राग गउड़ी महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
गुरुवाणी: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी
राग गउड़ी महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥
राग गउड़ी महला ९ ॥
साधो मन का मानु तिआगउ ॥
कामु क्रोधु संगति दुरजन की ता ते अहिनिसि भागउ ॥१॥ रहाउ ॥
सुख दुख दोनो सम करि जानै अउरु मानु अपमाना ॥
हरख सोग ते रहै अतीता तिनि जगि ततु पछाना ॥१॥
उसतति निंदा दोऊ तिआगै खोजै पदु निरबाना ॥
जन नानक इहू खेल कठन है किनहं ग्ररमुखि जाना ॥२॥१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २१९)
भावार्थ-
हे साधुजनो ! (तुम अपने) मन के अहंकार को त्याग दो। काम, क्रोध (आदि विकारों) और बुरे मनुष्यों की संगति से दिन-रात दूर ही रहो।१। रहाउ। (जो व्यक्ति) दुःख और सुख को एक-समान समझता है और मान तथा अपमान (को भी बराबर समझता है)। खुशी और गमी से भी निर्लिप्त रहता है, उसी ने ही (वस्तुतः) जगत् की वास्तविकता को पहचाना है।१। स्तुति और निंदा दोनों को (जो मनुष्य) त्याग देता है, (वही) निर्वाण पद को खोजता है। दास नानक (का कथन है कि) यह खेल कठिन है, (परन्तु) किसी विरले व्यक्ति ने इस को गुरु की शिक्षा द्वारा जाना है।२।१।
Remain, day and night, detached from anger and the other inner vices, and keep distance from the company of the corrupt. (Pause). One who regards sorrow and joy as equal, who views honor and dishonor with the same calm vision, and who remains untouched by both happiness and grief—such a person alone has truly recognized the reality of the world. Whoever abandons both praise and slander seeks the state of liberation. Servant Nanak affirms: this path is difficult, yet a rare one understands it through the Guru’s teaching.
गउड़ी महला ९ ॥
साधो रचना राम बनाई ॥
इकि बिनसै इक असथिरु मानै अचरजु लखिओ न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
काम क्रोध मोह बसि प्रानी हरि मूरति बिसराई॥
झूठा तनु साचा करि मानिओ जिउ सुपना रैनाई ॥१॥
जो दीसै सो सगल बिनासै जिउ बादर की छाई॥
जन नानक जगु जानिओ मिथिआ रहिओ राम सरनाई ॥२॥२॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २१९)
भावार्थ-
हे साधो ! सृष्टि को प्रभु ने सिरजित किया है। एक (मनुष्य) मरता है, (परन्तु) एक और (मनुष्य अपने आप को) स्थायी मानता है। यह आश्चर्य समझ में नहीं आता। १। रहाउ। काम, क्रोध, मोह (आदि के विकारों) के वश में हो कर प्राणी ने प्रभु को भुला दिया है। (वह) नश्वर शरीर को सच्चा/स्थायी मानता है, जैसे रात का स्वप्न (होता है) ।१। जो दृश्यमान है, वह सब नाशवान है, जैसे बादल छाया (होती है)। दास नानक (का कथन है कि उस ने) जगत् को झूठा समझ लिया है और राम की शरण में रह रहा है।२।२।
The human being, astonishingly, comes to regard what is impermanent as permanent; under the dominance of desire, anger, attachment, and other inner vices, one forgets the Divine and considers the perishable body to be real and enduring, like a dream seen in the night. Whatever appears before the eyes is transient, like the fleeting shadow of clouds. Servant Nanak declares that he has recognized the world as illusory and now abides in the refuge of the Divine.
