प्रसंग क्रमांक 17: जत्थेदार साहिब का परिवार तम्बाकू क्यों पीता है?
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
कभी-कभी इतिहास केवल ग्रंथों के पीले पड़ चुके पन्नों में नहीं मिलता, वह टूटे हुए घरों की दीवारों में, बुझी हुई आँखों में, और समय की मार से बिखर चुके परिवारों की निस्तब्ध पीड़ा में भी जीवित रहता है। आज जो इतिहास हम आपके समक्ष प्रस्तुत कर है, वह केवल दृश्य नहीं, अपितु एक ऐसा मौन इतिहास है, जिसकी प्रत्येक छवि के पीछे विगत चार-पाँच वर्षों का तप, संघर्ष, अध्ययन, वेदना और अनगिनत जागी हुई रातों का सत्य छिपा हुआ है। यह कोई साधारण कथा नहीं, अपितु उस परिवार की करुण गाथा है, जिसके मुखिया को स्वयं धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपने कर – कमलों से सम्मानित कर जत्थेदार नियुक्त किया था। जिस ‘जत्थेदार’ शब्द को सिख परंपरा में श्रद्धा, मर्यादा और गौरव का प्रतीक माना जाता है, उसी वंश की वर्तमान दशा जब हमारे समक्ष आई, तो आत्मा भीतर तक कांप उठी।
यह अत्यंत वेदना का विषय था कि गुरु साहिब जी के द्वारा सम्मानित वह परिवार समय के थपेड़ों से इतना टूट चुका था कि उसके जीवन में निर्धनता, उपेक्षा और सामाजिक विस्मृति के साथ – साथ शराब और तंबाकू जैसे नशों ने भी अपना स्थान बना लिया था। यह प्रश्न केवल एक परिवार का नहीं था, अपितु यह सम्पूर्ण कौम की आत्मा के सामने खड़ा एक मौन प्रश्न था कि आखिर इतिहास के वे दीपक, जिन्होंने गुरु घर की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, समय की धूल में इतने अकेले और असहाय कैसे छोड़ दिए गए? परन्तु इतिहास का दूसरा पक्ष उतना ही दिव्य है, क्योंकि जब – जब मानवता थकती है, गुरु साहिब स्वयं किसी न किसी रूप में सहारा बनकर प्रकट होते हैं। इस परिवार के जीवन में भी वही कृपा हुई। टीम खोज – विचार ने जब इस इतिहास की परतों को खोलना आरम्भ किया, तब यह केवल एक शोध नहीं रहा, अपितु एक आध्यात्मिक दायित्व बन गया।
संगत जी, इस पूरे इतिहास को खोज निकालना कोई सरल कार्य नहीं था। अनेक ऐसे तथ्य थे, जो वर्षों से मौन पड़े थे। कई लोगों के दरवाज़ों पर बार – बार जाना पड़ा, बुजुर्गों से विनम्र निवेदन करने पड़े, पुरातन ग्रंथों के धुंधले अक्षरों को रात – रात भर जागकर पढ़ना पड़ा। कहीं इतिहास अधूरा मिला, कहीं टूटी स्मृतियों में छिपा मिला, और कहीं लोगों की उपेक्षा के नीचे दबा हुआ मिला। तभी जाकर यह पीड़ामयी सत्य सामने आया कि शहीदी मार्ग का यह अध्याय केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, अपितु विस्मृत होती विरासत का मौन विलाप है।
इस ऐतिहासिक यात्रा के दौरान जब टीम खोज – विचार ग्राम करहाली पहुँची, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो समय स्वयं पीछे लौट रहा हो। इसी पावन भूमि पर गुरुद्वारा चरण – कमल साहिब सुशोभित है, जहाँ धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने विश्राम किया था और यहीं से आपने ग्राम चीका की ओर प्रस्थान किए था। पश्चात धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी भी इस स्थान पर पधारे। जिस वृक्ष के नीचे गुरु साहिब विराजमान हुए थे, वह आज भले ही अस्तित्व में नहीं है, परंतु उसकी स्मृति आज भी इस भूमि की वायु में सांस लेती प्रतीत होती है। पटियाला से लगभग चालीस-इकतालीस किलोमीटर दूर स्थित यह ग्राम, इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा लगता है मानो इस मिट्टी का प्रत्येक कण आज भी गुरु चरणों की आहट को अपने भीतर संजोए बैठा है।
पार्श्व-गायन: समय की धूल हटाती-सी मार्मिक सुर-लहरी, दर्शक को इतिहास की गहराइयों में ले जाती है।
गुरुद्वारा साहिब में सुशोभित धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी और धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की स्मृति मानो यह अनुभव कराती है कि इतिहास कभी मरता नहीं, वह केवल प्रतीक्षा करता है, किसी ऐसे हृदय की, जो उसे श्रद्धा से पुकार सके।
पार्श्व-गायन: गुरु चरणों की स्मृति में रची धुन, मन के भीतर श्रद्धा की कंपन पैदा करती है।
सन 2021 ईस्वी में जब टीम खोज विचार श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के यात्रा मार्ग की खोज में निकली, तब उद्देश्य केवल स्थानों की पहचान करना नहीं था, अपितु उन परिवारों को खोजना भी था, जिनकी सांसों में आज भी गुरु इतिहास की अंतिम बची हुई स्मृतियाँ जीवित थीं। इसी खोज के दौरान जो परिवार वीडियो क्लिप में दिखाई दे रहा है, वह भाई मतीदास जी का वंशज परिवार है, जिसे उत्तर प्रदेश के बिलासपुर क्षेत्र से खोज निकाला गया। यह केवल एक खोज नहीं थी, अपितु इतिहास के एक खोए हुए अध्याय का पुनर्जन्म था। सम्माननीय श्री अकाल तख्त साहिब जी के जत्थेदार भाई कुलदीप सिंह जी गढ़ गज्ज जी स्वयं इस परिवार के निवास पर पहुँचे और उन्हें सम्मानित किया। गुरु साहिब की ऐसी कृपा हुई कि संगत के सहयोग से इस परिवार के लिए एक भव्य निवास का निर्माण भी संभव हो सका। आज दूर-दराज से संगत इस परिवार के पास पहुँचती है और उन पुरातन निशानियों के दर्शन करती है, जिन्हें इस परिवार ने पीढ़ियों तक अपनी निर्धनता के बीच भी सहेज कर रखा।
पार्श्व-गायन: पृष्ठभूमि में गुरु-स्मृति जागृत करती कोमल, आध्यात्मिक धुन प्रवाहित है।
