बीसवीं शताब्दी में गुरुधामों का अभिलेखन: भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) की साइकिल यात्राओं का ऐतिहासिक विश्लेषण
सारांश (Abstract)
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में जब भारत अखंड भू-राजनीतिक स्वरूप में विद्यमान था और संचार-सुविधाएं अत्यंत सीमित थीं, उस समय भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) ने 11 मार्च 1930 से 26 जून 1935 तक लगभग पाँच वर्षों की अवधि में साइकिल द्वारा लगभग 20,000 माइल्स की यात्रा कर, लगभग 1600 गुरुधामों के दर्शन किए। इस यात्रा के दौरान उन्होंने न केवल ऐतिहासिक गुरुधामों का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया, अपितु उनके इतिहास, प्रबंधन, स्वरूपों तथा भौगोलिक स्थितियों का विस्तृत दस्तावेजीकरण भी किया। प्रस्तुत शोध-पत्र में भाई धन्ना सिंह चहल के जीवन, उनकी ऐतिहासिक साइकिल यात्राओं, उनके द्वारा लिखित डायरियों तथा सिख इतिहास में उनके योगदान का सम्यक् विश्लेषण किया गया है।
मुख्य शब्द: गुरु पंथ खालसा, साइकिल यात्रा, गुरुधाम, सिख इतिहास, दस्तावेजीकरण, पंथ दर्दी साहित्य
1. प्रस्तावना
गुरुवाणी का उद्घोष—
चरन चलउ मारगि गोबिंद॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा॥
(अंग 281)
यह केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं, अपितु जीवन-मार्ग का घोष है। इसी भावभूमि पर ‘गुरु पंथ खालसा’ के महान निष्काम सेवादार भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) का जीवन एक मूर्त उदाहरण के रूप में सामने आता है। उन्होंने गोबिंद के मार्ग पर चलने की व्याख्या को केवल वाणी तक सीमित नहीं रखा अपितु उसे कर्म-योग में परिणत किया।
2. जन्म, पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व
भाई धन्ना सिंह चहल का जन्म सन् 1905 ईस्वी में ग्राम चांगली, तहसील धुरी, जिला संगरूर (सूबा पंजाब) में हुआ। उनके पिता का नाम भाई सुंदर सिंह जी था। वह महाराजा पटियाला के यहाँ कार-ड्राइवर एवं दक्ष मैकेनिक के रूप में कार्यरत थे। वह उत्कृष्ट हॉकी खिलाड़ी भी थे।
नौकरी के दौरान उनका परिचय गुरु सिख भाई जीवन सिंह जी से हुआ, जिनकी संगति में रहकर वह सिक्खी की मर्यादाओं में परिपक्व हुए। भाई गुरबक्श सिंह जी (हेड मैकेनिक, पटियाला रियासत) से भी उनका पारिवारिक स्नेह-संबंध था। यात्राओं के दौरान वह पत्राचार द्वारा निरंतर संपर्क बनाए रखते थे।
3. ऐतिहासिक साइकिल यात्राएँ (1930–1935)
3.1 यात्रा का विस्तार
11 मार्च सन 1930 ई. से 26 जून सन 1935 ई. तक उन्होंने लगभग पाँच वर्षों में 20,000 माइल्स की साइकिल यात्रा कर लगभग 1600 गुरु धामों के दर्शन किए।
यह यात्रा कश्मीर से लेकर अबचल नगर श्री हजूर साहिब नांदेड़ (महाराष्ट्र) तक, असम से लेकर पेशावर पार कर जमरोद (अफगानिस्तान) तक विस्तृत थी। उस समय भारत अखंड था। सूबा पंजाब से बाहर 3 फीट लंबी श्री साहिब (कृपाण) ले जाने के लिए लाइसेंस आवश्यक था।
3.2 यात्रा की परिस्थितियाँ
उस समय न तो सड़कों की समुचित व्यवस्था थी, न पुल, न धर्मशालाएँ, न होटल। कई बार उन्हें साइकिल को कंधे पर उठाकर नदी-नालों को पार करना पड़ता था। प्लेग जैसी महामारी का भी प्रकोप था। इन परिस्थितियों में यह यात्राएँ “लोहे के चने चबाने” के समान थी।
वह अपनी साइकिल को स्नेहपूर्वक “अरबी पातशाह” (अरबी घोड़ा) कहते थे। यात्रा के दौरान भाई साहिब, साइकिल पर निशान साहिब, बैटरी टॉर्च, तख्ती, कृपाण, लोहे का संदूक (भोजन, शस्त्र, डायरी सहित) रखते थे।
4. दस्तावेजीकरण और ऐतिहासिक योगदान
4.1 गुरुधामों का अभिलेखन
