सिंधी समाज में गुरमत की खुशबू: इतिहास, विरासत और प्रभाव
सिंध प्रदेश और पंजाब का संबंध उतना ही प्राचीन है जितना स्वयं सिंधु नदी का प्रवाह। इन दोनों भू-भागों में प्राप्त हो रहे सिंधु सभ्यता के असंख्य पुरातात्विक अवशेष और प्रमाण इस ऐतिहासिक सत्य की सजीव पुष्टि करते हैं। यह एक प्रामाणिक एवं सर्वमान्य तथ्य है कि हजारों वर्षों से वर्तमान कश्मीर, लद्दाख, विशाल पंजाब, सिंध, राजस्थान और गुजरात तक फैला समूचा क्षेत्र राजनीतिक सीमाओं से परे एक ही भौगोलिक इकाई के रूप में मानव सभ्यता का साझा पालना रहा है।
सिंधु घाटी की महान सभ्यता इसी विस्तृत भूभाग में विकसित हुई तथा वैदिक काल में इस क्षेत्र के उत्तरी भाग को “सप्त सिंधु” के नाम से जाना जाता था। आज भी पूर्वी और पश्चिमी पंजाब की नई पीढ़ी जब विद्यालयों में इतिहास का अध्ययन प्रारंभ करती है, तो उसका पहला पाठ “सिंधु घाटी सभ्यता” से ही आरंभ होता है। इस विशाल भू-प्रदेश की सभी बड़ी और छोटी नदियाँ अंततः सिंधु नदी में मिलती हुई पंजाब और वर्तमान सिंध प्रदेश से होकर समुद्र में समाहित हो जाती हैं। सिंध की धरती को जीवनदायिनी जलधारा के रूप में जो जल प्राप्त होता है, उसमें पंजाब की नदियों के असंख्य जीवन-तत्त्व भी घुल-मिल होकर एकजुट हो जाते हैं। इस प्रकार सिंध और पंजाब का संबंध केवल भौगोलिक नहीं, अपितु जल, मिट्टी, संस्कृति और सभ्यता का भी अभिन्न संबंध है।
अरब सागर में विलीन होने से पूर्व दक्षिणी सिंध में हैदराबाद, ठट्टा, कराची तथा दूसरी ओर केटी बंदर और कोट लखपत (कच्छ) तक फैले सिंधु नदी के एक विशाल डेल्टा के निर्माण में पंजाब की नदियों द्वारा लाए गए उपजाऊ मिट्टी के कणों की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पंजाब और सिंध के पारस्परिक संबंधों तथा उनकी प्राकृतिक एकात्मता को समझने के लिए यह एक तथ्य पर्याप्त है कि पंजाब और सिंध केवल पड़ोसी प्रदेश नहीं, अपितु एक-दूसरे के प्राकृतिक सहयोगी और सभ्यतागत सहभागी रहे हैं।
यह मूलभूत समझ हमें वर्तमान संकीर्ण सांप्रदायिक मानसिकताओं तथा द्रविड़ों और आर्यों के तथाकथित संघर्षों पर आधारित तर्कहीन विवादों और कृत्रिम व्याख्याओं से ऊपर उठाकर इतिहास को अधिक व्यापक और वस्तुनिष्ठ दृष्टि से देखने की प्रेरणा देती है।
सिंधु नदी दक्षिण एशिया अथवा भारतीय उपमहाद्वीप की प्रमुख नदियों में से एक है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 3,180 किलोमीटर है। इसका उद्गम हिमालय के पार कैलाश पर्वत के निकट पश्चिमी तिब्बत में स्थित मानसरोवर क्षेत्र से होता है। वहाँ से यह काराकोरम पर्वतमाला की तलहटी के साथ-साथ लद्दाख से होकर गिलगित-बाल्टिस्तान की दिशा में उत्तर-पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है।
इसके पश्चात यह स्वात घाटी के पूर्वी क्षेत्र कोहिस्तान की ओर मुड़कर दक्षिण दिशा में बहती हुई अटक के समीप मैदानी भूभाग में प्रवेश करती है। आगे चलकर यह सुलेमान पर्वतमाला के पूर्वी मैदानों से होकर बहती हुई मुल्तान के आगे मिथनकोट के निकट पंजाब की पाँचों नदियों—सतलुज, ब्यास, रावी, झेलम और चिनाब को अपने भीतर समाहित कर लेती है। ये पाँचों नदियाँ सिंधु की पूर्वी सहायक नदियाँ (Tributaries) हैं।
उत्तर दिशा से काराकोरम, लद्दाख तथा गिलगित-बाल्टिस्तान के पर्वतीय क्षेत्रों की जैंसकर, श्योक, नुब्रा और गिलगित जैसी प्रमुख नदियाँ भी सिंधु में आकर मिलती हैं। पश्चिम की ओर से काबुल नदी, जो अपने साथ स्वात और कुनर जैसी नदियों का जल लेकर आती है, सिंधु में समाहित हो जाती है। इसके अतिरिक्त कुर्रम, टोची, झाब तथा गुमल जैसी अनेक नदियाँ भी पश्चिम दिशा से सिंधु में मिलती हैं।
मिथनकोट से आगे बढ़कर सिंधु नदी वर्तमान सिंध प्रदेश में प्रवेश करती है। वहाँ से यह सक्खर के समीप बहती हुई हैदराबाद और ठट्टा पहुँचकर एक विशाल डेल्टा का निर्माण करती है और अंततः कराची बंदरगाह के निकट अरब सागर में विलीन हो जाती है।