इसी प्रकार जब भाई दयाला जी के इतिहास की खोज प्रारंभ हुई; जिन्हें उबलते हुए जल की देग में बैठाकर शहीद किया गया था, तब उनके वंशजों की पहचान भी टीम खोज – विचार के अथक प्रयासों से संभव हो सकी। दिल्ली में हुए एक समागम में इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह जी खोजी के साथ इन शहीद परिवारों की उपस्थिति ने उस इतिहास को जीवंत कर दिया, जिसे लोग केवल पुस्तकों तक सीमित समझते थे। इसी शोध के दौरान कवि संतोख सिंह जी द्वारा रचित सूरज प्रकाश ग्रंथ की वे पंक्तियाँ आत्मा को झकझोर देती हैं, जिनमें वे लिखते हैं कि उन्होंने स्वयं भाई गलौरा जी के परिवार को अत्यंत दयनीय अवस्था में जीवन व्यतीत करते हुए देखा था। उन्होंने लिखा कि यह निर्धन परिवार सिख कौम के सहारे का अधिकारी है। परन्तु कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि सौ वर्षों से अधिक समय बीत जाने के पश्चात भी किसी ने उस पुकार को सुनने का प्रयास नहीं किया। न जाने ऐसे कितने परिवार होंगे, जो इतिहास की अंधेरी गलियों में आज भी मौन खड़े सहायता की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
जब यह ऐतिहासिक खोज ग्राम चीका पहुँची, तब मार्ग पर एक भव्य गुरुद्वारा दिखाई दिया — “शहीदी मार्ग श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी।” अत्यंत सुंदर निर्मित यह स्थान, अपनी विशाल पालकी और आकर्षक स्वरूप के कारण दूर से ही श्रद्धा उत्पन्न करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो यदि इस पालकी को स्वर्ण से भी मढ़ दिया जाए, तब भी उसकी भव्यता में कोई कमी न आए। परन्तु जब स्थानीय बुजुर्गों से इस स्थान के संबंध में जानकारी प्राप्त की गई, तब उन्होंने अत्यंत सरलता से बताया कि यह गुरुद्वारा केवल उस मार्ग की स्मृति में बनाया गया है, जहाँ से धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी गुजरे थे। वास्तविक इतिहास से संबंधित स्थान ग्राम के भीतर स्थित उस स्थान से है, जो गलौरा मसंद के निवास से जुड़ा हुआ है। यह सुनकर मन भीतर तक सोच में डूब गया कि इतिहास का वास्तविक केंद्र कहीं और था, और समय ने स्मृति का केंद्र कहीं और निर्मित कर दिया। यही इतिहास की सबसे बड़ी विडम्बना भी है, कभी – कभी सत्य मौन कोनों में पड़ा रहता है और जगमगाहट केवल प्रतीक बनकर रह जाती है।
जब टीम खोज – विचार ग्राम चीका के भीतर स्थित उस ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब में पहुँची, जहाँ इतिहास की अंतिम धड़कनों को खोजने का प्रयास किया जा रहा था, तब मन में एक गहरी आशा थी कि शायद यहां से गलौरा मसंद के परिवार के संबंध में कोई सूत्र प्राप्त हो जाए। परन्तु जब वहां उपस्थित लोगों से इस विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाही गई, तो अधिकांश ने अनभिज्ञता प्रकट करते हुए कहा कि उन्हें इस परिवार के विषय में कुछ ज्ञात नहीं है। यह उत्तर केवल निराशाजनक ही नहीं था, अपितु भीतर कहीं एक गहरी पीड़ा उत्पन्न कर रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो इतिहास स्वयं अपने ही घर में अनाथ होकर खड़ा हो। जब हरियाणा राज्य की गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से संपर्क स्थापित कर ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए जानकारी प्राप्त करनी चाही गई, तब वहां से जो उत्तर प्राप्त हुआ, उसने आत्मा को भीतर तक विचलित कर दिया। कहा गया- “मरे हुए और गड़े हुए मुर्दों को खोदने की क्या आवश्यकता है?”
यह वाक्य केवल एक उत्तर नहीं था, अपितु उस मानसिकता का प्रतीक था, जिसने वर्षों से अनेक ऐतिहासिक परिवारों को विस्मृति के अंधकार में धकेल दिया। परन्तु मन को चैन नहीं आया। भीतर कहीं एक दृढ़ विश्वास लगातार जन्म ले रहा था कि यदि कवि भाई संतोख सिंह जी अपने ग्रंथों में इस परिवार का उल्लेख कर रहे हैं, तो निश्चित ही इतिहास की वह शृंखला कहीं न कहीं आज भी जीवित होगी। उसी क्षण मन ही मन सच्चे पातशाह के चरणों में अरदास की गई- “हे धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी! यह कार्य अब आपका ही है। यदि यह सेवा आपने हमें प्रदान की है, तो इसकी पूर्णता भी आपकी ही कृपा से संभव होगी। हमारी बांह पकड़कर इस महान कारज को आप ही संपन्न कराए।”
उसके पश्चात यह खोज केवल एक ऐतिहासिक प्रयास नहीं रही, अपितु एक आध्यात्मिक यात्रा बन गई। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ग्राम चीका के अनेक चक्कर लगाए गए। पुराने बुजुर्गों से भेंट की गई, भूली – बिसरी स्मृतियों को जोड़ने का प्रयास किया गया। यहां तक कि हरिद्वार जाकर पंडितों के वंशावली रिकॉर्ड तक खंगाले गए। अनगिनत कठिनाइयों, निराशाओं और प्रतीक्षाओं के पश्चात अंततः उस गलौरा परिवार की जानकारी प्राप्त हो ही गई। ऐसा प्रतीत हुआ मानो इतिहास ने वर्षों बाद पहली बार अपने मौन को तोड़ा हो।
जब टीम पुनः ग्राम चीका पहुँची और ग्रामवासियों से उस परिवार के संबंध में वार्तालाप किया, तब ज्ञात हुआ कि वह परिवार आज भी उसी ग्राम में निवास करता है। परन्तु लोगों की दृष्टि में उनकी पहचान अब केवल “मसंदों का परिवार” भर रह गई थी। लोगों ने कहा- “वह तो तंबाकू पीते हैं, जर्दा चबाते हैं, आप उन्हें सिक्खी की मुख्यधारा में कैसे लेकर आएंगे?” यह सुनकर मन अत्यंत व्यथित हुआ, परन्तु भीतर से एक ही उत्तर निकला- “यह सेवा हमें गुरु साहिब से प्राप्त हुई है, हम अपनी कोशिश अवश्य जारी रखेंगे।”
उस समय सम्पूर्ण सिख कौम धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का 350वाँ शहीदी गुरु पर्व मना रही थी। मन में यही विचार उठ रहा था कि शायद गुरु साहिब स्वयं इस परिवार की बांह पकड़ने के लिए ही यह मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। यदि यह परिवार पुनः गुरु की शरण में आ जाए, यदि इन टूटे हुए वंशजों को पुनः सिक्खी की मुख्यधारा से जोड़ा जा सके, तो इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? यह केवल एक परिवार को जोड़ना नहीं था, अपितु इतिहास की टूटी हुई कड़ी को पुनर्जीवित करना था।
