प्रसंग क्रमांक 14: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से संबंधित गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब (पटियाला) का इतिहास

Spread the love

प्रसंग क्रमांक 14: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से संबंधित गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब (पटियाला) का इतिहास

(सफ़र – ए – पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)

संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
संगत जी, आज हम यह जानेंगे कि इस स्थान को गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब क्यों कहा जाता है। धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी जब दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे, उस समय वह इस स्थान पर विराजमान हुए थे। इसी स्थान से श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी समाणा नामक स्थान की ओर प्रस्थान करते हैं।

दूसरी ओर, पटियाला नगर में एक गुरुद्वारा साहिब, गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी सुशोभित है। कई बार हम भ्रमवश यह मान लेते हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी इस स्थान पर उस समय आए थे, जब वे दिल्ली शीश अर्पण करने जा रहे थे; नहीं संगत जी, ऐसा नहीं है। जब धन्य – धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी मालवा रटन (देशाटन) हेतु श्री आनंदपुर साहिब से प्रस्थान कर रहे थे, तब उन्होंने बहादुरगढ़ के पंचवटी नामक बाग में अपना डेरा जमाया था। इसी स्थान से नवाब सैफुद्दीन उन्हें अपने महलों में लेकर गया था। इसके पश्चात उस समय श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के द्वारा आसपास के अनेक गांवों में भ्रमण के लिए गए।

उसी समय गुरु घर के अनन्य सेवक राम झीवर जी ने गुरु पातशाह जी के समक्ष निवेदन किया- हे सच्चे पातशाह जी, हम लहल नामक गांव से आए हैं। हमारे गांव का विकास नहीं हो पा रहा है, आप जी हम गांव वासियों पर कृपा करें। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने राम झीवर जी के प्रेम और श्रद्धा को देखकर इस स्थान पर पधार कर कृपा की।
(विशेष—संगत जी, इस स्थान पर जो पुरातन संरचनाएं थीं, उन्हें समाप्त किया जा चुका है, परंतु टीम खोज-विचार द्वारा अत्यंत कठिनाई से उन पुरातन स्थलों के चित्र संग्रहित किए गए हैं। ये चित्र हम स्क्रीन पर आप जी के दर्शनों हेतु प्रदर्शित कर रहे हैं।)

पार्श्व गायन: गुरु-चरित्र की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन प्रवाहित है।

आज वर्तमान समय में जो गुरुद्वारा साहिब जी आप देख रहे हैं, यह पहले इस स्वरूप में नहीं था। आज यहां पवित्र ज्योत प्रज्वलित होती है, परंतु यह ज्योत पहले इस स्थान पर नहीं थी। जो पुराने वीर, सेवादार आज से पंद्रह – बीस वर्ष पूर्व गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब के दर्शनों हेतु आते थे, तथा जो बुजुर्ग इस स्थान से जुड़े हैं, वे यह भली-भांति जानते हैं। दास (इतिहासकार—डॉक्टर भगवान सिंह जी खोजी) का बचपन भी इसी क्षेत्र में व्यतीत हुआ है, क्योंकि दास का निवास इस स्थान से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर गांव सिद्धूवाल, बक्शीवाला रोड पर स्थित है।

उस समय जब हम इस स्थान पर आते थे, तो गुरुद्वारा साहिब की सतह से नीचे सीढ़ियां उतरने पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के आगमन की स्मृति में शुद्ध घी की एक ज्योत चौबीस घंटे प्रज्वलित रहती थी। साथ ही यहां एक पुरातन बरगद का वृक्ष भी विद्यमान था। उस पुरातन गुरुद्वारा साहिब का चित्र आप जी स्क्रीन पर देख रहे हैं। अब हम उस पुरातन गुरुद्वारा साहिब की ड्योढ़ी के भी दर्शन कर रहे हैं, परंतु आज उसका अस्तित्व समाप्त हो चुका है। उस पुरातन स्थान के स्थान पर वर्तमान समय में निर्मित ड्योढ़ी के दर्शन आप कर रहे हैं।

दूसरी ओर, जब हम दफ्तर वाली जगह से गुरुद्वारा साहिब के सामने आते थे, तो बाईं ओर सीढ़ियां चढ़ते थे। बाईं ओर का यही मार्ग पुरातन मार्ग था। अब इस मार्ग पर पार्किंग का निर्माण हो चुका है और आज इस स्थान पर वाहनों की पार्किंग की जाती है।

