हमारी सांझीवालता

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हमारी सांझीवालता

(गुरु नानक शाह फ़कीर, हिंदुओं के गुरु मुसलमानों के पीर)।

सिख धर्म के संस्थापक एवं प्रथम गुरु, श्री गुरु नानक देव साहिब जी का प्राकट्य समस्त मानवता के कल्याण हेतु हुआ था। उनकी वाणी में समाहित सत्य, प्रेम, करुणा और समानता का संदेश संपूर्ण विश्व के लिए पथ-प्रदर्शक बना। उन्होंने अपनी चार व्यापक उदासी यात्राओं के माध्यम से लगभग 36,000 मील की यात्रा की और विभिन्न समाजों में व्याप्त जाति, वर्ण तथा छुआछूत जैसी कुरीतियों पर प्रहार करते हुए एक आदर्श मानव समाज की स्थापना का संदेश दिया। उनके उपदेशों में केवल आध्यात्मिकता ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिक मूल्यों की भी गहन व्याख्या मिलती है।

श्री गुरु नानक देव जी ने कर्मकांडों, अंधविश्वास और सामाजिक असमानताओं का खुलकर विरोध किया। वह किसी एक संप्रदाय या धर्म के प्रचारक नहीं थे, अपितु आप जी संपूर्ण मानवता के उद्धारक थे। इतिहास साक्षी है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय उनके उपदेशों के प्रति श्रद्धानत थे परंतु आज कुछ नवोदित बुद्धिजीवी इतिहास की विकृत व्याख्या कर समाज को यह भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं कि सिखों का अस्तित्व केवल मुस्लिमों के विरोध में संघर्ष करने के लिए हुआ। इस संदर्भ में हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सिख इतिहास किसी धर्म विशेष के विरोध का नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतिरोध का प्रतीक है। सिख गुरुजनों के कालखंड से लेकर उनके पश्चात के इतिहास तक, यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि मुस्लिम समाज का सिखों के प्रति प्रारंभ से ही आत्मीय संबंध रहा है।

श्री गुरु नानक देव जी के दिव्य स्वरूप को सर्वप्रथम पहचानने वाले, उनके प्रथम अनुयायी, राय बुलार मुस्लिम समुदाय से थे। इसी प्रकार, उनके अनन्य सखा भाई मरदाना, जो एक कुशल रबाबी थे, जीवनभर गुरुजी के साथ छाया की भाँति रहे और उनकी उदासी यात्राओं में एक अपरिहार्य सहयोगी बने। यह सांझीवालता का एक अनुपम उदाहरण है।

चौथे गुरु, श्री गुरु राम दास साहिब जी ने जब अमृतसर नगर को बसाने का संकल्प लिया और श्री हरमंदिर साहिब का निर्माण प्रारंभ हुआ, तब उसकी नींव मुस्लिम सूफी संत मियां मीर जी के कर-कमलों द्वारा रखवाई गई। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि सिख परंपरा में समावेशिता और धार्मिक सद्भावना का कितना उच्च स्थान था।

इतिहास के और पृष्ठ पलटें तो यह भी ज्ञात होता है कि मुग़ल आक्रांताओं द्वारा किए गए अत्याचारों से न केवल हिंदू समाज, बल्कि मुस्लिम समाज के अनेक वर्ग भी पीड़ित थे। अनेक मुस्लिम परिवार सिख गुरुओं के प्रति अपार श्रद्धा और निष्ठा रखते थे। फिर भी, आज कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी हर मुसलमान में औरंगज़ेब, जकरिया ख़ान, वज़ीर खान और फर्रूखशियार को ही देखने की भूल कर रहे हैं। यह एक संकीर्ण दृष्टिकोण है, जो इतिहास की वास्तविकता से कोसों दूर है।

दशम पिता, श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी, करुणा, क़लम और कृपाण के अद्वितीय संगम थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में 14 युद्ध लड़े, जिनमें से 13 युद्ध उन हिंदू राजाओं के विरुद्ध हुए, जिन्होंने मुग़ल सत्ता के साथ मिलकर आम जनता पर अत्याचार किए। केवल एक युद्ध ऐसा था, जो गुरुजी ने प्रत्यक्ष रूप से औरंगज़ेब के विरुद्ध लड़ा, वह भी तब, जब पहाड़ी राजाओं ने औरंगज़ेब को उनके विरुद्ध भड़काया। इसका सीधा तात्पर्य यह है कि गुरु साहिब का संघर्ष किसी धर्म विशेष के विरोध में नहीं था, बल्कि वह अन्याय और अधर्म के विरुद्ध था।

सिख गुरु हमारे देश की सांझीवालता के सजग प्रहरी थे। इतिहास साक्षी है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने गुरु जी के उपदेशों को आत्मसात किया। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी आज सिख इतिहास को विकृत कर यह भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं कि सिखों ने मुस्लिमों के विरुद्ध युद्ध किए और सिख धर्म का जन्म इसी उद्देश्य से हुआ। किंतु वास्तविकता यह है कि सिख धर्म किसी भी धर्म के विरुद्ध नहीं था, बल्कि अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध था। सिख इतिहास इस बात का प्रमाण है कि मुस्लिम समुदाय का सिखों के प्रति प्रारंभ से ही स्नेह रहा है।

