लेफ्टिनेंट करमजीत सिंह जज
(विक्टोरिया क्रास मरणोपरांत)
लेफ्टिनेंट करमजीत सिंह जज का जन्म सन 1912 ई. में अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत के गुजरांवाला जिले के चक रामदास गाँव में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में प्राप्त की और फिर आगे की पढ़ाई के लिए खालसा कॉलेज, अमृतसर में दाखिला लिया। एक प्रतिभाशाली और उत्साही युवा के रूप में, करमजीत सिंह में नेतृत्व के गुण बचपन से ही दिखाई देते थे।
सन 1941 ई. में, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, करमजीत सिंह भारतीय सेना में शामिल हुए और उन्हें 4/15वीं पंजाब रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ। अपनी निष्ठा, अनुशासन और त्वरित सीखने की क्षमता के कारण, उन्होंने जल्द ही अपने साथियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सम्मान अर्जित कर लिया। उन्हें एक साहसी और दृढ़ निश्चयी अधिकारी के रूप में जाना जाता था, जो हमेशा अपने सैनिकों का नेतृत्व करने के लिए आगे रहते थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, 18 मार्च सन 1945 ई. को बर्मा (वर्तमान म्यांमार) में इम्फाल की लड़ाई के दौरान लेफ्टिनेंट करमजीत सिंह जज ने अद्वितीय वीरता और आत्म-बलिदान का प्रदर्शन किया। उनकी पलटन पर एक दृढ़ता से स्थापित जापानी चौकी पर हमला करने का कार्यभार सौंपा गया था। दुश्मन की भारी गोलाबारी और मशीनगन की आग के बावजूद, लेफ्टिनेंट जज ने व्यक्तिगत रूप से अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए कई दुश्मन बंकरों पर धावा बोला।
एक महत्वपूर्ण क्षण में, जब उनकी पलटन दुश्मन की एक मजबूत स्थिति से भारी दबाव में थी, लेफ्टिनेंट जज ने अकेले ही आगे बढ़कर दुश्मन की मशीनगन पोस्ट पर ग्रेनेड फेंके और उसे निष्क्रिय कर दिया। इस साहसिक कार्रवाई के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे, लेकिन उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और अपने सैनिकों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे। अपनी गंभीर चोटों के बावजूद, उन्होंने तब तक लड़ना जारी रखा जब तक कि दुश्मन की स्थिति पर कब्जा नहीं कर लिया गया।
लेफ्टिनेंट करमजीत सिंह जज ने कर्तव्य की पुकार पर अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनकी अद्वितीय बहादुरी, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ नेतृत्व के लिए उन्हें मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया, जो ब्रिटिश साम्राज्य का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण है। उनका बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
लेफ्टिनेंट करमजीत सिंह जज का नाम साहस और बलिदान के पर्याय के रूप में भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि कर्तव्य के प्रति समर्पण और निस्वार्थ सेवा किसी भी चुनौती पर विजय प्राप्त कर सकती है।