सरोवर वाले स्थान से जब गुरुद्वारे के दर्शन होते थे, तो वह दृश्य अत्यंत मनमोहक प्रतीत होता था। जब मैंने इस स्थान के बुजुर्गों से संवाद किया, तो उन्होंने भी यही कहा कि उस समय जो आनंद प्राप्त होता था, वह आनंद आज वैसा अनुभव नहीं होता; फिर भी संगत की उपस्थिति आत्मिक आनंद प्रदान करती है।

पार्श्व गायन: गुरु-स्मृति से ओतप्रोत धीमी, पवित्र तान पृष्ठभूमि में बह रही है।

संगत जी, आपने स्क्रीन पर प्रदर्शित पुरानी इमारत के दर्शन किए। आइए, अब हम गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी की नवनिर्मित भव्य इमारत के दर्शन करते हैं। सामने पवित्र ज्योत प्रज्वलित है, आप जी निशान साहिब के दर्शन कर रहे हैं, और सामने ही एक विशाल, सुंदर एवं विलोभनीय सरोवर स्थित है, जिसके भी आप दर्शन कर रहे हैं। 

गुरुद्वारा साहिब जी के दर्शन करने के पश्चात जब हम इतिहास की ओर दृष्टिक्षेप करते हैं, तो यह तथ्य सामने आता है कि धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी सैफाबाद से लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी तय कर इस स्थान पर पहुँचे थे। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार उस समय इस स्थान पर एक छोटा-सा छप्पड़, अर्थात् पानी का तालाब, विद्यमान था। जब गुरु घर के सेवक राम झीवर जी ने गुरु साहिब के समक्ष निवेदन किया, तो उनके निवेदन पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी इस स्थान पर पधार कर विराजमान हुए। उसी समय गुरु पातशाह जी के दर्शनों हेतु संगत का आना प्रारंभ हो गया। उस समय एक माता कर्मों अपने पुत्र को लेकर गुरु साहिब के दर्शनों में उपस्थित हुईं। माता कर्मों के पुत्र को ‘सुखे’ नामक बीमारी थी, जो किसी भी प्रकार से ठीक नहीं हो रही थी। वह बालक इस गंभीर बीमारी से ग्रस्त होकर निरंतर दुर्बल होता जा रहा था।

माता कर्मों ने गुरु पातशाह जी के चरणों में निवेदन किया, हे सच्चे पातशाह! मेरे दुखों का निवारण कीजिए। मेरा पुत्र सुखे की बीमारी से सूखता जा रहा है। केवल मेरा ही नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र में अनेक बच्चे इस भयानक बीमारी से पीड़ित हैं। उस समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने, जो वचन के बली थे, माता जी को वचन देते हुए कहा- इस बीमारी से ग्रस्त बालक को इस छपड़ी (पानी के छोटे तालाब) में स्नान करवाओ। जब उस समय उस बालक को स्नान करवाया गया, तो यह मानना स्वाभाविक है कि गुरु साहिब जी ने उसे कोई औषधि अथवा जड़ी – बूटी भी ग्रहण करने के लिए दी होगी।

गुरु पातशाह जी ने माता जी को यह भी उपदेश दिया कि वे वाहिगुरु पर पूर्ण विश्वास रखें और गुरबाणी को अपने जीवन में आत्मसात करें। गुरबाणी में अंकित है—

बिलावलु महला 5 ॥

ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥

चउगिरद हमारै राम कार दुखु लगै न भाई ॥1॥

अर्थात-पारब्रह्म की शरण में आने से हमें कोई गर्म हवा भी नहीं लगती अर्थात् तनिक मात्र भी संताप नहीं लगता। हमारे इर्द-गिर्द राम-नाम की रेखा खिंची हुई है, जिससे कोई दुख नहीं लगता ॥ 1॥ (अंग क्रमांक: 819)

