सिख इतिहास का उपेक्षित अध्याय: सिकलीगर सिख
श्री गुरु नानक साहिब जी द्वारा प्रवर्तित निर्मल पंथ अर्थात गुरु पंथ खालसा में जात-पात, रंग, नस्ल, लिंग, भाषा, क्षेत्र, मज़हब अथवा किसी भी अन्य आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। यही कारण है कि मानव समाज के प्रत्येक वर्ग का गुरु पंथ खालसा के साथ गहरा और आत्मीय संबंध रहा है। किसान, मज़दूर, व्यापारी, दुकानदार, शिल्पकार, कर्मचारी, धनी, निर्धन, समाज के सभी वर्ग प्रारंभ से ही गुरु पंथ खालसा से जुड़े रहे हैं। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि दक्षिण एशिया के विशाल भू-भाग में, विशेषतः आधुनिक भारत के दूरदराज क्षेत्रों में, श्री गुरु नानक देव साहिब जी की सिक्खी का व्यापक और गहन प्रभाव विद्यमान रहा है। इस क्षेत्र में थोड़ी सी भी रुचि लेकर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं को अनेक आश्चर्यजनक तथ्य प्राप्त हुए हैं। भारत के विभिन्न राज्यों- मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ आदि में ऐसे अनेक कबीले पाए गए हैं, जिन्होंने आज तक किसी न किसी रूप में श्री गुरु नानक देव साहिब जी की सिक्खी को संजोकर रखा है।
इनमें सिकलीगर, वणजारे, लुबाणे, सतनामी, भील आदि अनेक कबीले और वर्ग सम्मिलित हैं, जो आज मुख्यधारा से अलग – थलग पड़ चुके हैं। इन कबीलों के विषय में व्यापक स्तर पर गंभीर शोध कार्य और सर्वेक्षण किए जाने की आवश्यकता है, ताकि इनके संबंध में बहुमूल्य ऐतिहासिक और सामाजिक जानकारी संकलित की जा सके। प्रस्तुत आलेख में केवल सिकलीगर कबीले के गुरु पंथ खालसा के साथ संबंधों का यथासंभव वर्णन किया जाएगा।
सिकलीगर कबीला : अर्थ और पहचान
‘सिकलीगर’ शब्द फ़ारसी भाषा के ‘सकलगर’ का पंजाबी रूपांतरण है, जिसका अर्थ है- सिकिल करने वाला, जंग उतारने वाला। अरबी, फ़ारसी भाषाओं में ‘सकल’ (सिकिल) का अर्थ है- साफ़ करने की क्रिया, अर्थात जंग हटाकर शस्त्रों आदि को चमकाने का कार्य।
‘कबीला’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- परिवार, टब्बर, कुटुंब, कुनबा, कुल, ख़ानदान, नस्ल, आल – औलाद, घराना आदि। सामान्य अर्थों में एक ही ख़ानदान, वंश या कुल से संबंधित लोगों को ‘कबीला’ कहा जाता है, किंतु विशेष अर्थों में यह शब्द ऐसे ख़ानदान या कुनबे के लिए प्रयुक्त होता है, जो प्राचीन काल से ही वंशानुगत परंपराओं, अर्थात पितृक रिवायतों को बनाए रखते हुए एक विशेष कबायली अनुशासन में बँधे रहते हैं। खान – पान, रहन – सहन और विशेषतः विवाह आदि के मामलों में कबीले से संबंधित लोग ख़ानदानी और वंशगत शुद्धता बनाए रखने के लिए अनेक प्रतिबंधों और निषेधों का कठोरता से पालन करते हैं। यद्यपि समय के प्रवाह के साथ इन प्रतिबंधों की कठोरता कुछ कम हुई है, फिर भी आज भी अनेक कबीले इन्हें सख्ती से निभाते हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता है, यहाँ तक कि कई बार उन्हें कबीले से निष्कासित भी कर दिया जाता है, जिससे नए कबीले या उप-कबीले अस्तित्व में आते रहते हैं।
आज की पंजाबी लोक मानसिकता में यदि सिकलीगर कबीले की कोई पहचान है, तो वह मुख्यतः बर्तनों पर ‘थल्ले’ लगाने, बाल्टियाँ, चिमटे, खुरचणियाँ, चाकू, छुरियाँ, ताले-चाबियाँ, छलनियाँ आदि बनाने और बेचने वालों के रूप में है। सामान्य जन को यह भी ज्ञात नहीं कि तख़्त साहिबानों और अन्य गुर स्थानों पर जिन शस्त्रों के दर्शन कराए जाते हैं, जो गुरु साहिबानों और उनके प्रिय गुरु सिखों की पावन स्पर्श से पवित्र हुए हैं, वे सभी सिकलीगर कारीगरों के ही कुशल हाथों से गढ़े गए हैं।
सिकलीगर कबीले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सिकलीगर कबीले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विषय में बहुत अधिक प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। किरपाल कज़ाक के अनुसार सदियों पुराना इनका इतिहास अलिखित इतिहास की धुंध में कहीं खो गया है।
बिना ठोस प्रमाण प्रस्तुत किए, यह टप्परीवास कबीले अपने मूल को राजपूताना के योद्धाओं से जोड़ते हैं। यह अपनी खानाबदोशी का मुख्य कारण सन 1308 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी से लेकर अकबर तक के लंबे कालखंड में मुग़लों द्वारा चित्तौड़ पर बार – बार किए गए आक्रमणों और अंततः मुग़लों की विजय को मानते हैं। अधिकांश टप्परीवास इसी धारणा के समर्थक हैं।
इन अनुमानों के पक्ष में कुछ ऐतिहासिक विवरण तथा पीढ़ी – दर – पीढ़ी प्रचलित लोक – कथाएँ अवश्य मिलती हैं, किंतु कबीले के मूल उद्गम के विषय में स्वयं कबीले के लोग कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने में असमर्थ हैं।
