नाइक नंद सिंह, 1/11वीं सिख रेजिमेंट

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नाइक नंद सिंह, 1/11वीं सिख रेजिमेंट

(विक्टोरिया क्रास मरणोपरांत)

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि:

नायक नंद सिंह का जन्म सन 1914 ई. में ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत (अब पाकिस्तान में) के बहादुरपुर गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार भोला सिंह और माता का नाम श्रीमती ईश्वर कौर था। बचपन से ही नंद सिंह शारीरिक रूप से मजबूत और साहसी स्वभाव के थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही स्कूल में प्राप्त की। ग्रामीण परिवेश और सिख परंपराओं ने उनके चरित्र और मूल्यों को आकार दिया। उनमें बचपन से ही सेवा और बलिदान की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी, जो सिख धर्म के सिद्धांतों और योद्धा परंपरा से प्रेरित थी।

सैन्य सेवा में प्रवेश:

युवावस्था में, नंद सिंह ने ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया। उनकी शारीरिक क्षमता और दृढ़ संकल्प को देखते हुए, उन्हें 1/11वीं सिख रेजिमेंट में शामिल किया गया। यह रेजिमेंट अपनी बहादुरी और युद्ध कौशल के लिए जानी जाती थी। नंद सिंह ने अपनी रेजिमेंट में कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया और एक कुशल सैनिक के रूप में उभरे। उन्होंने जल्द ही अपनी कर्तव्यनिष्ठा और अनुशासन से अपने साथियों और अधिकारियों का सम्मान अर्जित कर लिया।

द्वितीय विश्व युद्ध में योगदान:

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 1/11वीं सिख रेजिमेंट को विभिन्न युद्ध क्षेत्रों में तैनात किया गया था। नायक नंद सिंह ने कई महत्वपूर्ण लड़ाइयों में भाग लिया और अपनी वीरता का परिचय दिया। बर्मा अभियान के दौरान उनकी बहादुरी विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

बर्मा अभियान और विक्टोरिया क्रॉस:

मई सन 1944 ई. में, बर्मा के अराकन क्षेत्र में, 1/11वीं सिख रेजिमेंट जापानी सेना के खिलाफ एक महत्वपूर्ण लड़ाई में उलझी हुई थी। नायक नंद सिंह उस समय एक अग्रिम प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। जापानी सेना ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एक पहाड़ी पर मजबूत किलेबंदी कर रखी थी। इस पहाड़ी पर कब्जा करना मित्र देशों की सेना के लिए अत्यंत आवश्यक था।

नंद सिंह और उनकी प्लाटून को इस पहाड़ी पर हमला करने का आदेश दिया गया। दुश्मन की भारी गोलाबारी और मशीनगन की आग के बावजूद, नंद सिंह ने अदम्य साहस का प्रदर्शन करते हुए अपने सैनिकों का नेतृत्व किया। उन्होंने तीन दुश्मन बंकरों पर अकेले ही हमला किया। पहले बंकर पर ग्रेनेड फेंककर उन्होंने उसमें मौजूद दुश्मनों को मार गिराया। इस दौरान वे बुरी तरह से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

अपने गंभीर घावों की परवाह किए बिना, नंद सिंह ने दूसरे बंकर पर धावा बोला और उसे भी नष्ट कर दिया। इस हमले में उन्हें और भी गंभीर चोटें आईं, लेकिन उनका हौसला चट्टान की तरह अडिग था। उन्होंने अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

अंत में, नंद सिंह ने तीसरे दुश्मन बंकर पर भी हमला किया और उसे अपने कब्जे में ले लिया। इस अंतिम हमले में उन्हें इतनी गहरी चोटें आईं कि वे कुछ ही देर बाद वीरगति को प्राप्त हो गए।

नायक नंद सिंह के इस अद्वितीय पराक्रम और आत्म-बलिदान के कारण उनकी प्लाटून पहाड़ी पर कब्जा करने में सफल रही। उनके इस असाधारण शौर्य और कर्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया। विक्टोरिया क्रॉस ब्रिटिश और राष्ट्रमंडल सेनाओं का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है।

विक्टोरिया क्रॉस प्रशस्ति पत्र:

नायक नंद सिंह को विक्टोरिया क्रॉस निम्नलिखित शब्दों में प्रदान किया गया था:

“यह गैलेंट्री के लिए प्रदान किया जाता है: –

नायक नंद सिंह का यह अद्वितीय पराक्रम और आत्म-बलिदान उनकी प्लाटून को अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में सक्षम बनाया। उन्होंने कर्तव्य के प्रति अटूट निष्ठा और असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया, जो भारतीय सेना की परंपराओं के अनुरूप है।”

विरासत और प्रेरणा:

नायक नंद सिंह का बलिदान और वीरता आज भी भारतीय सेना और पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका नाम साहस और कर्तव्यनिष्ठा के पर्याय के रूप में इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उनकी कहानी युवा पीढ़ी को देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देती है।

उनके सम्मान में कई स्मारक और संस्थान स्थापित किए गए हैं। उनकी बहादुरी की कहानियाँ सैन्य प्रशिक्षण संस्थानों में सुनाई जाती हैं ताकि सैनिकों में वीरता और बलिदान की भावना जागृत हो सके। नायक नंद सिंह का जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अटूट साहस और दृढ़ संकल्प से किसी भी लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया, और वह हमेशा हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे।

 


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