इस प्रकार गुरु साहिब जी ने माता कर्मों को गुरबाणी से जोड़ा और उनकी कृपा से अनेक रोगी स्वस्थ हुए। आज भी इस स्थान पर दूर-दूर से संगत आकर दर्शन एवं स्नान करती है और अपने दुखों से मुक्ति प्राप्त करती है। यह अटल विश्वास है कि इस स्थान पर आने वाली संगत की झोली गुरु साहिब भर देते हैं और उनके भाग्य जागृत होते हैं। विशेष रूप से बसंत पंचमी के दिवस पर इस स्थान पर एक विशाल जोड़ – मेला आयोजित किया जाता है। बसंत पंचमी के अवसर पर पटियाला सहित संपूर्ण पंजाब के दूर-दराज़ क्षेत्रों से संगत यहाँ दर्शन – स्नान करने आती है। इतनी विशाल संगत उमड़ पड़ती है कि गुरुद्वारा परिसर में पैर रखने तक की जगह नहीं रहती है।

संगत जी, गुरुद्वारा साहिब जी के परिसर में जो ज्योत प्रज्वलित होती है, उस ज्योत के समीप एक बोर्ड अथवा हुकुमनामा स्थापित है, जिसे हम पट्टा कहकर भी संबोधित कर सकते हैं। निश्चित रूप से हुकुमनामे और पट्टे में बहुत अंतर होता है। इस स्थान पर एक पट्टा सुशोभित है, जिस पर निम्नलिखित अंकित है—

ੴ सतिगुर प्रसादि॥
ੴ अकाल जी सहाय॥
श्री गुरु तेग बहादर साहिब परगट भए बाबा बकाले।
श्री गुरु तेग बहादर जी साहिब नूं, भाग राम ब्यूर बेनती करत भई।
जी, लाहल गांव विच बिमारी जांदी नहीं। सचे साहिब सफाबाद ते उठ के लाहुल गांव दे पहाड़ ओर करीबन सत-आन-सौ तौर, बोहड़ दे तले आण बिराजत भए।
यीहां टेबर में चरन धोबत भए।
हुकम होया—एथे जे कोई रोगी श्रधा सहित अश्नान करेगा, उस दे सभ रोग खंडीएंगी।
इथे बड़ा बनाओ, लंगर चलाओ—हुकम होया।
जे एथे बसंत पंचमी नूं इशनान करेगा, उस नूं सभ तीरथां का फल परापत होवेगा।
संगत बेनती करत भई—जी, इथे अबादी हुंदी नहीं, अबादी होवे जी।
हुकम होया—एथे रौनक बहुत होवेगी, एथे गुरसिख होसी, राजधान सेवा करसी, गुरधाम उगा होसी सभ जहान।
जो कोई सेव कमावै, मन बांचत फल पाए।
करमां देवी खतराणी चरनी डिगी।
जी, अठराए नाल बाल शांत हो जांदे हैं।
हुकम होया—एथे अश्नान करसे दूर होसी; कोई रोग न रहसी।
एथे दिन खेड़स, माघ, लुकल पंचमी, सतारां सो उनाईस, सभ संगत के खुशी करत भए।
जो हुकमनामे दे दर्शन पावेगा, सो मेरे दर्शन पावेगा।
गुरधाम के जावेगा, सभ सुख पावेगा।
जम धाम न जावेगा।
समापती।

संगत जी, यह भी बताया जाता है कि यह हुकुमनामा श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का है, परंतु इस हुकुमनामे की शब्दावली और शैली गुरु साहिबान के प्रमाणिक हुकुम नामों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि यह पट्टा संभवतः पुरातन सिखों द्वारा लिखा गया हो। इस तथ्य की खोज और गहन अध्ययन की अत्यंत आवश्यकता है।

इसके पश्चात, धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के इस स्थान से जाने के बाद वह समय आता है, जब पटियाला नगर को भाग्य लगना प्रारंभ होता है। गुरुद्वारा मोती बाग साहिब की स्थापना हो जाती है। संगत के आग्रह पर इस स्थान पर गुरुद्वारा साहिब जी का निर्माण किया गया। यह भूमि एक सिख वीर (भाई) द्वारा गुरुद्वारा साहिब को भेंट की गई थी।