डॉ. वणजारा बेदी के अनुसार भी सिकलीगर अपना मूल राजपूतों से जोड़ते हैं। परंपराओं के अनुसार उनके पूर्वज मारवाड़ से आकर पंजाब और हरियाणा में बसे। शेर सिंह ‘शेर’ ने सिकलीगरों की वंशावली के संबंध में दो मिथक प्रस्तुत किए हैं। पहले मत के अनुसार सिकलीगरों का संबंध वणजारों, लुबाणों के साथ-साथ जोगियों और नाथों से जुड़ता है, जबकि दूसरे मिथक में उनका संबंध रामायण के पात्र सुग्रीव तथा श्रीकृष्ण की राधा से जोड़ा गया है। किंतु इन मिथकों को ऐतिहासिक तथ्य मान लेना उचित नहीं है। फिर भी अब तक उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सिकलीगरों, वणजारों और लुबाणों की पृष्ठभूमि किसी न किसी रूप में राजपूतों से जुड़ी हुई है।
डॉ. वणजारा बेदी ने खोज-दर्पण (जुलाई सन 1977 ई.) के संदर्भ से एक अन्य धारणा का उल्लेख किया है कि टप्परीवासों की अपनी परंपराओं के अनुसार लुबाणे, बाज़ीगर और सिकलीगर एक ही पूर्वज की संतान हैं। उनके चार भाई थे, दो भाइयों की संतानें बाज़ीगर कहलाईं, शेष दो में से एक की संतानें लुबाणे और दूसरे की सिकलीगर कही जाने लगीं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि सिकलीगरों की वंशगत उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विषय में अनेक परस्पर भिन्न धारणाएँ प्रचलित हैं।
गुरु पंथ खालसा से संबंध : श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का काल
गुरु पंथ खालसा के साथ सिकलीगरों का संबंध सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में स्थापित होता है। यह वह काल था, जब श्री गुरु अर्जुन साहिब देव साहिब जी की शहादत के उपरांत छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी को समय की जालिम मुग़ल सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाना पड़ा। मुग़लों से युद्ध के लिए श्रेष्ठ गुणवत्ता वाले हथियारों की आवश्यकता स्वाभाविक थी। प्रारंभिक रूप से यह आवश्यकता लाहौर के प्रसिद्ध लोहार मौला बख्श द्वारा पूरी की जाती रही, जो उत्तम हथियार निर्माण में निपुण कारीगर था।
श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के सिख सैनिकों के लिए उत्तम गुणवत्ता के हथियार बनाने के बदले उसे मनचाही कीमत दी जाती थी। किंतु जब मुग़लों को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने मौला बख्श को डराया – धमकाया, जिसके परिणामस्वरूप उसने सिख फ़ौजों के लिए घटिया हथियार बनाने आरंभ कर दिए। तलवारें और भाले कच्चे लोहे से बनाए जाने लगे और ढालों में भी कमी छोड़ दी गई। युद्ध भूमि में इन हथियारों की निम्न गुणवत्ता स्पष्ट रूप से सामने आ गई और फिर सिखों ने इसकी शिकायत गुरु साहिब जी के समक्ष की, तो उन्होंने मौला बख्श को बुलाया। उसने गुरु जी के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करते हुए क्षमा याचना की, जिस पर गुरु जी ने उसे क्षमा प्रदान की।
मारवाड़ के कुशल कारीगर: गुरु दरबार में
श्रेष्ठ हथियारों के निर्माण के लिए श्रेष्ठ कारीगरों की आवश्यकता का प्रश्न पुनः सामने आया। गहन विचार – विमर्श के उपरांत श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने गुरु दरबार की प्रत्यक्ष निगरानी में हथियार निर्माण कराने का निर्णय लिया। उन्होंने भाई जेठा और भाई बिधी चंद को बुलाकर मारवाड़ से राजपूत लोहारों को लाने का आदेश दिया।
गुरु जी की आज्ञा से मारवाड़ से कुछ लोहार परिवार पंजाब लाए गए। यह परिवार केहर सिंह के नेतृत्व में गुरु दरबार में उपस्थित हुए और अपने द्वारा निर्मित हथियारों का प्रदर्शन किया। परीक्षण और परख के उपरांत गुरु जी ने उनके हथियारों की मज़बूती और कारीगरी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की तथा केहर सिंह से और अधिक लोहार लाने का आग्रह किया, जिसे उसने सहर्ष स्वीकार किया।
इसके पश्चात बड़ी संख्या में मारवाड़ी लोहार गुरु दरबार में आने लगे और हथियार निर्माण के कार्य में जुट गए। धीरे – धीरे वे गुरु जी के ऐसे अनन्य अनुयायी बन गए कि हथियार गढ़ने के साथ – साथ युद्ध भूमि में भी उतरने लगे। मुग़ल सत्ता के विरुद्ध उनका रक्त उबाल लेने लगा। श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी द्वारा मुग़लों के साथ लड़ी गई लड़ाइयों में इन मारवाड़ी वीरों ने अन्य सिखों की भाँति मुग़ल सेनाओं का डटकर सामना किया और उन्हें परास्त किया।
श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के काल के पश्चात श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के गुरु गद्दी पर विराजमान होने तक के लंबे अंतराल में सशस्त्र संघर्ष की विशेष आवश्यकता नहीं पड़ी।
यह स्थिति राजपूती स्वभाव के अनुकूल नहीं थी। इसी अवधि में कुछ मारवाड़ी परिवार पुनः अपनी मातृभूमि की ओर लौट गए, कुछ पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए, कुछ ने शिकार को अपना पेशा बना लिया और कुछ रियासती रजवाड़ों को हथियार बेचने लगे। दूसरी ओर, मारवाड़ तथा अन्य राजपूत राज्यों के आपसी संघर्ष, मुग़लों के आक्रमण, पारस्परिक वैर – विरोध और पारिवारिक कठिनाइयों से त्रस्त अनेक राजपूत परिवार अपनी मातृभूमि छोड़कर पंजाब की ओर आ गए।
ये लोग घुमंतू या टप्परीवास कबीले के रूप में इधर – उधर भटकते रहे और स्थायी रूप से कहीं नहीं बसे। धीरे – धीरे वे मुख्यधारा से कटते चले गए।