इस प्रकार लद्दाख, कश्मीर, पूर्वी एवं पश्चिमी पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा, सिंध तथा कच्छ-काठियावाड़ (गुजरात) तक फैला विशाल भू-प्रदेश “सिंधु भूखंड” अथवा “सिंधु घाटी का मैदान (Indus Plain)” कहलाता है। भौगोलिक दृष्टि से हिमाचल प्रदेश, हरियाणा तथा पश्चिमी राजस्थान (मरु प्रदेश) भी इसी भू-क्षेत्र का अभिन्न अंग माने जाते हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता की प्राकृतिक सीमाएँ पूर्व में यमुना नदी और अरावली पर्वतमाला तक विस्तृत हैं। उत्तर में इसकी सीमा हिमालय के पार कैलाश (तिब्बत) और काराकोरम पर्वतमालाओं तक पहुँचती है, जबकि पश्चिम में यह हिंदुकुश (अफगानिस्तान) से लेकर दक्षिण की ओर सुलेमान तथा कीर्थर (बलूचिस्तान) पर्वतमालाओं तक फैली हुई है।
इतिहास में इसी व्यापक भू-प्रदेश को विदेशी आक्रमणकारियों और व्यापारियों ने “हिंद” अथवा “हिंदुस्तान” के नाम से संबोधित किया था। किंतु 1947 ई. के भारत-विभाजन के पश्चात यह नाम वर्तमान भारत (India) तक सीमित होकर रह गया, जबकि वास्तविक सिंधु घाटी का अधिकांश भूभाग उसकी राजनीतिक सीमाओं से बाहर चला गया।
सिंधु घाटी अथवा सिंधु भूखंड की यह अवधारणा वर्तमान राजनीतिक और सांप्रदायिक सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक प्राकृतिक भौगोलिक एकता का बोध कराती है। सिंधु तथा उसकी समस्त सहायक नदियों की घाटियों के अतिरिक्त, उन्हीं नदियों के जल से सिंचित हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र भी इसी सिंधु भू-प्रदेश का हिस्सा हैं।
यह दृष्टिकोण हमारी सोच को भारत, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान जैसी आधुनिक राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठाकर प्रकृति द्वारा निर्मित एक विशाल सांस्कृतिक और भौगोलिक इकाई का बोध कराता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्री गुरु नानक देव साहिब जी की वाणी में प्रयुक्त “हिंदुस्तान” शब्द को समझना अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।
इसी दृष्टि से यदि शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह द्वारा सिंधु नदी की समूची घाटी पर एक व्यापक खालसा राज्य की स्थापना तथा उसकी सीमाओं को हिंदूकुश, कश्मीर, लद्दाख और कैलाश से लेकर सिंधु-सागर तक विस्तृत करने के स्वप्न को देखा जाए, तो वह आज की सांप्रदायिक संकीर्णताओं और राजनीतिक सीमाओं से कहीं ऊपर उठकर एक विराट सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता की भावना का प्रतीक दिखाई देता है।
‘सिंधी’ शब्द का संबंध उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के सिंध प्रांत, उसके निवासियों, उनकी भाषा, साहित्य और संस्कृति से है। पंजाब के दक्षिण में स्थित होने के कारण अनेक स्रोतों में ‘सिंध’ को ‘दक्षिण देश’ भी लिखा गया है।
1947 ई. के अप्राकृतिक विभाजन के कारण हुए भीषण विस्थापन में पूरा सिंध प्रांत पाकिस्तान के हिस्से में चला गया, किंतु सिंध का हिंदू-सिख समाज दो भागों में बंट गया। सिंधी हिंदू-सिखों का बड़ा हिस्सा उजड़कर भारत आ गया, जबकि एक हिस्सा वहीं सिंध में रह गया।
इसी दृष्टि से इस आलेख का संबंध 1947 ई. के विस्थापन के बाद गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली सहित भारत के विभिन्न राज्यों में आ बसे सिंधी सिखों और सहजधारी नानक पंथियों से भी है, तथा पाकिस्तान के सिंध प्रदेश में रह गए सिंधी सिखों और नानक पंथियों से भी है।
वर्तमान समय में सिंधी नानक पंथी अपनी व्यावसायिक आवश्यकताओं के कारण, पंजाबियों की भांति ही विश्व के अनेक देशों में फैले हुए हैं। उन्होंने स्थान-स्थान पर गुरु नानक दरबार स्थापित कर गुरु की सिक्खी और गुरबाणी के प्रति अपने प्रेम को निरंतर बनाए रखा है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में ‘हिंदुस्तान’ शब्द के संदर्भ—
“काइआ कपड़ु टुकु टुकु होसी हिदुस्तानु समालसी बोला॥” (अंग 723)
“खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तानु डराइआ॥” (अंग 360)
यह तथ्य विशेष रूप से उभरकर सामने आता है कि 1947 ई. के विभाजन से पहले और उसके बाद आज तक सिंधियों की आबादी का बड़ा हिस्सा गुरु नानक पंथी रहा है। यह लोग श्री गुरु नानक देव साहिब जी को अपना इष्ट मानते हैं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब साहिब जी की पवित्र गुरबाणी को असीम श्रद्धा और प्रेम से पढ़ते, मानते और सम्मान देते हैं। यह परंपरा आज भी निरंतर कायम है।