यह सिख भाई कौन था? इस प्रश्न का उत्तर हमें गुरुद्वारा साहिब के पुरातन इतिहास से प्राप्त होता है। जब हमने गुरुद्वारा साहिब के दर्शन किए, तो जिस स्थान पर कड़ाह प्रसाद की देग बनती है, उसी स्थान पर एक पत्थर की सील (शिलान्यास) लगी हुई है। इस शिलान्यास पर जैलदार काकू सिंह का नाम अंकित है। जैलदार काकू सिंह जी ग्राम महल के निवासी थे। उन्होंने धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के समय इस स्थान की 60 बीघा भूमि तथा ग्राम पनधरी की 40 बीघा भूमि, इस प्रकार कुल 100 बीघा भूमि, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के नाम लिखवाई, ताकि श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का स्थान प्रकट हो सके।

इस परिवार के एक सदस्य का पता हमें प्राप्त हुआ। हम उनके निवास की ओर गए। वहां पहुंचने पर हमें बताया गया कि उनके निवास के समीप ही उसी परिवार के रिटायर्ड कर्नल सरदार बलवंत सिंह जी चहल आज भी चढ़दी कला में निवास कर रहे हैं। हमने उनके निवास पर जाकर उनसे भेंट की और इस इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की।

कर्नल साहिब उस परिवार से संबंधित हैं, जिनके पुरखों ने गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी के नाम अपनी 100 बीघा भूमि की सेवा लिखवाई है। गुरुद्वारा साहिब का पुरातन स्वरूप भी इसी परिवार द्वारा निर्मित किया गया था। कर्नल साहिब ने भारतीय सेना में अपनी अमूल्य सेवाएं दी हैं और अनेक युद्धों में भाग लिया है।

कर्नल बलदेव सिंह जी चहल का वक्तव्य: “मैं कर्नल बलदेव सिंह चहल, पुत्र सरदार गुरदित्त सिंह जी, ग्राम चहल का निवासी हूं। गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी जिस स्थान पर बना है, वह संपूर्ण भूमि जैलदार काकू सिंह जी की थी तथा उसका कुछ हिस्सा लहल ग्रामवासियों का भी था। सन 1922 ईस्वी में मेरे पिताजी सरदार गुरदित्त सिंह जी, जो उस समय पटियाला स्टेट में फॉरेस्ट ऑफिसर थे, उन्होंने जैलदार काकू सिंह जी से कहकर इस स्थान पर गुरुद्वारा साहिब के निर्माण की नींव रखी। उस समय न तो पर्याप्त धन था और न ही सुविधाएं थीं। मेरे पिताजी ने एक छोटा कमरा बनवाकर वहां एक निहंग सिंह की सेवा लगाई, जो उस स्थान पर निवास कर सेवा करते थे।

कुछ समय बाद निहंग सिंह वहां से चला गया। सन 1929 ईस्वी में पटियाला के सभी सम्मानित सिखों को आमंत्रित कर गुरुद्वारा साहिब की विधिवत नींव रखी गई, क्योंकि यह भूमि मेरे नाना जी की थी और कुछ भूमि लहल गांव के सिखों की थी। निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ और सन 1933 ईस्वी तक गुरुद्वारा साहिब का निर्माण पूर्ण हो गया।

मुझे अधिक विस्तृत इतिहास की जानकारी नहीं है, परंतु यह भूमि जैलदार काकू सिंह जी की थी और इस स्थान पर महंतों ने कब्जा कर रखा था। उस समय महंतों और लहल निवासियों के बीच कई बार सशस्त्र संघर्ष हुआ, जिसमें मेरे दो मामा शहीद हो गए। महंतों को भी भारी नुकसान हुआ और अंततः वे इस स्थान को छोड़कर चले गए। इसके पश्चात गुरुद्वारा साहिब की संरचना और कमेटी का निर्माण मेरे पिताजी ने किया। उन्होंने गुरुद्वारा साहिब के निर्माण और रखरखाव में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।”

इसके पश्चात इसी भूमि पर खालसा कॉलेज की नींव रखी गई। उस समय मेरे पिताजी ने शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार तारा सिंह जी से भेंट कर इस गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब के परिसर में खालसा कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव रखा। वह कॉलेज उस स्थान पर स्थापित किया गया, जहां वर्तमान समय में लंगर घर स्थित है। उस समय सरकार अथवा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से कोई विशेष सहायता प्राप्त नहीं हुई। प्रारंभ में हमारे घर की कुर्सियां, मेज और बेंच लगाकर विद्यार्थियों का दाखिला किया गया और कॉलेज आरंभ किया गया।

डॉक्टर खोजी: “जब हमने कर्नल बलदेव सिंह जी से बातचीत की, तो उनसे पूछा कि क्या आपने अपनी आंखों से उस पुरातन बरगद के वृक्ष को टूटते हुए देखा था? उस समय आपके मन में क्या भाव उत्पन्न हुए?”