जो परिवार किसी कारणवश पुनः अपनी भूमि की ओर लौट भी जाते, उन्हें मारवाड़ के राजपूत समाज द्वारा तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता था। वहाँ रहने वाले राजपूतों ने इनके साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने से इंकार कर दिया। ऐसी परिस्थितियों में ‘वट्टा – सट्टा’ विवाह की प्रथा प्रचलित हुई और अनेक ऐसे कारण उत्पन्न हुए, जिन्होंने मारवाड़ी लोहारों को कबीलावाद की कठोर जकड़न में बाँध दिया। यहाँ यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जातिगत भावना के साथ – साथ अनेक सामाजिक प्रतिबंध और कबायली परंपराएँ प्रारंभ से ही राजपूती जीवन शैली और स्वभाव का अंग रही हैं।
श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी का समय: मारवाड़ी कबीले की चढ़त
छठे गुरु के पश्चात इन (मारवाड़ी परिवारों) का संबंध सिखों से दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। अनेक मारवाड़ी सिख बन गए और गुरु दरबार के निरंतर संपर्क में रहने लगे। सातवें पातशाह के पास 2200 घुड़सवार सैनिकों का दल हुआ करता था; स्वाभाविक है कि उनमें मारवाड़ी वीर भी अवश्य रहे होंगे। यह भी उल्लेख मिलता है कि जब नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी असम की ओर गए, तब कई मारवाड़ी सुरमे उनके साथ थे। कहने का अभिप्राय यह है कि शांतिपूर्ण काल में भी इनका संबंध गुरु दरबार से पूर्णतः टूटा नहीं; जैसा कि कई लेखकों ने संकेत दिया है, यह घट अवश्य गया था।
श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की शहादत के उपरांत जैसे ही श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी गुरु गद्दी पर विराजमान हुए, इस मारवाड़ी कबीले के लिए समय पुनः जाग उठा। पंजाब में भटकते मारवाड़ी लोहारों ने सुना कि कोई दिव्य योद्धा रणभूमि में उतर रहा है। नगाड़ों की चोट सुनाई दी, नरसिंघों की ध्वनि गूँज उठी। जहाँ – जहाँ भी कबीले के लोग थे, उन कारीगर सूरमाओं का राजपूती रक्त उबाल लेने लगा। कंधे फड़क उठे, भीतर कहीं से एक पुकार उठी और इन मारवाड़ी कारीगरों ने श्री आनंदपुर की ओर जत्थे बाँधकर कूच कर दिया।
मारवाड़ियों को यह दृढ़ विश्वास था कि श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी भारतीय जनमानस से अत्याचारी शासकों का भय दूर कर उन्हें आन, शौर्य और निर्भीकता का पाठ पढ़ाने के लिए तत्पर हैं। उनकी राजपूताना जात, आन – बान और गैरत को श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के रूप में एक ऐसा योद्धा सेनानायक मिल गया, जो जाबर मुगल हुकूमत से लोहा लेने को तैयार था। गुरु जी की सरपरस्ती और अगुवाई उनके राजपूती स्वभाव के अत्यंत अनुकूल सिद्ध हुई। उन्हें यह भी भलीभाँति अनुभूति थी कि हथियार गढ़ने की उनकी प्रवीणता और कारीगरी गुरु दरबार में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
भाई राम सिंह और भाई वीर सिंह मारवाड़ी कबीले के प्रतिनिधि के रूप में श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के दरबार में उपस्थित हुए और श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के समय से गुरु पंथ के साथ बने संबंधों का विवरण प्रस्तुत करते हुए अपनी सेवाएँ अर्पित कीं। उन्होंने मारवाड़ियों द्वारा निर्मित विविध प्रकार के हथियार गुरु जी को भेंट किए। गुरु जी ने उन हथियारों की परख हेतु भाई चौपा सिंह और भाई नंद सिंह को उत्तरदायित्व सौंपा। जब परीक्षण एवं अभ्यास में यह हथियार हर दृष्टि से खरे सिद्ध हुए, तब मारवाड़ी कारीगरों को गुरु जी की फौज के लिए हथियार तैयार करने की अनुमति प्राप्त हो गई। धीरे – धीरे संपूर्ण कबीला गुरु जी की सरपरस्ती में हथियार निर्माण के कार्य में जुट गया। मारवाड़ी कबीले के प्रतिनिधियों में भाई राम सिंह के विषय में भाई काहन सिंह नाभा लिखते हैं कि वे दसवें पातशाह के सिलहखाना के एक सिकलीगर सिख थे, जो परम प्रेम से सेवा करते थे।
मारवाड़ियों में सर्वप्रथम इन्हीं ने अमृत छका था।
मारवाड़ी लोहारों को “सिकलीगर” की उपाधि
एक परंपरा के अनुसार लोहारों को “सिकलीगर” की उपाधि स्वयं श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने प्रदान की। डॉ. किरपाल सिंह कज़ाक ने सिकलीगर बुज़ुर्गों के हवाले से लिखा है कि श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी की शरण में आने से पूर्व जब गुरु जी ने समूचे कबीले के लोहार वंश को प्रेम और श्रद्धा से हथियार चमकाते (सिकिल करते) देखा, तो वे प्रसन्न हो उठे और उन्होंने उस समूचे लोहार वंश को “सिकलीगर” की उपाधि से विभूषित कर दिया। इसके पश्चात यह संपूर्ण कबीला “सिकलीगर” नाम से ही जाना जाने लगा।
सिकलीगरों के गुरु प्रेम और शौर्य के प्रसंग
