BHULE-BISARE NANAK PANTHI

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भूले – बिसरे नानक पंथी

भूमिका-

नानक पंथियों के जीवन-संघर्ष को निकट से देखकर और उसे गहराई से समझने के उपरांत, इस पुस्तक के माध्यम से मेरे लिए अत्यंत प्रिय, सम्मान की अधिकारी और साथ ही उपेक्षित इन नानक पंथियों के प्रति मेरी लेखनी की संवेदनाएँ एक सशक्त चेतावनी का रूप ले लेती हैं।

इस कृति में उन करोड़ों नानक – नामलेवाओं, नानक – पंथियों की वेदनाएँ, करुण पुकारें और कराहें समाहित हैं, जो आज आकाश को तो चीर रही हैं, किंतु संभवतः गुरु पंथ खालसा के आँगन तक उनकी दस्तक अभी पूर्णतः नहीं पहुँच सकी है। मेरे ब्लाॅग का यह कॉलम उन्हीं दबे – कुचले और उपेक्षित स्वरों की प्रतिनिधि है तथा सिख जगत के अतिरिक्त सामान्य समाज तक उनके यथार्थ से परिचित कराने का एक विनम्र, किंतु अत्यंत गंभीर प्रयास है।

उपेक्षित और विस्मृत नानक पंथियों की पीड़ाएँ और समस्याएँ अत्यंत व्यापक तथा गहन हैं। टीम खोज – विचार के ब्लाॅग अर्श.ब्लाॅग की यह कृति उन करोड़ों परिवारों की व्यथा है, जिनके पूर्वजों ने अपने प्रिय गुरुओं पर धन, दौलत, भूमि, संपत्ति और यहाँ तक कि अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए थे और अद्वितीय शहादत का गौरव प्राप्त किया था।

कालचक्र के फेर, सिख कौम के नेतृत्व की घोर उपेक्षा तथा उनकी विशिष्ट जीवन – पद्धति के कारण, आज उन्हीं महान शहीदों की संताने झुग्गियों और झोपड़ियों में जीवन यापन करने को विवश हैं। वह अपने गुरु की स्मृति में दिन काटते हुए, अपने प्रिय गुरु पंथ खालसा को निरंतर पुकार रही हैं।

आज से लगभग 128 वर्ष पूर्व, सिंघ सभा आंदोलन के अग्रदूत, पंथ-रत्न ज्ञानी दित्त सिंह जी ने अपने समाचार-पत्र ‘खालसा अख़बार, लाहौर’ के 28 अगस्त सन 1898 ई. के अंक में इस विषय पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए यह मार्मिक पुकार लगाई थी-

“सिकलीगर, जो मारवाड़ी खालसा हैं, अत्यंत दयनीय अवस्था में झुग्गियाँ डालकर बाहर रहते हैं। उनका कार्य शस्त्र बनाना और शिकार करके जीवन निर्वाह करना है। किंतु खालसा धर्म के प्रति वे पूर्णतः निष्ठावान हैं। वह अपने सिर पर कैंची या उस्तरा चलाना अपनी मृत्यु के समान मानते हैं। इस दिशा में भी ‘गुरु पंथ खालसा’ ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया।”

एक शताब्दी से अधिक समय बीत जाने के बाद, आज जब हम साहिब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज का 350वाँ शहादत वर्ष मना रहे हैं, यह दिवस तभी सार्थक माना जाएगा जब हम श्री गुरु नानक देव जी के समय से जुड़े उन करोड़ों नानक – पंथियों को जो विभिन्न स्थानों पर बिखरे हुए मोतियों की भाँति दृष्टिगोचर होते हैं, अपने हृदय से लगा सकें।

गुरुमुखी की पुस्तक ‘भूले – विसरे नानाक पंथी (संपादक: स्वर्गीय सरदार सुखदेव सिंह जी ‘लाज’) के अनुसार यह एक सशक्त और जागृत पुकार है, जिसे स्वीकार करना हम सभी का सामूहिक कर्तव्य है। माननीय पत्रकार सरदार हरबीर सिंह ‘कंवर’ ने अजीत अख़बार में अपने लेखों के माध्यम से इस दिशा में चेतना जगाई और विभिन्न संस्थाओं ने अपनी – अपनी क्षमता के अनुसार कार्य आरंभ भी किए। उन्होंने पंथक नेताओं को झकझोरते हुए स्पष्ट कहा कि यह कार्य इतना व्यापक है कि इसे अकेले दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, तख़्त श्री पटना साहिब अथवा तख़्त श्री हज़ूर साहिब भी नहीं संभाल सकते; यह तो समस्त गुरु पंथ खालसा का साझा उत्तरदायित्व है।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद सरदार रणजीत सिंह ने भी अपने लेख ‘बिखरे मोती’ में इसी भाव को दोहराते हुए लिखा—
“नानक-पंथी इस प्रतीक्षा में हैं कि कोई पंथक नेतृत्व उनकी बाँह थामे, उन्हें अपने गले से लगाए और उनके भविष्य के लिए कोई ठोस योजना तैयार करे।”