कर्नल बलदेव सिंह जी: “उस समय स्थानीय संगत ने सरदार गुरुचरण सिंह जी तोहरा से शिकायत की थी कि यह गलत हो रहा है। मैं भी उस समय फोर्स से छुट्टी लेकर आया हुआ था और उनसे मिला था। उन्होंने कहा कि नई इमारत बनाते समय कई समझौते करने पड़ते हैं, परंतु स्थान की मर्यादा को बनाए रखते हुए ही निर्माण किया जाएगा। इसी भावना के साथ इस इमारत का निर्माण किया गया। गुरुद्वारा परिसर में जो टोबा (छप्पड़ी, पानी का छोटा तालाब) था, संगत ने सेवा कर उसे सरोवर का रूप दिया। बाद में सरोवर की दीवारों को पक्का किया गया।”

डॉक्टर खोजी: कर्नल बलदेव सिंह जी, एक बात अवश्य संगत को बताइए। जब अंग्रेजों के शासनकाल में इस स्थान पर रेलवे ट्रैक बिछाया जा रहा था, उस समय के इंजीनियर मियां जहीरुद्दीन थे। उस समय गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब के स्थान पर एक बरोटा (बरगद का वृक्ष) विद्यमान था। उस इंजीनियर ने कहा कि इस बरोटे को काटकर रेलवे लाइन बिछाई जाए। सिख संगत द्वारा मना करने के बाद भी वह इंजीनियर अपनी जिद पर अड़ा रहा और कहता रहा कि वह अपने अनुसार ही रेलवे लाइन बिछाएगा। ऐसा बताया जाता है कि दोपहर का भोजन करने के पश्चात उसके साथ कुछ ऐसा घटित हुआ कि वह वापस मुड़कर श्वास भी नहीं ले सका। उस समय यह घटना प्रचलित हुई और इस स्थान से रेलवे ट्रैक को पटियाला शहर के ऊपर से तिरछा करके बिछाया गया। यह रेलवे लाइन इस स्थान से होकर गुजरने वाली थी, परंतु इसे घुमाकर बाहर की ओर से निकाल दिया गया। इस घटना का उल्लेख गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब के इतिहास की जानकारी देने वाले मुद्रित पर्चों में भी अंकित है।

कर्नल बलदेव सिंह जी: उस समय जब रेलवे लाइन बनाने की बात चल रही थी, तो यह लाइन गुरुद्वारा साहिब के स्थान से होकर निकल रही थी और उसी मार्ग में जैलदार काकू सिंह जी की हवेली भी आ रही थी। उस समय मेरे पिताजी, जो पटियाला स्टेट में फॉरेस्ट ऑफिसर थे, जैलदार काकू सिंह जी के साथ महाराजा पटियाला से मिले और उन्हें बताया कि इस स्थान पर गुरु साहिब का आगमन हुआ था, इसलिए यहां से रेलवे लाइन निकालना उचित नहीं होगा। साथ ही रेलवे लाइन के कारण हमारी हवेली भी नष्ट हो जाएगी और गांव के लोग अपने निवास स्थान को छोड़कर कहां जाएंगे। इन कारणों से महाराजा जी ने उनके निवेदन को स्वीकार किया और रेलवे लाइन को स्थानांतरित कर दिया। ऐसा भी सुनने में आता है कि वह इंजीनियर मान नहीं रहा था और अपनी जिद पर अड़ा रहा, और दो दिन बाद ही उसका देहांत हो गया।

डॉक्टर खोजी: कर्नल साहिब के परिवार की ओर से उस बरगद के वृक्ष का एक पत्ता आज भी संभाल कर रखा गया है, जो लगभग चालीस वर्ष पूर्व काटा गया था। उस बरगद के पत्ते को उन्होंने गुरु साहिब जी की स्मृति में अत्यंत सत्कार के साथ सुरक्षित रखा है। आज हम देख रहे हैं कि पटियाला, पंजाब के 23 जिलों में से एक, अपनी एक अलग विशिष्ट पहचान बना रहा है। पटियाला शहर को महाराजाओं की रॉयल शाही पहचान के लिए जाना जाता है। आज पटियाला एक विकसित शहर के रूप में निरंतर आगे बढ़ रहा है।