समस्त सिकलीगर कबीला श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के प्रति अथाह श्रद्धा और प्रेम रखता था। गुरु-प्रेम के अनेक प्रसंग सिकलीगर आज भी बड़े गर्व से सुनाते हैं। गुरु जी भी इन सिखों की श्रद्धा-भावना पर विशेष कृपा-दृष्टि रखते थे। एक बार राम सिंह और वीर सिंह अपने साथियों सहित शस्त्र बनाने, उनकी मरम्मत करने और उन्हें सिकिल करने के कार्य में लगे हुए थे। ऐसा करते हुए कभी – कभी शस्त्र को पाँव के नीचे दबाने की आवश्यकता भी पड़ जाती थी। उसी समय एक अनुभवहीन सेवक ने इस बात पर आपत्ति की कि शस्त्रों को पाँव के नीचे दबाना बेअदबी है। तब सिकलीगर कारीगरों ने शस्त्रों को चूमकर अपने मस्तक पर रख लिया। इसके साथ ही समस्त कार्य ठप हो गया।
संयोगवश उसी समय श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी उधर से निकले। कारीगरों को इस प्रकार बैठे देखकर वे आश्चर्यचकित हुए। पूछने पर जब सारी बात ज्ञात हुई, तो गुरु जी ने मुस्कराते हुए बड़े प्रेम से कहा कि- “भाई! शस्त्रों का ऐसा सत्कार तो रणभूमि में जूझने वाले एक सिपाही से अपेक्षित किया जा सकता है; पर यदि शस्त्र बनाने वाले कारीगर ही इस प्रकार भावुक हो जाएँ, तो शस्त्र तैयार कैसे होंगे? इसलिए भाई, अपना काम जारी रखो। शस्त्र बनाते समय जो भी आवश्यक हो, तुम कर सकते हो; तुम्हें सब माफ़ है।” यह सिकलीगरों के गुरु प्रेम का प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस घटना को भाई सुखा सिंह जी ने भी ‘गुर बिलास’ नामक ग्रंथ में विस्तार सहित दर्ज किया है। उसके कुछ अंतिम अंश इस प्रकार हैं-
तुम हो श्री असधुज के दासा,
तुम को खता बखश सुनतासा।
तुम जो सदा सेव यह कैहौ,
रिधि सिधि सिखी फल पैहौ।
तिन में राम सिंह मति सारा,
वागी देस मारवाड़ पियारा।
ता को बखसियो दीन दयाल,
है यह रोशन कथा विशाल।
इसी प्रकार सिकलीगर सिख आज भी भाई बचित्र सिंह द्वारा वीरता से मदमस्त हाथी का सामना करने का उल्लेख बड़े गर्व से करते हैं। शूरवीरता की इस घटना का वर्णन अनेक इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध है। भाई बचित्र सिंह एक सिकलीगर – वणजारा परिवार से थे; वे भाई मनी राम के पुत्र और भाई उदय सिंह के भ्राता थे। भाई काहन सिंह नाभा तथा अन्य लेखकों के अनुसार संवत 1758 में जब पहाड़ी राजाओं ने एकत्र होकर श्री आनंदपुर को घेर लिया, तब केशरी चंद जसवालिया ने लोहे के तवों और छुरियों-कटारों से सुसज्जित एक मदांध हाथी को लोहेगढ़ किले का द्वार तोड़ने के लिए आगे कर दिया। श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने हाथी का सामना करने का दायित्व भाई दुनी चंद को सौंपा, किंतु वह भयभीत होकर रातों – रात भाग गया। इसके पश्चात गुरु जी के आदेश से भाई बचित्तर सिंह (सिकलीगर / राजपूत) हाथी के मुकाबले के लिए आगे आए। उन्होंने घोड़े पर सवार होकर हाथी के मस्तक पर ऐसा नेज़ा (कई लिखतों में ‘नागणी / बरछी’ भी लिखा गया है) मारा कि वह लोहे के तवे को चीरता हुआ हाथी के माथे में जा धँसा। हाथी पीछे मुड़ते हुए अपनी ही सेना के सिपाहियों को रौंदने लगा। उस समय मची भगदड़ के कारण पहाड़ी सेनाओं को भारी क्षति उठानी पड़ी।
भाई बचित्तर सिंह के पिता भाई मनी राम, मारवाड़ी थे और छठी पातशाही की हजूरी में लंबे समय तक रहे थे। पर जैसे ही छठी पातशाही के बाद सिकलीगर कबीला टुकड़ों में बिखर गया, तब मनी राम की कबीलाई टुकड़ी मुल्तान में थी। जब सिकलीगर कबीले ने पुनः श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के समक्ष अपनी सेवाएँ अर्पित कीं, तब मनी राम ने अपने पाँचों पुत्र भेंट किए, जिन्हें गुरु जी ने अमृत छकाकर सिंह सजा दिया। ये पाँच योद्धा- भाई उदय सिंह, भाई अजब सिंह, भाई अजायब सिंह, भाई अनक सिंह और भाई बचित्तर सिंह थे। संवत 1758 की युद्ध-घटना में राजा केशरी चंद जसवालिया का सिर काटकर नेज़े में पिरोकर दसवें पातशाह की हजूरी में लाने वाले भाई उदय सिंह ही थे। जब गुरु जी ने श्री आनंदपुर छोड़ा, तब भी वे गुरु जी के साथ रहे। चमकौर के मार्ग पर संवत 1761 (1704 ई.) में यह गुरु-प्यारा अत्यंत वीरता से शत्रुओं का सामना करते हुए शहीद हो गया।
भाई उदय सिंह के विषय में एक अन्य कथा भी प्रसिद्ध है कि एक बार उन्होंने एक शेर का शिकार कर उसकी खाल श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के समक्ष प्रस्तुत की। गुरु जी ने वह खाल एक गधे को पहना दी। अब वह गधा निर्भय होकर खेतों में रहता और भरपेट चरता; कोई भी उसके निकट जाने का साहस नहीं करता। बोझ-भार से मुक्ति मिल गई। किंतु एक बार वही गधा अन्य गधों की हिनहिनाहट सुनकर अपने मालिक कुम्हार के घर चला गया और हिनहिनाने लगा। कुम्हार ने ‘गुम हुआ’ गधा पहचान लिया और शेर की खाल उतार ली। तब गुरु जी ने अपने खालसे को संबोधित करते हुए कहा कि- जो खालसा होकर भी जात – पात का बोझ (चिल्ली) अपने ऊपर लाद लेता है, वह फिर उसी दशा में लौट जाता है; उसकी यही हालत होती है।
सिकलीगर कबीला और नांदेड़ (तख़्त श्री हजूर साहिब अबचल नगर)
