राग रामकली महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

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राग रामकली महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥

रागु रामकली महला ९ तिपदे ॥

रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥

जा कै सिमरनि दुरमति नासै पावहि पटु निरबाना ॥१॥ रहाउ ॥

बडभागी तिह जन कर जानहु जो हरि के गुन गावै ॥

जनम जनम के पाप ‘खोइ कै फुनि बैकुंठि सिधावै ॥१॥

अजामल कर अंत काल महि नाराइन सुधि आई ॥

जां गति कउ जोगीसुर बाछत सो गति छिन महि पाई ॥२॥

नाहिन गुनु नाहिन कछु बिदिआ धरमु कउनु गजि कीना ॥

नानक बिरदु राम का देखहु अझै दानु तिह दीना ॥३॥१॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८०१)

भावार्थ-

हे मन! (तुम) हरि के नाम का आश्रय लो। जिस (प्रभु के नाम) के स्मरण से दुर्मति दूर हो जाती है और (तुम) परम-पद को प्राप्त कर लेते हो।१। रहाउ। उस सेवक को भाग्यशाली समझो, जो हरि का गुणगान करता है। (वह) जन्म-जन्मांतरों के पापों को खत्म करा कर पुनः वैकुंठ में पहुंच जाता है।१। अजामिल (नामक पापी) को अंतकाल में प्रभु (का नाम स्मरण) करने की याद आई जिस श्रेष्ठ स्थिति के लिए बड़े बड़े योगी भी लालायित हैं, वह स्थिति (उस ने) क्षण भर में ही प्राप्त कर ली है।२। (उस हाथी में) न कोई गुण था, न ही (उस ने) कुछ विद्या (प्राप्त की थी), (फिर उस) हाथी ने कौन सा धर्म-कर्म किया था? नानक (का कथन है कि) प्रभु का विरद देखो, उस (हाथी) को अमय-पद प्रदान कर दिया।३।१।

O mind, take refuge in the Divine Name; through remembrance of this Name, misguided understanding is dispelled and the supreme state is attained. Blessed is that servant who sings the praises of the Lord, for such devotion erases the sins of countless lifetimes and leads one back to the eternal abode. Ajamil, though a sinner, remembered the Divine Name at the final moment and instantly attained that exalted state for which even great yogis yearn. The elephant possessed neither virtue nor learning—what religious acts had it performed? Nanak declares: behold the Lord’s eternal compassion, for He bestowed upon that elephant the immortal, fearless state.

रामकली महला ९ ॥

साधी कउन जुगति अब कीजै ॥

जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥

मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझे नह कछु गिआना ॥

कउनु नामु जगु जा के सिमरै पावे पटु निरबाना ॥१॥

भए दइआल क्रिपाल संत जन तब इह बात बताई ॥

सरब धरम मानो तिह कीए जिह प्रग्भ कीरति गाई ॥२॥

राम नामु नरु निसि बासुर महि निमख एक उरि धारै ॥

जम को त्रासु मिटै नानक तिह अपुनो जनमु सवारै ॥३॥२॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८०२)

भावार्थ-

हे साधु-जनों! अब कौन सा उपाय करें, जिस से सब दुर्बुद्धि नष्ट हो जाए और प्रभु-भक्ति में मन भीग जाए?।१। रहाउ। मन माया-मोह में उलझा पड़ा है। (यह आत्म-) ज्ञान को कुछ समझता ही नहीं। (वह) कौन सा नाम है जिस के स्मरण से परम-पद को प्राप्त किया जा सकता है।१। (जब) संत जन कृपालु और दयालु हुए, तब (उन्होंने) यह बात बताई कि जिस ने प्रभु का गुणगान कर लिया, उस ने मानो सब धर्म-कर्म कर लिए।२। (यदि कोई) मनुष्य दिन रात में एक क्षण भर के लिए भी राम-नाम को हृदय में धारण कर ले, नानक (का कथन है कि) उस के (मन में से) यम का भय दूर हो जाता है और वह अपना जन्म संवार लेता है।३।२।

O holy ones, what course should now be taken by which all misguided understanding may be destroyed and the mind may be drenched in devotion to the Divine? The mind remains entangled in attachment to Maya and does not comprehend true self-knowledge; which is that Name whose remembrance leads one to the supreme state? When the saintly become compassionate and merciful, they reveal this truth: whoever sings the praises of the Lord has, as it were, fulfilled all religious duties and disciplines. If a human being holds the Divine Name in the heart even for a single moment, day or night, Nanak declares that the fear of death is driven away and one’s human birth is redeemed.

रामकली महला ९ ॥

प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥

छिनु छिनु अउध घटै निसि बासुर ब्रिथा जातु है देह ॥१॥ रहाउ ॥

तरनापो बिखिअन सिउ खोइओ बालपनु अगिआना ॥

बिरधि भइओ अजहू नही समझै कउन कुमति उरझाना ॥१॥

मानस जनमु दीओ जिह ठाकुरि सो तै किउ बिसराइओ ॥

मुकतु होत नर जा कै सिमरै निमख न ता कउ गाइओ ॥२॥

माइआ को मदु कहा करतु है संगि न काहू जाई ॥

नानकु कहतु चेति चिंतामनि होइ है अंति सहाई ॥३॥३॥८१॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८०२)

भावार्थ-

हे प्राणी! प्रभु का स्मरण करो। (तुम्हारी) आयु दिन रात क्षण क्षण कर घटती जा रही है और (मनुष्य) शरीर व्यर्थ जा रहा है।१। रहाउ। (तुम ने अपनी) जवानी विषयों में (लीन हो कर) और बचपन अज्ञान (की अवस्था) में खो दिया। (अब) वृद्ध हो गए हो, (परन्तु) अब भी समझे नहीं हो। (तुम) कौन सी दुर्बुद्धि में उलझे पड़े हो? ।१। जिस स्वामी ने मनुष्य जन्म दिया है, उस को तुम ने क्यों भुला दिया है? जिस के स्मरण से मनुष्य मुक्त होता है, (तुम ने) क्षण भर के लिए भी उस (प्रभु) का यशोगान नहीं किया है।२। (तुम) माया का अभिमान किस लिए करते हो? (यह अंत-काल में किसी के साथ भी नहीं जाती। नानक का कथन है (कि हे मन! तुम) प्रभु का स्मरण करते रहो (क्योंकि वही) अंत-काल में सहायक होता है।३।३।८१।

O mortal, remember the Divine, for your life is diminishing moment by moment, day and night, and this human body is being wasted away. You lost your youth immersed in sense pleasures and your childhood in ignorance; now you have grown old, yet still you have not awakened—what kind of misguided understanding are you entangled in? Why have you forgotten the Master who granted you human birth, whose remembrance brings liberation, and whose praise you have not sung even for a single moment? Why do you take pride in Maya, which will not accompany anyone at the final hour? Nanak declares: O mind, continue to remember the Divine, for He alone is the helper at the end.


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