कुछ समय पूर्व एडवोकेट सरदार रेवेल सिंह द्वारा लिखा गया एक दुर्लभ लेख प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था- “नानक नाम लेवाओं को एकत्र करने की आवश्यकता”। उसमें लेखक ने उल्लेख किया कि नामधारी संप्रदाय के द्वितीय मुखिया बाबा प्रताप सिंह जी ने श्री गुरु नानक नाम लेवा समस्त सिखों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया था। 14–15 अक्तूबर सन 1934 ई. को भैणी साहिब में आयोजित एक सम्मेलन में भाई अर्जुन सिंह बागड़ियाँ को अध्यक्ष नियुक्त कर यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।

इस सम्मेलन में सरदार सुंदर सिंह मजीठिया, भाई कन्हैया सिंह नाभा, भाई जोध सिंह, प्रोफेसर तेजा सिंह, प्रोफेसर गंगा सिंह, ज्ञानी शेर सिंह, अकाली दल, चीफ खालसा दीवान, बुद्धा दल तथा उदासी महामंडल सहित अनेक प्रतिष्ठित प्रतिनिधि सम्मिलित हुए।

अपनी उदासियों के दौरान श्री गुरु नानक देव साहिब जी जहाँ – जहाँ गए, वहाँ की संगत ने उनके प्रभाव को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने असंख्य लोगों को सिख बनाया, धर्मशालाओं की स्थापना की और वहाँ नियुक्त प्रचारकों के माध्यम से निरंतर धर्म – प्रचार, सत्संग तथा सामाजिक सेवा का कार्य प्रवाहित होता रहा।

आंध्र प्रदेश के पर्वतीय और वन्य क्षेत्र का कोड़ा भील, जो कभी आदमखोर के रूप में कुख्यात था, वस्तुतः उच्च ज्ञान-सम्पन्न व्यक्ति था। उसका नाम ‘राक्षस’ संभवतः उसके आदमखोर स्वभाव और पर्वतीय निवास के कारण पड़ा, क्योंकि तेलुगु भाषा में ‘कोड़े’ शब्द का अर्थ पर्वत होता है। इसी प्रकार सज्जन ठग, देव लूत, बंगाल की जादूगरनी तथा असम, बंगाल, उड़ीसा, लंका, तिब्बत, चीन और अनेक मुस्लिम देशों के अनेक व्यक्ति गुरु साहिब के चरणों में आकर सिख बने और उनकी आने वाली पीढ़ियों में सिक्खी निरंतर पुष्पित-पल्लवित होती रही।

महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के नायक लोग, इराक और अफ़ग़ानिस्तान के कुछ कबीले आज भी इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। लाहौर के वणजारे व्यापारी भाई मनसुख, श्री गुरु नानक देव साहिब जी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सिख बने। उन्होंने अपने लाहौर स्थित व्यापार को लंका तक विस्तारित किया और व्यापार के साथ – साथ सिक्खी का प्रचार भी किया। भाई मनसुख के आग्रह पर ही श्री गुरु नानक देव साहिब जी लंका गए, जहाँ के राजा शिवनाभ गुरु साहिब और सिक्खी से अत्यंत प्रभावित हुए।

श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा आरंभ की गई यह परंपरा आगे की पातशाहियों द्वारा भी निरंतर आगे बढ़ाई गई। काबुली संगत, बनारसी संगत, अग्रहरी सिख, कश्मीरी सिख तथा अनेक अन्य संगतों का उल्लेख सिख इतिहास में मिलता है। प्रसिद्ध बंगाली विद्वान डॉ. हिमाद्रि बनर्जी की पुस्तक “The Other Sikhs” में उल्लेख मिलता है कि जब कुछ समय पूर्व अग्रवाल समाज ने अपने पूर्वज महाराजा अग्रसेन की राजधानी अग्रोहा का पुनर्निर्माण किया, तो उस अवसर पर बड़ी संख्या में अग्रहरी सिख भी सम्मिलित हुए। ये वह सिख थे, जो नौवें पातशाह के काल में सिख धर्म में दीक्षित हुए थे। इसी प्रकार कठिन समय में महाराणा प्रताप को आर्थिक सहायता प्रदान करने वाले सेठ भामाशाह भी एक उदासी सिख थे।

श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने जहाँ-जहाँ भी विचरण किया, वहाँ संगतों और संस्थाओं की स्थापना की, जिन्हें कालांतर में ‘नानक पंथी’ कहा जाने लगा। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति ने इन समस्त संस्थाओं की नानक पंथी सूची तैयार कर प्रकाशित की है। शिरोमणि समिति के मासिक पत्र ‘गुरमति प्रकाश’ के सितंबर 1969 अंक में सिंह साहिब ज्ञानी फौजा सिंह जी के लेख में यह उल्लेख मिलता है कि उस समय बिहार का लगभग आधा भाग उदासी संप्रदाय (नानक पंथी) से संबंधित था। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी उदासी संप्रदाय से संबद्ध थे। इस सूची को इस पुस्तक में प्रथम लेख के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है।