सिकलीगर कबीले की गुरु-भक्ति, ईमानदारी, बहादुरी और गैरत पर शहादत का जाम पीने की भावना कठिन दिनों में भी कम नहीं हुई। अन्य सिदकी सिखों की भाँति सिकलीगर सिख भी श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के आनंदपुर छोड़ने के पश्चात, तथा नांदेड़ कूच के समय भी उनके साथ रहे। सिकलीगर दावा करते हैं कि मोहन सिंह और बदन सिंह सहित अनेक सिकलीगर सिख गुरु जी के साथ ही नांदेड़ गए। जो जत्था गुरु जी ने नांदेड़ से पंजाब भेजा था, उसमें सुंदर सिंह और भगत सिंह नामक सिकलीगर सिख उपस्थित थे। तख़्त श्री हज़ूर साहिब, नांदेड़ में विद्यमान विभिन्न शस्त्रों के विषय में भाई काहन सिंह नाभा लिखते हैं कि ऐसे अमूल्य शस्त्र किसी राजधानी के सिलहखाना (असला खाना) में भी देखने को नहीं मिलते। नांदेड़ के आसपास, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के अनेक क्षेत्रों में वणजारों के टांडों की भाँति सिकलीगर सिखों की बस्तियाँ आज भी विद्यमान हैं।
सिकलीगर कबीला : श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के पश्चात
श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के पश्चात “सिकलीगर” शब्द शस्त्र तैयार करने वाले मारवाड़ी कबीलों के लिए रूढ़ हो चुका था। वह तलवार का युग था, जब आधुनिक हथियारों का नामोनिशान भी नहीं था। निस्संदेह अठारहवीं शताब्दी के दौरान सशस्त्र संघर्ष तीव्र रहा। बाबा बंदा सिंह बहादुर के समय और उसके बाद शस्त्रों की आवश्यकता स्वाभाविक थी। ऐसे समय में बाबा बंदा सिंह के साथ सिकलीगरों के होने के विषय में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रहती। इस संदर्भ में ‘गुरमति प्रकाश नामक ग्रंथ में सिकलीगर-वणजारों सिखों पर प्रकाशित विशेषांक में ज्ञानी बचित्तर सिंह (एडवोकेट) स्पष्ट संकेत देते हुए लिखते हैं कि- “बाबा बंदा सिंह बहादुर के पंजाब और सरहिंद पर आक्रमण के समय वणजारे और सिकलीगर सिखों ने जन-शक्ति, रुपयों और हथियारों द्वारा भारी सहायता की थी।” अनेक लेखक भाई बाज सिंह जो बाबा बंदा सिंह बहादुर की दाहिनी भुजा (डिप्टी) तथा सरहिंद के प्रथम सिख सूबेदार थे, को राजपूत लिखते हैं।
इसके बावजूद इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उस समय सिकलीगर परिवारों का श्री आनंदपुर की भाँति स्थिर होकर टिके रहना संभव नहीं था, क्योंकि परिस्थितियाँ ही ऐसी थीं। इसी कारण उस काल में सिकलीगर छोटे – छोटे दल बनाकर टप्परीवास शैली में घूमते – फिरते हथियार बनाते, और जहाँ – जहाँ संभव होता, स्थानीय रजवाड़ों सहित इन हथियारों को उन्हें बेच देते। इस पेशे के साथ – साथ वे सामान्य जन के लिए चाकू – छुरियाँ आदि अन्य वस्तुएँ बनाने का काम भी जारी रखते थे।
सिकलीगर कबीला और पटियाला राज दरबार
सन 1937 ईस्वी में बुड्ढा दल, पटियाला द्वारा प्रकाशित हरनाम सिंह की काव्य – रचना ‘सिकलीगर प्रकाश’ के संदर्भ से शेर सिंह और किरपाल कज़ाक ने पटियाला रियासत के साथ सिकलीगरों के संबंधों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। अनेक सिकलीगर परिवार घूमते – फिरते पटियाला राज्य घराने के प्रवर्तक बाबा आला सिंह (1691–1765 ई.) की सेवा में आ गए। इनमें मंगलोवरी सिंह, लोती सिंह, मंगत सिंह, राम सिंह, बल सिंह, लाल सिंह, भगत सिंह आदि के नाम का उल्लेख उपर्युक्त लिखतों में मिलता है। जैसे ही बाबा आला सिंह के राज दरबार में कबीले को अपनी कला का जौहर दिखाने का अवसर मिला, वैसे ही बाबा आला सिंह ने सिकलीगर कबीले की युद्ध एवं हथियारों में दक्षता, राज-दरबार और शस्त्र-विद्या की सूझबूझ को दृष्टि में रखते हुए कबीले के कुशल सिकलीगरों को सिलहखाने (असलाखाना) का मुखिया नियुक्त कर दिया।
पटियाला राज दरबार की छत्रछाया में सिकलीगर कबीले ने उत्कृष्ट हथियारों की सृष्टि की, जो आज भी अनेक संग्रहालयों की शोभा हैं। उन हथियारों की दृढ़ता और सौंदर्य में इस टप्परीवास कबीले की लौह वंश परंपरा और पितृक स्पर्श प्रत्यक्ष दिखाई देता है। उनकी विशिष्टता केवल हथियार होने तक सीमित नहीं रहती; अपितु मुठों, म्यानों, ढालों की पीठों, संजोओं, तीरों के नुकीले सिरों, बरछों, खुखरियों, जाफ़रतकीयों, नागदौणों, बिछुओं, गुप्तियों, नेज़ों, बंदूकों, बट्टों, कोटलियों, सिंगियों, खंडों, चक्करों, तेगों, गुरजों, नागणियों और सैफ़ों जैसे हथियारों पर अंकित ऐसी नक्काशी और मीनाकारी दिखाई देती है, जिन्हें उत्तम कला कृतियों की संज्ञा दी जा सकती है।
बाबा आला सिंह के पश्चात उनके पौत्र महाराजा अमर सिंह ने सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया के जत्थे से अमृत छका था। शासन – प्रबंधन में निपुण इस शूरवीर सरदार ने पंद्रह से सोलह वर्षों के राजकाल में पटियाला राज्य की उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किए। उनकी सेवा में भी अनेक सिकलीगर सिख उपस्थित थे। सन 1767 ईस्वी में राजा अमर सिंह ने अहमद शाह अब्दाली के हाथों कैद हुए हजारों (ज्ञानी सोहन सिंह सीतल के अनुसार तीस हजार) हिंदू स्त्री – पुरुषों को मुक्त कराया और अपने निजी व्यय से उन्हें घर – घर पहुंचाया। इस पुण्य कार्य में सिकलीगरों ने महाराजा अमर सिंह की सहायता की। एक बार नाहन के राजा ने शस्त्र और शस्त्र घाती सामग्री की माँग की, तब महाराजा अमर सिंह ने विशेष रूप से मोहन सिंह, बदन सिंह, टहल सिंह, महिल सिंह आदि मारवाड़ी कारीगरों (सिकलीगरों) को उनकी दक्षता के कारण नाहन भेजा।