गउड़ी महला ९ ॥
प्रानी कउ हरि जसु मनि नहीं आवै ॥
अहिनिसि मगनु रहै माइआ मै कहु कैसे गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥
पूत मीत माइआ ममता सिउ इह बिधि आपु बंधावै ॥
म्रिग त्रिसना जिउ झूठो इहु जग देखि तासि उठि धावै ॥१॥
भुगति मुकति का कारनु सुआमी मूड़ ताहि बिसरावै ॥
जन नानक कोटन मै कोऊ भजनु राम को पावै ॥२॥३॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २१९)
भावार्थ-
प्राणी को हरि-यश मन में (बसाना) नहीं आता। (जो व्यक्ति) दिन रात माया में मग्न रहता है, (भला) बताओ (वह प्रभु की) गुणस्तुति कैसे कर सकता है।१। रहाउ। पुत्र, मित्र और मायावी ममता से अपने आप को इस प्रकार बंधवा लेता है. जैसे मृगतृष्णा (के भुलावे के कारण) इस झूठे जगत् को देख कर उस की ओर दौड़ता रहता है।१। भोग और मोक्ष का कारण रूप प्रभु स्वयं है, मूर्ख (मनुष्य) उस को भुला देता है। दास नानक (का कथन है कि करोड़ों में से कोई विरला ही होता है जो) राम की भक्ति को प्राप्त कर पाता है।२।३।
The mortal does not know how to enshrine the Lord’s praise within the mind; one who remains absorbed in Maya day and night—how can such a person sing the Lord’s glories? ||Pause|| Bound by attachment to children, friends, and illusory affection, one entangles oneself, running after this false world like a mirage created by deception. ||1|| The Lord Himself is the cause of both worldly enjoyment and liberation, yet the foolish person forgets Him; says servant Nanak, among millions only a rare one attains devotion to the Lord. ||2||3||
गउड़ी महला ९ ॥
साधी इहु मनु गहिओ न जाई ॥
चंचल त्रिसना संगि बसतु है या ते थिरु न रहाई ॥१॥ रहाउ ॥
कठन करोध घट ही के भीतरि जिह सुधि सभ बिसराई ॥
रतनु गिआनु सभ को हिरि लीना ता सिउ कछु न बसाई ॥१॥
जोगी जतन करत सभि हारे गुनी रहे गुन गाई॥
जन नानक हरि भए दइआला तउ सभ बिधि बनि आई ॥२॥४॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २१९)
भावार्थ-
हे संतो! इस मन को वश में नहीं किया जा सकता (क्योंकि यह) चंचल तृष्णा की संगति में रहता हैं, इस लिए स्थिर नहीं रह पाता।१। रहाउ। कठोर क्रोध भी हृदय में (बसता है) जिस ने (मनुष्य) की सब होश भुलाई हुई है। (इस क्रोध ने) सब (मनुष्यों) का ज्ञान रूप रत्न चुरा लिया है। उस पर किसी का वश नहीं चलता।१। सब योगी साधना कर हार गए हैं और गुणवान (व्यक्ति अपनी विद्या के द्वारा) गुणस्तुति करते करते हार गए हैं। दास नानक (का कथन है कि जब) परमात्मा दयालु होता है, तब सब तरह से बात बन जाती है (अर्थात् मनोरथ में सफलता प्राप्त हो जाती है) ।२।४।
O saints, this mind cannot be brought under control, because it lives in the company of restless desire and therefore cannot remain steady. ||Pause|| Harsh anger also dwells within the heart, causing a person to lose all sense; it has stolen the jewel of wisdom from everyone, and no one has mastery over it. ||1|| All yogis have grown weary practicing disciplines, and even the virtuous have tired themselves out singing praises through their learning; says servant Nanak, when the Supreme Lord becomes compassionate, then everything comes together in every way—that is, one attains success in one’s purpose. ||2||4||
गउड़ी महला ९ ॥
साधो गोबिंद के गुन गावउ ॥
मानस जनमु अमोलकु पाइओ बिरथा काहि गवावउ ॥१॥ रहाउ ॥
पतित पुनीत दीन बंध हरि सरनि ताहि तुम आवउ ॥
गज को त्रासु मिटिओ जिह सिमरत तुम काहे बिसरावउ ॥१॥
तजि अभिमान मोह माइआ फुनि भजन राम चितु लावउ ॥
नानक कहत मुकति पंथ इहु गुरमुखि होइ तुम पावउ ॥२॥५॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २१९)
भावार्थ-
हे साधो! (तुम) प्रभु का गुणनुवाद करो। (तुमने) अमूल्य मानव जन्म प्राप्त किया है, (उसे) व्यर्थ में बैठे गंवा रहे हो।१। रहाउ। परमात्मा पतितों को पवित्र करने वाला और दीनों/गरीबों का बंधु है, (तुम) उस की शरण में आओ। जिस (प्रभु) के स्मरण से (तेंदुए के द्वारा पकड़े जाने पर भी) हाथी का भय दूर हो गया, (उस को) तुम क्यों विस्मृत करते हो ।१। (अपने) अहंभाव और माया-मोह को त्याग कर प्रभु-भक्ति में चित्त को लगाओ। नानक का कथन है कि (भवसागर से) मुक्त होने का यह मार्ग है. गुरमुख हो कर तुम (इस को) प्राप्त करो।२।५।