यद्यपि 1947 ई. के विभाजन के बाद मुख्यधारा के सिखों, सिंधी सिखों और पंथक संस्थाओं की उदासीनता अथवा उपेक्षा के कारण इन गुरु नानक पंथी सिंधियों की नई पीढ़ी में से बड़ी संख्या श्री गुरु नानक देव साहिब जी की सिक्खी और गुरबाणी से दूर होती जा रही है, और कुछ लोग स्वयं को नानक पंथी अथवा सहजधारी सिख कहलाना भूलते जा रहे हैं; फिर भी यह एक बड़ा सत्य है कि 1947 ई. के विभाजन से पूर्व पंजाब से बाहर यदि सिक्खी का पौधा कहीं प्रेम और श्रद्धा के साथ खूब फला-फूला, तो वह सिंध की धरती ही थी।
‘सिंध’ शब्द पंजाब वासियों और गुरु के सिखों के लिए कभी भी अपरिचित या पराया नहीं रहा। श्री गुरु नानक देव साहिब जी से सिंधी समाज का संबंध गुरुओं की धरती पंजाब और सिक्खी के साथ अत्यंत गहरा हो गया। गुरु साहिबान के समय से लेकर शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के राज्यकाल तक, और फिर 1947 ई. के विस्थापन तक, सिंधी समाज की गुरु पंथ खालसा और पंजाब के साथ भाईचारे की साझ अत्यंत मजबूत बनी रही।
परंतु 1947 ई. के विस्थापन ने जहाँ पंजाबी और सिंधी समाजों के अनेक पारस्परिक और आंतरिक भाईचारे के संबंधों को तोड़ दिया, वहीं इस त्रासदी ने दोनों समाजों के आपसी संबंधों को दूरी में बदल दिया। सिंध प्रांत पाकिस्तान के हिस्से में चला गया और उजड़कर आए हिंदू-सिंधी समाज का मध्य भारत तथा पश्चिमी भारत के राज्यों में बिखरे रूप में पुनर्वास हुआ। इसके साथ ही सांप्रदायिक आधार पर खड़ी की गई दो देशों की सीमा-दीवार ने सिंधी समाज के सिक्खी से जुड़े सरोकारों को बहुत हद तक विभाजित कर दिया।
सिंध से पलायन कर भारत आए नानक पंथी सिंधी समाज का बड़ा भाग पंजाब की धरती से दूर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में बस गया। इसके कारण पंजाब और सिक्खी से उनका भौगोलिक और सामाजिक फासला बढ़ता चला गया।
दूसरी ओर मुस्लिम सिंधी समाज पाकिस्तान की नई सीमाओं में सिमट गया, और सिंध प्रांत में रह गया नानक पंथी सिंधी समाज भी सीमा-दीवार के कारण सिक्खी के स्रोत पवित्र गुरुधामों तथा गुरुओं की धरती पंजाब से दूर हो गया। इस प्रकार 1947 ई. की त्रासदी ने जहाँ सिंध और पंजाब की मानवीय पहचानों को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, वहीं मूलभूत भाईचारे की साझों को भी बिखेर कर रख दिया।
उपरोक्त दृष्टि से 1947 ई. का विभाजन एक अप्राकृतिक और अमानवीय घटना थी। उसने क्रूरता की सीमाएँ पार करते हुए जहाँ मानवीय संबंधों को तार-तार कर दिया, वहीं सदियों से चली आ रही विशिष्ट विरासती पहचानों को उनके मूल से काटकर पहचान-विहीन करने का भी बहुत बड़ा अपराध किया।
सिंधी और पंजाबी समाज के बीच धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टि से बढ़ी हुई दूरियों की बड़ी वजह यही विभाजन है। एक और दुखद बात यह हुई कि सभी संबंधित पक्ष इस विभाजनकारी प्रक्रिया के प्रति अत्यंत उदासीन, उपेक्षापूर्ण और कमजोर बने रहे। यही एक बड़ा कारण है कि पंजाबी और सिंधी समाजों की नई पीढ़ी एक-दूसरे से बहुत दूर होती चली गई। इस संपूर्ण दुखांत परिस्थिति का अवसरवादी राजनीतिक और सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर लाभ उठाया, जो अपने आप में अलग विचार का विषय है।
सिंध की धरती को प्रथम पातशाह श्री गुरु नानक देव साहिब जी के पवित्र चरणों का स्पर्श दो बार प्राप्त हुआ है। पहली बार, जब गुरु जी दक्षिण की उदासी अर्थात यात्रा से इसी क्षेत्र के रास्ते वापस लौटे। दूसरी बार, जब वे पश्चिम की उदासी के लिए अरब देशों की ओर रवाना हुए।
ऐतिहासिक तथ्यों और संदर्भों के विषय में विभिन्न विचारकों की समझ, दृष्टिकोण और प्रस्तुति में थोड़े-बहुत अंतर के बावजूद, इस सुदृढ़ परंपरा के विषय में सिंध के वासी और सिख विद्वान एकमत हैं कि सिंध के अनेक नगर और स्थान श्री गुरु नानक देव साहिब जी के पवित्र चरणों के स्पर्श से धन्य हैं।
उनके पश्चात अनगिनत सिंधी संगत सभी गुरु पातशाहों के दरबार में हाजिरी भरती रहीं। वह गुरु की हजूरी में उपस्थित होकर गुरुपदेश और गुरु-संगत की छांव से सराबोर होती रहीं तथा अपने जीवन को गुरसिक्खी के रंग में रंगती रहीं।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के संकलन और संपादन के समय शहीदों के सरताज पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी ने सिंधी भगत सदना जी की वाणी को पूर्ण सम्मान सहित इसमें शामिल किया। भगत सदना जी का जन्म सिंध प्रांत के सेहवान में हुआ था और उनका अकाल-चलाना / प्रभु मिलन पंजाब के सरहिंद नगर में हुआ। उनका देहुरा / स्मारक सरहिंद में आज भी मौजूद है। इसकी पुष्टि भाई काहन सिंह नाभा के ‘महानकोश’ सहित अनेक स्रोतों और संदर्भों से भली-भांति होती है।