संवत 1851 (1794 ई.) में पटियाला रियासत के दीवान मिसर नौध सिंह की गद्दारी के कारण, जब पटियाला राजपरिवार की साहसी और विवेकशील प्रशासिका रानी साहिब कौर जो राजा अमर सिंह की पत्नी और राजा साहिब सिंह की बड़ी बहन थीं, का मराठों के साथ युद्ध हुआ, तब केसर सिंह, महताब सिंह, खेम सिंह, गुलाब सिंह, जवाहर सिंह आदि सहित अनेक सिकलीगर सिखों ने रानी की दृढ़ता से सहायता की। रानी साहिब कौर ने मारवाड़ी राजपूतों की निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें अनेक पुरस्कार देकर सम्मानित किया। यह अलग बात है कि बाद में मिसर नौध ने अपनी माता की मृत्यु का आरोप लगाकर कई सिकलीगरों को चौदह – चौदह वर्ष की कैद दिलवा दी। यह समूचा प्रसंग ‘सिकलीगर प्रकाश’ में विस्तार से अंकित है। पटियाला राज दरबार से संबंध सिकलीगरों की संतति आज भी पटियाला में निवास करती है।
सिकलीगर कबीला : महाराजा रणजीत सिंह के संरक्षण और छत्रछाया में
स्थानीय रियासतों के आपसी संघर्षों, खानाजंगियों तथा विदेशी आक्रमणों के कारण सिकलिगर कबीले की संगठित शक्ति विखंडित हो चुकी थी। इस कबीले के छोटे – छोटे दल विभिन्न स्थानों पर बिखर गए और अलग – अलग राजाओं व सरदारों के अधीन कार्य करने लगे। मिसलों के शासन काल में भी सिकलिगर कबीले के कुशल कारीगर विभिन्न मिसलों के लिए युद्ध-सामग्री और हथियारों का निर्माण करते रहे।
जब महाराजा रणजीत सिंह ने इन मिसलों को एकीकृत कर एक विशाल सिख साम्राज्य की स्थापना की, तब उन्होंने अपनी सेना के लिए युद्ध-सामग्री और हथियारों के निर्माण हेतु बड़ी संख्या में सिकलिगरों को कर्मचारी के रूप में नियुक्त किया। महाराजा ने अपनी सेना के प्रशिक्षण, शस्त्रों के उन्नत निर्माण तथा उनके आधुनिकीकरण पर विशेष ध्यान दिया। महाराजा की सेना के लिए पारंपरिक तथा नवीन शस्त्रों के निर्माण और उनमें दक्षता का कार्य लाहौर की अस्त्रशालाओं में मुख्यतः सिकलिगर ही करते थे।
सिकलिगर कारीगरों को पारंपरिक धारदार हथियारों के साथ – साथ अग्नि-शस्त्रों, जैसे बंदूकें, गोला बारूद आदि के निर्माण में भी महारत प्राप्त थी। इस प्रकार महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में सिकलिगर कबीले ने अपने खोए हुए गौरव को पुनः स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किए।
अंग्रेज़ी शासन: सिकलीगर कबीले का पतन
भारत में अंग्रेज़ी साम्राज्य का विस्तार सिकलिगर कबीले के पतन का प्रमुख कारण बना। सन् 1849 ई. में पंजाब अंग्रेज़ी साम्राज्य के अधीन चला गया। उस समय सिकलिगर पंजाब में खुले रूप से, ईमानदारी और निष्ठा के साथ हथियार निर्माण के व्यवसाय में संलग्न थे। उनमें से कुछ लोग अंग्रेज़ी सरकार की सेवा में भी चले गए, जहाँ उन्हें विशेष रूप से सेना के गोरखा विंग के लिए तलवारें और खुखरियाँ बनाने का कार्य सौंपा गया।
परंतु शीघ्र ही कबीले के पतन की प्रक्रिया आरंभ हो गई, जिसके मुख्यतः तीन कारण थे-
- विज्ञान की प्रगति के कारण नवीन शस्त्रों का आगमन
- अंग्रेज़ी सरकार द्वारा स्वदेशी हथियार निर्माण पर प्रतिबंध
- अपराधी कबीला कानून
उन्नीसवीं शताब्दी में विज्ञान ने प्रत्येक क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की। तलवारों और धारदार हथियारों का स्थान घातक बमों, बंदूकों और तोपों ने ले लिया। परिणामस्वरूप सिकलीगरों के पारंपरिक और पैतृक व्यवसाय को गहरा आघात पहुँचा।
दूसरे, अंग्रेज़ी सरकार ने भारत में स्वदेशी हथियार निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया और इसके विरुद्ध कठोर कानून पारित किए। यह इसलिए किया गया ताकि अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्षरत शक्तियों को न तो हथियार बनाए जा सकें और न ही उनकी आपूर्ति हो सके। इन कानूनों को अत्यंत कठोरता से लागू किया गया। सिकलिगर कबीले की रीढ़ तोड़ने के लिए यह कानून अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ।
दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि इन कुशल कारीगरों के अधिकारों के पक्ष में किसी भी वर्ग ने आवाज़ नहीं उठाई। उस समय पूरा देश विदेशी प्रभाव के अधीन जकड़ा हुआ था, परिणामस्वरूप सिकलिगर कारीगरों की अद्वितीय दक्षता उन्हीं के हाथों में दम तोड़ गई।
इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी सरकार ने अपराध की आड़ में भारत के घुमंतू कबीलों की आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगा दिया। मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इन टपरवासियों के पुनर्वास और सुधार के स्थान पर, सन् 1871 ई. में ‘अपराधी कबीला कानून’ लागू कर दिया गया, जिसने इन कबीलों को पीढ़ियों तक पीड़ा में जकड़े रखा।
