कैप्टन ईश्वर सिंह: विक्टोरिया क्रॉस (VC) विजेता (उत्तरी वजीरिस्तान, 1921)

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कैप्टन ईश्वर सिंह: विक्टोरिया क्रॉस (V.C.) विजेता (उत्तरी वजीरिस्तान, 1921)

जब इतिहास के पृष्ठों में वीरता की मिसालें खोजी जाती हैं, तब कुछ नाम स्वर्णाक्षरों में स्वयं को अंकित कर लेते हैं। ऐसा ही एक नाम है, कैप्टन ईशर सिंह, जो ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च युद्ध सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से विभूषित होने वाले प्रथम सिख सैनिक थे। उनकी यह गाथा केवल पदक तक सीमित नहीं, बल्कि साहस, सेवा, समर्पण और सिख परंपरा के गौरव की ऐसी जीवंत कथा है, जो आज भी जनमानस को प्रेरणा देती है।

 एक सपूत का जन्म और सैन्य जीवन की शुरुआत

कैप्टन ईशर सिंह का जन्म ब्रिटिश भारत की पुण्य भूमि पर हुआ था, जहाँ सेवा और शौर्य को जीवन का ध्येय माना जाता था। एक सिख परिवार से आने वाले ईशर सिंह ने बचपन से ही सेवा, संयम और साहस के बीज अंकुरित थे। उन्होंने सेना में 28वीं पंजाब रेजिमेंट के सिपाही के रूप में सेवा प्रारंभ की, उस दौर में जब भारत के 13 लाख से अधिक युवाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की सेना में स्वेच्छा से भर्ती होकर विश्वयुद्ध के मोर्चों पर डटकर युद्ध लड़ा।

वीरता का पराक्रम: वज़ीरिस्तान अभियान

10 अप्रैल 1921– यह दिन इतिहास के पन्नों में एक अद्भुत शौर्यगाथा के रूप में अंकित हो गया। उत्तर-पश्चिम सीमा पर स्थित हैदरी कच (वज़ीरिस्तान) के मोर्चे पर जब 28वीं पंजाब रेजिमेंट की टुकड़ी पर घातक हमला हुआ, तब 25 वर्षीय कैप्टन ईशर सिंह एक लुईस गन सेक्शन में तैनात थे।

शत्रु की घातक गोलीबारी के दौरान उन्हें छाती पर गंभीर गोली लगी और वे ज़मीन पर गिर पड़े। स्थिति अत्यंत विकट थी उनके अधिकांश अधिकारी और हवलदार या तो मारे गए थे या घायल। इसी बीच शत्रु ने उनकी लुईस गन भी कब्जे में ले ली।

बहादुर परन्तु, ईशर सिंह उठे। लहूलुहान अवस्था में भी उन्होंने दो और साथियों को बुलाकर दुश्मन पर धावा बोला, गन को पुनः कब्जे में लिया और मोर्चे पर पुनः स्थापित किया। इस अदम्य साहस ने न केवल उनकी टुकड़ी की रक्षा की, बल्कि युद्ध के परिणाम को भी प्रभावित किया।

कर्तव्य की पराकाष्ठा

जब उनके जमादार ने उन्हें पीठ पीछे हटकर चिकित्सा सहायता लेने को कहा, तब उन्होंने उस आज्ञा का भी त्याग कर दिया। वह घायल साथियों की देखभाल, उन्हें पानी पिलाने और उनकी स्थिति की जानकारी देने में लग गए। दुश्मन की लगातार हो रही गोलीबारी के बीच वे अनेक बार नदी तक गए और लौटे, केवल इसलिए कि किसी प्यासे घायल सैनिक को राहत मिले।

एक घायल सैनिक की मरहम-पट्टी कर रहे चिकित्सा अधिकारी को ढाल देने के लिए उन्होंने स्वयं को उसके सामने खड़ा कर दिया। तीन घंटे तक वह अपने कर्तव्य की पराकाष्ठा करते रहे, और जब अंततः उन्हें निकासी के लिए ले जाया गया, तब वे रक्त की अत्यधिक हानि के कारण निःशक्त हो चुके थे।

 विक्टोरिया क्रॉस का सम्मान

25 नवम्बर 1921 को लंदन गजट के विशेष परिशिष्ट में प्रकाशित हुआ वह प्रशस्ति-पत्र, जिसने कैप्टन ईशर सिंह को विक्टोरिया क्रॉस के सम्मान से विभूषित किया। यह पदक केवल ‘दुश्मन के सामने’ असाधारण साहस दिखाने वाले सैनिकों को दिया जाता है, और ईशर सिंह इसके लिए पूर्णतः योग्य सिद्ध हुए।

ब्रिटिश सम्राट की ओर से प्रदान किया गया यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत पराक्रम की स्वीकृति थी, बल्कि सिख वीरता की भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता थी।

सिख परंपरा की गौरवशाली झलक

ईशर सिंह ने केवल युद्ध नहीं लड़ा, उन्होंने सिख धर्म के “सच्चा साहिबजादा” होने का परिचय दिया। साहस और सेवा की संगति ही सिख मर्यादा की आत्मा है — और उन्होंने इसे अपने रक्त से लिखा।

उनकी वंशज पीढ़ियाँ आज ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न और कैलेगरी (कनाडा) में निवास करती हैं। वहाँ भी उनकी गाथा परिवारजनों द्वारा सम्मान और गर्व से सुनाई जाती है।

 प्रशंसा की सीमाओं से परे वीरता

उनके अधिकारी कैप्टन बर्नार्ड ओडी ने स्वयं उन्हें विक्टोरिया क्रॉस हेतु नामित किया। युद्ध कार्यालय की आधिकारिक घोषणा में यह स्पष्ट कहा गया:

“उनकी वीरता और कर्तव्यपरायणता प्रशंसा से परे थी। उनका आचरण उन सभी को प्रेरित कर गया जिन्होंने उन्हें देखा।”

 उच्च पद, उच्च सम्मान

बाद में वे कैप्टन के पद तक पदोन्नत हुए और द्वितीय विश्व युद्ध में भी सेवा की। इसके साथ ही उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया, फर्स्ट क्लास’ से भी अलंकृत किया गया और ‘सरदार बहादुर’ की उपाधि प्राप्त हुई।

उनका विक्टोरिया क्रॉस पदक अब लॉर्ड एशक्रॉफ्ट के ऐतिहासिक संग्रह में संरक्षित है।

 उपसंहार: एक अमर गाथा

कैप्टन ईशर सिंह का जीवन किसी भी प्रकार के संकोच, भय या आत्म-संवरण से परे था। वे जीवित रहे तो सिख धर्म की लाज रखी और जब घायल हुए तो दूसरों की सेवा में पीछे नहीं हटे। वह न केवल युद्धक्षेत्र में जीते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के दिलों में भी।

उनकी गाथा हमें यह सिखाती है कि-

“वीरता वह नहीं जो केवल हथियारों से लड़ी जाए, वीरता वह है जो सेवा, सहानुभूति और कर्तव्य की भावना से जन्म ले।”कैप्टन ईशर सिंह एक सैनिक नहीं, एक विचार हैं- जो हमें साहस के साथ मानवता का पाठ पढ़ाते हैं।


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