जब स्थानीय कमेटी के सदस्यों से इस विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाही गई, तब वहां से भी नकारात्मक उत्तर ही मिला। परन्तु खोज रुकने वाली नहीं थी। इसी दौरान जब इस विषय पर लाइव वीडियो प्रसारित किया गया, तब गलौरा परिवार के मुखिया बाबूराम जी की जानकारी प्राप्त हुई। यह ज्ञात हुआ कि अब वे सिख धर्म के अनुयायी नहीं रहे। जब पहली बार उनसे भेंट हुई और उन्हें दौड़कर आलिंगन में लिया गया, तब उस क्षण भीतर ऐसा अनुभव हुआ मानो कोई खोई हुई विरासत वर्षों बाद पुनः मिल गई हो। अंतरात्मा बार – बार यही कह रही थी- “यह वही परिवार है, जिसे धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपने हाथों से सम्मानित कर जत्थेदार नियुक्त किया था।”
उस क्षण मन में एक अत्यंत पीड़ादायक विचार भी उठा कि हमारी ऊँची – ऊँची इमारतें, हमारे भव्य भवन और उनमें लगे चमकदार पत्थर, पता नहीं ऐसे कितने परिवारों को गुमनामी के अंधेरे में छोड़ चुके हैं। जिन कार्यों को सिख कौम को अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए था, हम उनसे कोसों दूर निकल गए। आज भी न जाने कितने ऐसे परिवार हैं, जो दर – दर भटक रहे हैं, जबकि कभी वे गुरु साहिब की विशेष कृपा और छत्र-छाया में थे। वह छत्र-छाया, वह “कलावा”, जो कभी इन परिवारों की पहचान हुआ करता था, समय के अंधकार में कहीं खो गया। आज हमारी छत्र-छाया किसी और दिशा में विस्तृत है, परन्तु गुरु के अपने परिवार ही उपेक्षित रह गए।
जब ग्रामवासियों के साथ बैठकर इस परिवार को उनकी वास्तविक विरासत के विषय में बताया गया, तब परिवार के मुखिया बाबूराम जी दहाड़ें मारकर रो पड़े। वे बार – बार यही कह रहे थे- “मुझे तो इस विरासत की जानकारी ही नहीं थी। हम तो सिख धर्म की मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं। हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई।” वह वातावरण इतना भावुक और करुणामय था कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति की आंखें नम हो चुकी थीं। इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह खोजी जी भी अपने आंसुओं को रोक नहीं सके। उन्होंने इस परिवार के दुख को अपना दुख मानकर उनके साथ बैठकर रोते हुए अपनी सहभागिता प्रकट की। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों से बिछड़ा हुआ इतिहास आज स्वयं रो रहा हो। वहां उपस्थित सभी लोग इस परिवार को गले लगाकर, अपने आंसुओं के माध्यम से उनके दुख को बांटने का प्रयास कर रहे थे।
उसी भावनात्मक वातावरण में इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह खोजी जी अनायास बोल पड़े कि हमारी संस्थाओं, हमारी कमेटियों और हमारे धार्मिक संगठनों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने स्मरण करवाया कि दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रमुख सदस्य सरदार सरबजीत सिंह जी सरना ने भी अपने फेसबुक लेख में उल्लेख किया था कि जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी शहादत देने के लिए दिल्ली की ओर जा रहे थे, तब वे गलौरा मसंद के पास ठहरे थे। उस समय जब गुरु साहिब ने संगत को वापस लौटने के लिए कहा, तब संगत ने अत्यंत करुण भाव से निवेदन किया था कि वे गुरु साहिब का वियोग सहन नहीं कर सकते। तब गुरु साहिब ने वचन किए थे कि “जो श्रद्धा से यहां आएगा, उसे मेरे दर्शन होंगे और उसकी मुरादें पूरी होंगी।”
आज वही परिवार दहाड़ें मार – मारकर संगत से कह रहा था- “हमें जोड़ लो….. हमें अपनी मुख्यधारा में वापस ले लो…” यह दृश्य केवल करुणा नहीं, अपितु आत्ममंथन का विषय था। इतिहास की यह सबसे बड़ी शोकांतिका थी कि जहां अन्य धर्मों के लोग घर – घर जाकर अपने अनुयायियों को जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं गुरु के अपने सिखों का परिवार स्वयं पुकार रहा था कि “हमें अपना लो।” उस परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि उन्हें दो समय की रोटी तक सही ढंग से उपलब्ध नहीं हो पाती थी। परन्तु इसके बावजूद उनके भीतर गुरु घर से पुनः जुड़ने की तीव्र इच्छा जीवित थी। उन्होंने वचन दिया कि वे अवश्य सिख धर्म की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं।
यह दृश्य मन को भीतर तक झकझोर देने वाला था। एक ओर करोड़ों रुपये खर्च कर विशाल लंगर और आयोजन किए जा रहे हैं, दूसरी ओर गुरु के अपने वंशज रोटी के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे निर्धन और उपेक्षित परिवारों की बांह पकड़ना भी तो उतना ही आवश्यक है। यदि यह परिवार पुनः खंडे-बाटे का अमृत छककर “सिंघ” स्वरूप धारण कर ले, तो शायद उस दिन यह कहने का सौभाग्य पुनः प्राप्त होगा कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी, जिनको आप जत्थेदार नियुक्त कर गए थे, उनके वंशज पुनः गुरु की गोद में लौट आए हैं।
एक स्थानीय बुजुर्ग ने अत्यंत वेदना के साथ बताया कि वर्षों से अनेक संस्थाएं और कमेटियां यहां आती रहीं। सभी को ज्ञात था कि यह गलौरा मसंद का परिवार है, परन्तु किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। किसी ने यह प्रयास नहीं किया कि उन्हें पुनः मुख्यधारा से जोड़ा जाए, किसी ने उनकी सहायता का हाथ नहीं बढ़ाया। उस बुजुर्ग ने भावुक होकर कहा कि वह टीम खोज – विचार के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने सही खोज कर इस परिवार को केवल इतिहास से नहीं, अपितु सम्मान और सहारे से भी जोड़ने का कार्य किया है।
इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह खोजी जी ने अत्यंत गंभीर स्वर में संगत को संबोधित करते हुए बताया कि जब इस विषय पर गहन अध्ययन आरम्भ किया गया, तब केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, अपितु अनेक प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथों के संदर्भों के माध्यम से इस सत्य को खोजा गया। उन्होंने कहा कि महान कोश के रचयिता भाई काहन सिंह जी नाभा द्वारा रचित महान कोश के पृष्ठ क्रमांक 401 का अध्ययन करने पर भाई गलौरा जी के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसी प्रकार जब डॉ. रतन सिंह जग्गी जी द्वारा रचित सिख पंथ विश्वकोश का अध्ययन किया गया, तब पृष्ठ क्रमांक 365 पर भी इस परिवार के संबंध में उल्लेख प्राप्त हुआ। कवि भाई संतोख सिंह जी ने अपने महान ग्रंथ में पृष्ठ क्रमांक 4357 पर इस परिवार की साखी अंकित की है। जब ज्ञानी ज्ञान सिंह जी रचित तवारीख गुरु खालसा का अध्ययन किया गया, तब पृष्ठ क्रमांक 724 पर भी इस ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख मिला। इसी प्रकार प्रिंसिपल सतबीर सिंह जी द्वारा लिखित इति जनकारी में पृष्ठ क्रमांक 172 पर भी इस परिवार से संबंधित जानकारी उपलब्ध है। इन सभी ऐतिहासिक प्रमाणों, पुरातन ग्रंथों और तथ्यों की परत – दर – परत जांच करने के पश्चात ही टीम खोज – विचार इस निष्कर्ष तक पहुँची कि यह वही परिवार है, जिसे इतिहास ने लगभग विस्मृत कर दिया था।
डॉ. खोजी जी ने अत्यंत भावुक होकर आगे कहा कि भविष्य में यह जानकारी भी संगत के समक्ष रखी जाएगी कि आखिर इस परिवार को इतने असहनीय दुख और संघर्ष क्यों सहन करने पड़े? परन्तु उस समय सबसे बड़ी प्रसन्नता इस बात की थी कि वर्षों से बिछड़ा यह परिवार पुनः गुरु घर की ओर लौटने की इच्छा प्रकट कर रहा था। मन बार – बार सच्चे पातशाह के चरणों में यही अरदास कर रहा था कि हे गुरु साहिब! इस परिवार को पुनः अपनी छत्र-छाया में स्थान प्रदान करें। कौन जानता है कि भविष्य में इसी परिवार के बच्चे सिख कौम के महान प्रचारक बनकर सामने आएँ, क्योंकि लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व स्वयं गुरु साहिब ने इस परिवार को सिख धर्म के प्रचार के लिए ही मनोनीत किया था।
गुरु साहिब की असीम कृपा से जब इस परिवार को दिल्ली के चांदनी चौक ले जाया गया, तब वह दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला था। वहीं, उसी पावन धरती पर, जहाँ धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने मानवता और धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश अर्पित किया था, इस परिवार ने खंडे-बाटे का अमृत छककर पुनः गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्र होने का गौरव प्राप्त किया। वह क्षण केवल एक धार्मिक रस्म नहीं था, अपितु इतिहास के पुनर्जन्म का क्षण था। संगत की आँखों में आंसू थे, हृदयों में भावनाओं का सैलाब था, और आत्मा यह अनुभव कर रही थी कि साढ़े तीन सौ वर्षों से बिछड़ा हुआ परिवार आज पुनः गुरु चरणों में लौट आया है।
परन्तु डॉ. खोजी जी ने अत्यंत यथार्थवादी भाव से कहा कि वास्तविक संघर्ष तो अभी शेष था। सिख धर्म की मुख्यधारा में लौट आना एक आध्यात्मिक उपलब्धि अवश्य थी, परन्तु जीवन के कठोर प्रश्न अभी भी सामने खड़े थे। “अब इन्हें सहारा कौन देगा? इनके बच्चों का भविष्य कौन संवारेगा? इनके लिए रोजगार कौन उपलब्ध कराएगा?” यह वे प्रश्न थे, जो उस समय प्रत्येक संवेदनशील हृदय को भीतर तक विचलित कर रहे थे। जब टीम खोज – विचार ने हरियाणा कमेटी से मिलकर इस परिवार की वास्तविक स्थिति से अवगत करवाया, तब उन्होंने तत्काल सहयोग करते हुए परिवार के मुखिया बाबूराम जी को नौकरी प्रदान की। इस सहयोग के लिए टीम खोज – विचार ने हरियाणा कमेटी के प्रति अपना हृदय से आभार व्यक्त किया, क्योंकि किसी टूटे हुए परिवार को सम्मान पूर्वक जीवन देना भी सेवा का ही एक स्वरूप है।
समय धीरे – धीरे आगे बढ़ता गया, परन्तु इस प्रसंग ने डॉ. खोजी जी के भीतर एक और गहरी पीड़ा को जन्म दिया। उन्होंने अत्यंत भावुक होकर कहा कि आज हमारे गुरु घरों में सेवा करने वाले कर्मचारियों, ग्रंथी सिंघों, रागी सिंघों, कीर्तनियों और कथाकारों का जीवन कितना संघर्षपूर्ण है। उन्होंने रुकते हुए कहा- “मैं आगे बोलना नहीं चाहता…” परन्तु उनकी आँखों की नमी स्वयं बहुत कुछ कह रही थी। उन्होंने कहा कि आज स्थिति यह है कि कोई ग्रंथी सिंघ अपने बच्चों को ग्रंथी नहीं बनाना चाहता, कोई रागी सिंघ नहीं चाहता कि उसका पुत्र आगे इस सेवा में आए। कारण यह नहीं कि उन्हें गुरु घर से प्रेम नहीं, अपितु कारण यह है कि हमारे ओहदेदारों और संस्थाओं ने उनके परिवारों को वह सहारा नहीं दिया, जिसके वे अधिकारी थे।
आज भी असंख्य सेवादार, रागी सिंघ, कीर्तनिए और कथावाचक घुटन भरे वातावरण में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। फिर भी वे सेवा कर रहे हैं, क्योंकि उनके भीतर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है। यदि यह श्रद्धा न होती, तो वे बहुत पहले ही सब कुछ छोड़कर जा चुके होते। वास्तव में ये सभी गुरु की छत्र-छाया में “सब्र का घूंट” पीकर अपना जीवन काट रहे हैं। डॉ. खोजी जी ने कहा कि यदि हम अपने ही सिख परिवारों को सहारा देना आरम्भ करें, तो वास्तविक प्रचार यहीं से प्रारम्भ होगा। फिर अत्यंत विनम्रता से उन्होंने कहा- “माफ करना, यह मेरी व्यक्तिगत भावनाएँ हैं… हमारी अपनी पीड़ा है…”
इस परिवार की स्थिति भी अत्यंत दयनीय थी। जिस घर में वे रहते थे, वह जर्जरता की अंतिम सीमा पर खड़ा था। एक दिन परिवार ने भयभीत स्वर में कहा कि “जिस घर में हम रह रहे हैं, कहीं वह गिर न जाए…” और दुर्भाग्य से वही हुआ। वर्षा के दिनों में वह टूटा – फूटा मकान ढह गया। यह गुरु साहिब की कृपा ही थी कि उस भयानक हादसे में बच्चों की जान बच गई। उस समय परिवार की महिला ने रो – रोकर अपनी व्यथा सुनाई। वे कह रही थीं- “हो सकता था कि इस हादसे में हमारा पूरा परिवार समाप्त हो जाता। बच्चे अभी बहुत छोटे हैं, अब हम कहाँ जाएँ? किसके घर शरण लें?”