O saints, sing the praise of the Lord; you have obtained this precious human birth, yet you are wasting it away in idleness. ||Pause|| The Supreme Lord is the purifier of the fallen and the friend of the humble and the poor—seek His refuge; by whose remembrance even the elephant’s fear was dispelled when seized by the leopard, why do you forget such a Lord? ||1|| Renounce ego and attachment to Maya, and focus your consciousness on devotion to the Lord; says Nanak, this is the path to liberation from the ocean of existence—becoming Gurmukh, you shall attain it. ||2||5||
गउड़ी महला ९ ॥
कोऊ ‘माई भूलिओ मनु समझावै ॥
बेद पुरान साध मग सुनि करि निमख न हरि गुन गावै ॥१॥ रहाउ ॥
दुरलभ देह पाइ मानस की बिरथा जनमु सिरावै॥
माइआ मोह महा संकट बन ता सिउ रुच उपजावै ॥१॥
अंतरि बाहरि सदा संगि प्रभु ता सिउ नेहु न लावै ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानहु जिह घटि रामु समावै ॥२॥६॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २२०)
भावार्थ-
हे माता! कोई मेरे भूले हुए (कुमार्गगामी) मन को समझाए। वेदों, पुराणों और साधु-जनों के उपदेश को सुन कर भी यह क्षण भर के लिए हरि-गुणों का गायन नहीं करता।१। रहाउ। मनुष्य की दुर्लभ देह को प्राप्त करके भी (यह) जन्म को व्यर्थ में बिता रहा है। माया का मोह रूप (जो) दुःखदायक जंगल है, उस के प्रति आसक्त हो गया है।१। अंदर और बाहर सदा अंगसंग रहने वाले प्रभु से (यह) प्रेम नहीं करता। नानक (का कथन है कि) तुम उस को ही मुक्त समझो जिस के हृदय में प्रभु समा रहा हो। २।६।
O mother, may someone counsel my misguided and wayward mind; even after listening to the teachings of the Vedas, the Puranas, and the saints, it does not sing the Lord’s praises even for a moment. ||Pause|| Though having obtained the rare human body, it is still wasting this life in vain, having become attached to the painful jungle of attachment to Maya. ||1|| It does not love the Lord who ever abides within and without, always accompanying one; says Nanak, consider only that person liberated in whose heart the Lord comes to dwell. ||2||6||
गउड़ी महला ९ ॥
साधो राम सरनि बिसरामा ॥
बेद पुरान पड़े को इह गुन सिमरे हरि को नामा ॥१॥ रहाउ ॥
लोभ मोह माइआ ममता फुनि अउ बिखिअन की सेवा ॥
हरख सोग परसै जिह नाहनि सो मूरति है देवा ॥१॥
सुरग नरक अंम्रित बिखु ए सभ तिउ कंचन अरु पैसा ॥
उसतति निंदा ए सम जा कै लोभु मोहु फुनि तैसा ॥२॥
दुख सुख ए बाधे जिह नाहनि तिह तुम जानउ गिआनी ॥
नानक मुकति ताहि तुम मानउ इह बिधि को जो प्रानी ॥३॥७॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २२०)
भावार्थ-
हे संतो! प्रभु की शरण में पड़ने से ही शांति प्राप्त होती है। वेद और पुराण (आदि धर्म ग्रंथों) को पढ़ने का यह लाभ होना चाहिए कि मनुष्य हरि-नाम का स्मरण करे।१। रहाउ। लोभ, मोह और मायावी ममता और पुनः अन्य विषयों का सेवन (जिस को प्रभावित नहीं कर सकते), जिस को हर्ष और शोक स्पर्श नहीं कर पाते, वह (वस्तुतः) परमात्मा का ही रूप है।१। जिस मनुष्य के लिए नर्क और स्वर्ग, अमृत और विष (एक-समान है) और उसी तरह सोना और तांबा (बराबर है)। जिस के लिए स्तुति और निंदा एक जैसी है और उसी प्रकार लोभ और मोह (भी एक जैसे लगते हैं)।२। जिस को दुःख और सुख अपने वश में नहीं करते, उस को तुम ‘ज्ञानी’ समझो। नानक (का कथन है कि) इस प्रकार का जो प्राणी (भाव मनुष्य) है, तुम उस को मुक्त समझो ।३।७।