इसी प्रकार पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी ने सिक्खी के केंद्र के रूप में नव-निर्मित अमृत सरोवर में श्री दरबार साहिब, हरमंदिर साहिब की नींव रखने का सौभाग्य एक सिंधी सूफी संत साईं मियां मीर जी को प्रदान किया। साईं मियां मीर जी के उदात्त चरित्र की विशेषताओं का इतिहास साक्षी है कि वे सिंध और पंजाब के क्षेत्र में धार्मिक सहिष्णुता, समरसता, भाईचारे और सह-अस्तित्व के अद्भुत प्रतीक बनकर इतिहास में अमर हुए।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी की उदासियों के पश्चात बाबा श्रीचंद जी और उनके अनुयायी उदासी संत-महापुरुषों ने, जिनमें से कई सिंधी मूल के भी थे, सिंध के विभिन्न क्षेत्रों में विचरण कर सिंधी संगत को श्री गुरु नानक देव साहिब जी की शिक्षाओं, पवित्र गुरबाणी और गुरमुखी लिपि से जोड़ा।
डल्ला निवासी भाई पारो और भाई लालू जैसे मंजीदार गुरसिखों के अतिरिक्त भाई मौजराज जिज्ञासी सहित अनेक अन्य गुरसिखों के नाम भी ऐतिहासिक स्रोतों में प्राप्त होते हैं। इन्हें गुरु घर की ओर से सिंध में सिक्खी की खुशबू फैलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
नौवें पातशाह के समय कपट धारियों के बीच सच्चे गुरु की पहचान के लिए भाई मक्खन शाह लुबाना द्वारा बोले गए शब्द “गुरु लाधो रे” सिक्खी विरासत के साथ-साथ लहिंदी अर्थात पश्चिमी पंजाबी की साझी सांस्कृतिक विरासत और सिंधी की साझी भाषाई विरासत का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
भाई मक्खन शाह लुबाना भारतीय उपमहाद्वीप के एक बड़े कारोबारी और व्यापारी थे, जो गुरु के प्रेमी सिख थे। उनका व्यापार कश्मीर, पंजाब, सिंध, गुजरात, अफगानिस्तान सहित दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया तक फैला हुआ था। उनके छोटे-बड़े अनेक जहाज समुद्री और नदी मार्गों पर चलते थे। उनके जल और थल मार्गों से चलने वाले वाहनों की संख्या बहुत अधिक थी।
उस समय स्थलीय मार्गों के साथ-साथ नदी मार्गों से भी व्यापक व्यापार होता था। पंजाब की सभी नदियों से सिंधु नदी के रास्ते छोटे जहाज़ों और बेड़ों द्वारा भी पर्याप्त व्यापार किया जाता था।
गुरु दरबार में होने वाले विशेष समागमों में ठट्टा, सक्खर, भखर आदि स्थानों से सिंधी संगत दर्शन हेतु हाज़री भरती थीं और गुरु साहिबान की प्रसन्नता प्राप्त करती थीं। कुछ स्रोतों में श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के समय भाई तोता मेहता के खानदान से भाई धनराज मेहता, भाई मनी राम, गणपत और भाई चैन राय आदि नामों का उल्लेख इस बात का संकेत देता है कि दशम पातशाह के समय भी सिंधी संगतों का गुरु दरबार में आना-जाना निरंतर बना हुआ था।
दशम पिता द्वारा भाई दयाल सिंह नामक सिंह को सिंधी संगतों में जुझारू भावना भरने के लिए सिंध भेजे जाने का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है।
बाबा बंदा सिंह बहादुर के अनुयायी कहे जाने वाले बंदई खालसा के कुछ सिंहों के सिंध की ओर जाने का उल्लेख तथा बाबा फतेह सिंह बंदई की सिंध यात्राओं के ऐतिहासिक विवरण स्पष्ट संकेत देते हैं कि अठारहवीं शताब्दी में हुकूमती अत्याचारों से पीड़ित कुछ जुझारू परिवार सिंध की ओर चले गए थे।
शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के समय स्थापित खालसा दरबार के चार सूबे थे, लाहौर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर। ऐतिहासिक तथ्यों के मूल्यांकन से स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है कि शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का सिंध के प्रति विशेष झुकाव और रुचि थी। उनके अंतिम वर्षों में राज्य-विस्तार की अगली दिशा सिंध की ओर ही थी।
यह कहना उचित होगा कि यदि शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह को और समय मिल जाता, तो खालसा दरबार का पाँचवाँ सूबा सिंध ही होता। सिंध सूबे के पंजाब के साथ भौगोलिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और राजनीतिक संबंधों पर अध्ययन का एक विस्तृत क्षेत्र पंजाबी और सिंधी विद्वानों, शोधकर्ताओं तथा विशेष रूप से इतिहासकारों की प्रतीक्षा कर रहा है। इस प्रकाशित आलेख में शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के कार्यकाल के दौरान सिंध से जुड़े सरोकारों पर इतिहासकारों और विद्वान लेखकों के अनेक लेख पढ़ने योग्य हैं।