सबसे अधिक पीड़ा इस बात की थी कि उस समय किसी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने उन्हें अस्थायी निवास के रूप में एक कमरा तक उपलब्ध नहीं करवाया था। ठंड का मौसम था। साहिबजादों की शहादत का सप्ताह चल रहा था। उसी समय डॉ. खोजी जी ने उन बच्चों को साहस देते हुए कहा- “साहिबजादों के इतिहास को याद करो। उन्हें भी ठंडे बुर्ज में कैद रखा गया था।” यह कहते हुए उनका गला भर आया। उन्होंने कहा कि आज भी अनेक माताएँ उसी ठंडे बुर्ज की स्मृति में झोपड़ियों में रातें काट रही हैं। यह कितनी विडंबना थी कि जिस परिवार को गुरु साहिब ने स्वयं जत्थेदार नियुक्त किया था, उसके पास सिर छुपाने के लिए भी सुरक्षित स्थान नहीं था।
पड़ोसियों ने भी उन्हें किराए पर मकान देने से मना कर दिया। मजबूरी में परिवार को घर के बाहर तंबू लगाकर रहना पड़ा। कल्पना कीजिए संगत जी, उस परिवार की स्थिति क्या रही होगी? बरसात, ठंड, छोटे – छोटे बच्चे, और सिर पर कोई स्थायी छत नहीं। यह सोचकर आत्मा कांप उठती है कि यह वही परिवार था, जिसे कभी धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपने विश्वास का प्रतीक बनाकर जत्थेदार नियुक्त किया था।
परन्तु सच्चे पातशाह की कृपा कभी समाप्त नहीं होती। डॉ. खोजी जी ने अत्यंत विनम्रता से संगत का धन्यवाद करते हुए कहा कि आपकी आशीष और सहयोग से यह सेवा हमारी झोली में पड़ी और उसी के परिणामस्वरूप उस टूटे हुए घर का पुनर्निर्माण प्रारम्भ हुआ। तीन से चार महीनों के अथक प्रयासों के पश्चात संगत के सहयोग से यह परिवार पुनः अपने पक्के घर में आ बसा। वह दिन अत्यंत आनंद और संतोष का था, जब गुरु घर के कीर्तनिए भी उस नव-निर्मित घर में पहुँचे और वहाँ गुरु साहिब का यशगान गूंज उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वर्षों बाद उस घर की दीवारों ने पहली बार राहत की सांस ली हो।
परिवार के मुखिया बाबूराम जी ने डॉ. खोजी जी का हाथ पकड़कर अश्रुपूरित नेत्रों से धन्यवाद प्रकट किया। पूरे परिवार ने संगत को फतेह बुलाकर अपना आभार व्यक्त किया। वह दृश्य केवल धन्यवाद का नहीं, अपितु विश्वास की पुनर्स्थापना का था।
इसके पश्चात डॉ. खोजी जी ने अत्यंत गंभीर स्वर में कहा कि घर तो बन गया, परन्तु जीवन की वास्तविक कठिनाइयाँ अभी भी समाप्त नहीं हुई थीं। परिवार के मुखिया की मासिक आय मात्र सात से आठ हजार रुपये के बीच थी। इतने अल्प वेतन में घर कैसे चलता? बच्चों को शिक्षा कैसे मिलती? तभी विचार आया कि परिवार के छोटे बच्चे सरदार गुरप्रीत सिंह जी को किसी अच्छे शिक्षण संस्थान में भेजा जाए। टीम खोज – विचार अनेक संस्थाओं, बड़ी – बड़ी अकादमियों और संगठनों के पास पहुँची, परन्तु अधिकांश स्थानों पर यही उत्तर मिला- “यदि पैसे हैं तो शिक्षा मिल जाएगी, परन्तु ऐसे बच्चों के लिए हमारे पास कोई विशेष योजना नहीं है।”
यह उत्तर निराशाजनक था, परन्तु गुरु साहिब की कृपा पुनः प्रकट हुई। जर्मनी निवासी एक संवेदनशील बहन जी ने टीम के निवेदन को स्वीकार किया और इस बच्चे की शिक्षा – दीक्षा की सम्पूर्ण जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। आज उस बच्चे की शिक्षा का शुल्क जर्मनी से आता है और वह वडू साहिब की अकादमी में उत्तम शिक्षा प्राप्त कर रहा है। सबसे अधिक प्रसन्नता की बात यह है कि पढ़ाई के साथ – साथ उस बच्चे ने कीर्तन करना भी प्रारम्भ कर दिया है। आज जब उसकी मधुर वाणी में गुरु यश गूंजता है, तब ऐसा अनुभव होता है कि इतिहास की टूटी हुई कड़ी धीरे – धीरे पुनः जुड़ रही है। वह दिन अब दूर नहीं प्रतीत होता, जब यही बालक सिख कौम के एक समर्थ प्रचारक के रूप में अपनी सेवाएँ अर्पित करेगा, और शायद तब इतिहास स्वयं मुस्कराकर कहेगा- “जिस दीपक को समय ने बुझा हुआ समझ लिया था, गुरु कृपा ने उसे पुनः प्रज्वलित कर दिया।”
इस परिवार की दो बेटियाँ आज भी अत्यंत श्रद्धा और मर्यादा के साथ सिक्खी जीवन व्यतीत कर रही हैं। उनके भीतर अपने इतिहास के प्रति गर्व और गुरु घर के प्रति गहरी आस्था स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इन बेटियों ने गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से विनम्र निवेदन किया था कि उन्हें संगत के समक्ष कीर्तन करने और अपने परिवार का इतिहास सुनाने का अवसर प्रदान किया जाए। परन्तु कितना दुर्भाग्यपूर्ण दृश्य था कि जब तक उन्हें समय दिया गया, तब तक अधिकांश संगत जा चुकी थी। उस समय गुरु घर में केवल चार श्रद्धालु उपस्थित थे। वे बेटियाँ अपने भीतर वर्षों से संजोया हुआ इतिहास ठीक प्रकार से व्यक्त भी नहीं कर पाईं। उनके स्वर में श्रद्धा थी, आँखों में पीड़ा थी, परन्तु सुनने वाला समाज बहुत छोटा रह गया था। यह केवल एक परिवार की वेदना नहीं थी, अपितु उस ऐतिहासिक उपेक्षा का प्रतीक था, जो वर्षों से इन परिवारों को सहनी पड़ रही थी।
जब संगत के सहयोग से उनका घर पुनः बनकर तैयार हुआ, तब पहली बार ऐसा प्रतीत हुआ कि यह परिवार अब कुछ हद तक सम्मान पूर्वक और शांतिपूर्ण जीवन जीने की स्थिति में पहुँच रहा है। टूटी हुई दीवारों की जगह पक्के घर की छत ने ले ली थी, परन्तु उन वर्षों की पीड़ा अभी भी उनके हृदयों में जीवित थी।
