राष्ट्र के प्रहरी: शिक्षक

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राष्ट्र के प्रहरी: शिक्षक

जो अक्षर को अर्थ बनाता,

जो जीवन को पथ दिखलाता,

जो अज्ञान के घोर तमस में

ज्ञान-दीप बन जगमगाता।

वह शिक्षक है, वह निर्माता,

राष्ट्र-भविष्य का भाग्य-विधाता,

उसके श्रम की एक बूँद से

उगता है युग का सूरज नाता

कलम पकड़ना जिसने सिखलाया,

सपनों को उड़ना बतलाया,

जिसने मिट्टी से मानव गढ़कर

देश का मस्तक चमकाया।

उस पर यदि कोई प्रश्न उठाए,

उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाए,

तो याद रखो, इस जग में कोई

गुरु बिन ऊँचाई न पाए।

नेता, अभिनेता, वैज्ञानिक,

लेखक, सैनिक, न्यायाधिकारी,

सबकी पहली पाठशाला में

बैठा था शिक्षक अधिकारी।

शिक्षक केवल वेतनभोगी कक्षा का एक कर्मचारी नहीं,

वह संस्कृति का जीवित प्रहरी है,

वह राष्ट्रधर्म का व्यापारी नहीं।

उसके कारण भाषा जीवित,

उससे ही इतिहास अमर है,

उसके चरणों की धूलि से ही

भारत का हर शिखर प्रखर है।

इसलिए शब्दों को तौलो,

सम्मान का दीपक मत तोड़ो,

जिस गुरु ने चलना सिखलाया,

उसकी गरिमा से नाता जोड़ो।

नमन उन सब शिक्षकों को

जो जीवन भर जलते रहते,

खुद तपकर पीढ़ियाँ गढ़ते,

और जिन्हें हम राष्ट्र के प्रहरी कहते।

यह कविता शिक्षकों के सम्मान, उनके राष्ट्र-निर्माण में योगदान और उनकी गरिमा की रक्षा के भाव को प्रस्तुत करती है।

सादर आभार सहित--लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’


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