अंग्रेजी शासनकाल के दौरान भी सिंध में सिख संतों, महापुरुषों, उपदेशकों और व्याख्याकारों का पूर्ण प्रभाव रहा। उदासी संतों और भाई सेवा राम जी सेवा पंथी के उत्तराधिकारी महापुरुषों सहित संत बाबा थाहरिया सिंह जी, संत बाबा बुड्ढा सिंह जी निर्मले, संत बाबा शाम सिंह जी अमृतसर, संत अतर सिंह जी मस्तुआना वाले और संत गुरमुख सिंह जी पटियाला सहित अनेक महापुरुष सिंध में सिक्खी के प्रचार – प्रसार और विकास के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान देते रहे।
सिंघ सभा लहर, चीफ खालसा दीवान के उपदेशक, कथावाचक और कीर्तनिए भी सिंध के विभिन्न क्षेत्रों में सिक्खी की सुगंध फैलाते रहे। भाई वीर सिंह जी जैसे विद्वान साहित्यकारों और भाई हीरा सिंह जी जैसे कीर्तनियों ने भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
इसके अतिरिक्त बाबा गुरदित सिंह कामागाटामारू के सिंध क्षेत्र में गुप्त रूप से रहने के संकेतात्मक संदर्भ, साका ननकाना साहिब और जैतो मोर्चे से संबंधित सिंधी सरोकार, सिक्खी के दृष्टिकोण से अंग्रेजी काल के सिंधी इतिहास को और गहराई से परखने के लिए प्रेरित करते हैं।
‘पंजाब एंड सिंध बैंक’ की स्थापना को भी इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए। जब हम ‘पंजाब एंड सिंध बैंक’ का नाम लेते हैं या बैंकिंग सेवाओं के लिए इस बैंक की किसी शाखा में प्रवेश करते हैं, तो शायद ही कभी विचार करते हों कि बैंक के नाम में ‘सिंध’ शब्द का क्या संबंध है और यह पंजाब के साथ जुड़कर क्यों आया है। सिक्खी को समर्पित प्रसिद्ध विद्वान साहित्यकार भाई वीर सिंह जी ने अपने गुरमुख सज्जनों, सरदार त्रिलोचन सिंह और सरदार सुंदर सिंह मजीठिया के सहयोग से जब इस बैंक की शुरुआत की, तब पंजाब और सिंध के लोगों की आवश्यकताओं और रुचियों को विशेष रूप से ध्यान में रखा गया था।
विभाजन के समय गैर-मुस्लिम अर्थात हिंदू-सिख सिंधी समाज के लिए सिंध में जनसंख्या के अनुपात के आधार पर कोई भू-क्षेत्र प्राप्त करने का महत्वपूर्ण मुद्दा विभाजन के शोर-शराबे और कूटनीतिक चूकों तथा कमजोरियों की भेंट चढ़ गया। यहाँ तक कि थार पारकर और उमरकोट आदि जैसे अधिक गैर-मुस्लिम आबादी, अर्थात हिंदू-बहुल क्षेत्रों वाले इलाके भी पाकिस्तान में रह गए।
गुरबाणी में सिंधी भाषा की शब्दावली बड़ी मात्रा में मिलती है। भाई काहन सिंह नाभा के ‘महानकोश’ और भाई वीर सिंह के ‘श्री गुरु ग्रंथ कोश’ में शब्दों के साथ दिए गए भाषाई पृष्ठभूमि के संकेत सहज रूप से इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। गुरबाणी का पाठ करते हुए हम सिंधी भाषा के अनेक शब्द स्वाभाविक रूप से पढ़ते हैं।
शीर्षकों के रूप में प्रयुक्त ‘करहले’ और ‘डखणे’ आदि शब्द सिंधी और लहिंदी अर्थात पश्चिमी पंजाबी की साझी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। पाठ करते समय शायद ही किसी विरले सिख के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न होती हो कि ये शब्द किस भाषा के हैं।
गुरबाणी की भाषाई शब्दावली के तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि गुरबाणी में सिंधी और लहिंदी अर्थात पश्चिमी पंजाबी की साझी सांस्कृतिक विरासत के अनेक साझा शब्दों का भरपूर उपयोग हुआ है।
इसके अतिरिक्त केंद्रीय और लहिंदी पंजाबी की बहुत-सी शब्दावली ऐसी भी है, जो सिंधी भाषा से साझा है या उससे मेल खाती है। भाषाई दृष्टि से, विशेषकर शब्दावली के स्तर पर, सिंधी अन्य भाषाओं की तुलना में लहिंदी अर्थात पश्चिमी पंजाबी के बहुत निकट है।
भारत के गुजरात राज्य में स्थित कच्छ का क्षेत्र सिंध का ही हिस्सा रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से एक समय यह स्वतंत्र राज्य के रूप में भी स्थापित रहा। इस क्षेत्र की कच्छी भाषा सिंधी की एक उपबोली है।
गुजरात के कच्छ क्षेत्र के अतिरिक्त उत्तरी बलूचिस्तान में भी कच्छी नाम का एक क्षेत्र है। वहाँ की बोली को भी सिंधी की उपबोली माना जाता है। किंतु यह ‘कच्छी’ क्षेत्र और वहाँ की बोली गुजरात के ‘कच्छ’ क्षेत्र और वहाँ की ‘कच्छी’ बोली से भिन्न हैं। दोनों क्षेत्रों के बीच लगभग आठ-नौ सौ किलोमीटर की दूरी है।
