प्रसंग क्रमांक 10: दो श्रद्धालु सिखों के नाम पर एक ही नगर / पिंड – दोनों ही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के मुरीद
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)
पार्श्व गायन: गुरु चरित्र की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन प्रवाहित है।
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह! आज पुनः एक भाग्यकारी दिवस का उदय हुआ है। हम उस भू-भाग पर खड़े हैं जहाँ पंजाब की स्थानीय बोलियाँ अपने विशिष्ट स्वरों के साथ जीवित इतिहास का रूप धारण करती हैं। यह स्थान है, हसनपुर-कबूलपुर, जो पुआदकी इलाके के अंतर्गत आता है। पुआदकी बोली की विशेषता यह है कि यहाँ ‘दा’ के स्थान पर ‘का’ शब्द का उच्चारण प्रचलित है। गुरु-परंपरा के वचनों में ‘आनंदपुर म्हारा गांव’ की ध्वनि आज भी इसी लोकबोली में प्रतिध्वनित होती प्रतीत होती है। चक नानकी को श्री आनंदपुर के नाम से प्रतिष्ठित कर देने के पश्चात् यह अनुभूति और भी गहरी हो जाती है| संसार का प्रत्येक सिख श्री आनंदपुर साहिब का वासी है। इसी पुआदकी बोली में, इसी आत्मीयता के साथ, एक सिख दूसरे सिख से मिलता है और कह उठता है- वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह!
आज टीम खोज-विचार हसनपुर-कबूलपुर के खेतों के मध्य खड़ी है। पंजाब की यही विशेषता है कि कुछ कोस की दूरी पर बोली और भाषा बदल जाती है और प्रत्येक बोली अपने साथ संस्कृति, स्मृति और इतिहास का एक स्वतंत्र संसार लेकर चलती है। हम जिस क्षेत्र में उपस्थित हैं, वह पुआदकी इलाका है। हमारे साथ इस गांव के फौजी साहिब तथा सरदार भाग सिंह जी खड़े हैं। हमारे पीछे स्क्रीन पर घास से बने दो बुर्ज दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें बच्चे टावर कह सकते हैं, परंतु पंजाबी में इन्हें ‘कूप’ कहा जाता है, इस ‘कूप’ में अनाज को सुरक्षित रखा जाता है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के मार्ग पर यह सफ़र निरंतर आगे बढ़ रहा है; अब हम स्थानीय नागरिकों से रूबरू होंगे और उनके स्मृति पटल में संचित इतिहास को सुनेंगे।
इतिहास के संवाद की इस कड़ी में यह जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक है कि आज, सन 2025 में, इस स्थान पर सिक्खी का प्रचार-प्रसार किस स्तर तक है और कितने बच्चे सिक्खी से जुड़े हुए हैं? इसी उद्देश्य से पुआदकी बोली में गांव के फौजी साहिब से संवाद होता है। वह बताते हैं कि यह पुआदकी इलाका है और इसके अंतर्गत हसनपुर-कबूलपुर, सनाहरसी, बरतापुर, सिंबू, हलाणा, छोटी कामी, बड़ी कामी, चमारू, झंडमगोली, उण्डसर और लोह-सिमली जैसे गांव आते हैं। उनके अनुसार इसी क्षेत्र में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने रात्रि-विश्राम किया था और आज भी यहाँ सिक्खी का व्यापक प्रचार है; अमृत-संचार निरंतर होता रहता है। सरदार भाग सिंह जी भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए बताते हैं कि यह हसनपुर-कबूलपुर का पुआदकी इलाका है और गुरु महाराज ने रात्रि में इसी धरती को अपने चरणों से पावन किया था।
अब हम इस नगर-पिंड में प्रवेश करते हैं और इसके इतिहास को स्थानीय निवासियों की वाणी में सुनने का संकल्प लेते हैं। इस पिंड की वह कौन-सी मनोत है जो इसे श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से जोड़ती है? क्या इस इतिहास के अतिरिक्त भी ऐसी घटनाएँ हैं जो गुरु-इतिहास की निरंतरता में यहाँ घटित हुईं? इन्हीं प्रश्नों के साथ यह यात्रा आगे बढ़ती है- इस शहीदी मार्ग पर, उन राहों पर जिनसे होकर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी दिल्ली में शहादत देने के लिए गए थे। प्रत्येक वह नगर, प्रत्येक वह पगडंडी, इस यात्रा का साक्ष्य बनेगी।
इतिहास की दृष्टि से जब हम गुरुद्वारा साहिब की ओर देखते हैं, तो उसकी दीवार पर प्रमुखता से लगी तख्ती/बोर्ड ध्यान आकृष्ट करता है। बाहर की ओर एक ज्योत निरंतर प्रज्वलित है और भीतर गुरुद्वारा साहिब का शांत, पवित्र वातावरण विराजमान है। इसकी इमारत आज भी पुरातन स्वरूप को सहेजे हुए है। इस समय गांव की माताएँ और बहनें सुखमनी साहिब का पाठ कर रही हैं। परिक्रमा के पश्चात् जब पुरातन मंजी साहिब के दर्शन होते हैं, तो कांच की फ्रेम में सुशोभित हुकूमनामे तथा कुछ ताम्रपट दृष्टिगोचर होते हैं, ये ताम्रपट स्थानीय सुनार से सिखों द्वारा प्राप्त किए गए थे। इस इतिहास को भी आगे विस्तार से जाना जाएगा।
इस स्थान की एक अद्भुत विशेषता यह है कि यहाँ दो गांव / पिंड स्थित हैं, एक ओर हसनपुर और दूसरी ओर, कुछ ही कदमों की दूरी पर, कबूलपुर। सामान्यतः इस पिंड को हसनपुर-कबूलपुर कहकर ही संबोधित किया जाता है, परंतु साधारण दृष्टि से यह समझ पाना कठिन है कि गांव एक ही है और नाम दो हैं। इससे भी रोचक तथ्य यह है कि दोनों गांवों की ग्राम-पंचायतें अलग-अलग हैं। गुरुद्वारा साहिब में प्रवेश करते समय एक ओर हसनपुर और दूसरी ओर कबूलपुर लिखा दिखाई देता है, जैसे शरीर दो हों और प्राण एक। ठीक उसी प्रकार यह नगर / पिंड एक है, पर नाम दो हैं।
कहा जाता है कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने प्रेम और एकता का संदेश देते हुए दो भाइयों के नामों को एक साथ जोड़कर इस गांव का नाम रखा। अब हम कबूलपुर से कुछ कदम आगे बढ़कर हसनपुर की ओर आ जाते हैं। सामने गुरुद्वारा साहिब के दर्शन हो रहे हैं। सर्वप्रथम गुरुद्वारा साहिब जी के दर्शन किए जाते हैं।
पार्श्व गायन: धीमी तानों में तपस्या और यात्रा का निचोड़ छिपा है—स्वर आगे बढ़ते कदमों जैसे।
डॉक्टर खोजी– एक और अत्यंत विलक्षण तथा हृदय को स्पर्श करने वाली बात यह है कि गुरुद्वारा साहिब हसनपुर में स्थित है, जबकि लंगर-घर कबूलपुर में। अर्थात् गुरुद्वारा साहिब जी से लंगर ग्रहण करने के लिए संगत कबूलपुर की ओर जाती है। किंतु यह कबूलपुर कोई दूरस्थ स्थान नहीं है, बल्कि गुरुद्वारा परिसर का ही अभिन्न अंग है। हसना और कबूला, इन दो सगे भाइयों के प्रेम को श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने इस प्रकार एक सूत्र में पिरोया कि आज भी श्रद्धालु सिख गुरुद्वारा हसनपुर से चलकर लंगर ग्रहण हेतु गुरुद्वारा कबूलपुर जाते हैं और मार्ग में धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का स्मरण करते हैं।
धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी जब मालवा के प्रचार-दौरे पर थे, तब वह बहादुरगढ़ में आकर ठहरे थे। इसी क्षेत्र में, मालवा का रटन / देशाटन करते हुए, पातशाह जी इस नगर में विराजमान हुए थे। उस समय इस नगर में दो मुस्लिम भाई, हसना और कबूला निवास करते थे। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी अपने इन दोनों श्रद्धालुओं से मिलने स्वयं आए थे। इन दोनों भाइयों के समीप ही एक स्थान निर्मित है; आइए, हम उस पावन स्थल की ओर चलते हैं।
पार्श्व गायन: शहीदी भाव को स्पर्श करता संगीत, कथा के प्रभाव को और गहन बना रहा है।
डॉक्टर खोजी– अब हम इस नगर / पिंड के एक कोने पर पहुँचे हैं। समीप ही ग्राम की एक माड़ी स्थित है (पीरों, फकीरों का वह रूहानी स्थान, जहाँ साधना और स्मृति एक साथ सांस लेती प्रतीत होती हैं)। जब हम इस स्थान पर पहुँचे और द्वार खोला, तो एक विशाल हाल-नुमा कक्ष के भीतर अनेक कब्रें दृष्टिगोचर हुईं। कुछ बड़ी कब्रें उन बुजुर्गों की हैं, जिन्हें यहाँ पीर के रूप में मान्यता दी जाती है। इन्हीं कब्रों के समीप, एक कोने में हसना और कबूला, इन दोनों भाइयों की कब्रें भी बनी हुई हैं। यह दोनों भाई धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के अत्यंत प्रिय और प्रेमी सिख थे, जिन्हें स्वयं श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी मिलने आए थे।
उस समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने जो वचन उच्चारित किए, वे आज भी मानवता की आत्मा को आलोकित करते हैं-
अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभबंदे॥
एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे॥ (अंग क्रमांक 1349)
पार्श्व गायन: गुरमत-भावना से ओतप्रोत एक पावन संगीत, जो साँझीवालता के वातावरण को दिव्यता से भर रहा है।
इन वचनों से हसना और कबूला अत्यंत प्रभावित हुए। नमाज़ की चर्चा चली- ‘पंजे वकत नमाज़ गुज़ारने’ की बात आई। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने उन्हें यह समझाया कि अंतःकरण का जीवन क्या होता है, भीतर की शुद्धता और सच्ची बंदगी का स्वरूप क्या है। यही उपदेश सुनकर दोनों भाई श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के मुरीद हो गए और उनकी सेवा में जुड़कर अल्लाह की बंदगी करने लगे।
आज भी, लगभग साढ़े तीन सौ वर्ष पुराना यह इतिहास गवाही देता है कि जिन आत्माओं को श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने रब का रूहानी संदेश दिया था, वह संदेश आज भी इन दोनों भाइयों की कब्रों के माध्यम से साँझीवालता का साक्षात्कार कराता है।
पार्श्व गायन: मुस्लिम महिलाएँ ताली बजाकर रूहानी अंदाज़ में बंदगी कर रही हैं।
डॉक्टर खोजी– निस्संदेह इन दोनों भाइयों का गुरु साहिब के प्रति अत्यंत प्रेम था, एक गहरी आत्मीय मोह-डोर थी। जब बाल गोविंद राय जी अपने नौनिहाल लखनौर से इस स्थान पर आए, तब उन्हें भी इस स्थल से विशेष लगाव अनुभव हुआ। धन्य श्री गुरु गोविंद राय जी ने अपने बाल्यकाल में यहाँ आकर इस स्थान के अनेक मुसलमानों से भेंट की थी।
हम, टीम खोज-विचार, इस मार्ग पर आगे बढ़ते हुए एक महत्वपूर्ण सच्चाई को सामने लाने का प्रयास करेंगे। जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी शीश अर्पण करने के लिए इस मार्ग से जा रहे थे, तब संभव है कि कुछ मुसलमान उनके विरोधी भी रहे हों कारण गुरु साहिब हिंदू धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली जा रहे थे। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस मार्ग से गुज़रे, तब उन्होंने इस क्षेत्र की संगत से भेंट की, हसना और कबूला से मिले, बहादुरगढ़ में नवाब सैफुद्दीन से भी मिले, और गढ़ी नज़ीर के मुस्लिम राजा के यहाँ निवास किया। वह राजा भी तो मुसलमान ही था।
वास्तव में प्रश्न किसी धर्म-विरोध का नहीं है। गुरु साहिब का संदेश उससे कहीं व्यापक, कहीं ऊँचा है, एक ऐसा संदेश, जिसे इस शहीदी मार्ग पर चलते हुए हम क्रमशः आपके समक्ष रखते चलेंगे।
धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस नगर में विराजमान हुए थे; बाल गोविंद राय जी भी यहाँ पधारे थे। जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी शहीदी मार्ग पर चलते हुए अर्थात् अपना शीश अर्पण करने हेतु इस मार्ग से गुज़रे, तब वह मुकरामपुर से होते हुए इस स्थान पर पहुँचे थे। (वर्तमान समय में यह गुरुद्वारा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन है।) गुरुद्वारे की दीवार पर एक बोर्ड सुशोभित है, जिस पर इस ऐतिहासिक तथ्य का स्पष्ट उल्लेख अंकित है।
उस समय श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के समक्ष हसना और कबूला की ओर से कौन-कौन से निवेदन आए थे? उसके पश्चात यह नगर किस प्रकार से आबाद होता चला गया? इस स्थान पर सुशोभित हुकुमनामे कहाँ से प्राप्त हुए? यह भी ज्ञात हुआ है कि धन्य श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी महाराज ने नांदेड़ से कुछ सिखों को इस स्थान पर भेजकर इसे पुनः प्रकट किया था।
इन समस्त तथ्यों और स्मृतियों को हम इस नगर के बुजुर्गों से विस्तारपूर्वक जानेंगे- कारण यही जीवित इतिहास की सच्ची आवाज़ है।
स्थानीय बुजुर्ग– गुरु-प्यारी साध-संगत जियो, जो इतिहास हमें गुरु-परंपरा से प्राप्त हुआ है, उसके अनुसार इस नगर में दो शेख निवास करते थे। यह दोनों नगर के एक पीर शेख के पास सेवा करते थे। जब गुरु साहिब इस स्थान पर आकर विराजमान हुए और उन शेखों को यह ज्ञात हुआ, तो दोनों शेख गुरु साहिब के चरणों में नतमस्तक हो गए और उन्होंने गुरु साहिब की सेवा की। गुरु साहिब जी ने इस स्थान पर तीन दिनों तक निवास किया था और इन तीनों दिनों में दोनों शेखों ने पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ गुरु साहिब की सेवा की।
इन शेखों की सेवा से प्रसन्न होकर गुरु साहिब जी ने वचन किए कि भविष्य में इस नगर का नाम तुम दोनों भाइयों के नाम पर रखा जाएगा। इस स्थान पर दो नगर बसे हुए हैं और इन दोनों नगरों के मध्य केवल दस फीट का रास्ता है। एक नगर का नाम कबूलपुर है और दूसरे का नाम हसनपुर है। इन दोनों भाइयों के नाम पर ही यह नगर अस्तित्व में आया।
इसके पश्चात जब गुरु साहिब दोबारा यहाँ पधारे, तो उन्होंने हुकुमनामे इन शेखों को प्रदान किए। यह हुकुमनामे लंबे समय तक शेखों के पास ही रहे। कालांतर में, इन अनपढ़ शेखों ने हुकुमनामों को नगर के एक सुनार के पास पढ़वाने हेतु दे दिया। जब उस सुनार ने हुकुमनामे पढ़े, तो उसने शेखों से कहा कि ये तुम्हारे किसी काम के नहीं हैं, इन्हें मैं अपने पास सुरक्षित रख लेता हूँ। उस सुनार ने इन हुकुमनामों को संभालकर अपने पास सुरक्षित रखा।
बाद में जब दशम पातशाह जी ने नांदेड़ से सिखों को भेजकर इस स्थान को प्रकट करने का हुक्म दिया, तो उन सिखों ने यहाँ पहुँचकर सबसे पहले मिट्टी के एक चबूतरे का निर्माण किया और सेवा-संभाल में जुट गए। इसके पश्चात उसी नगर के उस सुनार ने हुकुमनामे सिखों के सुपुर्द कर दिए। धीरे-धीरे यहाँ एक कच्ची इमारत का निर्माण हुआ।
आगे चलकर इस स्थान पर एक निहंग सिंह ने अपनी सेवाएँ अर्पित कीं। वह निहंग सिंह महाराजा पटियाला का अत्यंत प्रिय था। महाराजा पटियाला प्रत्येक वर्ष उसी निहंग सिंह से अखंड पाठ साहिब का आयोजन करवाते थे। महाराजा पटियाला को संतान-सुख प्राप्त नहीं था, परंतु गुरु साहिब की कृपा से उन्हें औलाद का सुख प्राप्त हुआ। इसके पश्चात इस स्थान पर एक पक्की इमारत का निर्माण किया गया। बाद में इस इमारत के पीछे की ओर आकाशीय बिजली गिरने से क्षति पहुँची, जिसे पुनः दुरुस्त किया गया।
यहाँ से कुछ दूरी पर हरपालपुर स्थित है, जहाँ श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी का एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा है। उस स्थान के संतों ने भी इस इमारत की संपूर्ण सेवा करवाई। यह सेवा सन 1956 में आरंभ हुई थी। धीरे-धीरे, नगर वासियों के सहयोग से, इस गुरुद्वारा साहिब की संपूर्ण इमारत का निर्माण पूर्ण हुआ।
डॉक्टर खोजी– जब हम इतिहास की खोज कर रहे थे, तो हमें यह भी ज्ञात हुआ कि इस स्थान पर एक वृक्ष और एक सरोवर भी विद्यमान थे।
स्थानीय बुजुर्ग– हाथ से संकेत करते हुए बताते हैं कि इस स्थान पर नीम के वृक्ष के समीप एक केंदु का वृक्ष था, जो बाद में सूख गया। यहाँ एक पुरातन कुआँ आज भी विद्यमान है। सामने ही लंगर-घर के पीछे छप्पड़ अर्थात प्राकृतिक सरोवर की सीढ़ियाँ बनी हुई हैं और वहाँ एक चबूतरा भी है, जहाँ संगत जाकर स्नान करती है।
डॉक्टर खोजी– संगत जी, अब हम कुछ ऐसी बातों की ओर आते हैं, जो पुस्तकों में नहीं लिखी जातीं। पुस्तकें तो विश्वविद्यालयों में बैठकर भी लिखी जा सकती हैं, किंतु जब हम ज़मीनी धरातल पर पहुँचकर खोज करते हैं, तब कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं जो हमें विस्मय से भर देती हैं।
इस स्थान के बुजुर्गों ने बताया कि आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व, जब यहाँ अमृत-संचार हो रहा था, उसी समय अत्यंत तेज़ी से दरवाज़ा खड़खड़ाने की आवाज़ आई। भीतर बैठे लोग कह रहे थे कि बाहर वालों ने दरवाज़ा खड़खड़ाया है, जबकि बाहर वाले कह रहे थे कि अंदर से आवाज़ आई है। तभी एक छोटे बच्चे ने ज़ोर से चिल्लाकर कहा—“देखो, वह जा रहा है नीले घोड़े वाला… वह जा रहा है नीले घोड़े वाला!”
बुजुर्गों के अनुसार, वह बच्चा खेल रहा था और सामने लंगर चल रहा था। उस समय तेग तप रही थी। बच्चा खेलते-खेलते लोहे के गर्म तवे पर दौड़ गया, जिससे उसके पैर जल गए। परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि वह बच्चा रोया नहीं। उसे गुरुद्वारा साहिब के दर्शन कराए गए और गुरु-कृपा से वह पूर्णतः स्वस्थ हो गया।
डॉक्टर खोजी– कहीं यह संदेश तो नहीं कि गुरु साहिब कहीं गए ही नहीं हैं, किसी न किसी रूप में आज भी इस स्थान पर विद्यमान हैं। ऐसे ही नहीं धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस नगर में आए थे और ऐसे ही नहीं धन्य श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने नांदेड़ की धरती से सिखों को भेजकर इस स्थान को पुनः प्रकट करवाया।
नगर के बुजुर्गों के अनुसार, निशानदेही के आधार पर यह भी माना जाता है कि बाल्यावस्था में श्री गुरु गोविंद सिंह महाराज इस स्थान पर आए थे। उन्हें अपने पिता श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी से अत्यंत प्रेम था। जहाँ-जहाँ गुरु साहिब विराजमान हुए थे, वह स्थान आज भी शोभायमान हैं।
इतिहास के इन पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं- अगले प्रसंग के अगले भाग में…
संगत जी से विनम्र निवेदन
इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सबमें बहुत बड़ा व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक को, यह शहीदी मार्ग प्रसंग को और आगे आने वाले सभी ऐतिहासिक प्रयासों को अपना सहयोग देना चाहें, तो- मोबाइल क्रमांक- 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इस इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक होगा।
आपका अपना वीर- इतिहासकार, डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’
पार्श्व गायन: (गुरु-चरित्र की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन वातावरण में गूँज रही है।)