इस कानून की कठोर पकड़ से अनेक निर्दोष और कुशल कबीले भी नहीं बच सके। सिकलिगर कबीले पर विशेष निगरानी रखी गई क्योंकि यह कबीला अंग्रेज़ों के विरुद्ध किसी भी रियासती शक्ति के लिए हथियार बना सकता था। इसी संदेह के आधार पर कबीले के कारीगरों के साथ अमानवीय कठोरता बरती गई। विवश होकर पूरे कबीले ने ‘भट्ठी तपाने’ की शपथ छोड़ दी और जीविका के लिए घरेलू उपयोग की छोटी – मोटी वस्तुएँ- जैसे चाकू, छुरियाँ, बाल्टियाँ, चिमटे, खुरचनी आदि बनाने लगे।
इन वस्तुओं की बिक्री हेतु उन्हें गाँव – गाँव और नगर – नगर घूमना पड़ता था, जिसके कारण उन्हें घुमंतू जीवन-शैली अपनानी पड़ी।
स्वतंत्रता के बाद सिकलीगर कबीला
स्वतंत्रता के उपरांत सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण छह राज्यों में सिकलीगरों को अनुसूचित जातियों की सूची में तो शामिल कर लिया गया, किंतु उनके कल्याण और स्थायी पुनर्वास की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए। अशिक्षा, निर्धनता और अस्थिर जीवन-शैली के कारण ये लोग अनुसूचित वर्गों को मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित रह गए।
यह कबीला केवल पंजाब में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत में फैला हुआ है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र सहित अनेक राज्यों में इनकी जनसंख्या करोड़ों में आँकी जाती है।
सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और विशेष रूप से शैक्षणिक दृष्टि से यह कबीला अत्यंत पिछड़ेपन का शिकार है। झुग्गी-झोपड़ियों में जीवन व्यतीत करने वाले ये लोग आधुनिक युग की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए हैं। रोजगार के अभाव में दो वक्त की रोटी के लिए संघर्षरत हैं, न ढंग का भोजन, न पर्याप्त वस्त्र।
जहाँ कहीं स्थायी बस्तियाँ बनाकर झोपड़ीनुमा घर भी निर्मित किए गए हैं, वहाँ न तो शिक्षा हेतु विद्यालयों की व्यवस्था है और न ही चिकित्सा सुविधाएँ। यहाँ तक कि पीने के स्वच्छ पानी की भी कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।
समकालीन सिख संस्थाएँ और सिकलिगर कबीला
इसमें कोई संदेह नहीं कि सिख इतिहास में सिकलिगर कबीले की भूमिका अत्यंत प्रशंसनीय रही है, किंतु सिख मुख्यधारा से उनके विच्छिन्न हो जाने का तथ्य अधिकांश सिखों को ज्ञात नहीं है। श्री गुरु नानक देव साहिब जी की फुलवारी के इस महत्त्वपूर्ण अंग के प्रति सिख संस्थाएँ लंबे समय तक उदासीन रहीं। हाल के वर्षों में व्यक्तिगत और संस्थागत स्तर पर कुछ प्रयास अवश्य आरंभ हुए हैं।
‘गुरमत प्रकाश’, ‘सिख फुलवारी’, ‘सिख रिव्यू’ सहित अनेक सिख पत्रिकाओं में सिकलीगरों के साथ – साथ वणजारों, सतनामियों आदि नानक पंथी सिखों पर सामग्री प्रकाशित होने लगी है, जिससे सिख संस्थाओं में चेतना का संचार हुआ है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, सिख मिशनरी कॉलेज लुधियाना सहित कई संस्थाओं ने इस दिशा में ध्यान देना प्रारंभ किया है।
इस क्षेत्र में अधिक सक्रियता स्थानीय और छोटी संस्थाओं- जैसे गुरमत प्रचार संस्था, नागपुर; स्कॉटिश सिख काउंसिल; सतनाम फाउंडेशन, रायपुर; गुरु अंगद देव शैक्षणिक एवं कल्याण संस्था, लुधियाना; श्री गुरु गोबिंद सिंह फाउंडेशन, विजयवाड़ा, तेलंगाना; वणजारा एंड अदर वीकर सेक्शन वेलफेयर सोसाइटी, चंडीगढ़ आदि द्वारा दिखाई गई है।
लुधियाना के प्रीत नगर स्थित सिकलीगर बस्ती में गुरु अंगद देव शैक्षणिक एवं कल्याण संस्था द्वारा आरंभ किए गए प्रोजेक्ट से यह स्पष्ट होता है कि इन सिखों के लिए भविष्य में बहुत कुछ किया जा सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि सिख संस्थाओं की सक्रियता से पूर्व, पंजाब और दिल्ली सहित कुछ क्षेत्रों में निरंकारियों द्वारा भी सिकलिगर बस्तियों में कल्याणकारी प्रयास किए गए थे।
सिकलिगर कबीला: वर्तमान स्थिति
विभिन्न धार्मिक और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा किए गए सीमित किंतु महत्त्वपूर्ण कार्यों और सर्वेक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि सैकड़ों वर्षों तक सिख मुख्यधारा से अलग रहने के बावजूद सिख सिकलीगर आज भी पूर्ण सिख स्वरूप में हैं। गुरुद्वारों, गुरमत साहित्य और संगठित धर्म-प्रचार के अभाव के बावजूद उनके भीतर सिक्खी के प्रति गहन आकांक्षा विद्यमान है।
यद्यपि समाज के अन्य वर्गों की भाँति इनमें भी कुछ प्राचीन रूढ़ियाँ, कबीलाई विश्वास और अंधविश्वास प्रचलित हैं तथा उनकी गरीबी का अनुचित लाभ उठाकर कुछ अन्य धर्मों के लोग धर्म-परिवर्तन के प्रयास करते रहे हैं, फिर भी सिख धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा और सम्मान अक्षुण्ण बना हुआ है।
उनकी जीवन-शैली पर सिख मर्यादा का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, जैसे बच्चों का नामकरण सिख परंपरा के अनुसार करना, केशधारी रहना, अमृत मर्यादा में विश्वास, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी और गुरुद्वारों के प्रति अपार श्रद्धा, तथा आनंद कारज की परंपरा का पालन।