‘कच्छी’ नाम से प्रचलित दोनों उपबोलियो के सिंधी भाषा से संबंध पर शोध करना भाषा वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत रोचक विषय हो सकता है।
इसके अतिरिक्त मारवाड़ अर्थात राजस्थान के मरुस्थलीय जिलों- जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर आदि के सीमावर्ती क्षेत्रों में बोली जाने वाली ढटकी अथवा थरेली बोली भी सिंधी की एक उपबोली है।
कई नाम, वाक्यांश, मुहावरे और लोकोक्तियाँ ऐसी हैं, जो सिंध और पंजाब की साझी सांस्कृतिक एवं भाषाई विरासत को उजागर करती हैं। इसी संदर्भ में पंथ की सभी धार्मिक संस्थाओं और संप्रदायों को सिंधी समाज के हितों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सिंधी भाषा में सिख साहित्य उपलब्ध करवाना अत्यंत आवश्यक है परंतु इस संबंध में एक अत्यंत आवश्यक और ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि प्रकाशित किया जाने वाला साहित्य मानक, प्रामाणिक तथा गुरमत और गुरबाणी की मूल भावना के अनुरूप हो। यह साहित्य समस्त मानवता को संबोधित करने वाला हो और सर्वसाझीवालता की स्थापना के लिए ‘सरबत दा भला’ की भावना से ओतप्रोत हो। इसकी वाणी आध्यात्मिक, विनम्र, प्रेमपूर्ण तथा आपसी संबंधों को जोड़ने और सुदृढ़ करने वाली होनी चाहिए।
गुरुमुखी से सिंधी और सिंधी से गुरमुखी अनुवादों की बहुत बड़ी आवश्यकता है। गुरबाणी, धार्मिक साहित्य, कला, संगीत, संस्कृति और इतिहास सहित सिक्खी की अनमोल विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए ऐसा करना अत्यंत आवश्यक है।
यदि सिंधी समाज स्वयं इस महान कार्य को अपने हाथ में ले, तो यह अधिक प्रभावी और लाभकारी सिद्ध होगा। यह अवश्य सुनिश्चित किया जाए कि गुरुमुखी, गुरबाणी, सिख साहित्य, संस्कृति और इतिहास के संबंध में सिंधी भाषा में होने वाले सभी कार्य गुरु-दृष्टि को समर्पित हों। गुरु-दृष्टि का आधार और कसौटी केवल और केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पवित्र वाणी है, और कोई नहीं।
गुरुमुखी से सिंधी और सिंधी से गुरुमुखी कोश तैयार करवाने की अत्यंत आवश्यकता अनुभव की जा रही है। यह कार्य पंजाब के शैक्षिक और साहित्यिक संस्थान अपने हाथ में लें। पंजाब की विश्वविद्यालयों के अतिरिक्त भाषा विभाग और पंजाबी साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं, सिंधी संस्थाओं के सहयोग से ऐसे कार्य प्राथमिकता के आधार पर आरंभ करें।
सिंधी नानक पंथियों को अपनी आगामी पीढ़ियों को गुरु, गुरबाणी और सिंधी विरासत से जोड़े रखने के लिए निरंतर धार्मिक गतिविधियों और अकादमिक प्रयासों की आवश्यकता है। सिंधी सिखों और संस्थाओं को पूरी गंभीरता, दूरदर्शिता और सजगता से विचार कर सिंधी और गुरुमुखी भाषाओं के परस्पर विकास के लिए किसी साझा अकादमी के निर्माण की योजना बनानी चाहिए। इस अकादमी अथवा विश्वविद्यालय में अन्य शैक्षिक कार्यों के साथ-साथ एक शोध और प्रकाशन विभाग अवश्य होना चाहिए। वहाँ सिंधी और गुरुमुखी भाषा-लिपि के अध्ययन के साथ-साथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का अध्ययन तथा सिख दृष्टिकोण को सामने रखकर सिंध के इतिहास पर गंभीर शोध कार्य करवाए जाएँ।
सिंधी सिखों और नानक पंथी-सहज धारियों को, विशेष रूप से अपनी नई पीढ़ी को मातृभाषा सिंधी के प्रति जागरूक करने के लिए सभी संभव प्रयास करने चाहिए। पंजाब सहित भारत के सभी राज्यों और विदेशों में रहने वाले सिंधियों को अपनी नई पीढ़ी को सिंधी भाषा सिखाने के लिए विशेष विद्यालय स्थापित करने चाहिए।
सिंधी भाईचारे के गुरुद्वारों और गुरु नानक दरबारों में सिंधी भाषा सिखाने तथा गुरमुखी शिक्षा देने के विशेष प्रबंध करने की आवश्यकता है। यद्यपि कुछ सिंधी संस्थाएँ इस दिशा में पर्याप्त सार्थक कार्य कर रही हैं, फिर भी सिंधी सिखों और नानक पंथियों में बच्चों तथा युवाओं को सिंधी और गुरमुखी सिखाने के लिए और अधिक विशेष प्रयासों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
