राग तिलंग महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

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राग तिलंग महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥

तिलंग महला ९

चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥

छिनु छिनु अउध बिहातु है फूटै घट जिउ पानी ॥१॥ रहाउ ॥

हरि गुन काहि न गावही मूरख अगिआना ॥

झूठे लालचि लागि कै नहि मरनु पछाना ॥१॥

अजहू कछु बिगरिओ नही जो प्रभ गुन गावै ॥

कहु नानक तिह भजन ते निरभै पटु पावै ॥२॥१॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७२६)

भावार्थ-

हे प्राणी! (यदि तुम ने परमात्मा का नाम) स्मरण करना है, तो रात दिन (निरंतर) स्मरण करते रहो। (क्योंकि) क्षण क्षण में तुम्हारी आयु व्यतीत होती जा रही है, जिस प्रकार फूटे हुए घड़े से पानी (निकलता जाता है)।१। रहाउ। हे मूर्ख ! हे अज्ञानी! (तुम) हरि का गुणगान क्यों नहीं करते। झूठे (मायावी) लालच में लग कर (तुम) मृत्यु को नहीं पहचानते ।१। अभी कुछ बिगड़ा नहीं है जो (तुम) प्रभु के गुणों को गाने लग जाओ। नानक का कथन है कि उस (परमात्मा के) भजन से निर्भय पद प्राप्त कर लोगे ।२।१।

O mortal, if you are to remember the Divine Name, then remember it continuously, day and night, for your life is slipping away moment by moment, just as water drains from a cracked vessel. O foolish and ignorant one, why do you not sing the praises of the Lord? Entangled in false, illusory greed, you fail to recognize the approach of death. Even now, nothing is lost—begin to praise the Divine. Nanak declares that through such devotion you will attain the state of fearlessness.

तिलंग महला ९ ॥

जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥

जो तनु उपजिआ संग ही सो भी संगि न होइआ ॥१॥ रहाउ ॥

मात पिता सुत बंध जन हितु जा सिउ कीना ॥

जीउ छूटिओ जब देह ते डारि अगनि मै दीना ॥१॥ *

जीवत लउ बिउहारु है जग कउ तुम जानउ ॥

नानक हरि गुन गाइ लै सभ सुफन समानउ ॥२॥२॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७२६)

भावार्थ-

हे मना सावधान हो जाओ. सचेत हो जाओ! क्यों लापरवाह हो कर (तुम) सो रहे हो? जो शरीर (तुम्हारे साथ ही पैदा हुआ है, वह गी साथ नहीं जाता।१। रहा। माता, पिता, पुत्र, सम्बंधी आदि लोग, जिन के साथ तुम ने प्रेम किया था, जब शरीर से प्राण अलग हो जाएं, तब যि तुझे) अग्नि में डाल देते हैं।१। तुम समझ लो कि जीवित रहने तक ही (यह) जगत का व्यवहार है। नानक (का कथन है कि हरि का गुणगान करो, शेष सब कुछ स्वप्न के समान है।२।२।

O mind, become alert—awaken from heedlessness; why do you lie asleep in negligence? The body that is born along with you does not accompany you in the end. Mother, father, children, and relatives with whom you formed bonds of love, the moment life departs from the body, place it into the fire. Understand that the ways of the world endure only as long as life remains. Nanak declares: sing the praises of the Divine, for all else is like a dream.

तिलंग महला ९ ॥

हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥

अउसरु बीतिओ जातु है कहिओ मान लै मेरो ॥१॥ रहाउ ॥

संपति रथ धन राज सिउ अति नेहु लगाइओ ॥

काल फास जब गलि परी सभ भइओ पराइओ ॥१॥

जानि बूझ के बावरे तै काजु बिगारिओ ॥

पाप करत सुकचिओ नही नह गरबु निवारिओ ॥२॥

जिह बिधि गुर उपदेसिआ सो सुनु रे भाई ॥

नानक कहत पुकारि कै गहु प्रभ सरनाई ॥३॥३॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७२७)

भावार्थ-

हे मन! हरि के यश का गायन कर लो. जो तुम्हारे साथ जाने वाला साथी है। अवसर गुज़रता जा रहा है, मेरा कहा मान लो।१। रहाउ। (तुम ने) सम्पत्ति, रथ, धन और राज्य से बहुत ही प्रेम लगाया हुआ है। (परन्तु) जब मृत्यु का फंदा गले में पड़ेगा, तब सब कुछ पराया हो जाएगा।१। हे मूर्ख! तुम ने जान बूझ कर अपना काम बिगाड़ा है। (तुम ने) पाप करने से संकोच नहीं किया और न ही अहंकार को दूर किया है।२। हे भाई! जिस प्रकार गुरु ने (मुझे) उपदेश दिया है, वह सुन लो। नानक ऊंचे स्वर में बोल कर कहता है कि प्रभु की शरण ग्रहण कर लो।३।३।

O mind, sing the praises of the Divine Lord, for He alone is the companion who goes with you; the moment is slipping away—heed these words. You have grown deeply attached to property, chariots, wealth, and power, yet when the noose of death tightens around your neck, all of this will become чуж alien and meaningless. O foolish one, knowingly you have ruined your own task; you did not hesitate to commit sin, nor did you cast away your ego. O brother, listen to the teaching as the Guru has imparted it—Nanak proclaims aloud: take refuge in the Divine.


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