हमारी विनम्र प्रार्थना है कि अब और समय न गँवाते हुए, समस्त नानक पंथियों की सेवा भावना को केंद्र में रखते हुए, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से कमजोर वर्गों को उन्नति के मार्ग पर लाने हेतु योजनाबद्ध और सामूहिक प्रयास समय की सरकारों की ओर से भी किए जाने चाहिए। सरदार महिंदर सिंह जोश ने अपने एक लेख में लिखा है कि अन्य मतों के लेखक- विशेषतः मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी यह स्वीकार करते हैं कि श्री गुरु नानक साहिब जी ने लगभग तीन करोड़ लोगों को स्वयं गुरु नानक का अनुयायी बनाया। लेखक एवं शोधकर्ता इतिहासकार डॉ. दलविंदर सिंह ग्रेवाल तथा पूर्व शिरोमणि समिति सदस्य मलकीत सिंह सग्गू के प्रकाशित लेखों में नानक पंथियों की संख्या बारह करोड़ बताई गई है, जबकि सिकलीगर समुदाय पर डॉक्टरेट करने वाली प्रथम विदुषी डॉ. हरप्रीत कौर खुराना इनके संख्या-आकलन को पंद्रह करोड़ तक बताती हैं। वर्नमान समय में यह संख्या 22 से 25 करोड़ तक हो सकती है|

भाई काहन सिंह नाभा द्वारा रचित ‘महान कोष’ में ‘नानक पंथी’ शब्द का अर्थ श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने वाला गुरु सिख बताया गया है। यद्यपि वर्तमान समय में नानक पंथियों के अनेक फिरके दृष्टिगोचर होते हैं, तथापि मुख्य रूप से तीन प्रमुख धाराएँ मानी जाती हैं—उदासी, सहजधारी और सिंघ- जिनमें आगे चलकर निहंग, निर्मले, कूके आदि सम्मिलित हुए।

जब साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने खालसा पंथ की सृजना की, उस समय सजे हुए दीवान में दूर – दराज़ से आई सिख संगत ने भाग लिया। उस ऐतिहासिक अवसर पर चुने गए पाँच प्यारे इस प्रकार थे—
लाहौर से भाई दया सिंह जी,
हस्तिनापुर (उत्तर प्रदेश) से भाई धर्म सिंह जी,
गुजरात से भाई मोहकम सिंह जी,
जगन्नाथ पुरी (उड़ीसा) से भाई हिम्मत सिंह जी,
बीदर (कर्नाटक) से भाई साहिब सिंह जी।

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि सिख कौम की बगिया को और अधिक विस्तार देने की आवश्यकता है। श्री गुरु नानक नाम लेवाओं की ओर समूची कौम को विशेष ध्यान देना चाहिए। किसी बाग में पाँच या दस वृक्ष हो सकते हैं, किंतु नर्सरियों से सैकड़ों प्रकार के पौधे लाकर ही बाग को हरा – भरा और समृद्ध बनाया जा सकता है। आज के समय में सिकलीगर, वणजारे, सतनामी, वारकरी, सिंधी, उदासी, निर्मले, रमईए, जोहरी, अग्रहरी- ये सभी नानक पंथी सिख कौम की उस मूल्यवान नर्सरी के पौधे हैं, जो भविष्य की समृद्धि का आधार बन सकते हैं।

यदि साहिब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 350वें शहादत स्मृति-वर्ष को समर्पित होकर उपर्युक्त उपेक्षित नानक पंथियों की सुध ली जाए, तो इससे सिख कौम का भविष्य निश्चय ही स्वर्णिम बन सकता है।

टीम खोज–विचार गुरु चरणों में अरदास और विनती करती है कि समूची कौम श्री गुरु नानक देव साहिब जी के उपदेशों पर चलती हुई, निर्धन और भूले – बिसरे इन नानक पंथी भाइयों को (जो की अधिकतर हिंदी भाषी है) अपने आलिंगन में लेकर पंथ की चढ़दी कला की ओर निरंतर अग्रसर होती रहे। टीम खोज – विचार के इस उपक्रम से इन सभी नानक पंथी सिखों को जोड़ने का प्रयास इस काॅलम में प्रकाशित लेखों के माध्यम से किया जा रहा है, यह लेख गुरुमुखी भाषा के लेखकों के द्वारा विभिन्न पुस्तकों, अखबारों और पत्रिकाओं में समय – समय पर प्रकाशित किए गये है|

आभार- मेरे इस कॉलम की संकल्पना पंजाबी भाषा के प्रसिद्ध लेखक स्वर्गीय सरदार सुखदेव सिंह ‘लाज’ जी द्वारा संपादित की गई पुस्तक भूले – बिसरे नानक पंथी  नामक पुस्तक से प्रेरित है|



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