इसके साथ ही पंजाब सहित देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में बसे सिंधी नानक पंथियों को सजग प्रयास करने चाहिए कि हर सिंधी, चाहे वह किसी भी देश में रहता हो, जनगणना के समय अपनी मातृभाषा सिंधी ही लिखवाए या दर्ज करवाए। इस संबंध अनेक सिंधी बुजुर्गों की एक उचित चिंता और पीड़ा इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि उनकी नई पीढ़ी सिंधी भाषा पढ़ना-लिखना भूलती जा रही है। सिंधी भाषा लिखने के लिए सिंधी समाज फारसी और नागरी लिपि अपनाने के प्रश्न पर एक विचित्र द्वंद्व और कशमकश से जूझ रहा है। भारत में सिंधी भाषा के के अस्तित्व को सर्व समावेशक बनाने हेतु हमारी सिख संस्थाओं को विशेष प्रयास करने की अत्यंत आवश्यकता है।
इधर भारत के विभिन्न राज्यों में आकर बसे सिंधी नानक पंथियों ने, विस्थापन और मातृभूमि से वंचित हो जाने के बावजूद, अपने दरबारों, धर्मशालाओं, ठिकानों और आध्यात्मिक केंद्रों में गुरु की सिक्खी की ज्योति को निरंतर प्रज्वलित रखा है।
मुंबई, उल्हासनगर, पुणे, बेंगलुरु, सिकंदराबाद-हैदराबाद, विजयवाड़ा, विशाखापट्टनम, चेन्नई, भावनगर, अहमदाबाद, सूरत, भुज, आदिपुर, गांधीधाम, राजकोट, इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, उज्जैन, जबलपुर, लखनऊ, मथुरा, कानपुर, वाराणसी, जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा, जोधपुर, झालावाड़, कोटा, दिल्ली, सोलन तथा मलेरकोटला सहित अनेक नगरों और स्थानों पर सिंधी धर्मशालाएँ, गुरु नानक दरबार, ठिकाणे तथा धाम स्थापित हैं। इनमें से अधिकांश स्थान श्री गुरु नानक देव साहिब जी के पावन नाम से संबद्ध हैं, जबकि अनेक केंद्र सिंधी समाज में अत्यंत श्रद्धेय गुरमुख विभूति संत बाबा थाहरिया सिंह जी के नाम से जुड़े हुए हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में संत बाबा थाहरिया सिंह जी ने सिंध की विशाल संख्या में संगत को श्री गुरु नानक देव साहिब जी, गुरबाणी और सिक्खी से जोड़ने का अत्यंत पुण्य एवं ऐतिहासिक कार्य किया था।
वर्तमान समय में ‘अमृत वेला ट्रस्ट’ नामक संस्था उल्हासनगर सहित भारत के विभिन्न राज्यों में व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार कर रही है और सिंधी संगत के बीच श्री गुरु नानक देव साहिब जी तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पावन गुरबाणी की खुशबू का प्रचार – प्रसार कर रही है।
अतः यह निर्विवाद सत्य है कि सिंध और सिंधी समाज का श्री गुरु नानक देव जी तथा पावन गुरबाणी के साथ अत्यंत गहरा, भावनात्मक और आध्यात्मिक संबंध है। इस सुंदर और पवित्र संबंध की संवेदनशीलता को उसी भावभूमि पर पहुँचकर ही अनुभव कर समझा जा सकता है।
भारतीय उपमहाद्वीप अर्थात दक्षिण एशिया के इस विशाल भूभाग में विद्यमान विविध धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई और प्रादेशिक पहचानों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें अद्भुत एकात्मता के सूत्र में पिरोने का कार्य गुरु साहिबानों की सिक्खी ने प्रारंभ से ही किया है। सिख परंपरा ने सदैव समाज को जोड़ने, समन्वय स्थापित करने और मानवता को एक सूत्र में बांधने की रचनात्मक भूमिका निभाई है।
गुरबाणी में प्रकृति की अद्भुत सृष्टि की भाँति मानवीय विविधताओं और बहुरूपताओं को भी परमात्मा की आज्ञा और उसकी रचना का अंग माना गया है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पावन वाणी मनुष्य को बार-बार अपने मूल को पहचानने और अपने मूल से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।
गुरु साहिबानों और गुरबाणी की ऐतिहासिक भूमिका सदैव जोड़ने वाली रही है, तोड़ने वाली नहीं; मनुष्य को उसके मूल की ओर लौटाने वाली रही है, उससे दूर करने वाली नहीं। सिक्खी केवल आत्म-विकास का मार्ग ही नहीं, अपितु प्रत्येक मनुष्य की मौलिक पहचान और उसकी स्वतंत्र अस्मिता की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर सर्वस्व न्योछावर कर देने का नाम भी है। गुरु साहिबानों और गुरु के प्रिय सिखों ने समय-समय पर अपनी शहादतें देकर इस आदर्श को सत्य सिद्ध किया है।
