तपते-तवे की दास्तान-
मैं सामान्य तवे की तरह ही एक तवा था। आम तवों की तरह… लोहे से बना… एक सामान्य तवा… पर, एक दिन मेरी जिंदगी में ऐसा तूफान आया, जिसने मेरी जिंदगी में उथल-पुथल मचा दी थी।
25 मई सन 1606 ई. का वह दिन! जिसे आज तक कोई नहीं भूल पाया है और ना ही कोई भूल पाएगा। आज ही के दिन लाहौर में शहीदों के सरताज, महान शांति के पुंज, गुरु वाणी के बोहिथा (ज्ञाता/सागर), सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी एक महान कवि, लेखक, देशभक्त, समाज सुधारक, लोकनायक, परोपकारी और ब्रह्मज्ञानी ऐसी अनेक प्रतिभा से संपन्न गुरु जी को मुझ गरमा-गरम लाल तपते हुए तवे पर बैठा के असहनीय कठोर यातनाएं दी गयी। अत्याचारियों ने अमानवीय कृत्य को अंजाम देकर हैवानियत कि हद्द कर दीं थी। इस तरह की अमानवीय यातना, जो अब तक किसी ने ना सुनी थी, ना देखी थी।
मुझे आज भी वह दिन बहुत अच्छे से याद है, जिस दिन मैं और गरमा-गरम रेत एक दूसरे से लिपट कर खूब दहाड़ मार-मारकर रोए थे, हमारी आंखों से आंसुओं की सुनामी रुक ही नहीं रही थी, हम शर्म से जारो-जार हो रहे थे, वहां कोई नहीं था। हम चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे, गुरु साहिब पर अत्याचार करने के लिए हमारा इस्तेमाल एक शस्त्र की तरह किया जा रहा था। “जिस तन लागी सोई जाने” के अनुसार हमारी व्यथा, हमारा दर्द, हमारी मजबूरी केवल और केवल हम ही जानते थे, कोई और नहीं।
अब भी मैं कभी-कभी सोचता रहता हूं कि मैं खुद को बदकिस्मत कहूं या खुशकिस्मत. दुर्भाग्य है कि मैं उन निरंकार स्वरूप साहिब श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी पर हुए अत्याचारों का भागीदार था, गुरु साहिब पर मेरी आंखों के सामने अमानवीय अत्याचार होते रहे और मैं कुछ नहीं कर सका। मेरी खुशकिस्मत है कि मुझ अभागे और पापी को श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी के चरणों का पवित्र स्पर्श प्राप्त हुआ था। जो मुझ जैसे भाग्यशाली को ही मिला था। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा… मुझे अच्छी तरह से याद है, जब श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी ने मुझे अपने चरणों के पवित्र स्पर्श का एहसास दिया था, तो न जाने कैसे, मेरी तपिश कहीं न कहीं शीतल हो चली थी और मैं बर्फ की तरह तुरंत ठंडा ठार हो गया था, मानो किसी ने मुझे बर्फ के पहाड़ से ढक दिया हो। मेरे अंदर जल रही आग भी शायद उस नाम-सिमरन की ठंडी बयार के आगे झुक गयी थी।
मैं उस प्रत्येक पल-पल का गवाह हूं, जब श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी को कठोर यातनाएं दी जा रही थी और गुरु पातशाह जी उस अकाल पुरख के भाणे (उसकी रजा) को मीठा मानकर, स्थिर मनोभाव से ध्यानमग्न होकर नाम का जाप कर रहे थे उनकी सूरत निरंकार से जुड़ी हुई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों उनके अंतर्मन में चल रहे नाम-सिमरन की ठंडक के सामने, मेरे अंदर जल रही आग और सिर पर गिरती गरमा-गरम रेत गुरु साहिब के आगे बेबस हो गए हों, या यूं कहें कि नाम-सिमरन की शक्ति, जालिमों के जुल्म को नेस्तनाबूद कर रही थी।
मेरे गुरु साहिब जी के पवित्र स्पर्श से मेरे अंदर जल रही आग की तपिश तुरंत शांत हो गई थी। पर सच जानना. अंदर जल रही पश्चाताप की अग्नि की तपिश आज भी मुझे अंदर ही अंदर जलाकर खाक करती रहती है और उस अविस्मरणीय त्रासदी की याद दिलाती है। मुझे लगता है कि पश्चाताप की इस आग की तपिश को कम करने का एकमात्र उपाय पूरी मानवता से अपने अक्षम्य पापों के लिए क्षमा मांगना है। शायद लोगों के आशीर्वाद से मेरे अंदर जल रही पश्चाताप की अग्नि कुछ कम हो जाये। इसलिए, मैं आज अपने पापों के लिए पूरी मानवता से क्षमा मांगता हूं और वाहिगुरू जी के चरणों में अरदास करता हूं कि भविष्य में कोई भी क्रूर व्यक्ति ऐसा अमानवीय अत्याचार ना करे, जिससे मानवता शर्मसार हो और मानवीय मूल्यों का अपमान हो और मानवता का सिर शर्म से झुक जाए।
स्रोत- गुरु पंथ खालसा के महान लेखक, सरदार परमजीत सिंह जी सुचिंतन जी की किताब ‘गुरु मिलि चजु अचारु सिखु’। धन्य-धन्य श्री गुरु अर्जुन देव साहिब की शहादत को सादर नमन !
✍️ -सादर आभार सहित
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’