संगत जी, जब भी आपका पटियाला शहर में आगमन हो, तो मैं एक विनम्र निवेदन करना चाहता हूं। पटियाला शहर के चारों ओर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी की स्मृति से जुड़े अनेक स्थान विद्यमान हैं। पटियाला शहर से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर शाही चौबारा स्थित है। इस स्थान पर आपको पंजाबी सभ्याचार, पंजाबी रहन-सहन तथा पंजाब के पारंपरिक खान-पान का आनंद प्राप्त होगा। आप शाही चौबारे के दर्शन कर रहे हैं। इस शाही चौबारे में वे वीर और परिवार ठहर सकते हैं, जिनके पंजाब में कोई रिश्तेदार नहीं हैं।

शाही चौबारे में निवास करने हेतु मोबाइल क्रमांक 9988110544 पर संपर्क किया जा सकता है और इस स्थान को रैन बसेरे के रूप में उपयोग किया जा सकता है। यहां एक कोठा महाराजा रणजीत सिंह जी के नाम पर है तथा दूसरा कोठा महारानी जींद कौर के नाम से है। आज भी पुरातन वास्तुकला की तकनीक से निर्मित यह शाही चौबारा आपका वह घर है, जिसे पंजाब सरकार के पर्यटन विभाग से मान्यता प्राप्त है। सरदारनी गुरमीत कौर खालसा इस घर की प्रमुख हैं, जो दास (डॉक्टर खोजी) की सिंधनी (पत्नी) हैं। दास स्वयं भी इसी स्थान पर निवास करता है। जो भी वीर अथवा परिवार इस स्थान पर ठहरना चाहें, वे मोबाइल क्रमांक 9988110544 पर संपर्क कर सकते हैं।

निश्चित ही आप जी इस घर को बुक कर यहां ठहर सकते हैं। पधारी हुई संगत को पटियाला के आसपास स्थित ऐतिहासिक एवं दर्शनीय स्थलों के दर्शन करवाए जाएंगे तथा पटियाला शहर का संपूर्ण भ्रमण भी कराया जाएगा।
विशेष: इस स्थान पर एक पुस्तकालय का भी निर्माण किया गया है। जो संगत इतिहास से रूबरू होना चाहती है, उन्हें आसपास स्थित धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से संबंधित सभी ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन करवाए जाएंगे। इस स्थान से लगभग ढाई घंटे की दूरी पर श्री आनंदपुर साहिब जी स्थित है तथा एक घंटे की दूरी पर फतेहगढ़ साहिब जी है। पटियाला शहर के आसपास ऐसे अनेक स्थल हैं, जिनका एक संपूर्ण टूर बनाकर आप दर्शन कर सकते हैं।

इस प्रसंग में हमने गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी के इतिहास को जाना। परंतु यह भी स्मरणीय है कि गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब जी में धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी मालवा रटन (देशाटन) के समय पधारे थे। हम गुरुद्वारा मोती बाग साहिब की चर्चा कर रहे थे, अब प्रश्न यह है कि मोती बाग नामक इस स्थान से आगे चलकर श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी किस मार्ग से गए थे? इस संपूर्ण इतिहास को जानने के लिए जुड़े रहिए। अब हम इस यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हैं, हम चलते हैं समाणा नगर की ओर। समाणा से जुड़ा धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का क्या इतिहास है? जुड़े रहिए जी।

पार्श्व गायन: शहीदी भाव को स्पर्श करता संगीत कथा के प्रभाव को और अधिक गहन बना रहा है।

इतिहास के इन पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं अगले प्रसंग में……..

संगत जी से विनम्र निवेदन

इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ तथा विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सभी कार्यों में अत्यधिक व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक, इस शहीदी मार्ग प्रसंग तथा आगे आने वाले समस्त ऐतिहासिक प्रयासों में अपना सहयोग देना चाहें, तो कृपया मोबाइल क्रमांक 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।

आपका अपना वीर,
इतिहासकार — डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’


Spread the love

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *