प्रसंग क्रमांक 12: सैफाबाद से बहादुरगढ़ तक: नाम परिवर्तन की ऐतिहासिक यात्रा

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प्रसंग क्रमांक 12: सैफाबाद से बहादुरगढ़ तक: नाम परिवर्तन की ऐतिहासिक यात्रा

(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)

संगत जी, अब हम ननहेड़ी पिंड / नगर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बहादुरगढ़ की ओर बढ़ते हैं। शेखूपुर, चापड़ और शील से होते हुए इस मार्ग पर भी श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का आगमन हुआ था। पटियाला से लगभग 8 किलोमीटर पूर्व, दिल्ली से लगभग ढाई सौ किलोमीटर की दूरी पर तथा चंडीगढ़ एयरपोर्ट से लगभग 50–55 किलोमीटर की दूरी पर बहादुरगढ़ स्थित है।

पार्श्व-गायन: शहीदी भाव को स्पर्श करता संगीत कथा के प्रभाव को और अधिक गहन बना रहा है।

संगत जी, आओ—अब हम गुरुद्वारा साहिब पातशाही नौवीं, बहादुरगढ़ साहिब के दर्शन करते हैं। हम सबसे पहले इस गुरुद्वारा साहिब के मुख्य भवन के दर्शन करते हैं।

पार्श्व-गायन: गुरु चरणों की स्मृति में रची गई धुन मन के भीतर श्रद्धा की सूक्ष्म कंपन उत्पन्न करती है।

इस गुरुद्वारा साहिब के मुख्य हाल में अत्यंत सुंदर और विलोभनीय शीशे लगे हुए हैं तथा वर्तमान स्वरूप में भव्य श्रृंगार दिखाई देता है। किंतु पुरातन काल में इस स्थान का स्वरूप ऐसा नहीं था। अब आप मेरे साथ स्क्रीन पर इस गुरुद्वारा साहिब की एक पुरातन तस्वीर देख रहे हैं। यह तस्वीर स्वयं बोलकर साक्ष्य देती है कि यह स्थान किसी किले-नुमा हवेली के समान, एक बाग के मध्य निर्मित था। इस पुरातन इमारत का निर्माण महाराज कर्म सिंह जी की सेवाओं से संपन्न हुआ था।

इस ऐतिहासिक भवन की विलोभनीय ड्योढ़ी को तोड़कर एक नई ड्योढ़ी का निर्माण कर दिया गया। दूसरी ओर, आप जिस निशान साहिब के दर्शन कर रहे हैं—उस समय भी ठीक इसी प्रकार, जैसे पटियाला शहर के मध्य स्थित गुरुद्वारा मोती बाग साहिब में निशान साहिब सुशोभित है—वैसा ही निशान साहिब यहां भी एक ऊँचे चबूतरे / थड़े पर स्थापित था। उस पर लोहे की बड़ी-बड़ी जंजीर / चेन लगी हुई थीं और निशान साहिब शान से झूल रहा था।

परंतु समय के साथ, शायद वह पुरातन निशान साहिब उपयुक्त नहीं समझा गया, अथवा नए निशान साहिब को सुशोभित करने की योजना बनी। परिणामस्वरूप, उस पुरातन निशान साहिब के चबूतरे / थड़े को तोड़ दिया गया और यह ऐतिहासिक निशानी भी समाप्त कर दी गई।

पार्श्व-गायन: समय की धूल हटाती-सी मार्मिक सुर-लहरी दर्शक को इतिहास की गहराइयों में ले जा रही है।

अब स्क्रीन पर डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ इस स्थान के मुख्य सेवादार से संवाद करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

मुख्य सेवादार बताते हैं कि सामने जो कुआँ दिखाई देता है, उसे स्थान के वर्तमान नक्शे के अनुसार बंद न करके केवल ढक दिया गया है। डॉ. खोजी प्रश्न करते हैं कि क्या उस कुएँ की कोई निशानी शेष है और यदि भविष्य में उसे पुनः जीवंत करना पड़े, तो क्या यह संभव है।

मुख्य सेवादार उत्तर देते हैं कि वह कुआँ एक ढक्कन से ढका हुआ है और यही बात उन्हें भी समझ आई थी। डॉ. खोजी उनकी आयु के बारे में पूछते हैं। सेवादार बताते हैं कि उनकी आयु लगभग सत्तर वर्ष है। डॉ. खोजी कहते हैं कि उस समय वे जवान रहे होंगे।

मुख्य सेवादार आगे बताते हैं कि इस स्थान के भीतर स्थित कुएँ को ढक कर उसके ऊपर निर्माण करना पड़ा। डॉ. खोजी पूछते हैं कि क्या उस कुएँ को बचाया जा सकता था। सेवादार उत्तर देते हैं कि ऐसा संभव था, क्योंकि इस स्थान पर भूमि बहुत अधिक है—लगभग 70 से 72 किले।

डॉ. खोजी यह प्रश्न रखते हैं कि क्या इन पुरातन निशानियों को संरक्षित किया जाना चाहिए था। मुख्य सेवादार बताते हैं कि उन्होंने स्वयं उस कुएँ का उपयोग होते हुए देखा है और उसका अत्यंत उचित ढंग से प्रयोग किया जाता था। सामने कमरे बने हुए थे और उनके पास ही कुआँ स्थित था। उन्होंने उस पुरातन भवन के संपूर्ण दर्शन किए हैं। ऊपर जो मस्जिद के सामने दरबार साहिब बना हुआ था, वहाँ से लगातार मिट्टी गिरती रहती थी, क्योंकि वह चुना-मिट्टी से निर्मित था। उसी स्थान पर महाराज का प्रकाश भी हुआ करता था।

डॉ. खोजी स्पष्ट करते हैं कि अर्थात आपने उस पुरातन भवन के दर्शन किए हैं, जो पहले किले जैसी इमारत के रूप में बना हुआ था। मुख्य सेवादार सहमति जताते हुए बताते हैं कि दूसरी ओर जो समाधि बनी हुई है, उसी प्रकार के भवन में महाराज का प्रकाश होता था। वहाँ स्थान इतना कम था कि बड़ी कठिनाई से कोई व्यक्ति जैसे-तैसे महाराज के ताबे पर बैठ पाता था। उस समय एक चबूतरा / थड़ा भी था, जिसका उपयोग किया जाता था।

मुख्य सेवादार कहते हैं कि अब तो महाराज की अपार कृपा से इस स्थान पर अत्यंत गहमागहमी है। उस समय के अनुसार सारा प्रबंध ठीक था। ठीक इसी प्रकार किले में भी कुआँ और चबूतरा / थड़ा साहिब दोनों ही विद्यमान थे।

डॉ. खोजी पूछते हैं कि आपने और क्या-क्या पुराना देखा है। मुख्य सेवादार बताते हैं कि इसके पहले यहाँ एक विद्यालय भी हुआ करता था, जहाँ दुनिया भर के बच्चे पढ़ने आते थे।

डॉ. खोजी प्रश्न करते हैं कि महाराज कर्म सिंह जी द्वारा सेवा से निर्मित ऊँचे निशान साहिब को क्या किसी मजबूरी में हटाया गया। मुख्य सेवादार बताते हैं कि वह निशान साहिब छोटा था और नवीन परिसर में एक और हो गया था, इसलिए जब नई विशाल इमारत का निर्माण हुआ, तब पुराने निशान साहिब को हटाकर परिसर के मध्य नया निशान साहिब स्थापित किया गया। पहले इस स्थान का प्रबंध छोटे स्तर पर था और निशान साहिब की ऊँचाई लगभग 70 फीट थी।

डॉ. खोजी कहते हैं कि वह निशान साहिब और भी ऊँचा हो सकता था। मुख्य सेवादार उत्तर देते हैं कि ऊँचा तो हो सकता था, पर वह नक्शे में फिट नहीं बैठ रहा था।

डॉ. खोजी पुनः कहते हैं कि महाराज कर्म सिंह जी द्वारा बनवाया गया वह निशान साहिब तोड़ दिया गया। मुख्य सेवादार बताते हैं कि वह निशान साहिब बहुत ऊँचा था और उसके चारों ओर दीवार बनाई गई थी। डॉ. खोजी पूछते हैं कि उसके नीचे कोई कमरा बना हुआ था क्या? मुख्य सेवादार बताते हैं कि नहीं, वह केवल ऊँचा चबूतरा / थड़ा ही था।

डॉ. खोजी स्मरण कराते हैं कि उसकी पुरानी जंजीर भी तो थी।

पार्श्व-गायन: पृष्ठभूमि में शांत, आध्यात्मिक और शहीदी-भाव को जागृत करती कोमल धुन निरंतर प्रवाहित हो रही है।

इस स्थान के कथावाचक भाई अवतार सिंह जी अपने कथन में बताते हैं कि यह पावन धरती श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज के चरण-स्पर्श से पवित्र हुई गुरुद्वारा साहिब पातशाही नौवीं, बहादुरगढ़ है। यह वही स्थान है, जहाँ सतगुरु जी का पावन स्थान आज भी शोभायमान है। भाई साहिब बताते हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज ने अपने मुबारक चरणों से इस धरती को दो बार पवित्र किया था।

डॉ. खोजी प्रश्न करते हैं कि सामने दिखाई दे रही इस बारादरी के भवन में किसका स्थान था।

कथावाचक भाई अवतार सिंह जी उत्तर देते हैं कि यह बारादरी बाबा दूधाधारी जी की पवित्र स्मृति में निर्मित की गई थी। इस स्थान पर पहले एक विद्यालय भी चलता था, जहाँ बच्चों को गुरमत की शिक्षा दी जाती थी। प्रारंभ में यह स्थान केवल बाबा दूधाधारी जी की ही जगह के रूप में जाना जाता था। लोगों में यह धारणा बन गई थी कि यह नवाब साहिब के पीर की जगह है, इसलिए लोग यहाँ आकर मनमत के अनुसार हरे रंग की चुनरी चढ़ाते थे। इस स्थिति को देखकर प्रबंधकों ने विचार किया और इस स्थान पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश स्थापित किया गया।

अब स्थिति यह है कि संगत की भावना पूर्णतः परिवर्तित हो चुकी है। संगत इस स्थान पर आकर जाप करती है। अनेक ऐसे प्रेमी सिख हैं, जो यहाँ बैठकर सारी रात नाम-जाप में लीन रहते हैं।

श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज के पावन स्थान से संबंधित इस गुरुद्वारा साहिब के सामने दो ऐतिहासिक स्थल स्थित हैं। इनमें से बड़ा स्थान बाबा दूधाधारी जी के नाम से प्रसिद्ध है। जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज इस पंचवटी बाग में आकर शोभायमान हुए थे, तब इस स्थान की सेवा-संभाल बाबा दूधाधारी जी महाराज किया करते थे।

जब महाराज कर्म सिंह जी का इस स्थान पर आगमन हुआ, तो उन्होंने बाबा दूधाधारी जी महाराज के दर्शन किए। उस समय बाबा जी ने महाराज कर्म सिंह जी से कहा कि उन्होंने अपने जीवन में कभी एक लाख रुपये नहीं देखे हैं और वे एक लाख रुपये देखना चाहते हैं। यह सुनकर महाराज कर्म सिंह जी अपने महल से एक लाख रुपये की स्वर्ण मुद्राएँ लाए और उन्हें बाबा दूधाधारी जी के समक्ष ढेर के रूप में रख दिया। उन्होंने कहा—“यह एक लाख रुपये हैं।”

तब बाबा दूधाधारी जी ने उत्तर दिया कि यह एक लाख रुपये उनके किसी काम के नहीं हैं और यह महाराज के ही काम आने योग्य हैं, इसलिए वे इन्हें वापस ले जाएँ। इस पर महाराज कर्म सिंह जी ने कहा कि यह माया अब आपकी सेवा में आ चुकी है और अब यह आपकी ही है।

उस समय महाराज कर्म सिंह जी प्रायः बीमार रहते थे। तब बाबा दूधाधारी जी ने उन्हें परामर्श दिया कि इस एक लाख रुपये की माया से श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की स्मृति में इस स्थान पर एक सुंदर गुरुद्वारा साहिब का निर्माण करवाया जाए।

इस स्थान पर जो पुरातन भवन था, वह महाराज कर्म सिंह जी ने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज की स्मृति में ही निर्मित करवाया था। उस समय यह संपूर्ण क्षेत्र सैफाबाद के नाम से प्रसिद्ध था। पश्चात्, सैफाबाद का नाम परिवर्तित कर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के पावन नाम पर इस स्थान को बहादुरगढ़ साहिब कहा जाने लगा।

इसके साथ ही, सामने एक सुंदर बुंगा भी निर्मित है। नाभा के राजा जसवंत सिंह जी के सुपुत्र रणजीत सिंह जी जब शाहजहाँपुर कर / टैक्स वसूलने गए थे, तब उनकी सौतेली माँ ने उन्हें विष देकर मरवा दिया था। जब उनकी मृत देह इस स्थान पर लाई गई, तब महाराज कर्म सिंह जी ने वचन किए कि- यह स्थान श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का पावन स्थल है, इसलिए इसी स्थान पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। इस प्रकार राजा रणजीत सिंह जी का अंतिम संस्कार यहीं किया गया।

पंथ के महान विद्वान और लेखक ज्ञानी ज्ञान सिंह जी ने अपनी रचना तवारिख गुरु खालसा में इस स्थान का विशेष उल्लेख किया है। समय के साथ यह स्थान खंडहर में परिवर्तित हो गया था, किंतु कारीगरों द्वारा पुरातन नक्शे के अनुसार संपूर्ण निर्माण कार्य पुनः किया गया। ऊपर का घुमट भी ढह चुका था, जिसे फिर से निर्मित कर एक सुंदर घुमट का स्वरूप दिया गया।

डॉ. खोजी पूछते हैं कि यह बुंगा कितने बाय कितने का है।

भाई अवतार सिंह जी उत्तर देते हैं कि यह 10 बाय 10 फीट का है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि पहले छोटी मंजी या आसान भी इसी प्रकार के होते थे।

भाई अवतार सिंह जी बताते हैं कि यह पावन स्थान हमारी पुरातन विरासत है, जिसे उन्होंने भली-भाँति संभाल कर रखा है। राजा जसवंत सिंह जी के सुपुत्र राजा रणजीत सिंह जी की स्मृति में इस सुंदर बुंगे का निर्माण किया गया है। बाबा दूधाधारी जी का देहांत भी इसी स्थान पर हुआ था और उनकी स्मृति में भी यहाँ एक सुंदर स्थान बनाया गया है।

इस परिसर में स्थित दो पुरातन स्थानों को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने लंबे समय से संरक्षित कर रखा है, जहाँ संगत आकर श्रद्धापूर्वक दर्शन करती है। इस स्थान पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महाराज का प्रकाश है और संगत की ओर से अत्यंत भावना के साथ निरंतर अखंड पाठ साहिब करवाए जाते हैं तथा भोग संपन्न होते हैं। संगत बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ यहाँ दर्शन करने आती है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि कहीं-कहीं ऐसा अनुभव होता है कि पुरातन इमारतों में अधिक सुकून था, जबकि अब पत्थर पर पत्थर लगाया जा रहा है। क्या संगत इस परिवर्तन को महसूस करती है?

भाई अवतार सिंह जी उत्तर देते हैं कि हाँ, अवश्य। जब संगत इस स्थान पर आती है, तो उनका विशेष आग्रह होता है कि उनका अखंड पाठ साहिब इसी स्थान पर संपन्न हो। यहाँ गर्मी के दिनों में भी ठंडक बनी रहती है और जेठ के महीने में भी इस स्थान पर शीतलता का अनुभव होता है।

डॉ. खोजी प्रश्न करते हैं कि जब पुरानी इमारत इतनी सुंदर थी और निशान साहिब भी सुशोभित था, तो फिर पुरातन इमारत को तोड़कर नई इमारत बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

भाई अवतार सिंह जी कहते हैं कि उस समय संगत में शायद कोई विशेष जागृति नहीं आई और कार सेवा करने वालों को भी किसी ने रोका नहीं। इतनी सुंदर ऐतिहासिक इमारत को ढहा दिया गया, जबकि नई इमारत भी उसी प्रकार संगमरमर और पत्थर से ही बनाई गई। इससे न तो कोई अतिरिक्त स्थान बना और न ही संगत के लिए कोई विशेष सुविधा बढ़ी। यदि पुरातन किले-नुमा इमारत की सेवा-संभाल की जाती, तो उस ऐतिहासिक धरोहर को बचाया जा सकता था।

डॉ. खोजी पूछते हैं कि क्या नवाब सैफुद्दीन का नाम आज भी कहीं अक्षरों में लिखा हुआ मिलता है।

भाई अवतार सिंह जी उत्तर देते हैं कि हाँ। इस स्थान पर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज ने लंबा समय निवास किया था और नवाब सैफुद्दीन महाराज के प्रेमी और मुरीद थे। इसी कारण उनकी स्मृति में इस दीवान हाल का नूतनीकरण कर इसका नाम रखा गया—

“श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के श्रद्धालु नवाब सैफ खान दीवान हाल।”

डॉ. खोजी संगत से कहते हैं कि कई बार हमारी सोच संकुचित हो जाती है, परंतु सिक्खी का हृदय अत्यंत विशाल है। हमारे वीडियो मुस्लिम भाइयों तक भी पहुँचते हैं। उस समय धन्य – धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का अपने श्रद्धालु सैफुद्दीन से प्रेम का संबंध, उसी प्रकार श्री गुरु गोबिंद सिंह जी साहिब का पीर बुद्धूशाह से जुड़ाव, और इसी भावना का उदाहरण जिला रोपड़ में मुस्लिम महिला के नाम पर निर्मित गुरुद्वारा मुमताजगढ़ साहिब भी है।

जब सिख श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी को पढ़ता है, तो उसमें यह संदेश स्पष्ट रूप से अंकित है—

सभु को मीतु हम आपन कीना हम सभना के साजन॥ (अंग क्रमांक 671)
अर्थात—मैंने सभी को अपना मित्र बना लिया है और मैं सबका सज्जन मित्र बन गया हूँ।

ना को बैरी नही बिगाना सगल संगि हम कउ बनि आई॥ (अंग क्रमांक 1299)
अर्थात—न कोई शत्रु है, न कोई पराया; मेरा सबके साथ प्रेम बन गया है।

ये साँझीवालता के संदेश हमें गुरुओं से प्राप्त हुए हैं। आज इस दीवान हाल में, जहाँ सिखी की बात होती है और दीवान सजाए जाते हैं, वहीं उतने ही आदर और सम्मान के साथ नवाब सैफुद्दीन को भी स्मरण किया जाता है।

आओ संगत जी, अब हम इस ऐतिहासिक दीवान हाल के दर्शन करें।

पार्श्व-गायन: गुरु चरित्र की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन पृष्ठभूमि में निरंतर प्रवाहित हो रही है। 

डॉ. खोजी संगत जी को संबोधित करते हुए कहते हैं—धन्य – धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के इस पावन स्थान पर हम खड़े होकर दर्शन कर रहे हैं। इस ओर सरोवर साहिब है और इसी स्थान पर नवाब सैफुद्दीन का बाग हुआ करता था। डॉ. खोजी आगे संगत को इतिहास की एक और कड़ी से जोड़ते हैं और कहते हैं कि हम गुरबाणी में पढ़ते हैं—

जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरू सो थानु सुहावा राम राजे॥ (अंग क्रमांक 1299)
अर्थात—जहाँ भी जाकर मेरा सच्चा गुरु विराजमान होता है, वह स्थान अति सुन्दर है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि जिस बाग को धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अपनी चरण-छाया और शुभ उपस्थिति से भाग्य लगाया, उसी बाग में सन 2011 में एक विशेष उपक्रम / उपराला किया गया। इस गुरुद्वारा साहिब की भूमि पर—जो कि तकरीबन 500 घुमाऊं जमीन महाराज कर्म सिंह जी ने इस स्थान के नाम पर अर्पित की थी, इस ही स्थान पर एक सुंदर एवं विलोभनीय संस्था का निर्माण करवाया गया।

सन 2011 ई. में गुरुद्वारा साहिब के समीप यह महलनुमा भवन, जिसे आप स्क्रीन पर लाल रंग की इमारत के रूप में देख रहे हैं, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन है। इसी इमारत में “पंथ रत्न जत्थेदार गुरचरण सिंह तोहरा इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज इन सिख धर्म” नामक संस्था सिख विद्यार्थियों की उच्च शिक्षा-दीक्षा के लिए सुशोभित है। इस संस्था में सिख धर्म के युवाओं के भविष्य को उज्जवल बनाया जाता है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि जिस बाग में धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने बूटे / पौधे रोपित किए थे, आज उसी स्थान पर सिक्खी के बूटे / पौधे प्रफुल्लित हो रहे हैं। आओ, हम चलते हैं इस महान संस्था की जानकारी प्राप्त करने— यह वह संस्था है, जहाँ सिक्खी के बूटे / पौधे लगाए जा रहे हैं।

पार्श्व-गायन: शहीदी भाव को स्पर्श करता संगीत, कथा के प्रभाव को और गहन बना रहा है।

अब संस्था प्रमुख अपना कथन प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के चरण-कमल से स्पर्शित इस बहादुरगढ़ की भूमि पर यह संस्था सुशोभित है। इस पावन सरजमीं पर सन 2011 ई. में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा “पंथ रत्न जत्थेदार गुरचरण सिंह तोहड़ा इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज इन सिख धर्म” नामक इस संस्था की स्थापना की गई। यह संस्था अत्यंत सुंदर, आलीशान और विलोभनीय इमारत में सुशोभित है।

संस्था प्रमुख बताते हैं कि इस इमारत में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से अपने गुरुद्वारों को सुचारू रूप से चलाने हेतु “गुरुद्वारा मैनेजमेंट” नामक तीन वर्ष का एक कोर्स प्रारंभ किया गया है। साथ ही सिख धर्म पर आधारित दो एडवांस कोर्स भी विद्यार्थियों को करवाए जा रहे हैं। इस संस्था की एफीलिएशन श्री गुरु ग्रंथ साहिब यूनिवर्सिटी के साथ है।

संस्था प्रमुख आगे बताते हैं कि इस संस्था में करीब 90 विद्यार्थी इन कोर्सों की विद्या प्राप्त कर रहे हैं। यह एक निवासी संस्था है, जिसमें विद्यार्थियों की अकादमिक पढ़ाई के साथ-साथ उनके जीवन में गुरमत व्यवहार, नितनेम, गुरुद्वारा मैनेजमेंट आदि से संबंधित सभी शिक्षाएँ उन्हें प्रायोगिक रूप में सिखाई जाती हैं।

वे यह भी बताते हैं कि इसके अतिरिक्त, इस संस्था में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की ओर से “सिख स्रोत ऐतिहासिक ग्रंथ संपादन” नामक एक प्रोजेक्ट भी चलाया जा रहा है। इसके संस्थापक डॉ. कृपाल सिंह जी (चंडीगढ़ वाले) थे। उनकी रहनुमाई में इस संस्था में गुरु प्रताप सूरज ग्रंथ को दोबारा संपादित करने का प्रोजेक्ट शुरू किया गया। इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत अभी तक 24 पोथियों को प्रकाशित कर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा संगत में बांटी जा चुकी हैं।

संस्था प्रमुख कहते हैं कि यहाँ विद्यार्थी जहाँ प्रायोगिक रूप से विद्या प्राप्त कर रहे हैं, वहीं गुरमत के अनुसार अपना जीवन भी सफल कर रहे हैं। इस संस्था से शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये नौजवान विभिन्न स्थानों पर जाकर गुरुद्वारों में, विद्यालयों में, विश्वविद्यालयों में उत्तम सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं और साथ ही उच्च शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं। विद्यार्थी इसी परिसर में निवास कर विद्या प्राप्त करते हैं और गुरमत जीवन की शिक्षा भी उन्हें दी जाती है।

संस्था प्रमुख बताते हैं कि इस संस्था में 40 अध्यापक / स्कॉलर तथा संपूर्ण स्टाफ है, जो विद्यार्थियों की सेवाओं से जुड़ा रहता है और ग्रंथ संपादन प्रोजेक्ट में भी अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की इस सरजमीं पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अंतर्गत यह विद्या का मंदिर उसारा / निर्मित किया गया है, ताकि विद्यार्थी विद्या प्राप्त कर गुरमत अनुसार जीवन यापन करें और कौम को उत्तम सेवाएँ दे सकें, यही इस संस्था का प्रयास है।

संस्था प्रमुख आगे यह भी बताते हैं कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन वर्तमान समय में 85 विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और अस्पताल अपनी उत्तम सेवाएँ दे रहे हैं। इन सभी संस्थाओं का एक सामूहिक कार्यालय भी इसी संस्था में सुशोभित है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि उन्हें भी इस स्थान पर सेमिनार करने का अवसर मिला और विद्यार्थियों से मिलकर अपने विचार रखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

संस्था प्रमुख डॉ. खोजी की सेवा का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि वे हैरान होते हैं कि किताबों में कुछ और लिखा है, जबकि बहुत-सा इतिहास किताबों से प्राप्त ही नहीं होता। ऐसे में डॉ. खोजी पता नहीं कहाँ-कहाँ से ऐतिहासिक तथ्यों को खोजकर, निकालकर, इतिहास को संगत के सामने रखते हैं। यह अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। वे कहते हैं कि इस क्षेत्र में किसी ने भी ऐसा कार्य नहीं किया। थोड़ी-बहुत जानकारी उन्हें सूरज प्रकाश नामक ग्रंथ (लेखक कवि संतोक सिंह) से मिलती है; उसके बाद शेष इतिहास डॉ. खोजी ने पंथ के सम्मुख प्रस्तुत किया है। वे इसे कौम की बहुत बड़ी सेवा मानते हैं और कहते हैं कि इन सेवाओं से हमें एक बड़ा खजाना प्राप्त हो रहा है और हम जीवन में इनसे बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

डॉ. खोजी संगत जी से कहते हैं कि अब हम वापस चलते हैं गुरुद्वारा साहिब के इतिहास की ओर। वे बताते हैं कि पहली बार जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी मालवा रटन / देशाटन के समय अपने 300 सिखों के साथ, रबाबियों के साथ, भाई नाथूराम जी जैसे रबाबी सिखों के साथ इस स्थान पर आए, तो गुरु साहिब जी बार – बार यहाँ आकर डेरा लगाते रहे। उस समय इस स्थान का प्रशासक नवाब सैफुद्दीन था।

डॉ. खोजी बताते हैं कि नवाब सैफुद्दीन उस समय के बादशाह औरंगज़ेब का धर्म भाई बना हुआ था और रिश्ते में वह शाहजहाँ का साडू था। वह तरबीयत खान के सुपुत्र थे—नवाब सैफुद्दीन अर्थात सैफ खान। उस समय वे कश्मीर के गवर्नर भी थे। डॉ. खोजी कहते हैं कि यह एक रब का बंदा था।

डॉ. खोजी आगे कहते हैं कि आज भी जो रब के बंदे ऊँचे पदों पर नौकरी करते हैं, जब उन्हें कोई गलत बात लगती है और वे उसका विरोध करते हैं, तो कई बार ऐसे लोगों की बदली कर दी जाती है। संभव है कि उस समय नवाब सैफ खान औरंगज़ेब की राह का रोड़ा बन रहा हो, इसलिए उसे पंजाब के इस इलाके / खीते में 12 पिंड / नगर का प्रशासक बनाकर इस क्षेत्र में भेज दिया गया हो।

डॉ. खोजी कहते हैं कि रब के साथ जुड़े व्यक्ति को रब की भावना के साथ जुड़े व्यक्ति ही मिल जाते हैं—जैसे राही को राही मिलता है, उड़ते हुए पक्षी को उड़ता हुआ पक्षी मिलता है। इसी स्थान पर—जहाँ आप यह किला देख रहे हैं—पीर मूसा रोपड़ी के साथ गुरु साहिब जी की मुलाकात हुई थी। पीर भीकण शाह (ठसका निवासी) का भी सैफ खान मुरीद था। ये दोनों हाणी / समकालीन थे।

डॉ. खोजी पुनः पीर मूसा रोपड़ी का प्रसंग जोड़ते हैं और बताते हैं कि एक बार पीर मूसा रोपड़ी श्री आनंदपुर साहिब / चक नानकी पहुँचे। उन्होंने धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से प्रश्न किया कि आप पीर-फकीर होकर, रब के बंदे होकर, इतने बड़े – बड़े महल किसके लिए उसार / निर्माण कर रहे हो?

श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने वचन किए कि—पीर जी, आज के दिवस इस स्थान पर विश्राम करके देखो। पीर जी एक दिन वहाँ रुके और उन्होंने देखा कि श्री आनंदपुर साहिब / चक नानकी में अमृतवेले (ब्रह्म मुहूर्त) लोग उठकर रब के साथ जुड़ रहे हैं, घर-घर में रब की बात हो रही है, शाम को रहिरास साहिब का पाठ हो रहा है, गृहस्थ जीवन इतना ऊँचा और सुच्चा (पवित्र) है। यह देखकर पीर मूसा रोपड़ी गुरु साहिब पर बलिहारी हो गए और वचन किए कि—गुरु पातशाह जी, मेरा भ्रम / भलेखा दूर हो गया।

डॉ. खोजी बताते हैं कि पीर मूसा रोपड़ी इस नगर में आता-जाता रहता था। जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से उसका वार्तालाप होता और वह कहता कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी रब के साथ जुड़े हुए भले और नेक महापुरुष हैं, जो गृहस्थ जीवन में रहने वाले लोगों को भी ऊँची पदवियाँ प्रदान कर रहे हैं—तो उसके हृदय में भी भावना जागृत हुई और वह विचार करने लगा कि कब उसे श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के दर्शन होंगे?

डॉ. खोजी बताते हैं कि पीर मूसा रोपड़ी जी का इतिहास मालवा रटन / देशाटन के समय हम पिछले प्रसंग में संगत को बता चुके हैं। इस प्रसंग / लड़ी को भी आप अवश्य देख सकते हैं।

डॉ. खोजी आगे बताते हैं कि जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी पहली बार माता गुजरी जी और गुरु सिखों के साथ इस स्थान पर पधारे थे, तब यहाँ पंचवटी थी, पंचवटी बाग था। जहाँ आज तोहरा इंस्टिट्यूट बना हुआ है, यह संपूर्ण इलाका पंचवटी बाग कहलाता था।

गुरुद्वारा साहिब के भीतर जो पावन स्थान मौजूद है, जहाँ थड़ा / चबूतरा बना हुआ है—उसी थड़े पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश होता है, और उसी थड़े पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी विराजमान हुए थे। साथ ही एक कुआँ भी है, जिसका उल्लेख हम कर चुके हैं। वह कुआँ इस स्थान पर दाहिने हाथ की ओर था, जिसे बंद कर दिया गया। थोड़ी – बहुत उस कुएँ की कोई जगह हो सकती है, और हाँ—बाहर – बाहर गुरुद्वारा साहिब के कुएँ की जगह मौजूद है।

भाई अवतार सिंह जी बताते हैं कि यह छोटा कुआँ (कुई) जब बाबा जी की स्मृति में यह स्थान निर्मित हुआ, तब उसी समय इस कुएँ का भी निर्माण किया गया था। उस समय पानी का स्तर बहुत ऊपर हुआ करता था। इस कुएँ का जल दूर-दूर से आकर संगत ग्रहण करती थी।

डॉ. खोजी कहते हैं कि भले ही आज इस कुएँ का पानी नीचे की ओर चला गया है, परंतु कितने ही पक्षी जब इस बाग में आकर कलरव करते हैं, आवाजें देते हैं, तो वे इस कुएँ पर आकर जल पीकर चले जाते हैं। आओ, हम अरदास करें कि- एक दिन ऐसा अवश्य आए कि पंजाब में गुरु साहिब के कर-कमलों से जुड़े हुए जो पुरातन कुएँ हैं, वे फिर से पुनः कार्यरत हो जाएँ, उनमें फिर से जल लबालब भर जाए। वाहिगुरु जी छेती / जल्दी ही वह दिन दिखाएँ।

डॉ. खोजी कहते हैं कि पंजाब में पानी का स्तर नीचे की ओर जा रहा है, इस विषय में भी अरदास करें। वे गुरबाणी का संदर्भ जोड़ते हुए कहते हैं—

दुध बिनु धेनु पंख बिनु पंखी जल बिनु उतभुज कामि नाही॥ (अंग क्रमांक 1299)

अर्थात—हे प्रभु! दूध के बिना गाय, पंखों के बिना पक्षी एवं जल के बिना वनस्पति किसी काम की नहीं।

डॉ. खोजी कहते हैं कि अरदास करना कि पंजाब के पानी को बचाया जाए। जैसे गुरु साहिब ने कुएँ लगवाए थे, वैसे ही उनके द्वारा निर्मित कुओं की भी हमें आज सेवा-संभाल करनी चाहिए। उस समय गुरुद्वारा साहिब की हदूद / परिसर में एक पुरातन कुआँ भी मौजूद था, परंतु पुराने स्थान को तोड़कर समाप्त करते हुए उस कुएँ को भी जमीन में दफ़न कर दिया गया। जो आज मौजूद हैं, उन्हें बचाने की आवश्यकता है।

डॉ. खोजी आगे प्रसंग जोड़ते हैं कि उस समय जब श्री गुरु तेग बहादुर जी के संबंध में सैफुद्दीन को पता चला, तो वह दौड़ता हुआ उनके पास आया और उसने धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को घोड़े से उतरने ही नहीं दिया। उसने धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को घोड़े पर ही बैठाकर विनंती की और महलों की ओर, अर्थात अपनी हवेली में लेकर गया। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने इसी हवेली में रात्रि विश्राम किया था।

जब अमृतवेले (ब्रह्म मुहूर्त) में धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी जागते हैं, तो बाहर आकर देखते हैं कि सामने अल्लाह का घर—अर्थात एक मस्जिद बनी हुई है। आप जी, मस्जिद के दर्शन करो जी—

पार्श्व-गायन: स्थान के गौरव को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि यह मस्जिद धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के समय की बनी हुई है। उस समय गुरु साहिब ने वचन किए—सैफुद्दीन, जब रब का घर इतना पास था, यह मस्जिद इतनी पास थी, तो आप हमें महलों में क्यों लेकर आए? हमें इसी जगह ठहरा देते, तो हम यहीं विश्राम कर लेते।

डॉ. खोजी कहते हैं- कमाल की बात है कि इतना प्रेम! निश्चित ही धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का किसी मुसलमान से, किसी धर्म से कोई भेदभाव नहीं था। मेरा पातशाह धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी- कहीं हिंदुओं के लिए शीश देने गए—और वे किसी से भी कोई भेदभाव नहीं करते थे। इन वचनों से सैफुद्दीन गुरु साहिब से और भी प्रभावित हो गया था।

डॉ. खोजी बताते हैं कि उस समय श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस स्थान पर निवास करते हुए पटियाला भी गए थे। आप भी दर्शन कर रहे हो—गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब जी। पर यह घटना उस समय की है जब आप मालवा रटन / देशाटन कर रहे थे और धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने इस स्थान पर कुछ दिन निवास किया था।

डॉ. खोजी कहते हैं कि जब गुरु साहिब इस स्थान से आगे की ओर यात्रा प्रारंभ करते हैं, तो सैफुद्दीन और उनकी रानियों द्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहब जी को अनेक प्रकार के उपहार भेंट किए गए। उसी समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को ‘श्रीधर’ नामक घोड़ा भी भेंट किया गया। इतिहास में जिक्र आता है कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने पूरा मालवा रटन / देशाटन ‘श्रीधर’ नामक इसी घोड़े की सवारी पर किया था।

डॉ. खोजी आगे बताते हैं कि जब धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी असम की यात्रा पर जा रहे थे, तो उन्होंने बनारस में विश्राम किया था। इस बनारस शहर में उनकी स्मृति में एक गुरुद्वारा साहिब सुशोभित है। उस स्थान पर एक कुई / छोटा कुआँ भी बना हुआ है, साथ ही महाराज जी का चोला भी सुशोभित है। इस स्थान पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी के जोड़े (पादुकाएँ) भी सुशोभित हैं और अनेक पुरातन निशानियाँ आज भी वहाँ मौजूद हैं। आज भी उस स्थान पर कुई (छोटा कुआँ) विद्यमान है।

डॉ. खोजी बताते हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का घोड़ा बनारस में बीमार हो गया था और गुरु साहिब अपनी यात्राओं को जारी रखते हुए पटना पहुँच गए थे। पटना पहुँचकर गुरु साहिब इतने व्याकुल हो गए कि उन्होंने अपने घोड़े ‘श्रीधर’ के लिए एक विशेष हुकुमनामा भाई जव्हेरी जी के नाम लिखकर भेजा। उस हुकुमनामा में लिखा था कि भाई जव्हेरी मल जी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है—
सरबत संगत गुरु रखेगा, श्रीधर की संगत सेवा करना, अलुफा अर्थात (दवाई या जड़ी बूटियां) श्री जित्त वेला चंगा होगा तां पटने पहुंचाई देना, संगत का भला होवेगा।”

डॉ. खोजी बताते हैं कि गुरुद्वारा बड़ी संगत, बनारस में यह हुकुमनामा मौजूद है। उस समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस स्थान पर आकर रुके थे।

इसके बाद डॉ. खोजी कहते हैं कि अब हम किले के अंदर गए। वे यह भी बताते हैं कि इस किले में जाने के लिए प्रशासन की इजाजत लेनी पड़ती है और वीडियो बनाने की भी अनुमति लेनी पड़ती है। वे उन सिखों का धन्यवाद करते हैं जिन्होंने इतिहास के वीडियो बनाने के लिए प्रशासन से अनुमति प्राप्त करवाई।

डॉ. खोजी बताते हैं कि मुख्य द्वार से होकर तीन बड़े द्वार पार करते हुए किले के भीतर स्थित गुरुद्वारा साहिब तक पहुँचा जा सकता है। जब हम किले के द्वार से होकर सामने गुरुद्वारा साहिब में पहुँचते हैं, तो इस गुरुद्वारे का हवाई दृश्य अत्यंत विलोभनीय प्रतीत होता है। यह गुरुद्वारा साहिब किले के अंदर सुशोभित है।

इस गुरुद्वारा साहिब में एक चबूतरा / थड़ा भी मौजूद है। आप जिस थड़े के दर्शन कर रहे हैं, वहाँ लगी पुरानी ईंटों को आप स्पर्श भी कर सकते हैं। उन ईंटों से निकली मिट्टी को माथे पर भी लगा सकते हैं। इसी पुराने थड़े पर श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी आकर विराजमान हुए थे। साथ ही इस स्थान पर एक पुरातन कुआँ भी मौजूद है, जिसकी उत्तम सेवा – संभाल वर्तमान समय में की जा रही है। इस कुएँ के ऊपर गुरुद्वारा साहिब जी का भवन निर्मित है।

पार्श्व-गायन: गुरमत-भावना से ओतप्रोत एक पावन संगीत, जो साँझीवालता के वातावरण को दिव्यता से भर रहा है।

डॉ. खोजी कहते हैं कि बिल्कुल गुरुद्वारा साहिब के अंदर जब हम प्रवेश करेंगे, तो इस स्थान पर एक मस्जिद भी बनी हुई है। आप जी, मैं कहूँगा—दर्शन कर रहे हो। हमारे लिए मंदिर, शिवालय, रब का घर—सभी पूजनीय हैं; हम इन सभी धार्मिक स्थलों का सत्कार करते हैं। आप जी दर्शन कर रहे हो उस मस्जिद के, जहाँ गुरु साहिब ने वचन कर कहा था कि- मैं भी रात को इसी स्थान पर विश्राम कर लेता।

पार्श्व-गायन: समय की अनगिनत आवाज़ों को पीछे छोड़ती धीमी तान, इतिहास की गूंज को जागृत करती है।

डॉ. खोजी बताते हैं कि इस किले के इतिहास के अनुसार सन 1762 ई. में पटियाला स्टेट का निर्माण हुआ था। महाराज कर्म सिंह जी ने इस स्थान सैफाबाद का नाम बदलकर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के पावन नाम पर बहादुरगढ़ रखा। सन 1904 ई. में फुलकिया रियासत के गजट (नोटिफिकेशन) में भी इस नाम का उल्लेख मिलता है। उस समय के विवरणों के अनुसार, लगभग 10 लाख रुपये की लागत और आठ वर्षों के निरंतर निर्माण कार्य के पश्चात इस किले का निर्माण संपन्न हुआ।

किले की बाहरी दीवार लगभग 29 फीट ऊँची है, जबकि भीतर की दीवारें लगभग 60 फीट ऊँचाई तक जाती हैं। हवाई अवलोकन से यह भी स्पष्ट होता है कि किले के चारों ओर बनी खाई लगभग 25 फीट गहरी और 50 फीट चौड़ी है। इस किले को ‘सर’ करना—अर्थात जीतना—और इसे पार करना, दोनों ही अत्यंत कठिन कार्य रहे हैं। लगभग 55 एकड़ में फैला यह किला अपने आप में एक दुर्जेय संरचना है।

सन 1947 ई. के पश्चात यह किला भारत सरकार, अर्थात पंजाब सरकार के अधीन आ गया। वर्तमान समय में इस किले में कमांडो प्रशिक्षण दिया जाता है और अब तक अनेक कमांडो यहाँ से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। प्रशासन की अनुमति के बिना इस किले में प्रवेश संभव नहीं है। टीम खोज–विचार का यह कर्तव्य रहा कि वह इस इतिहास को आपके समक्ष प्रस्तुत करे और उसी के साथ आप गुरु घर के दर्शन भी कर रहे हैं।

जहाँ आप गुरु घर के दर्शन कर रहे हैं, वहीं रोज़ा शरीफ के भी दर्शन होते हैं। इसी किले के भीतर सैफुद्दीन का परिवार आज भी दफ़न है। यह इतिहास प्रेम और साँझीवालता का सशक्त साक्ष्य प्रस्तुत करता है।

डॉ. खोजी बताते हैं कि आज भी सैफुद्दीन का परिवार श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के आगमन के इतिहास की गवाही दे रहा है। सामने दिखाई दे रही कब्र बाबा सैफुद्दीन के पिता की है।

डॉ. खोजी प्रश्न करते हैं- यह कौन-सा स्थान है?
स्थानीय भाईजान उत्तर देते हैं- यह बाबा रोशन शाह जी की कब्र है, जो बाबा सैफुद्दीन के भांजे की जगह है।

डॉ. खोजी फिर पूछते हैं- यह कब्र किसकी है?
स्थानीय भाईजान कहते हैं- यह बाबा सैफुद्दीन की माता जी की कब्र है।

डॉ. खोजी इस अवसर पर एक महत्वपूर्ण बात रेखांकित करते हैं कि पंजाब की धरती पर कहीं भी भेदभाव नहीं किया जाता। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी—जो रब की दरगाह के सच्चे बंदे थे, ला इलाहा इल्लल्लाहु मोहम्मदु रसूल अल्लाह 

لَا إِلٰهَ إِلَّا مُحَمَّدٌ رَسُولُ اللّٰهِ

अर्थात उसके रसूल पर चलने वाले है, वह कभी किसी धर्म को माड़ा / बुरा नहीं कहते है| 

डॉ. खोजी कहते हैं कि रोज़ा शरीफ परिसर के भीतर, विशेष रूप से हिंदू भाइयों के लिए भी यह संदेश स्पष्ट है कि हमारा आपसी प्रेम कितना गहरा है। इसी परिसर में हिंदुओं का एक धूना बना हुआ है, जिस पर त्रिशूल भी सुशोभित है और यह सब मस्जिद के भीतर स्थित है। कहीं कोई भेदभाव नहीं यह पंजाब है और यही पंजाबियत है।

आगे बढ़ते हुए, इस स्थान पर सैफुद्दीन के संपूर्ण परिवार- रिश्तेदार, मामे, भांजे, चाचा, ताया, भतीजे—सभी यहीं दफ़न हैं। 350 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह स्थान इतिहास की गवाही देते हुए प्रेम का संदेश देता है।

डॉ. खोजी बताते हैं कि सामने जो मस्जिद दिखाई दे रही है, वह एक पुरातन मस्जिद है। जनाज़े की नमाज़ इसी मस्जिद में अदा की जाती थी। यह मस्जिद छोटी ईंटों से निर्मित है और आज भी सहेजकर रखी गई है- इतिहास की जीवंत गवाही के रूप में। उनके पीछे दिखाई देती पुरातन इमारत आज भी सुरक्षित है।

