प्रसंग क्रमांक 7: पंजाब की वह कौन-सी जेल जहाँ श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को कैद किया गया था?
(सफ़र-ए-पातशाही नौंवीं -शहीदी मार्ग यात्रा)
पार्श्व-गायन: (गंभीर, मार्मिक और अंतर्मुखी संगीत – जो दर्शक को इतिहास की पीड़ा और गंभीरता से जोड़ लेता है।)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह! आप जिस तख्ती को अभी देख रहे हैं, उस पर इतिहासकार केसर सिंह छिब्बर के लिखित प्रमाणानुसार स्पष्ट अंकित है कि 12 जुलाई को भाई मति दास जी, भाई सती दास जी, भाई दयाला जी तथा गुरु साहिब को इसी स्थान से गिरफ्तार कर रोपड़ ले जाया गया था। रोपड़ की पुरातन कोठरी में इन्हें रखा गया, और तदनंतर सरहिंद के अधिकारियों- अब्दुल अज़ीज़ तथा दिलावर खाँ के आदेशानुसार 13 और 14 जुलाई 1675 ई. को गुरु साहिब एवं उनके सहचर संगियों को बस्सी पठाना स्थित इस प्राचीन जेल में लाया गया।
अभी हम इसी जेल की छत पर खड़े हैं। हमारे पीछे प्राचीन बुर्ज दृश्यमान हैं- जिनमें से एक बुर्ज ढह चुका है और अपनी दुरवस्था स्वयं बयान कर रहा है। वीडियो में आप जो भव्य और भीषण इतिहास का साक्षी मुख्य द्वार देख रहे हैं, उसी से होकर हम अपनी टीम के साथ अंदर प्रवेश कर रहे हैं।
आज हम इस पूरे जेल परिसर का विस्तृत अवलोकन करेंगे। हमारे मार्गदर्शक सरदार जतिंदर पाल सिंह जी हमें इस विरासत के एक-एक कोने से परिचित करवाएंगे। इसके पश्चात हम आप संगत को इस जेल के इतिहास की गहराइयों में लेकर चलेंगे।
जेल यात्रा का आरंभ
पार्श्व-गायन:( वातावरण में शांत, वीर-रस से ओतप्रोत धुन-जो स्थान की गंभीरता को उभारती है।)
सरदार सतिंदर पाल सिंह जी बताते हैं- जब इस जेल में प्रवेश किया जाता था, तो द्वार के ठीक ऊपर दरोगा की बैठक हुआ करती थी। उसी स्थान से कैदियों पर दृष्टि रखी जाती थी। द्वार से आगे बढ़ते ही सामने जो विशाल दीवार है, वह उसी समय की है- अत्यंत लंबी, लगभग ढाई से तीन फीट चौड़ी, और पूर्णतः नानकशाही ईंटों से निर्मित। अब तक जितनी भी ऐतिहासिक इमारतें सुरक्षित बची हैं, उनमें यह विशेषता समान रूप से दिखाई देती है, नानकशाही ईंटों का दृढ़, सुंदर और टिकाऊ निर्माण।
डॉ. खोजी जी इस बिंदु पर एक गंभीर प्रश्न उठाते हैं- “यदि यह जेल श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के समय की निर्मित है, और आज तक सुरक्षित है, तो फिर फतेहगढ़ साहिब में स्थित ठंडा बुर्ज क्यों न बच पाया? जब इतनी मोटी, मजबूत दीवारें आज भी दृढ़ खड़ी हैं, तो ठंडा बुर्ज का संरक्षण क्यों नहीं किया गया?”
पार्श्व गायन: (स्थान के गौरव को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।)
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी दुःख भरे स्वर में उत्तर देते हैं- “यही हमारी कौम की कमी है, जी! हमने अपनी असली ऐतिहासिक इमारतों को बचाकर नहीं रखा। उन्होनें कहा कि- क्या आपने फतेहगढ़ साहिब में भाई टोडरमल की हवेली देखी है? वह आज भी उत्तम स्थिति में है। पर वह तो बच गई—कुदरती रूप से! यदि वह हवेली भी कार सेवा वालों को मिल जाती, तो शायद उसे भी तोड़कर पत्थरों की नई इमारत बना दी जाती।”
डॉ. खोजी जी के मुख से एक लंबी, पीड़ाभरी सांस निकली- “वाहिगुरु…”
पुरातन ठंडा बुर्ज – इतिहास की अधूरी कहानी
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी आगे स्पष्ट करते हैं- “हम किसी का विरोध नहीं करते, पर यह अवश्य कहेंगे कि जो इतिहास शेष है, उसे नष्ट न किया जाए। पुराना ठंडा बुर्ज हमने अपनी आंखों से देखा है, आकार में बहुत छोटा था पर अत्यंत महत्वपूर्ण। उसकी छवि आज भी हमारी स्मृतियों में जीवित है। हमारे बुजुर्ग आज भी इस इतिहास की उत्तम जानकारी रखते हैं।”
डॉ. खोजी जी विनम्रता पूछते हैं- “आपके मन में इस बात का दुख तो अवश्य होगा?”