सांझीवालता के स्वर्णिम उदाहरण

पीर बुद्धु शाह का नाम सिख इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उन्होंने और उनके परिवार ने दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से सच्चा प्रेम किया और भंगानी के युद्ध में गुरु जी का साथ दिया। इस युद्ध में पीर बुद्धु शाह ने अपने 400 मसंदों और चार पुत्रों को शहीद करवा दिया। युद्ध उपरांत, गुरु जी ने प्रसन्न होकर उनसे वरदान मांगने को कहा। उस समय गुरु पातशाह कंघी कर रहे थे, और पीर बुद्धु शाह ने विनम्रता से उनकी कंघी में फंसे बालों को माँग लिया। उनकी श्रद्धा और निष्ठा ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया।

मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद खान, जिन्होंने छोटे साहिबज़ादों के प्रति न्याय की आवाज़ उठाई थी, को भी सिख इतिहास में सम्मान पूर्वक स्मरण किया जाता है। जब दशमेश पिता अपने समस्त परिवार की शहादत के पश्चात माछीवाड़े के जंगल में अकेले रह गए, तब उनके सेवक भाई गनी खान और भाई नबी खान ने उन्हें ‘उच्च का पीर’ बनाकर पालकी में बिठाकर सुरक्षित बाहर निकाला। इन दोनों ने अपने परिवारों को भी सिख इतिहास की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब में कई मुस्लिम संतों की वाणी सम्मिलित है, जैसे भक्त कबीर, भक्त शेख फरीद, भक्त भीकन, भक्त सदना, भाई मरदाना रबाबी, आदि। यह स्पष्ट करता है कि सिख धर्म ने सभी समुदायों के संतों को समान रूप से सम्मान दिया।

सिख इतिहास में उल्लेखनीय मुस्लिम व्यक्तित्व

सिख इतिहास में अनेक मुस्लिम व्यक्तित्वों का योगदान उल्लेखनीय रहा है, जिनमें प्रमुख हैं:

  • राय बुलार
  • साई अल्लाह दित्ता
  • सैयद तकी
  • मियां मिट्ठा
  • शाह सरफ
  • हमजा गौस
  • बुड्डन शाह
  • मखदूम बहाउद्दीन
  • पीर दस्तगीर
  • बहलोल दाना
  • सैय्यद हाजी अब्दुल बुखारी
  • पीर अराफ दिन
  • भाई कोटला निहंग खान
  • बीबी कौलां जी
  • बेगम ज़ेबुलनिशा

धर्म की रक्षा और ज़ुल्म के विरुद्ध संघर्ष

सिख धर्म ने हमेशा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। धर्म की चादर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए अपना शीश समर्पित कर दिया। भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी ने भी धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

पंडित कृपाराम जी दत्त, जो दशमेश पिता के साथ नौ वर्ष की आयु से उनके अंतिम समय तक उनके सान्निध्य में रहे, उन्होंने गुरु जी को धार्मिक शिक्षा और युद्ध-कला में निपुण बनाया। उन्होंने भी चमकौर की गढ़ी में बड़े साहिबज़ादों के साथ शहादत प्राप्त की।

निष्कर्ष

इन सभी ऐतिहासिक प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि सिख धर्म का संघर्ष किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध था। आज आवश्यकता है कि हम जात-पात और धार्मिक भेदभाव को त्यागकर सांझीवालता के इस संदेश को आत्मसात करें। समाज में जो विषैली विचारधारा फैलाई जा रही है, वह परमाणु बम से भी अधिक विनाशकारी सिद्ध हो सकती है।

भक्त कबीर जी ने इस सांझीवालता को इन पंक्तियों में संजोया है:

अवलि अलह नूरू उपाइआ कुदरति के सभ बंदे॥

एक नूर ते सभु जगु उपजिआ कउन भले को मंदे॥

(अंग क्रमाँक 1349)

अर्थात, समस्त सृष्टि एक ही ईश्वर के प्रकाश से उत्पन्न हुई है, फिर कौन श्रेष्ठ और कौन निम्न?

आज के परिवेश में, जब समाज विभिन्न विचारधाराओं और संकीर्ण मानसिकताओं के प्रभाव में विभाजित होता जा रहा है, तब हमें पुनः श्री गुरु नानक देव जी और अन्य सिख गुरुओं की शिक्षाओं को आत्मसात करने की आवश्यकता है। उनका संदेश प्रेम, सौहार्द्र और मानवता की एकता का संदेश है।

रमज़ान रोज़ा इफ्तारी और होली मिलन जैसे सांझे उत्सव हमें यह प्रेरणा देते हैं कि हम अपने ऐतिहासिक मूल्यों को समझें, सांप्रदायिक सौहार्द को सुदृढ़ करें और गुरु परंपरा की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए ऐसे समाज की स्थापना करें, जो प्रेम, करुणा और भाईचारे पर आधारित हो। यह समय हमें आत्मविश्लेषण करने और अपने भीतर सद्भावना के भावों को पुनः जाग्रत करने का अवसर प्रदान करता है।

आइए, इस शुभ अवसर पर यह संकल्प लें कि हम अपने समाज में फैले वैमनस्य को समाप्त कर, गुरुजनों की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए एक शांतिपूर्ण, सहिष्णु और न्यायसंगत समाज का निर्माण करेंगे। यही हमारी सच्ची सांझीवालता होगी।

‘हमारी सांझीवालता’ सच्ची देशभक्ति का सबसे उज्ज्वल स्वरूप है। हमें इसे अपनाकर एक समरस समाज की स्थापना करनी चाहिए।


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