O saints, peace is obtained only by taking refuge in the Lord; the true benefit of reading the Vedas and the Puranas and other sacred texts should be that a person remembers the Lord’s Name. ||Pause|| One whom greed, attachment, illusory affection, and other worldly indulgences cannot influence, whom joy and sorrow cannot touch—such a being is truly the very form of the Supreme Lord. ||1|| For whom hell and heaven, nectar and poison are the same, and likewise gold and copper are equal; for whom praise and slander are alike, and in the same way greed and attachment appear identical. ||2|| One whom pain and pleasure do not control—know that person as a knower of truth; says Nanak, such a being you should consider liberated. ||3||7||
गउड़ी महला ९ ॥
मन रे कहा भइओ तै बउरा ॥
अहिनिसि अउध घटै नही जानै भइओ लोभ संगि हउरा ॥१॥ रहाउ ॥
जो तनु तै अपनो करि मानिओ अरु सुंदर ग्रिह नारी॥
इन मैं कछु तेरो रे नाहनि देखो सोच बिचारी ॥१॥
रतन जनमु अपनो तै हारिओ गोबिंद गति नही जानी॥
निमख न लीन भइओ चरनन सिंउ बिरथा अउध सिरानी ॥२॥
कहु नानक सोई नरु सुखीआ राम नाम गुन गावै ॥
अउर सगल जगु माइआ मोहिआ निरभै पटु नही पावै ॥३॥८॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २२०)
भावार्थ-
हे मन ! तुम (सांसारिकता में उलझ कर) क्यों पागल हो गए हो। (तुम) नहीं जानते कि आयु दिन रात कम हो रही है और (तुम) लोभके कारण (आत्मिक रूप में) निर्बल हो गए हो। १ । रहाउ। जिस शरीर और घर की स्त्री को तुमने अपना समझ रखा है, इन में कुछ भी तुम्हारा नहीं है। तुम सोच विचार कर देख लो।१। तुम ने अपना रत्न के समान जन्म (जुए की बाज़ी की तरह) हार दिया है (क्योंकि तुम ने) प्रभु की लीला को नहीं समझा। क्षण भर के लिए भी (तुम प्रभु के) चरणों में लीन नहीं हुए, व्यर्थ में (सारी) आयु गुज़ार दी है।२। नानक का कथन है कि वही मनुष्य सुखी है (जो राम-नाम की गुणस्तुति करता है।) अन्य सारा जगत् माया से मोहित है, (अतः वह) निर्भयता की स्थिति को प्राप्त नहीं होता । ३ । ८ ।
O mind, why have you gone mad, entangled in worldliness? Do you not realize that your lifespan is decreasing day and night, and that through greed you have become spiritually weak? ||Pause|| The body and the spouse of the household that you consider your own—none of these truly belong to you; reflect upon this carefully. ||1|| You have lost your jewel-like human birth as if in a gamble, because you did not understand the Lord’s divine play; not even for a moment did you immerse yourself at the Lord’s feet, and thus you have wasted your entire life. ||2|| Says Nanak, only that person is truly happy who sings the praise of the Lord’s Name; the rest of the world is deluded by Maya and therefore does not attain the state of fearlessness. ||3||8||
गउड़ी महला ९ ॥
नर अचेत पाप ते डरु रे ॥
दीन दइआल सगल भै भंजन सरनि ताहि तुम परु रे ॥१॥ रहाउ ॥
बेद पुरान जास गुन गावत ता को नामु हीऐ मो धरु रे॥
पावन नामु जगति मै हरि को सिमरि सिमरि कसमल सभ हरु रे ॥१॥
मानस देह बहुरि नह पावै कछू उपाउ मुकति का करु रे ॥
नानक कहत गाइ करुना मै भव सागर कै पारि उतरु रे ॥२॥९॥२५१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक २२०)
भावार्थ-
हे मूर्ख मनुष्य! पाप कमाने से डरो। तुम दीनों पर दया करने वाले और सब तरह के भय को दूर करने वाले उस (प्रभु) की शरण में पड़ जाओ।१। रहाउ। जिस के गुणों का गायन वेद और पुराण (आदिक धर्मग्रंथ) कर रहे हैं, उस का नाम अपने हृदय में धारण करो। जगत् में हरि-नाम ही पवित्र है, (उस को) स्मरण कर सब पाप दूर कर दो।१। मनुष्य शरीर पुनः प्राप्त नहीं होगा, (अतः) मुक्ति का कुछ उपाय कर लो। नानक का कथन है कि करुणामय परमात्मा के गुणों का गायन कर भवसागर से पार हो जाओ।२।९।२५१।
O foolish person, fear earning sin; take refuge in that Lord who is compassionate to the poor and removes all kinds of fear. ||Pause|| Enshrine within your heart the Name of Him whose virtues are sung by the Vedas and the Puranas; in this world, the Lord’s Name alone is pure—by remembering it, erase all sins. ||1|| The human body will not be obtained again, so make some effort toward liberation; says Nanak, by singing the virtues of the compassionate Supreme Lord, cross over the ocean of existence. ||2||9||251||