सन 2025 ईस्वी में जब टीम खोज – विचार को हरियाणा के ग्राम दातोली से निमंत्रण प्राप्त हुआ, तब यह यात्रा इतिहास के एक और महत्वपूर्ण अध्याय की ओर बढ़ी। ग्राम दातोली बंजारा सिखों के सबसे बड़े केंद्रों में से एक माना जाता है। इस स्थान पर बड़ी संख्या में बंजारा सिख निवास करते हैं। कार्यक्रम के दौरान डॉ. भगवान सिंह खोजी जी ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सिख धर्म का प्रचार करते हुए संगत को बताया कि किस प्रकार इन बंजारा सिखों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया। उन्हें बड़े समूहों में दरबार साहिब अमृतसर, श्री आनंदपुर साहिब और अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारों की यात्रा करवाई गई। उस समय असंख्य बंजारा सिखों ने खंडे-बाटे का अमृत छककर “सिंघ” स्वरूप धारण किया था।
जब डॉ. खोजी जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण प्राप्त हुआ और यह ज्ञात हुआ कि हरियाणा कमेटी के प्रधान सरदार जगजीत सिंह जी झिंडा साहिब भी स्वयं इस कार्यक्रम में उपस्थित होने वाले हैं, तब उन्होंने इस अवसर को अत्यंत महत्वपूर्ण समझा। संगत के विशाल समागम के मध्य उन्होंने गलौरा परिवार के इतिहास को अत्यंत भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया और कहा कि इस परिवार की आर्थिक सहायता करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने संगत को स्मरण करवाया कि जब सम्पूर्ण कौम धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का 350वाँ शहीदी पर्व मना रही है, तब यह केवल उत्सव नहीं, अपितु आत्ममंथन का अवसर भी है।
हरियाणा कमेटी की ओर से ग्राम चीका से जो ऐतिहासिक यात्रा प्रारम्भ की गई थी, उस यात्रा के दौरान डॉ. खोजी जी ने प्रधान साहिब से विशेष निवेदन कर इस परिवार को यथोचित सम्मान दिलाया। उस समय परिवार के सदस्यों की आँखों से बहते हुए आंसू मानो स्वयं बोल रहे थे- “हे सच्चे पातशाह! आपने हम गरीबों पर दया कर हमें पुनः मान – सम्मान प्रदान किया।” यह वही क्षण था जब स्पष्ट अनुभव हो रहा था कि गुरु और संगत, यदि चाहे, तो टूटे हुए जीवनों को भी फिर से संवार सकते हैं।
डॉ. खोजी जी ने प्रधान साहिब से अत्यंत विनम्रता के साथ कहा कि यदि वे इस परिवार का सहारा बन जाएँ, तो यह संसार के सामने एक मिसाल होगी। उन्होंने कहा कि “धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शहीदी पर्व तभी सच्चे अर्थों में सफल होगा, जब उनके द्वारा मनोनीत परिवारों को सम्मान और सुरक्षा प्राप्त होगी।” उस समय संगत के जयकारे और भावनाओं से भरा वातावरण इस बात की पुष्टि कर रहा था कि उपस्थित प्रत्येक हृदय वैराग्य और संवेदना से भरा हुआ है।
उस दिन ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा वातावरण शहादत की स्मृतियों में डूब गया हो। संगत की आँखों में आंसू थे और मन में करुणा। उसी समय प्रधान साहिब सरदार जगजीत सिंह जी झिंडा ने अत्यंत दयालु भाव से इस परिवार को सम्मान पूर्वक स्थायी नौकरी देने का वचन दिया, ताकि उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। वह वचन उस परिवार के लिए केवल रोजगार का आश्वासन नहीं था, अपितु वर्षों से टूटे हुए आत्मविश्वास को पुनर्जीवित करने वाली आशा की किरण था।
समय धीरे – धीरे आगे बढ़ता रहा। बाद में जब श्री पटना साहिब से आई जागृति यात्रा में इन ऐतिहासिक परिवारों को शामिल किया गया, तब स्थान – स्थान पर उन्हें सम्मानित किया गया। श्री आनंदपुर साहिब की पावन धरती पर स्थित गुरुद्वारा शीशगंज साहिब- जहाँ धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के पवित्र शीश का संस्कार किया गया था, उस मुख्य मंच पर खड़े होकर डॉ. खोजी जी ने संगत को इस खोजे गए परिवार की पूरी जानकारी प्रदान की। परन्तु अफसोस की बात यह थी कि इतने सम्मान और यात्राओं के पश्चात भी यह परिवार आज मात्र ₹300 प्रतिदिन की दिहाड़ी पर अपना जीवन व्यतीत कर रहा है।
परिवार के मुखिया की नौकरी में अब केवल दो-तीन वर्ष ही शेष रह गए हैं, परन्तु आज तक उनकी नौकरी को स्थायी नहीं किया गया। केवल वादे किए गए। भविष्य क्या होगा? यह कोई नहीं जानता। उसी मंच से डॉ. खोजी जी ने अपना मोबाइल क्रमांक 9781913113 संगत को बताते हुए विनम्र अपील की कि सम्पूर्ण सिख कौम को इस परिवार का सहारा बनने की आवश्यकता है। वह केवल एक निवेदन नहीं था, अपितु इतिहास की ओर से कौम के लिए किया गया मौन आह्वान था।
संगत जी, यह संपूर्ण कठिन सफर लगभग पाँच वर्षों की अथक तपस्या के पश्चात पूर्ण हुआ। आज सरदार बाबू सिंघ जी, जिनके परिवार के पास कभी इस ग्राम में खेत – खलिहान, घर और सम्मान था, उसी गुरुद्वारा साहिब में बरछा लेकर पहरेदार के रूप में अपनी सेवाएँ निभा रहे हैं। यही भाई गलौरा जी के वंशज हैं। यह दृश्य इतिहास की उस विडंबना को प्रकट करता है, जहाँ कभी गुरु घर के विशेष कृपापात्र रहे परिवार आज जीवनयापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जब हम इस परिवार के मूल इतिहास को देखते हैं, तब आत्मा श्रद्धा से भर उठती है। धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी जब अपने सौ सिखों के साथ नानकमत्ता की ओर यात्रा कर रहे थे, तब इस स्थान पर पहुँचकर उन्होंने देखा कि एक छोटा-सा बालक अत्यंत निष्ठा के साथ घोड़ों की सेवा कर रहा है। गुरु साहिब ने प्रेमपूर्वक उसे अपने पास बुलाया और पूछा- “तुम इतनी सेवा कर रहे हो, तुम्हारा नाम क्या है?” उस बालक ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया- “गलौरा…”
जब गुरु साहिब ने उसके माता – पिता के विषय में पूछा, तब उस बालक ने अपना सिर झुका लिया। ग्रामवासियों ने हरियाणवी बोली में बताया कि “इसके माता – पिता नहीं हैं… यह अनाथ बच्चा है, परन्तु सेवा-भाव बहुत है।” यह सुनते ही गुरु साहिब का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने उस बालक को अपनी गोद में उठा लिया और वचन किए- “कोई बात नहीं… यह अब मेरा ही पुत्र है।”