गुरसिक्खी के मूल सिद्धांतों के अनुरूप साझेदारी, सह-अस्तित्व और भाईचारे की यह अद्भुत परंपरा शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल तक पूरी गरिमा के साथ जीवित रही। किंतु अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद के आगमन ने अपनी विभाजनकारी और कुटिल नीतियों के माध्यम से इस गुरमत-आधारित सामाजिक समरसता को धीरे-धीरे कमजोर करना आरंभ कर दिया, जिसका सबसे भयावह परिणाम 1947 ई. के विभाजन के रूप में सामने आया। 1947 ई. के विभाजन ने जहाँ दक्षिण एशिया के इस विशाल भूभाग के प्रेमपूर्ण मानवीय संबंधों की निर्ममता से हत्या कर हमारी संवेदनाओं को लहूलुहान कर दिया, वहीं हमें संकीर्ण धार्मिक विभाजनों की सीमाओं में भी कैद कर दिया। इसने सीमाओं के दोनों ओर और एक ही देश के भीतर रहने वाले भाई-बहनों को एक-दूसरे के सुख-दुःख से दूर कर देने का महापाप किया।
यद्यपि समय के साथ दोनों ओर की नई पीढ़ी में जागरूकता बढ़ रही है और युवा वर्ग सत्ता प्राप्ति के लिए घृणा का विष फैलाने वाली राजनीति की दुर्भावना और स्वार्थपूर्ण मानसिकता को समझने लगा है, फिर भी अभी बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। वाहिगुरु जी से यही अरदास है कि सिंधु-भूखंड और समूचे दक्षिण एशिया सहित पूरी पृथ्वी पर धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के सभी भेद प्राकृतिक विविधता की सुंदर अभिव्यक्ति बन जाएँ। प्रत्येक सिंधी और पंजाबी के हृदय में केवल हिंदू-सिख सिंधियों अथवा पंजाबियों के प्रति ही नहीं, अपितु मुस्लिम सिंधियों और पंजाबियों के प्रति भी समान प्रेम, सम्मान और आत्मीयता का भाव जागृत हो।
वह दिन आए जब सीमाओं की दीवारें मनुष्यों के हृदयों के बीच अवरोध न बनें; भाईचारे की सांझ पुनः स्थापित हो; प्रेम, विश्वास और मानवीय आत्मीयता फिर से अपने स्वाभाविक स्वरूप में विकसित हो।
यह विश्वास और अनुभूति हमारे हृदयों को सदैव आलोकित करती रहे कि सच्चे मन से की गई प्रार्थनाएँ / अरदास, विनम्र निवेदन और ईमानदार प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाते, वह एक न एक दिन अवश्य सफल होते हैं।
आभार प्रकटन-
प्रस्तुत आलेख का लेखन, संपादन एवं वैचारिक विन्यास वरिष्ठ – वरेण्य सिख विद्वान, इतिहासकार एवं चिंतक डॉ. चमकौर सिंह के मौलिक शोध, गहन अध्ययन तथा उनके प्रामाणिक लेखन से अनुप्राणित है। विशेष रूप से उनकी गुरुमुखी भाषा में प्रकाशित महत्वपूर्ण कृति “ਸਿੰਧੀ ਸਮਾਜ ਵਿੱਚ ਸਿੱਖੀ” (सिंधी समाज में सिक्खी) इस आलेख की वैचारिक आधारशिला रही है। इस ग्रंथ में संकलित ऐतिहासिक तथ्यों, संदर्भों एवं विश्लेषणों ने प्रस्तुत शोध-आलेख को दिशा, प्रामाणिकता और गहनता प्रदान की है।
डॉ. चमकौर सिंह, ग्राम धूड़कोट कलां, ज़िला मोगा (पंजाब) के निवासी हैं। आपने एम.ए. एवं पीएच.डी. की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत लगभग तीन दशकों तक शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में अनेक गरिमामय एवं उत्तरदायित्वपूर्ण पदों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया। इस अवधि में आपने गुरमत प्रकाश के संपादक एवं सह-संपादक के रूप में भी दीर्घकाल तक अपनी विद्वतापूर्ण सेवाएँ प्रदान कीं। इसके अतिरिक्त आप टोहड़ा इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन सिखिज़्म, बहादुरगढ़ में मार्गदर्शक के रूप में भी अपनी महत्वपूर्ण सेवाएँ देकर सम्मान पूर्वक सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान समय में भी आपकी लेखनी निरंतर “गुरु पंथ खालसा” की वैचारिक एवं बौद्धिक सेवा में समर्पित है।
डॉ. चमकौर सिंह केवल इस विषय के मूल चिंतक एवं प्रेरणास्रोत ही नहीं हैं, अपितु हमारी “खोज-विचार” टीम के आत्मीय शुभचिंतक, स्नेही एवं मार्गदर्शक भी हैं। उनका विद्वतापूर्ण मार्गदर्शन, ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति उनकी अद्भुत सजगता, अनुसंधानपरक दृष्टि तथा अकादमिक निष्पक्षता हमारी टीम के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रही है। उनके स्नेहिल सहयोग और सतत मार्गदर्शन ने हमारे शोध कार्यों को तथ्यात्मक विश्वसनीयता, वैचारिक दृढ़ता तथा अकादमिक संतुलन प्रदान किया है।
लेखक उनके इस अमूल्य सहयोग, आत्मीय स्नेह एवं विद्वतापूर्ण मार्गदर्शन के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता, विनम्र श्रद्धा एवं गहन आदर भाव व्यक्त करता है तथा कामना करता है कि उनका ज्ञान, अनुभव और प्रेरणा भविष्य में भी शोध एवं गुरमत साहित्य की सेवा करने वाले जिज्ञासुओं का इसी प्रकार मार्गदर्शन करती रहे।
✍️ लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’
पुणे (महाराष्ट्र)
© 23 / 06 / 2026.