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी की आँखों से करुणा छलक पड़ती है- “बहुत ज्यादा…!
जहाँ पुराना ठंडा बुर्ज था, वहीं से एक छप्पड़ (छोटी जलधारा) बहती थी। बुर्ज वहीं इसलिए बनाया गया था, क्योंकि वहाँ सदैव ठंडी प्राकृतिक हवा और बहते पानी का संगम रहता था। उस समय मुगल सरदार वहीं बैठकर मौसम का आनंद लेते थे।”
पुरातन वृक्ष और समय का सत्य
डॉ. खोजी जी एक बड़े वृक्ष की जड़ की ओर संकेत करते हैं- “यह वृक्ष, अपने मूल स्वरूप में कैसा था, आपने अवश्य देखा होगा?”
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी बताते हैं- “इसके कुछ पुराने चित्र मेरे पास हैं। वृक्ष बहुत पुराना था, इसलिए एक ओर झुक गया था, और आसपास के घरों के लिए खतरा बन गया था, इसलिए काटना पड़ा। पर आश्चर्य देखिए—इसी वृक्ष की जड़ से दूसरी ओर एक नया पौधा उगा, जिसकी शाखाएँ उसी पुराने वृक्ष की शाखाओं का विस्तार हैं। एक वृक्ष समाप्त हुआ, और दूसरा उसी की जड़ से जीवित हो उठा।”
डॉ. खोजी जी संगत को स्मरण कराते हैं-
“जो उपजै सो बिनसि है दुखु करि रौवे बलाइ॥ (अंग 337)”
अर्थात—जिस वस्तु का जन्म हुआ है, उसका नाश निश्चित है। “बड़े-बड़े वृक्ष मिट गए; बड़े-बड़े अहंकारी भी मिट गए। जो आज अपने अहंकार में यह सोचते हैं कि उनकी जड़ें अचल हैं- याद रखें, कुदरत का न्याय अटल है। जब सदियों पुराने वृक्षों की जड़ें डोल सकती हैं, तो हमारी क्यों नहीं?” यह इतना पुराना बड़ का वृक्ष है, जिसकी कुछ दूरी पर दूसरी ओर इसकी कुछ शाखाएं निकली हुई है| इसकी कुछ शाखाएं दूसरी ओर जमीन में प्रवेश कर पुरे एक संपूर्ण वृक्ष का रूप धारण कर चुकी है|
पार्श्व गायन: (समय की धूल हटाती-सी मार्मिक सुर लहरी, दर्शकों को इतिहास में ले जा रही है।)
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी ने आगे बढ़ते हुए कहा—“आओ, अब हम जेल के दूसरे हिस्से की ओर चलते हैं। पुराने समय में यहाँ अलग-अलग प्रकार की जेलें होती थीं—बिलकुल वैसे ही जैसे आज ‘हवालाती जेल’ और ‘नियमित जेल’ अलग-अलग देखी जाती हैं। इसी प्रकार इस ऐतिहासिक जेल में भी विभाग विभाजित थे- साधारण कैदी अलग रखे जाते थे, और पेशेवर या खतरनाक अपराधी अलग हिस्से में।”
हमारे सामने जो भाग खड़ा था, वह उसी तंग, संकुचित और कठोर हिस्से का स्वरूप लिए हुए था। सरकार द्वारा पुनर्निर्माण के बाद इसकी बाहरी दीवारों पर आधुनिक प्लास्टर चढ़ा दिया गया था, परंतु भीतर आज भी नानकशाही ईंटों की वह पुरातन गवाही जस की तस मौजूद है। इस हिस्से की दीवारें लगभग ढाई फीट मोटी– इतनी चौड़ी कि समय का आघात भी उन्हें पूरी तरह मिटा न सका। क़ैदियों के सोने के लिए नीचे की ओर छोटे-छोटे स्थान बनाए गए थे। यही वह भाग था जहाँ सबसे खतरनाक अपराधियों को कैद रखा जाता था।
गुरु साहिब की कैद-कौन से हिस्से में?
डॉ. खोजी ने अपनी शोध यात्रा के अनुभव साझा करते हुए कहा- “बुजुर्गों की वाणी से हम यह सुनते आए हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को या तो इसी हिस्से में कैद किया गया था या उसके सामने वाले बड़े भाग में।”
इस पर सरदार जतिंदर पाल सिंह जी ने अत्यंत गंभीरता से कहा- “हमारी जानकारी में गुरु साहिब को यहीं कैद किया गया था कारण सामने वाले हिस्से की काफी मरम्मत हो चुकी है तथा वहाँ लोहे की नई जालियाँ लगाई गई हैं लेकिन इस भाग में पुराना स्वरूप देर तक सुरक्षित रहा, यहाँ आगे एक पुराना दरवाज़ा हुआ करता था, जो अब लुप्त हो चुका है।” उन्होंने नीचे की ओर इशारा करते हुए कहा- “आप इस प्राचीन फर्श को देखिए- इसकी चौकनी बनावट, इसका सौंदर्य, सब अद्भुत है। मरम्मत के दौरान भी इसे मूल रूप में सँभालने का भरपूर प्रयास किया गया है।”
कैदियों का रहन-सहन-अंदर और खुले प्रकोष्ठों में
डॉ. खोजी बोले- “तो कैदी या तो भीतर के अंधेरे हिस्से में रहते थे, या इस खुले स्थान में और सामने की ओर मुख्य द्वार एवं बाहरी दीवारें स्थित थीं।”
यह सुनते हुए उनके स्वर में गहरी श्रद्धा उतर आती है- “हमने इस पूरी जेल को वीडियो क्लिप में दिखाया है परंतु संगत जी, मैं तो एक ही बात कहूंगा—
‘जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरु सो थानु सुहावा राम राजे॥’ (अंग 450)
अर्थात- जहाँ भी मेरा सच्चा गुरु विराजमान होता है, वह स्थान अत्यंत सुंदर, धन्य और पूज्यनीय हो जाता है।” उनकी वाणी में भावनाओं की तीव्रता थी- “आज हम इस जेल को देखने नहीं आए हैं अपितु जेल के दर्शन करने आए हैं। नहीं तो कौन इस खंडहर होती पुरानी जेल को पूछता? परंतु यहाँ गुरु साहिब के चरण पड़े हैं—अब यह स्थान ‘जेल’ नहीं, गुरु-धाम बन गया है।”
वे हृदयस्पर्शी शब्द जोड़ते हैं- “आज भी जहाँ-जहाँ खालसा जेल में बंद हो जाता है- जेलें धन्य हो जाती हैं क्योंकि भीतर बैठी रूहें नाम जपती हैं, पाठ करती हैं। इसलिए यह जेल भी सम्मानित हो उठती है।”
जेल का बड़ा हिस्सा-रसोई, पानी और पुरानी व्यवस्था
दूसरे बड़े हिस्से की ओर बढ़ते हुए सरदार जतिंदर पाल सिंह जी बताते हैं- “यह भाग अधिक विस्तृत था। यहीं जेल का रसोईघर भी था, परंतु मरम्मत के समय वह इतनी जर्जर हालत में था कि उसे बचाया नहीं जा सका—इसलिए उसे ढहा कर पुनर्निर्मित किया गया।” जेल के भीतर ही पानी की व्यवस्था भी की गई थी ताकि कैदियों को बाहर जाने का अवसर ही न मिले।
डॉ. खोजी चिंतन करते हुए पूछते हैं- “क्या सामने वाले हिस्से में भी ऐसी ही सुविधाएँ थीं?”
इस पर सरदार सत्येंद्र पाल सिंह जी ने स्पष्ट किया- “नहीं, वहाँ सुविधाएँ कम थीं कारण—वहाँ केवल 4–5 खतरनाक कैदी रखे जाते थे। जेल का मुख्य प्रबंध इस हिस्से में ही था।”
महिला कैदियों का हिस्सा और गुरु साहिब के साथ आए सिंह
डॉ. खोजी ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संदर्भ रखा- “गुरु साहिब के साथ उस समय कुल छह साथी थे- भाई मतिदास जी, भाई सती दास जी, भाई दयाला जी, भाई गुरदित्ता जी और भाई उधम जी। संभावना है कि उन्हें सामने वाले बड़े हिस्से में रखा गया हो, क्योंकि यह हिस्सा उस समय महिला कैदियों हेतु प्रयुक्त होता था।”
बस्सी पठाना-पठानों की बस्ती और एक विशाल जिला
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी ने एक महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किया- “यह पूरा क्षेत्र सरहिंद के पठानों की बस्ती था इसीलिए इसका नाम पड़ा—बस्सी पठाना। यह जेल सुबा सरहिंद और रोपड़ के अधीन आती थी।”
डॉ. खोजी ने इतिहास का एक और आयाम जोड़ा- “उस समय पठान अत्यंत ताकतवर और प्रभावी माने जाते थे इसलिए विशेषतः उनकी निगरानी हेतु यह जेल बनाई गई थी।”
सरदार सतिंदर पाल सिंह जी ने बताया- “इस क्षेत्र के अधिकांश ओहदेदार यहीं निवास करते थे और तब यह स्थान एक बड़ा जिला था।”
इसके बाद एक गंभीर निवेदन सामने आया- “हमारे बुजुर्गों के अनुसार बस्सी पठाना का जिला क्षेत्र इतना विशाल था कि इसमें अंबाला, रोपड़, पटियाला और लुधियाना तक शामिल थे। आपकी टीम से निवेदन है कि इसकी भी शोध करके जानकारी दें कि यह जिला कब बना और कब समाप्त हुआ?”
डॉ. खोजी ने मुस्कुराते हुए कहा- “जी, अवश्य। यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण है और की जाएगी।”
जेल का व्यक्तिगत अनुभव-एक हंसी भरा संस्मरण
यात्रा के दौरान वातावरण हल्का हो गया जब सरदार जतिंदर पाल सिंह जी ने हँसते हुए एक व्यक्तिगत प्रसंग सुनाया- “युवावस्था में हम दोस्तों में थोड़ा झगड़ा हो गया था। तब हम भी कुछ दिनों के लिए इसी जेल में आ गए थे!”
डॉ. खोजी ने हँसते हुए कहा- “वाह! आप तो धन्य हो गए—गुरु के कदमों वाली जेल में आपने भी सजा काटी।”
सरदार जी ने हँसते हुए बताया- “जी हाँ, पूरे 14 दिन। अब तो यह सब केवल स्मृति बन कर रह गया है।” अब हम पढ़ते थे उस समय का वाकया है।
पार्श्व संगीत: (गंभीर, अध्यात्मपूर्ण धुन—जेल को गुरु की महिमा से सुहाए हुए पवित्र स्थल के रूप में प्रस्तुत करती है।)
घुमट-पुरानी जेल-वास्तु का प्रहरी
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी बताते हैं- “जेलों का निर्माण करते समय ऊपर घुमट बनाए जाते थे; ये घुमट ही पहरेदारों का निवास स्थान हुआ करते थे। आज भी आधुनिक जेलों में जो चौकियाँ दिखाई देती हैं, यह इमारत उसी प्रकार की चौकी का पुरातन स्वरूप है। सरकार ने इसका अधिकांश हिस्सा मरम्मत कर दिया है, और शेष भाग का कार्य अंतिम चरण में है।
आप देखिए-उस युग में बिजली और पंखे नहीं होते थे। गर्मियों के मौसम में कैदियों को ऐसे ही भूमिगत, अत्यंत ठंडे कमरों में रखा जाता था। आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं कि यह स्थान कितना ठंडा है।”
तलघरों की परंपरा-गर्मी से सुरक्षा, इतिहास से गवाही
डॉ. खोजी आगे जोड़ते हैं- “आज जो लोग वातानुकूलित कक्षों में बैठकर प्रश्न करते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की गिरफ्तारी भीषण गर्मियों में हुई थी। उस समय ए.सी. कहाँ थे? तभी तो भूमिगत ‘भौंरे’ – अर्थात तलघर बनाए जाते थे। गुरु-स्मृति से जुड़े गुरुद्वारा बाबा बकाला में भी ऐसा ही एक तलघर है। चक नानकी गुरुद्वारे के इतिहास में स्थित गुरुद्वारा ‘भौंरा साहिब’ में भी एक और प्राचीन तलघर आज भी संरक्षित है। दुर्भाग्य यह कि हमारा समाज, अन्य आक्रमणकारियों द्वारा ढहाए गए भवनों को तो बड़े सम्मान से पुनर्निर्मित करता रहा परंतु अपने गुरुओं से जुड़े अति-पुरातन स्थलों को स्वयं ढहा कर नए निर्माण खड़े कर दिए– यह एक गम्भीर भूल रही है।
हाँ, मुगल काल में जहाँ-जहाँ ईमारतें ढहाई गईं, उन्हें सिख परंपरा ने पुनः सम्मानपूर्वक खड़ा किया। उदाहरण- बाबा सेवा सिंह जी, आनंदगढ़ साहिब, जिन्होंने उजड़े हुए श्री आनंदपुर साहिब को फिर से बसाने का महापुरुषी प्रयास किया परंतु जिन्होंने उत्तम स्थिति में सुरक्षित पड़े प्राचीन स्थलों को नष्ट कर नये निर्माण किए—उन्होंने वास्तव में हमारी विरासत को आघात पहुँचाया है।”
ठंडे कमरे गर्मी में शरण, सर्दी में आसरा
डॉ. खोजी कहते हैं- “उस काल के सिपाही और ओहदेदार भी भीषण गर्मी में ऐसे ही ठंडे कक्षों में रात गुजारते थे और शीत ऋतु में इन्हीं कक्षों में गर्माहट मिलती थी।”
फिर वे आगे बढ़ने का संकेत देते हैं- “अब हम जेल की छत अर्थात ऊपरी हिस्से की ओर चलते हैं। सरदार जतिंदर पाल सिंह जी काहलों साहिब के इतिहास को पूर्णता से जानने वाले हैं, वे हमें इस जेल से संबंधित समस्त जानकारी प्रदान करेंगे। जुड़े रहना। अब हम चलते हैं जेल के एकांत, पृथक-थलग कोने की ओर…”
घुमट पर प्रहरी-पूरे इलाके पर ईगल-आंख की निगरानी
सरदार जितिंदर पाल सिंह जी समझाते हैं- “पहले इस ऊँचे स्थान पर पहरेदार बैठते थे। यहाँ से दूर-दूर तक निगरानी रखी जाती थी। इस प्रकार की संरचना को ‘घुमट’ कहा जाता है। इस जेल के चारों ओर ऐसे ‘घुमट’ बने हुए थे।”
डॉ. खोजी ने प्रश्न किया- “क्या इस जेल में ऐसे चार घुमट विद्यमान थे?”
जवाब मिला- “अब केवल चार शेष हैं; पहले कितने थे, इसका सटीक ज्ञान नहीं है।”
डॉ. खोजी ने अवलोकन किया- “अर्थात इन चार घुमटों में से केवल इसी की मरम्मत की गई है। यह वास्तु एक प्राचीन घर की भाँति निर्मित है और इस स्थान से पूरे शहर का अवलोकन किया जा सकता है।”
सरदार जतिंदर पाल सिंह जी ने संकेत किया- “यहाँ से खंडा चौक भी स्पष्ट दिखाई देता है।”
जेल की खिड़की-अद्भुत वास्तुशिल्प का प्रमाण
डॉ. खोजी आगे बताते हैं- “गुरुद्वारा साहिब से जेल की ओर चलते समय यह खिड़की सामने ही दिखाई देती है। आप दृश्य में जो खिड़की देख रहे हैं—वही है वह प्राचीन खिड़की, जहाँ से पूरे क्षेत्र पर दृष्टि रखी जाती थी। भले ही यह स्थान एक जेल है, परंतु ऊपर से देखने पर इसकी वास्तु का सौंदर्य अत्यंत अद्भुत प्रतीत होता है। जेल की अभिकल्पना – डिज़ाइन – अनुपम है। अब हम ऊपर की ओर बढ़ते हैं…”
जब इतिहास चुप हो जाए-परंपरा बोलती है
डॉ. खोजी कहते हैं- “इतिहासकार सरदार करम सिंह जी का एक महत्वपूर्ण वाक्य है—
‘जब इतिहास चुप हो जाए या भ्रम डालकर भ्रमित करे, तब परंपरा की रीत महानी।’
अब हमें भी इसी परंपरा को समझने के लिए ग्राम बस्सी पठाना की पीढ़ियों में उतरना होगा क्योंकि उनके द्वारा संरक्षित मौखिक इतिहास ही इस स्थल का वास्तविक धरोहर है। स्थानीय बुजुर्गों ने अपने पूर्वजों से जो सुना, वही अगली पीढ़ी को ‘साखियों’ के रूप में बताया और इसी मौखिक परंपरा से हमें श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के आगमन की पुष्टि मिलती है।”
बस्सी पठाना-पठानों की बस्ती, खालसा की विजय
वे आगे कहते हैं- “फतेहगढ़ साहिब से पहले पड़ने वाला यह गाँव—बस्सी पठाना, कभी मुसलमानों की बस्ती था, जहाँ पठान निवास करते थे इसलिए इसका नाम पड़ा बस्सी पठाना। इस क्षेत्र का इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हम रोपड़ से भीतर की ओर आते हैं, तो एक बस अड्डा दिखाई देता है। फिर कुछ दुकानों को पार करते हुए दाएँ हाथ को जेल दिखती है। जेल मार्ग पर प्रवेश से पहले चौराहे पर ‘खंडे’ के दर्शन होते हैं। यह खंडा गवाही देता है कि- जहाँ कभी इस जेल में मनुष्यों की कराहें, दंड और बंदीगृह की पीड़ाएँ गूँजती थीं, आज वहीं खालसा का निशान साहिब शान से लहरा रहा है। निश्चित ही- जहाँ कभी सजा दी जाती होगी, आज उसी चौक पर खंडा दिव्य तेज से सुशोभीत है।”
यात्रा का अगला चरण-गुरुद्वारा साहिब में पहुंचकर दर्शन
डॉ. खोजी- “अब हम सबसे पहले गुरुद्वारा साहिब में पहुंचकर दर्शन कर रहे हैं।”
पार्श्व गायन: (गंभीर, मार्मिक और अंतर्मुखी संगीत—दर्शक को भावनात्मक रूप से जोड़ता है।)
गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से मुलाक़ात-परंपरा की धड़कन को सुनने की एक कोशिश
अब हम गुरुद्वारा साहिब जी की प्रबंधक कमेटी से मिलते हैं- इसी संगत, इसी धरती और इसी परंपरा ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस इतिहास को संरक्षित रखा है। हम जानेंगे कि इस गांव की रवायत क्या कहती है? हमारे साथ हैं- इस गाँव के प्रमुख सेवादार, प्रधान जी सरदार जतिंदर पाल सिंह जी काहलों साहिब।
डॉ. खोजी ने निवेदन किया- “काहलों साहिब प्रधान जी, हम जानना चाहेंगे कि इस गांव की परंपरा क्या कहती है? सभी जानते है कि- यह गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अत्यंत सुंदर व्यवस्था चला रही है।”
इस पर अत्यंत विनम्रता से उन्होंने कहा- “नहीं जी, यहाँ ‘प्रधान’ शब्द का कोई अहंकार नहीं। हम सब गुरु-घर के सेवादार हैं। गुरुद्वारे की प्रबंधक कमेटी में यह विषय कभी आता ही नहीं कि प्रधान कौन है। यह गुरु का घर है- यहाँ सेवक बनकर ही सबसे बड़ी सेवा निभाई जाती है।”
इतिहास और परंपरा-जब दो धाराएँ एक मोड़ पर मिलती हैं
डॉ. खोजी ने आगे पूछा- “प्रधान साहिब, इतिहास एक बात कहता है कि- श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को यहाँ कैद कर दिल्ली ले जाया गया। परंतु परंपरा क्या कहती है? मौखिक इतिहास क्या कहता है? वह रवायत जो बुजुर्गों से होकर हमारी पीढ़ियों तक पहुँची है?” उस परंपरा को जानने के लिए अब हम सरदार जतिंदर पाल सिंह जी काहलों की ओर मुड़ते हैं।
बस्सी पठाना के सिख सेवादार की वाणी से—गुरु साहिब के चार महीनों का जीवंत दस्तावेज़
सरदार जतिंदर पाल सिंह काहलों ने “वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह!” के साथ वार्तालाप आरंभ किया। उन्होंने कहा- “मैं सरदार जतिंदर पाल सिंह काहलों, निवासी: बस्सी पठाना, जिला फतेहगढ़ साहिब।
संगत को यह बताना चाहता हूँ कि- धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस बस्सी पठाना की जेल में चार महीने रहे थे। जेल में उनके निवास से संबंधित ऐतिहासिक विवरण डॉक्टर खोजी जी ने पहले ही साझा कर दिया है।”
कश्मीरी पंडितों की व्यथा-गुरु साहिब का धर्म-रक्षक रूप
उन्होंने आगे बताया- “जब गुरु साहिब श्री आनंदपुर साहिब में निवास कर रहे थे, उसी समय मुगलों द्वारा कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। उनका जनेऊ जबरन उतरवाया जा रहा था, धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कश्मीरी पंडितों का एक शिष्टमंडल अपनी करुण व्यथा लेकर श्री आनंदपुर साहिब पहुँचा। उन्होंने गुरु साहिब से विनती की ‘हमें मुगलों के अत्याचार से बचाइए।’
तब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने वचन किए- ‘यदि जोर-जबरदस्ती से धर्म परिवर्तन होगा तो इंसानियत नष्ट हो जाएगी।’ गुरु साहिब ने पंडितों से कहा- “तुम औरंगजेब को सूचना भेजो कि- यदि मैं अपना धर्म छोड़ दूँ, तो तुम सब भी धर्म परिवर्तन कर लेना पर यदि मैं अडिग रहा—तो तुम भी अडिग रहना।” यह समाचार दिल्ली व लाहौर तक पहुँच गया।”
औरंगजेब का बुलावा-गुरु साहिब की दिल्ली यात्रा
“दिल्ली बैठे औरंगजेब ने आदेश भेजा कि- गुरु तेग बहादुर साहिब जी दिल्ली उपस्थित हों, क्योंकि समस्या का समाधान दिल्ली में ही संभव है।
गुरु साहिब शांतिपूर्वक श्री आनंदपुर साहिब से दिल्ली की ओर रवाना हुए। कुछ सेवादार और संगत भी साथ थी।”
रंगड़ा गाँव-जहाँ गिरफ्तारी हुई
“जब गुरु साहिब रंगड़ा गाँव पहुँचे, वहाँ संगत को संबोधित करते हुए वे अन्याय के विरुद्ध जागृति का संदेश दे रहे थे लेकिन इसी दौरान गाँव के मुखबिरों ने मोरिंडा कोतवाली में सूचना पहुँचा दी। सूचना यह थी कि- ‘गुरु साहिब राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर रहे हैं।’ तब तत्कालीन ओहदेदारों ने रंगड़ा गाँव में गुरु साहिब और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया और बस्सी पठाना जेल में भेज दिया।”
चार महीने की कैद-संदेश, मुलाक़ातें और लगातार संवाद
“जब गुरु साहिब यहाँ कैद थे तो सरहिंद क्षेत्र में रहने वाले कई सिख-मुरीद गुरु साहिब के दर्शन करने इस जेल तक पहुँचे। उन्होंने घटना का पूरा वर्णन श्री आनंदपुर साहिब जाकर माता गुजरी जी को सुनाया। माता जी ने विचार-विमर्श कर दिल्ली और लाहौर संदेश भेजा- ‘जब गुरु साहिब स्वयं शांतिपूर्वक दिल्ली जा रहे हैं तो गिरफ्तारी का कोई औचित्य नहीं।’
लाहौर दरबार से फरमान आया और तब जाकर गुरु साहिब रिहा किए गए। दिल्ली–लाहौर–बस्सी पठाना इन तीनों स्थानों के बीच सूचना के आने-जाने में करीब चार महीने लग गए। इसी कारण गुरु साहिब इस जेल में चार महीनों तक रहे।”
जेल से रिहाई और आगे की यात्रा
“जेल से मुक्त होने के बाद गुरु साहिब मुकरामपुर, बहादुरगढ़, जींद होते हुए दिल्ली पहुँचे। डॉक्टर खोजी जी अपनी आगामी यात्राओं में इन सभी स्थलों के दर्शन भी करवाएँगे।”
स्थानीय परंपरा-बुजुर्गों से बुजुर्गों तक पहुँची हुई धरोहर
“जो इतिहास मैंने आपको बताया यह हमें हमारे बुजुर्गों ने बताया और उनके बुजुर्गों ने उन्हें, इसी मौखिक परंपरा को लेकर हम आज भी इस पवित्र स्थान की सेवा कर रहे हैं।”
खंडा चौक-खालसा की शान, इतिहास की गवाही
“हमने चौक पर खंडा भी स्थापित किया है, जो आप वीडियो में देखेंगे। यह जेल अत्यंत जर्जर अवस्था में थी। सरकार को निवेदन कर काफी हद तक इसकी मरम्मत करवाई गई है। इन पुरानी इमारतों को संवारना हमारा कर्तव्य है और हमारी आने वाली पीढ़ियों का भी।”
अंतिम निवेदन
“मैं डॉ. खोजी का दिल से धन्यवाद करता हूँ कि उन्होंने यहाँ आकर इस स्थान के इतिहास को उजागर किया। टीम खोज-विचार द्वारा सभी पवित्र स्थलों के विस्तृत वीडियो क्लिप तैयार कर
संगत तक पहुँचना- यह भी एक महान सेवा है। मेरा एक ही निवेदन है—जहाँ-जहाँ गुरु साहिब के चरण पड़े हैं, उन सभी स्थानों के दर्शन अवश्य करो।”
रिवायत की अंतिम कड़ी – डॉ. खोजी का गंभीर निवेदन
डॉ. खोजी कहते हैं- “संगत जी, यह थी इस स्थान की रिवायती बात। रिवायत यह कहती आई है कि- धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को मलकपुर रंगड़ा से गिरफ्तार कर बस्सी पठाना की जेल में कैद किया गया परंतु कुछ ही समय पश्चात उन्हें रिहा कर दिया गया।
इसके बाद गुरु साहिब दिल्ली की ओर चल पड़े किंतु कुछ शोध यह भी कहते हैं कि गुरु साहिब आगरा की ओर चल पड़े थे। अब यदि इतिहास आगरा की बात करता है तो हमें रिवायती मार्ग का अनुसरण करते हुए समझना होगा कि परंपरा और इतिहास – दोनों क्या कहते हैं?”
ऐतिहासिक ग्रंथों की साक्षियाँ – मलकपुर रंगड़ा या आगरा?
डॉ. खोजी आगे कहते हैं- “यदि हम प्रसिद्ध इतिहासकार ज्ञानी ज्ञान सिंह जी के ग्रंथ ‘पातशाही नौंवीं’ (पृष्ठ 18) को देखें तो वे लिखते हैं- ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी, श्री आनंदपुर साहिब से अनेक गांवों से होते हुए जब आगरा पहुँचे, तो उन्हें वहीं से गिरफ्तार किया गया।’
इसी संबंध में अंग्रेज लेखक Max Arthur Macauliffe की रचना अत्यंत महत्वपूर्ण है उनकी पुस्तक के Volume 3, कांड 43, पृष्ठ 322–330 में उन्होंने उल्लेख किया है कि- गुरु साहिब जिन-जिन गाँवों से होकर आगे बढ़े, भविष्य में जिन स्थलों पर हम यात्रा करेंगे, उनसे गुजरते हुए जब आगरा पहुँचे, तब उनकी गिरफ्तारी वहीं से हुई।
इतिहास के विद्वानों, कवि संतोक सिंह जी ने भी इस मत का समर्थन किया है। अनेक लेखक भी यही मंतव्य प्रस्तुत करते हैं।”
‘गुरु की साखियां’ – मौखिक इतिहास की अमूल्य धरोहर
डॉ. खोजी आगे एक अत्यंत प्रमाणिक स्रोत खोलते हैं- “यदि हम ‘गुरु की साखियां’ नामक ग्रंथ (पृष्ठ 73) को देखें तो उसमें लिखा है—
“सरहिंद वासी भंडारी सिख ने चकनानकी में माता नानकी को पता किया कि गुरु जी बसै तिंन सिंखा के बसी हवालात में बंद है सरहिंद से आई खबर चक ननकी के चमा दिशा में फैल गई। यानी कि सरहिंद के दो सिक्खों से ज्ञात हुआ कि- चक्र नानकी से दिल्ली की ओर जाते हुए गुरु साहिब को गिरफ्तार करके जेल में कैद कर दिया। इससे पहले इस खबर से सभी अनजान थे, अब यह खबर चारों दिशाओं में फैल चुकी है|
इस ग्रंथ में यह भी लिखा है—“
माता नानकी जी ने दीवान दरगाह मल ते चौपत राय के भंडारी सिख के गृह में भेज के सारा पता किआ गुरु जी तीन मास से ज्यादा बस्सी पठाणां के बंदी खाना में बंद रहे दुसरां ने शरीर को घणां कशट दिया तीन मास बाद देहली से परवाना आने से गुरु जी को लोहे के पिंजरे में बंद करके दिली की तरफ रवाना करदीआ संमत 1732 मंगसर वधी तरेदेसी वार – वार के देऊ गुरु जी के दिहली में पहुंचा दीआ”
मलकपुर रंगड़ा की गिरफ्तारी – ‘गुरु की साखियां’ में दूसरा पक्ष
डॉ. खोजी एक और संदर्भ उद्धृत करते हैं- “गुरु तेग बहादुर साहिब जी महल नावां को नूर मोहम्मद खाँ मिरजा चौकी रोपड़ वाले ने सदाल सॅतरे में बतीस सावन परवसिते 12 के दोहे गाऊ मलकपुर रंगड़ा परगणा घनोला से पकड़ के सरहंद पहुंचाइआ गैर दीवान मती दास मती दास बेटा हीरामल छिबर के गैल दआिल दास दा बेटा माई दास बलोतका पकड़िआ गुरु जी 4 मास बसी पठाणां के बंदीखाने में बंद रहे आठ दिवस दिॅली कोतवाली में कैद रहे और आठ दिनों तक दिल्ली कोतवाली में कैद रहे।”
इस ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख है कि- गुरु साहिब को 12 तारीख को गिरफ्तार कर सरहिंद लाया गया और यहाँ बस्सी पठाना जेल में चार महीने रखा गया।”
इतिहास की उलझन – विद्वानों के लिए शोध का गंभीर विषय
डॉ. खोजी हाथ जोड़कर निवेदन करते हैं- “संगत जी, आप जी से हाथ जोड़कर की विनती है- कि हमारी पंथक संस्थाएँ, गुरुद्वारे, प्रबंधक कमेटियाँ और हमारे सभी विद्वान एक बार एकत्र होकर
इस उलझे हुए इतिहास को निश्चित करें। क्या वास्तव में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की गिरफ्तारी बस्सी पठाना (मलकपुर रंगड़ा) में हुई थी और यहाँ से सीधे दिल्ली ले जाया गया? या
गांव-गांव में प्रचार करते हुए जब गुरु साहिब आगरा पहुँचे, तब उनकी गिरफ्तारी आगरा में की गई? अनेक प्रसिद्ध इतिहासकार दूसरे मत को स्वीकार नहीं करते। कुछ विद्वान केवल बस्सी पठाना की गिरफ्तारी को ही प्रमाणिक मानते हैं। यह विषय अत्यंत आवश्यक शोध का है।”
टीम खोज-विचार की गवाही
हम आगे चलकर अपने 124 दिनों के रूट पर, हमारी टीम इस बात की पुख्ता गवाही देता है कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को इस स्थान से गिरफ्तार किया गया था। इस इतिहास को इतिहासकार केसर सिंह छिब्बर को संदर्भित कर कहा जाता है, निश्चित यह खोज का विषय है कि- श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को यहीं – बस्सी पठाना (मलकपुर रंगड़ा) से गिरफ्तार किया गया था। इतिहासकार केसर सिंह छिब्बर द्वारा जो वर्णन मिलता है, वह भी इसी दिशा में संकेत करता है। यद्यपि यह खोज का विषय है परंतु मौखिक परंपरा, स्थानीय रिवायत और स्थल पर उपलब्ध प्रमाण बस्सी पठाना की गिरफ्तारी की ओर अधिक दृढ़ संकेत करते हैं।”
अगला पड़ाव – सदावर्ते का वह स्थान
“गुरु साहिब उसके पश्चात एक रात सदावर्ते नामक स्थान पर ठहरे थे। अब हम आगे बढ़ते हैं… आपने अभी-अभी मलकपुर रंगड़ा गुरुद्वारा साहिब के दर्शन किए। कभी यह गुरुद्वारा ‘सिंह सभा’ के नाम से प्रसिद्ध था। ड्योढ़ी से प्रवेश करते ही हम गुरुद्वारा साहिब में पहुँचे- गुरु चरणों में नमन किया और इतिहास के तथ्यों के प्रति अपने मन को दृढ़ किया।”
अगले भाग का आमंत्रण
“टीम खोज-विचार इतिहास के हर पहलू, हर स्थल, हर रिवायत और परंपरा को आप संगत तक सत्यता सहित पहुँचाएगी। गुरुधामों के इतिहास की यह यात्रा हम आगे भी जारी रखेंगे।
संगत जी, इतिहास के पन्नों को यहीं विराम देते हैं। श्रृंखला के अगले भाग में आपसे पुनः मुलाक़ात होगी…जुड़े रहना टीम खोज-विचार के साथ।”
संगत जी से विनम्र निवेदन
इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सबमें बहुत बड़ा व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक को, यह शहीदी मार्ग प्रसंग को और आगे आने वाले सभी ऐतिहासिक प्रयासों को अपना सहयोग देना चाहें, तो- मोबाइल क्रमांक- 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इस इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक होगा।
आपका अपना वीर- इतिहासकार, डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’
पार्श्व गायन: (गुरु-चरित की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन वातावरण में गूँज रही है।)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरू जी की फतेह!
आपका अपना वीर इतिहासकार-डॉक्टर भगवान सिंह खोजी