डॉ. खोजी बताते हैं कि जब धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी शहीद हुए और उनका शीश धड़ से जुदा हुआ, उस दिन पूरी दुनिया में केवल एक व्यक्ति ऐसा था जिसने काले वस्त्र धारण कर इस घटना पर अपना गहरा शोक व्यक्त किया और वह थे नवाब सैफुद्दीन, बाबा सैफुद्दीन। उन्होंने कहा था- औरंगज़ेब, तुमने बहुत माड़ा / बुरा किया; रब के भले बंदे को तुमने शहीद किया। यही वह स्थान है, जहाँ यह इतिहास साक्षात खड़ा है।

जब आप पटियाला आते हैं, तो पास ही बहादुरगढ़ किले के भीतर यह गुरुद्वारा साहिब भी दिखाई देता है और उसी के भीतर वह मस्जिद भी स्थित है, जिसके बारे में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने वचन किए थे कि- यदि रब का घर इतना पास था, तो मुझे महलों में ठहराने की आवश्यकता नहीं थी।

इस स्थान पर श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी की एक पुरातन तस्वीर भी सुशोभित है। अब हम स्थानीय भाईजान से भी दो शब्द सुनते हैं।

डॉ. खोजी पूछते हैं—आपका शुभ नाम क्या है?
स्थानीय भाईजान उत्तर देते हैं- मेरा नाम सरदार अली साबरी है।

सरदार अली साबरी जी बताते हैं कि इस स्थान पर बाबा सैफुद्दीन साहिब जी का मकबरा बना हुआ है। इंतकाल के पश्चात उनके परिवार के सभी सदस्यों के मकबरे इसी स्थान पर बने हुए हैं। यह वही स्थान है, जिसे हम कब्रिस्तान कहते हैं।

डॉ. खोजी कहते हैं कि सन 1947 के विभाजन के बाद उनकी टीम ने खोज कर भाई मति दास जी के परिवार, भाई दयाला जी के परिवार और श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी द्वारा मनोनीत जत्थेदार परिवार- गलौरा परिवार के भाई बाबूराम जी को भी खोज निकाला। संभव है कि बाबा सैफुद्दीन का परिवार 1947 के बाद पाकिस्तान में कहीं निवास करता हो। यदि इस परिवार के सदस्य यह वीडियो देखें, तो रोज़ा शरीफ में चल रहे लंगर और यहाँ अंकित संपर्क विवरण के माध्यम से अवश्य संपर्क करें। वे अपने पुरखों की इस धरती पर आकर दर्शन कर सकते हैं और चरण-धूलि को माथे पर लगा सकते हैं।

डॉ. खोजी बताते हैं कि जिस स्थान पर हम खड़े हैं, उसके ठीक ऊपर बाबा सैफुद्दीन का मकबरा है और नीचे उनकी स्मृति में एक पलंग सुशोभित है। यहाँ आकर हम उन बाबा सैफुद्दीन की रूहानी उपस्थिति को महसूस कर सकते हैं, जो अल्लाह की बंदगी करने वाले थे। अब हम उस भौरें (तलघर) के भीतर बने कमरे के भी दर्शन करते हैं।

पार्श्व-गायन: गुरमत-भावना से ओतप्रोत पावन संगीत, जो साँझीवालता के वातावरण को दिव्यता से भर रहा है।

सरदार अली साबरी जी- बड़े प्यार और श्रद्धा से कुरान की निम्नलिखित आयात का पाठ करते है-

بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ

الْحَمْدُ لِلّٰهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ

الرَّحْمٰنِ الرَّحِيمِ

مَالِكِ يَوْمِ الدِّينِ

إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ

اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ

صِرَاطَ الَّذِينَ أَنْعَمْتَ عَلَيْهِمْ غَيْرِ الْمَغْضُوبِ عَلَيْهِمْ وَلَا الضَّالِّينَ

(विशेष: सूरह अल-फ़ातिहा (سورة الفاتحة) कुरान मजीद की पहली सूरह है और इसे कुरान का ‘मुकद्दमा’ (प्रस्तावना) भी कहा जाता है। यह मक्की सूरह है और इसमें कुल 7 आयतें हैं। इसे ‘उम्म-उल-किताब’ (किताब की माँ) भी कहा जाता है क्योंकि यह संपूर्ण कुरान का सारांश प्रस्तुत करती है। सूरह फातिहा को इस्लाम में विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि यह हर नमाज़ (सलात) में पढ़ी जाती है और इसे दुआ और इबादत का सबसे अहम हिस्सा माना गया है। इसके साथ ही, यह सूरह अल्लाह की महानता, रहमत, और इंसान की जरूरतों को बयान करती है।)

डॉ. खोजी कहते हैं—अब हम अगले इतिहास की ओर बढ़ते हैं, जहाँ आप रोज़ा शरीफ के भी दर्शन कर रहे हैं और साथ ही गुरुद्वारा साहिब के भी। बाबा सैफुद्दीन का परिवार आज जिस स्थान पर दफ़न है, वह इतिहास प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है।

पार्श्व-गायन: पृष्ठभूमि में बहती सुर-लहरी, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की शहादत की स्मृति को जीवंत कर रही है।

डॉ. खोजी समापन करते हुए कहते हैं कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ननहेड़ी से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित बहादुरगढ़ आए और बहादुरगढ़ से मुड़कर बाबा सैफुद्दीन के पास रुके। इस स्थान से आगे, उस समय के पटियाला (जो तब शहर नहीं था) के इतिहास को जानेंगे। पटियाला को पार कर हम गुरुद्वारा मोती बाग साहिब के पुरातन स्थान के दर्शन करेंगे और आगे के इतिहास की ओर बढ़ेंगे।

जुड़े रहना… चलते रहना… इस इतिहास के साथ-साथ।

पार्श्व-गायन: समय की अनगिनत आवाज़ों को पीछे छोड़ती धीमी तान, इतिहास की गूंज को जागृत करती है।

इतिहास के पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं। 

संगत जी से विनम्र निवेदन

इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सबमें बहुत बड़ा व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक को, यह शहीदी मार्ग प्रसंग को और आगे आने वाले सभी ऐतिहासिक प्रयासों को अपना सहयोग देना चाहें, तो- मोबाइल क्रमांक- 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इस इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक होगा।

वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरू जी की फतेह! 

आपका अपना वीर इतिहासकार- डॉक्टर भगवान सिंह खोजी

नोट: आलेख में प्रकाशित कुरान शरीफ की आयत की जानकारी मेरे सहपाठी मोहम्मद जावेद कुरैशी (निवासी: उज्जैन मध्य प्रदेश) से प्राप्त हुई है।


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