उस समय लगभग 500 गुरुधामों की जानकारी लिखित रूप में उपलब्ध थी। उनकी पुस्तक प्रकाशित होने पर लगभग 1100 नए गुरुधामों की ऐतिहासिक जानकारी सामने आई। यह सिख इतिहास के अंधकारमय क्षेत्र में प्रकाश-रेखा सिद्ध हुआ।
भाई धन्ना सिंह जी प्रत्येक स्थान की तस्वीर लेते थे और फोटो के पीछे स्थान का नाम, शहर का नाम, तथा अंग्रेजी और गुरुमुखी अंकों में तिथि अंकित करते थे।
4.2 कैमरा और सहयोग
- 147 रुपये का कोडक कैमरा – सरदार गिरफ्तार सिंह सोढ़ी जी द्वारा प्रदत्त
- 23 अप्रैल सन 1932 ई. – सरदार हजूरा सिंह ढिल्लों द्वारा उत्तम कैमरा
- भाई जुगराज सिंह (दर्जी) – यात्रोपयोगी वस्त्र
5. डायरियाँ: एक ऐतिहासिक धरोहर
भाई धन्ना सिंह जी ने कुल 8 डायरियाँ लिखीं, जिनमें 3259 पृष्ठ हैं। अंतिम यात्रा (1 नवम्बर सन 1934 ई. से 2 मार्च सन 1935 ई. तक) की डायरी विलुप्त हो गई।
यह डायरियाँ न केवल संस्मरण हैं अपितु सिख इतिहास की सभ्यताओं, सामाजिक सरोकारों और आध्यात्मिक अनुभूतियों का जीवंत दस्तावेज हैं। यह स्मृति नहीं अपितु मनोवेगों का घनीभूत ऐतिहासिक उद्गार है।
6. पहाड़ी दौरे की खोज
उन्होंने ‘श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी’ के पहाड़ी दौरे का मार्ग खोजते हुए पैदल रिवालसर से श्री आनंदपुर साहिब जी तक यात्रा की। यह वोही मार्ग था जिस पर गुरु पातशाह ने स्वयं गमन किया था।
7. अधूरी आकांक्षाएँ और दुर्घटना
राजस्थान, सिंध, कराची, क्वेटा, बलूचिस्तान की यात्रा भाई धन्ना सिंह जी नहीं कर सके। उनकी विदेशों में जाकर, जैसे कि- अफगानिस्तान, ईरान, बगदाद, मक्का शरीफ, सऊदी अरब, तिब्बत, चीन इत्यादि स्थानों पर जाकर गुरुधाम खोजने की इच्छा भी अधूरी रही।
5 मार्च सन 1935 ई. को ‘Hindustan Times’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार, सहयोगी हीरा सिंह द्वारा राइफल संभालते समय दुर्घटनावश चली गोली उनके लिए प्राणघातक सिद्ध हुई।
8. प्रकाशन और पुनर्प्रकाशन
75 वर्षों तक भाई धन्ना सिंह जी (पटयालवी) जी की डायरियाँ भाई गुरबख्श सिंह जी के परिवार में सुरक्षित रहीं। तत्पश्चात पंजाबी भाषा विभाग के पूर्व संचालक सरदार चेतन सिंह जी ने ‘सथ लांबड़ा’ संस्था के सहयोग से ‘गुर तिरथ साइकिल यात्रा’ शीर्षक से ग्रंथ प्रकाशित किया।
9. विश्लेषण
भाई धन्ना सिंह चहल की यात्राएँ मात्र धार्मिक भ्रमण नहीं थीं। वह तो—
- सिख इतिहास के पुनराविष्कार का उपक्रम
- गुरुधामों की भौगोलिक पुनर्स्थापना
- पंथीय चेतना का पुनर्जागरण
- दस्तावेजी इतिहास-लेखन की मिसाल थी; 30 वर्ष की आयु में पाँच वर्षों तक हिमालय जैसी कठिन साधना कर उन्होंने इतिहास को शब्दांकित किया।
10. निष्कर्ष
भाई धन्ना सिंह चहल (पटियालवी) का जीवन सिख इतिहास में एक अद्वितीय अध्याय है। उन्होंने बिखरे हुए गुरुधामों को जोड़कर एक स्वर्णिम ऐतिहासिक श्रृंखला निर्मित की।
उनकी साइकिल यात्रा एक आध्यात्मिक तपस्या, एक ऐतिहासिक शोध और एक साहित्यिक पुनर्जागरण का संगम थी।
‘गुरु पंथ खालसा’ को अर्पित उनकी निष्काम सेवाएँ सदा वंदनीय रहेंगी।
संदर्भ (References)
- ‘गुर तिरथ साइकिल यात्रा’, संपादक: सरदार चेतन सिंह जी (गुरुमुखी)
- ‘हिंदुस्तान टाइम्स’, 5 मार्च 1935 (समाचार संदर्भ)
- वारां भाई गुरूदास जी
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी (अंग 281)
आभार
इस शोध के लेखन हेतु इतिहासकार डॉक्टर भगवान सिंह ‘खोजी’ (टीम खोज–विचार) का विशेष मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। गुरुवाणी पदों के विश्लेषण हेतु सरदार गुरदयाल सिंह जी (प्रमुख सेवादार, खोज–विचार टीम) का सहयोग प्राप्त हुआ।
–सादर आभार सहित
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’
अवंतिका रेसीडेन्सी, सोमवार पेठ, पुणे – 411011
ईमेल: [email protected]