वह क्षण केवल दया का नहीं, अपितु गुरु कृपा के इतिहास का प्रारम्भ था। भाई गलौरा जी ने आगे चलकर सातवें पातशाह जी की भी अत्यंत सेवा की। समय बीतता गया और जब वे युवा हुए, तब कवि भाई संतोख सिंह जी लिखते हैं कि एक दिन इसी ग्राम का एक व्यक्ति अमृतसर पहुँचा। वहाँ उसने भाई गलौरा जी को सेवा करते हुए पहचान लिया। जब गुरु साहिब ने पूछा कि “आप कौन हैं?” तब उस व्यक्ति ने उत्तर दिया — “म्हारे गाँव का है… कई वर्षों बाद इस स्थान पर आया हूँ और सेवा करते हुए इसे पहचान लिया।”
उस समय गुरु साहिब ने उस सज्जन को अपने समीप बुलाकर वचन किए कि वे भाई गलौरा जी को उनके ग्राम वापस ले जाएँ, उन्हें प्रचारक की सेवा प्रदान करें और उनका विवाह भी करवाएं। गुरु आज्ञा के अनुसार भाई गलौरा जी अपने ग्राम लौट आए। उनका विवाह हुआ और उनकी पत्नी अत्यंत भोली एवं सरल स्वभाव की थी।
जब यह पति – पत्नी धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के दर्शन के लिए पहुँचे, तब गुरु साहिब ने उन्हें आशीर्वाद देकर “मसंद” की पदवी पर मनोनीत किया। साथ ही उन्हें यह जिम्मेदारी प्रदान की गई कि जो भी संगत गुरु घर के लिए “दसवंध” के रूप में धन अर्पित करे, उसे एकत्रित कर गुरु घर तक पहुँचाया जाए। यही वह ऐतिहासिक क्षण था, जहाँ से इस परिवार का संबंध गुरु घर की सेवा और उत्तरदायित्व से स्थायी रूप से जुड़ गया।
इतिहास के इस अत्यंत संवेदनशील अध्याय में एक ऐसी घटना का वर्णन प्राप्त होता है, जो यह स्पष्ट कर देती है कि कभी – कभी मनुष्य का पतन बाहरी शत्रुओं से नहीं, अपितु एक छोटी-सी असावधानी, एक क्षणिक भ्रम और धर्म से विचलित हो जाने के कारण होता है। एक दिन भाई गलौरा जी किसी कार्यवश बाहर गए हुए थे। उसी समय उनकी पड़ोसन ने उनकी पत्नी से बातचीत करते हुए कहा- “तुम्हारे पास जो गुरु घर की माया एकत्रित है, उसे बहुत समय हो गया है। अभी तक वह गुरु साहिब तक नहीं पहुँचाई गई।” उस भोली और सरल हृदय पत्नी ने सहज भाव से उत्तर दिया- “हाँ, अब तो बहुत माया एकत्रित हो गई है, उसमें कुछ सोने के सिक्के भी हैं।”
तभी उस पड़ोसन ने धीरे – धीरे उसके मन में भ्रम उत्पन्न करना प्रारम्भ किया। उसने कहा- “तुम्हें पता नहीं, वह धन पड़े – पड़े खराब हो जाएगा। संभव है कि वह गीला भी हो गया हो। क्यों न उसे बाहर छत पर धूप में सुखा लिया जाए? मैं भी तुम्हारी सहायता कर दूँगी।” वह पत्नी अत्यंत भोली थी। उसने विश्वास कर दबा हुआ घड़ा बाहर निकाला और उस माया को छत पर सुखाने के लिए फैला दिया। इतिहास में वर्णन आता है कि उसी समय वह पड़ोसन चालाकी से मुट्ठी-भर सिक्के अपने घर की ओर फेंकती रही। ऐसा दो-तीन बार किया गया। बाद में जब धन को पुनः एकत्र कर घड़े में रखा गया, तब ज्ञात हुआ कि माया कम हो गई है।
जब यह बात भाई गलौरा जी को पता चली, तब इतिहास में उल्लेख आता है कि उस पड़ोसन के घरवाले के साथ उनका गंभीर विवाद हुआ। यह प्रसंग केवल चोरी या झगड़े का नहीं था, अपितु उस मानसिक और आध्यात्मिक संघर्ष का प्रारम्भ था, जिसने आगे चलकर भाई गलौरा जी के जीवन की दिशा बदल दी।
दूसरी ओर इतिहास यह भी बताता है कि वह क्षेत्र जाट बहुल था। उस समय जब रंगड़ समुदाय के लोग उस ग्राम से निकलते थे, तब दोनों समुदायों के बीच प्रायः हिंसक संघर्ष हो जाया करते थे। एक दिन भाई गलौरा जी ने रंगड़ समुदाय के लोगों से कहा- “जाट समुदाय के लोग मेरा सम्मान करते हैं। यदि तुम लोग मेरे साथ चलोगे, तो तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचाएगा।” परन्तु परिस्थितियाँ विपरीत हो गईं। दोनों समुदायों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ और रंगड़ समुदाय के अनेक लोग मारे गए।
इस घटना ने भाई गलौरा जी को भीतर से तोड़ दिया। इतिहासकारों के अनुसार यह वही क्षण था, जब वे अपने “धर्म” से हार गए। गुरु साहिब ने उन्हें पूर्व में ही वचन किए थे कि “जिस दिन तुम धर्म से हार जाओगे, उस दिन तुम्हें बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा।” एक ओर वे गुरु घर की माया के नुकसान का दुख झेल चुके थे, दूसरी ओर इस सामुदायिक हिंसा का बोझ भी उनके सिर पर आ गया। अंततः उस विवाद और संघर्ष के वातावरण में भाई गलौरा जी की मृत्यु हो गई। इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि वे उसी झगड़े के दौरान मारे गए।
उसके पश्चात उनकी आने वाली पीढ़ियों को निर्धनता, संघर्ष और उपेक्षा का सामना करना पड़ा। यही कारण था कि समय के साथ वह परिवार, जो कभी गुरु घर का विशेष कृपापात्र था, धीरे – धीरे कठिनाइयों और अभावों के अंधकार में चला गया। यह केवल एक परिवार का इतिहास नहीं, अपितु यह एक आध्यात्मिक चेतावनी भी है कि जब मनुष्य धर्म, संयम और सत्य से विचलित होता है, तो उसके परिणाम केवल उसी तक सीमित नहीं रहते, अपितु आने वाली पीढ़ियाँ भी उसका प्रभाव सहन करती हैं।
जब हम धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के इतिहास को संदर्भित करते हैं, तब यह प्रसंग और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इतिहास में वर्णन आता है कि जब गुरु साहिब करहाली नामक स्थान से यात्रा करते हुए ग्राम चीका पहुँचे, तब उससे पहले करहाली के मसंद ने गुरु साहिब से मुख मोड़ लिया था। उसने न केवल स्वयं गुरु साहिब की ओर पीठ कर ली, अपितु ग्रामवासियों को भी यह कहकर रोकने का प्रयास किया कि यदि वे गुरु साहिब से मिलने जाएँगे, तो औरंगजेब उन्हें कभी क्षमा नहीं करेगा। भय और स्वार्थ के कारण करहाली का मसंद तथा ग्रामवासी गुरु साहिब से विमुख हो गए।
इतिहास की यह पीड़ा आज भी जीवित है। वर्तमान समय, अर्थात सन 2025 ईस्वी में भी ग्राम करहाली के लोग इस बात पर पश्चाताप करते दिखाई देते हैं कि उनके पूर्वजों ने उस समय सच्चे पातशाह से मुख मोड़ लिया था।
चीका से आगे स्थित गुरुद्वारा कराह साहिब का इतिहास भी इसी प्रकार के वैराग्य और चेतावनी से भरा हुआ है। वहाँ के मसंद ने भी श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से मिलना उचित नहीं समझा। उसने तो यहां तक कह दिया कि गुरु साहिब से मिलने की आवश्यकता ही नहीं है। यह इतिहास यह दर्शाता है कि उस कठिन समय में कितने लोग भय और सत्ता के दबाव में अपने धर्म और कर्तव्य से पीछे हट गए थे परन्तु भाई गलौरा जी ने अपना धर्म निभाया। जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस शहीदी मार्ग से दिल्ली की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने भाई गलौरा जी के निवास स्थान पर विश्राम किया। उस समय गुरु साहिब के साथ भाई मतीदास जी, भाई सतीदास जी, भाई दयाला जी, भाई गुरुदित्ता जी और भाई उदय जी भी साथ थे। भाई गलौरा जी ने इस पूरे जत्थे का अत्यंत श्रद्धा, प्रेम और मर्यादा के साथ आदर – सत्कार किया।
इतिहास में वर्णन आता है कि उस समय दूर – दराज़ से संगत गुरु साहिब के दर्शन के लिए भाई गलौरा जी के निवास स्थान पर पहुँची थी। वहीं, उसी स्थान पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने दीवान सजाया था। उस दिव्य वातावरण में गुरु साहिब ने संगत को अत्यंत करुण स्वर में निवेदन किया- “इस स्थान से आगे अब कोई हमारे पीछे नहीं आएगा, क्योंकि हमें दिल्ली जाकर अपना शीश अर्पित करना है।”
वह क्षण कितना भावुक रहा होगा, इसकी कल्पना मात्र से हृदय कांप उठता है। संगत गुरु साहिब से बिछुड़ना नहीं चाहती थी, परन्तु गुरु साहिब अपनी शहादत के पथ पर अडिग थे। उसी समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने भाई गलौरा जी को हरियाणा के हांसी और हिसार क्षेत्र का जत्थेदार मनोनीत किया। यह मनोनयन लिखित रूप में भी किया गया था। इस प्रकार भाई गलौरा जी को “मसंद” से “जत्थेदार” के पद पर प्रतिष्ठित किया गया।
उसके पश्चात भाई गलौरा जी ने दूर – दराज़ के क्षेत्रों में सिख धर्म का व्यापक प्रचार किया। गुरु साहिब ने उन्हें एक विशेष तरकश (तीर रखने का पात्र) भी भेंट स्वरूप प्रदान किया था। यद्यपि वह तरकश वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं है, परन्तु उसकी स्मृति आज भी इतिहास के पन्नों में जीवित है।
आगे वीडियो क्लिप में स्थानीय गुरुद्वारे के ग्रंथी साहिब जी ने भी इस संपूर्ण इतिहास की पुष्टि की। एक स्थानीय बुजुर्ग ने अत्यंत प्रभावशाली हरियाणवी भाषा में भाई गलौरा जी के परिवार, उनकी संपत्ति और उनके संघर्षपूर्ण इतिहास का वर्णन किया।
परिवार के वर्तमान मुखिया सरदार बाबू सिंह जी ने भी अत्यंत भावुक होकर कहा कि डॉ. खोजी जी ने उनके परिवार को खोजकर उन्हें नई पहचान दी है। उन्होंने उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि यह खोज न होती, तो संभवत उनका इतिहास हमेशा के लिए गुमनामी में खो जाता।
इसके पश्चात डॉ. भगवान सिंह खोजी जी ने बताया कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने भाई गलौरा जी के निवास स्थान पर दो दिनों तक विश्राम किया था। उसके पश्चात वे अपनी भविष्य की यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़े और वहाँ से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित ग्राम कराह पहुँचे, जहाँ आज गुरुद्वारा कराह साहिब सुशोभित है।
यह स्थान भी अत्यंत पावन और ऐतिहासिक महत्व रखता है। सर्वप्रथम धन्य श्री गुरु नानक देव साहिब जी इस स्थान पर पधारे थे। उसके पश्चात छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने भी इस भूमि को अपने चरणों से पवित्र किया। और फिर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने भी इस स्थान पर विश्राम कर इसे त्रिवेणी स्वरूप प्रदान किया।
क्या आज भी उस स्थान पर गुरुओं के चरणों की वह त्रिवेणी जीवित है? क्या वह पुरातन कुआँ आज भी इतिहास की गवाही देता खड़ा है? क्या वह भूमि आज भी उन कदमों की आहट महसूस करती है, जिन पर चलकर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी दिल्ली की ओर अपने अमर बलिदान के लिए अग्रसर हुए थे?
इन सभी प्रश्नों और इस दिव्य इतिहास से संगत को श्रृंखला के अगले भाग में रूबरू करवाया जाएगा। निश्चित ही हम उस शहीदी मार्ग पर आगे बढ़ेंगे, जिस पर चलकर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने मानवता, धर्म और सत्य की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित किया था।
इतिहास के पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं अगले प्रसंग में…
संगत जी से विनम्र निवेदन
इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ तथा विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सभी कार्यों में अत्यधिक व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक, इस शहीदी मार्ग प्रसंग तथा आगे आने वाले समस्त ऐतिहासिक प्रयासों में अपना सहयोग देना चाहें, तो कृपया मोबाइल क्रमांक 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।
वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
आपका अपना वीर,
इतिहासकार- डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’