सिकलिगर कबीले का विस्तार और पिछड़ापन इतना व्यापक है कि विभिन्न संस्थाओं द्वारा किए जा रहे कल्याणकारी प्रयास अपर्याप्त सिद्ध हो रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हर दृष्टि से इनकी स्थिति दयनीय है। उनकी झुग्गियों में असाधारण प्रतिभा छिपी हुई है। इस प्रतिभा को अशिक्षा और गरीबी के चंगुल से बाहर निकालने के लिए सिकलिगर बस्तियों में शैक्षणिक संस्थानों, तकनीकी प्रशिक्षण केंद्रों और हस्तशिल्प शिक्षण संस्थाओं की नितांत आवश्यकता है।
सामान्य धारणा है कि सिकलिगर बच्चों में जन्मजात अभियंता और सुलभ बुद्धि होती है, किंतु औपचारिक शिक्षा और आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण के अभाव में ये कुशल और प्रतिभाशाली लोग दर – दर भटकने को विवश हैं। यदि सिकलीगर समुदाय की नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीकी शिक्षा और अवसर प्रदान किए जाएँ, तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकते हैं।
अंतिम विचार: शोधकर्ताओं के लिए
प्रस्तुत आलेख सिकलीगरों के गुरु पंथ खालसा से संबंधों पर उपलब्ध सामग्री का एक संक्षिप्त अवलोकन मात्र है। इस कबीले से संबंधित तथ्य, परंपराएँ और ऐतिहासिक संदर्भ आज भी गंभीर शोध की प्रतीक्षा में हैं। सिकलिगर कबीले पर उपलब्ध सामग्री बिखरी हुई, अपूर्ण और अस्पष्ट है।
सरदार शेर सिंह शेर और किरपाल कज़ाक द्वारा किया गया शोध इस दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, किंतु इस विषय के अनेक पक्ष अब भी अछूते हैं। शुद्ध ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो ऐतिहासिक स्रोतों में बहुत कुछ दबा पड़ा है, जो अब तक व्यवस्थित रूप में सामने नहीं आ सका। प्राचीन हथियारों के अध्ययन से भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण तथ्य उजागर हो सकते हैं।
समाजशास्त्र, नृविज्ञान और सुरक्षा अध्ययन के शोधार्थी अपने – अपने अनुशासन में रहकर इस उपेक्षित क्षेत्र पर विस्तृत सर्वेक्षण और शोध-परियोजनाएँ आरंभ कर सकते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो सिकलीगर कबीले पर अकादमिक स्तर पर बहुआयामी शोध की अपार संभावनाएं विद्यमान हैं। शोधकर्ताओं को इस दिशा में गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।
हवाले और टिप्पणियाँ और आभार-
“सिख इतिहास का उपेक्षित अध्याय: सिकलीगर सिख” शीर्षक से प्रस्तुत यह आलेख उपर्युक्त उल्लिखित प्रामाणिक ऐतिहासिक, भाषाई एवं सांस्कृतिक स्रोतों पर आधारित है। इन संदर्भ-ग्रंथों में भिन्न-भिन्न कालखंडों के गुरमुखी, फ़ारसी, पंजाबी तथा अंग्रेज़ी स्रोत सम्मिलित हैं, जिनके माध्यम से सिकलीगर सिखों के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक योगदान को तथ्यात्मक आधार प्रदान किया गया है। विशेष रूप से गुरुमुखी भाषा के ग्रंथ: महान कोश, सिख पंथ विश्व कोश, पंजाबी लोकधारा विश्वकोश, सिकलीगर कबीले दा सभ्यचार तथा The Sikligars of Punjab जैसे ग्रंथ इस अध्ययन की वैचारिक रीढ़ हैं।
कुछ स्थलों पर उपलब्ध स्रोतों में मतांतर, वंशावली संबंधी भिन्न व्याख्याएँ तथा अपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य भी सामने आते हैं। भट्टवहियों और पंडावहियों जैसे पारंपरिक स्रोतों के आधार पर कई विद्वानों ने भिन्न निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं, जिनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता पर और अधिक गहन शोध की आवश्यकता रेखांकित की गई है। यह आलेख उन सभी संभावनाओं को स्वीकार करते हुए शोध के नए द्वार खोलने का विनम्र प्रयास है।
इन सभी स्रोतों के संयोजन, विश्लेषण और प्रस्तुतीकरण के साथ इस आलेख का संपादन, लेखन वरिष्ठ सिख विद्वान, इतिहासकार और चिंतक डॉ. चमकौर सिंह के मौलिक लेख- विशेषतः उनकी गुरुमुखी भाषा की कृति भूले-बिसरे नानक पंथी, इस अध्ययन की वैचारिक आधारशिला रहे हैं। डॉ. चमकौर सिंह, ग्राम धूड़कोट कलां, ज़िला मोगा निवासी, एम.ए., पीएच.डी., शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में लगभग तीस वर्षों तक विभिन्न गरिमामय दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। वे गुरमत प्रकाश के संपादक एवं सह-संपादक के रूप में भी दीर्घकाल तक सक्रिय रहे हैं और वर्तमान में टोहड़ा इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन सिखिस्म, बहादुरगढ़ के मार्गदर्शक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं।
डॉ. चमकौर सिंह जी न केवल इस आलेख के प्रेरणा स्रोत हैं अपितु हमारी टीम खोज-विचार के शुभचिंतक, स्नेही और हितैषी भी हैं। उनके विद्वतापूर्ण मार्गदर्शन, तथ्यात्मक सूक्ष्मता और अकादमिक संतुलन ने हमारी टीम खोज – विचार को विश्वसनीयता और वैचारिक दृढ़ता प्रदान की है। लेखक उनके इस अमूल्य योगदान के प्रति गहरी कृतज्ञता और आदर भाव व्यक्त करता है।
✍️ -लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’ पुणे।©





