्दी के उस आलोक-पुंज, श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने भी यही किया। वे जहाँ-जहाँ गए, वहाँ की भ्रमित चेतना को अंधविश्वास, कर्मकांड और मिथ्या आडंबरों की धुंध से निकालकर सत्य,

वारकरी संप्रदाय : सामाजिक समरसता और निर्गुण भक्ति का संगम

वारकरी संप्रदाय : सामाजिक समरसता और निर्गुण भक्ति का संगम संतों, महापुरुषों और भक्तों की पुण्य भूमि महाराष्ट्र भारतीय भक्तिकाल की वह दिव्य प्रयोगशाला है, जहाँ सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं ने एक साथ लोक हृदय को आलोकित किया। इसी भूमि पर भक्त ज्ञानेश्वर माऊली, संत तुकाराम जी महाराज, निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, मुक्ताबाई, गोरा कुम्भार, सावता

सिख जौहरी समाज: परंपरा, संघर्ष और आत्मबोध की विरासत

सिख जौहरी समाज: परंपरा, संघर्ष और आत्मबोध की विरासत कभी जिन जौहरियों की पहचान राजाओं-महाराजाओं के राज दरबारों में हीरे-जवाहरात सँभालने वाले विशिष्ट कारीगरों के रूप में थी, वही आज समय की विडंबनाओं से जूझते हुए अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। गुरु नानक पंथी सिखों में से विकसित हुआ सिख जौहरी

रमईया सिख समाज: धर्म, श्रम, संघर्ष और परंपरा की अविच्छिन्न यात्रा

रमईया सिख समाज: धर्म, श्रम, संघर्ष और परंपरा की अविच्छिन्न यात्रा भारतीय सिख समाज की व्यापक और बहुआयामी संरचना में रमईया सिख समाज एक ऐसा विशिष्ट समुदाय है, जिसने भौगोलिक दूरी, सीमित आर्थिक संसाधनों, ऐतिहासिक उपेक्षा और संगठित संस्थागत सहयोग के अभाव के बावजूद श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा प्रतिपादित सिक्खी के मूल

पूर्वी भारत के सिख: इतिहास, पहचान, समकालीन यथार्थ और सिक्खी के विस्तार की यात्रा

पूर्वी भारत के सिख: इतिहास, पहचान, समकालीन यथार्थ और सिक्खी के विस्तार की यात्रा बिहार अपनी भौगोलिक सीमा के भीतर निवास करने वाली विविध जातियों, जनजातीय समुदायों, भाषाओं तथा अनेक धर्मों और आस्थाओं के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का एक अत्यंत बहुरंगी और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश माना जाता है। हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख

सिंधी सिख : इतिहास, आस्था और समकालीन यथार्थ

सिंधी सिख : इतिहास, आस्था और समकालीन यथार्थ सिंधी सिखों का संबंध सिंध प्रांत से है, जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है। सन 1947 ई. से पूर्व, जब देश का विभाजन नहीं हुआ था, उस समय सिंध प्रांत में हिंदुओं और मुसलमानों की जनसंख्या का अनुपात लगभग 20% और 80% था। सिंध प्रांत की

उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास

उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास (तप, त्याग और सिक्खी की सेवा का इतिहास) उदासी संप्रदाय: उत्पत्ति, परंपरा और ऐतिहासिक विकास (तप, त्याग और सिक्खी की सेवा का इतिहास) बाबा श्रीचंद जी के समय समाज में अज्ञानता का व्यापक प्रभुत्व था। उन्होंने अपने तपस्वी और प्रभावशाली जीवन के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप में फैली

 दक्खिनी (दक्षिणी) सिख : हजूरी संगत

 दक्खिनी (दक्षिणी) सिख : हजूरी संगत “दक्खिनी” शब्द, जिसे सिख समाज के कुछ वर्गों द्वारा कभी-कभी उपहास के भाव से प्रयुक्त किया जाता है, अपने वास्तविक अर्थ में केवल उस भौगोलिक क्षेत्र की ओर संकेत करता है, जहाँ ये सिख निवास करते हैं। उर्दू भाषा में “दक्षिण” का तात्पर्य दक्षिण दिशा से है। अविभाजित भारतीय