राग बसंत महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

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राग बसंत महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

बसंतु महला ९ ॥

पापी हीऐ मै कामु बसाइ ॥

मनु चंचलु या ते गहिओ न जाइ ॥१॥ रहाउ ॥

जोगी जंगम अरु संनिआस ॥

सभ ही परि डारी इह फास ॥१॥

जिहि जिहि हरि को नामु समारि ॥

ते भव सागर उतरे पारि ॥२॥

जन नानक हरि की सरनाइ ॥

दीजै नामु रहे गुन गाइ ॥३॥२॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ११८६)

भावार्थ-

पापी (व्यक्ति अपने) हृदय में काम (विकार) को बसाता है। इस लिए चंचल मन को वश में नहीं किया जा सकता।१। रहाउ। योगी, जंगम और संन्यासी, सब पर इस काम ने फंदा डाला हुआ है।१। जिस जिस ने हरि के नाम को याद किया है, वह भवसागर से पार हो गया है। २। दास नानक हरि की शरण में पड़ा है (और याचना करता है कि) हे प्रभु! (मुझे) नाम प्रदान किया जाए, (ताकि तुम्हारी) गुणस्तुति करता रहूं। ३।२।

The sinner enshrines lust within the heart, and therefore the restless mind cannot be brought under control. (Pause) This desire has cast its noose around yogis, wandering ascetics, and renunciates alike. Whoever has remembered the Name of the Lord has crossed over the terrifying ocean of existence. Servant Nanak has taken refuge in the Lord and humbly prays, O Lord, bless me with Your Name, so that I may continue to sing Your praises.

बसंतु महला ९ ॥

माई मै धनु पाइओ हरि नामु ॥

मनु मेरो धावन ते छूटिओ करि बैठो बिसरामु ॥१॥ रहाउ ॥

माइआ ममता तन ते भागी उपजिओ निरमल गिआनु ॥

लोभ मोह एह परसि न साकै गही भगति भगवान ॥१॥

जनम जनम का संसा चूका रतनु नामु जब पाइआ ॥

त्रिसना सकल बिनासी मन ते निज सुख माहि समाइआ ॥२॥

जा कउ होत दइआलु किरपा निधि सो गोबिंद गुन गावै ॥

कहु नानक इह बिधि की संपै कोऊ गुरमुखि पावै ॥३॥३॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ११८६)

भावार्थ-

हे माता! मैंने हरि-नाम रूप धन प्राप्त कर लिया है। (अब) मेरा मन दौड़-भाग से रुक गया है और ठिकाने पर स्थित हो गया है। १ ।रहाउ। माया की ममता (मेरे) शरीर से चली गई है और निर्मल ज्ञान पैदा हो गया है। लोभ और मोह, (अब मुझे) प्रभावित नहीं कर सकते, (मैंने) प्रभु की भक्ति ग्रहण कर ली है।१। जब (मैंने) नाम रूप रत्न पा लिया, (तो) जन्म जन्मांतरों का संशय दूर हो गया है। मन से सब प्रकार की तृष्णा नष्ट हो गई है (और मेरा मन अपने) आत्मिक सुख में समा गया है।२। जिस पर कृपा-निधान (प्रभु) दयालु होता है, यह गोविंद के गुणों का गायन करता है। नानक का कथन है कि इस तरह की (नाम रूप) सम्पत्ति कोई गुरमुख ही प्राप्त करता है।३।३।

O Mother, I have obtained the wealth of the Lord’s Name, and now my mind has ceased its restless wandering and has come to rest in its true abode. (Pause) Attachment to Maya has departed from my body and pure spiritual wisdom has arisen; greed and attachment can no longer affect me, for I have embraced devotion to the Lord. When I obtained the jewel of the Name, the doubts of countless lifetimes were dispelled, all craving vanished from the mind, and my consciousness merged into inner spiritual bliss. One upon whom the Lord, the treasure of mercy, bestows His compassion sings the praises of Govind; says Nanak, such wealth of the Name is attained only by the Guru-oriented one.

बसंतु महला ९ ॥

मन कहा बिसारिओ राम नामु ॥

तनु बिनसै जम सिउ परै कामु ॥१॥ रहाउ ॥

*इहु जगु धूए का पहार ॥

तै साचा मानिआ किह बिचारि ॥१॥

धनु दारा संपति ग्रह ॥

कछु संगि न चालै समझ लेह ॥२॥

इक भगति नाराइन होइ संगि ॥

कहु नानक भजु तिह एक रंगि ॥३॥४॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ११८६)

भावार्थ-

हे मन! (तुम ने) राम-नाम को क्यों भुला दिया है? शरीर के नष्ट होने पर यम से पाला पड़ता है।१। रहाउ। यह संसार धुएं के पर्वत जैसा है। तुम ने (इसे) किस विचार कारण सच्चा माना हुआ है।१। (हे मन! भली भांति) समझ लो कि धन, स्त्री, सम्पत्ति और घर-बार कुछ भी (परलोक गमन करते समय) साथ नहीं चलता। २। केवल एक प्रभु की भक्ति ही साथ जाएगी। नानक का कथन है कि (तुम) प्रेम-सहित उस एक (परमात्मा) का भजन करो। ३।४।

O mind, why have you forgotten the Name of the Lord; when the body perishes, one must confront Yama. (Pause) This world is like a mountain of smoke—by what reasoning have you accepted it as real? Understand well that wealth, spouse, possessions, and household do not accompany anyone on the journey beyond. Only devotion to the One Lord goes with the soul; says Nanak, worship that One Supreme Being with loving devotion.

बसंतु महला ९ ॥

कहा भूलिओ रे झूठे लोभ लाग ॥

कछु बिगरिओ नाहिन अजहु जाग ॥१॥ रहाउ ॥

सम सुपनै कै इहु जगु जानु ॥

बिनसै छिन मै साची मानु ॥१॥

संगि तेरै हरि बसत नीत ॥

निस बासुर भजु ताहि मीत ॥२॥

बार अंत की होइ सहाइ ॥

कहु नानक गुन ता के गाइ ॥३॥५॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ११८६)

भावार्थ-

(हे जिज्ञासु! तुम) झूठे लोभ में लग कर (हरि-नाम को) क्यों भूले हुए हो। अब भी सावधान हो जाओ (क्योंकि अभी तक) कुछ भी बिगड़ा नहीं है।१। रहाउ। इस जगत को स्वप्न के समान समझो। (यह बात) सच्ची मान लो (कि यह जगत) क्षण भर में नष्ट हो जाता है।१। हे मित्र! हरि नित्य तुम्हारे अंग-संग है, रात-दिन उस की आराधना करो।३। अंततः (प्रभु ही) सहायक होता है। नानक का कथन है कि उस (प्रभु) के गुणों का (सदा) गायन किया करो।३।५।

O seeker, why have you forgotten the Name of the Lord by becoming entangled in false greed; even now become alert, for nothing has yet been lost. (Pause) Understand this world to be like a dream and accept as true that it perishes in an instant. O friend, the Lord is forever with you, day and night—worship Him continually. In the end, He alone is the true helper; says Nanak, always sing the praises of that Lord.


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