मोहयाल समाज की अमर परंपरा: हिंद की चादर के अमर प्रहरी
(अमर शहीद भाई मती दास और भाई सती दास)
महाराष्ट्र सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रम हिंद की चादर के अंतर्गत दिनांक 11 जनवरी 2026 को न्यू मुंबई स्पोर्ट्स एसोसिएशन वाशी (मुंबई) में एक मोहयाल समाज का स्नेह मिलन समारोह रखा गया था, इस स्नेह मिलन समारोह में पुणे निवासी डॉक्टर रणजीत सिंह ‘अर्श’ टीम (खोज – विचार) ने अपने उद्बोधन में बताया कि-
भारतीय इतिहास में यदि किसी समाज ने अपने धर्म, राष्ट्र और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी शौर्य, त्याग और शहादत की परंपरा को जीवित रखा है, तो वह है मोहयाल समाज। यह समाज केवल विद्या और संस्कृति का संवाहक ही नहीं रहा, बल्कि संकट काल में शस्त्र उठाकर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होने वाला वह प्रहरी भी रहा है, जिसने इतिहास की धारा को मोड़ने का साहस दिखाया। अमर शहीद भाई मती दास और भाई सती दास इसी मोहयाल समाज की उस गौरवशाली परंपरा के सर्वोच्च शिखर हैं, जिनकी शहादत ने “हिंद की चादर” कहलाने वाले “श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी” के सनातन धर्म की रक्षा को अमरता प्रदान की।
मोहयाल समाज की ऐतिहासिक जड़ें अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण रही हैं। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, इस परंपरा का संबंध महाराजा दाहिर सेन के वंश से माना जाता है। इसी वंश परंपरा में जन्मे श्री गौतम दास जी, जो श्री गुरु नानक देव साहिब जी के समकालीन थे, आगे चलकर श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी के सानिध्य में आए और स्वयं को पूर्णतः सिख धर्म की सेवा में समर्पित कर दिया। गुरु पातशाह की आज्ञा से वह सिख धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु करियाला नामक स्थान पर भेजे गए, जो आज पाकिस्तान के चकवाल जिले में स्थित है। यह वही क्षेत्र है जहाँ समीप ही कटासराज शिव मंदिर स्थित है, जो उस युग के धार्मिक सह अस्तित्व का जीवित प्रमाण है।
करियाला ग्राम मोहयाल समाज का एक प्रमुख केंद्र बना। लगभग साढ़े चार सौ वर्षों तक यह समाज वहीं निवास करता रहा और चढ़दी कला अर्थात समृद्धि तथा सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना गया। मोहयाल ब्राह्मणों का यह छिब्बर परिवार सामान्य संगत में भाई जी का परिवार कहकर सम्मान पूर्वक जाना गया। आज भी करियाला ग्राम को मोहयाल समाज का ‘जेरूसलम’ कहा जाना, जो इस समाज के ऐतिहासिक योगदान का प्रमाण है। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील था; पश्चिम में अफगानी शासक और पूर्व में मुगल सत्ता। ऐसे में मोहयाल समाज के शूरवीर इस पूरे क्षेत्र की ढाल बनकर खड़े रहे।
इसी परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र थे भाई परागा जी, जो गौतम दास जी के सुपुत्र थे। वे श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की सेना के महान सेनापति बने। सन् 1628 ई. और 1635 ई. के युद्धों में उन्होंने अद्भुत वीरता का परिचय देते हुए मुगल सेना को भारी क्षति पहुँचाई। सन 1635 ई. की करतारपुर की ऐतिहासिक जंग में, जहाँ 14 वर्षीय श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपना अप्रतिम शौर्य दिखाया, वहीं एक सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व भाई परागा जी कर रहे थे। इस युद्ध में दाहिनी भुजा कट जाने के बाद भी रणभूमि न छोड़ना, मोहयाल समाज की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें शरीर से अधिक धर्म और कर्तव्य का महत्व रहा है।
श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने भाई परागा जी की सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें उत्तम नस्ल का घोड़ा, पाँच सौ रुपये नकद और अपनी स्वयं की कृपाण भेंट की तथा करियाला में रहकर धर्म-प्रचार का दायित्व सौंपा। उनके सुपुत्र भाई लक्खी दास जी और पौत्र भाई हीरानंद जी ने भी गुरु घर की सेवा को ही अपना जीवन बनाया। यह वही परंपरा थी जिसने आगे चलकर भाई मती दास और भाई सती दास जैसे अमर शहीद दिए।
जब श्री गुरु हर कृष्ण साहिब जी के बाद गुरु गद्दी का प्रश्न उपस्थित हुआ, तब मोहयाल समाज से ही भाई दरगाह मल जी को गुरु दरबार का दीवान नियुक्त किया गया। वे दिल्ली से बाबा बकाला साहिब तक गुरता गद्दी की समस्त सामग्री लेकर पहुँचे और नौवीं ज्योत के रूप में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के गुरु गद्दी पर प्रतिष्ठित होने की ऐतिहासिक प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाई। यही वह क्षण था, जब मोहयाल समाज का संबंध सीधे उस महान शहादत से जुड़ गया, जिसने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।
वयोवृद्ध भाई दरगाह मल जी ने भविष्य की गुरु-सेवाओं के लिए अपने भतीजों, भाई मती दास और भाई सती दास जी को गुरु घर को समर्पित किया। भाई मती दास जी गुरु दरबार के दीवान बने, जबकि भाई सती दास जी भाषाओं के विद्वान होकर गुरुवाणी के लेखन, अनुवाद और प्रचार में लगे। मोहयाल समाज की यह विशेषता रही है कि उसने शस्त्र और शास्त्र; दोनों को समान श्रद्धा दी।
दिल्ली में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी पर हुए अमानवीय अत्याचारों के प्रत्यक्ष साक्षी भाई सती दास जी थे। उन्होंने उन घटनाओं को लिपिबद्ध किया, यद्यपि वह अमूल्य साहित्य मुगल सत्ता द्वारा नष्ट कर दिया गया। गुरु पातशाह की यात्राओं में दोनों भाई सदैव साथ रहे। गुरु साहिब का स्नेह और सम्मान दोनों पर समान रूप से बरसता था।
9 नवंबर 1675 ई. को, धर्म परिवर्तन से इंकार करने पर, भाई मती दास जी को आरे से चीरकर शहीद कर दिया गया। जपु जी साहिब का पाठ करते हुए हँसते-हँसते शहादत स्वीकार करना, मोहयाल समाज की उस आध्यात्मिक ऊँचाई को दर्शाता है जहाँ मृत्यु भी पराजित हो जाती है। अगले दिन, 10 नवंबर 1675 को, भाई सती दास जी को रुई में लपेटकर जीवित जला दिया गया, परंतु उनके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि धर्म के लिए गर्व का तेज था।
भाई मती दास और भाई सती दास की शहादत केवल दो व्यक्तियों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह मोहयाल समाज की सामूहिक आत्मा का उद्घोष है। यह समाज सदियों से यही संदेश देता आया है कि धर्म, सत्य और आत्मसम्मान के लिए प्राण देना पराजय नहीं, बल्कि इतिहास को अमर दिशा देना है। हिंद की चादर परियोजना के अंतर्गत हम सभी देशवासीयों की मोहयाल चेतना को नमन है, जिसने सनातन की रक्षा में अपने दो अमर रत्न समर्पित किए।
अमर शहीद भाई मती दास और भाई सती दास को, तथा मोहयाल समाज की इस महान परंपरा को शत-शत नमन।
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’
(12 जनवरी 2026).