सिख जौहरी समाज: परंपरा, संघर्ष और आत्मबोध की विरासत

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सिख जौहरी समाज: परंपरा, संघर्ष और आत्मबोध की विरासत

कभी जिन जौहरियों की पहचान राजाओं-महाराजाओं के राज दरबारों में हीरे-जवाहरात सँभालने वाले विशिष्ट कारीगरों के रूप में थी, वही आज समय की विडंबनाओं से जूझते हुए अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। गुरु नानक पंथी सिखों में से विकसित हुआ सिख जौहरी समाज भारतीय सामाजिक और धार्मिक इतिहास में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण किंतु उपेक्षित अध्याय है। हीरे, मोती और बहुमूल्य रत्नों की परख और संरक्षण की परंपरा सदियों तक इसी समाज के हाथों में रही। ऐसा माना जाता है कि इस समाज के मूल राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र से जुड़े रहे हैं तथा पोथीवाल, चौहान आदि वंशों के माध्यम से इनका संबंध राजपूत घरानों से, विशेषतः राठौड़ और सिसोदियाओं से रहा है।

जो समाज कभी वैभव, प्रतिष्ठा और शान-ओ-शौकत का प्रतीक माना जाता था, आज उसी समाज के अनेक लोग जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गली-गली और गाँव-गाँव भटकने को विवश हैं। इसके बावजूद आज भी सिख जौहरियों में से अनेक लोग पूरे आत्मसम्मान के साथ सिक्खी स्वरूप में सजे हुए हैं। पारंपरिक रूप से जिनका कार्य हीरे-मोती और जवाहरात से जुड़ा रहा, वे अब समय की माँग के अनुरूप कृत्रिम आभूषण, जैसे कानों के टॉप्स, मोतियों की मालाएँ, मंगलसूत्र इत्यादि बनाकर बेचने लगे हैं। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार कोई फुटपाथ पर, तो कोई छोटी-सी दुकान के सहारे, सम्मान पूर्वक जीवन यापन करने का प्रयास कर रहा है।

सन 1984 ई. का कालखंड इस समाज के लिए गहरे घाव लेकर आया। सिक्खी स्वरूप के कारण इन्हें भीषण अत्याचारों का सामना करना पड़ा। भय और असुरक्षा के वातावरण में अनेक लोगों ने अपने केश कटवा लिए और फिर कभी सिक्खी स्वरूप में लौट नहीं सके। महाराष्ट्र के जलगांव ज़िले के इरंडोल क्षेत्र में सिख जौहरियों की एक बस्ती आज भी विद्यमान है। इसके अतिरिक्त ये लोग महाराष्ट्र के चंद्रपुर, धुलिया, भुसावल, बीड़, कमिला, सटाना, चोपड़ा, जलगांव, मालेगांव, तलोदा आदि क्षेत्रों में तथा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, बिहार और कर्नाटक जैसे अनेक राज्यों में फैले हुए हैं।

सिख धर्म से जौहरी समाज का संबंध प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव साहिब जी के काल से ही जुड़ गया था। जब गुरु साहिब ने अपनी पहली उदासी (प्रचार-यात्रा) की, उसी समय सालसराय जौहरी गुरु घर से जुड़ गए। परंपरा यह भी बताती है कि दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के समय पटना (बिहार) के राजा फतेह चंद सैण की रानी, सालसराय जौहरी की वंशज थीं। बाल स्वरूप में गुरु गोबिंद सिंह जी को वोही रानी प्रेमपूर्वक भुंगरनियाँ (नमक-मिर्च लगे चने) खिलाया करती थीं। यह प्रसंग सिख जौहरी समाज की गुरु परंपरा से आत्मीय निकटता को प्रमाणित करता है।

भाई मरदाना का प्रश्न और सालसराय जौहरी

लोक कल्याण की यात्रा में श्री गुरु नानक देव साहिब जी अपने संगियों, बाला और मरदाना के साथ पटना नगर के बाहर डेरा डालकर ठहरे। वहीं भाई मरदाना के मन में एक गूढ़ प्रश्न उठा। उन्होंने निवेदन किया- “बाबा जी, संत-महात्मा और धर्मग्रंथ मानव जीवन को अमूल्य रत्न बताते हैं, फिर मनुष्य इस अमूल्य देन को विषय-विकारों में क्यों गँवा देता है? नाम जपकर जीवन को सफल क्यों नहीं करता?”
गुरु साहिब ने उत्तर दिया- “भाई मरदाना, मानव जन्म वास्तव में अमूल्य रत्न है, पर उसकी कद्र बहुत कम लोग जानते हैं। तुम स्वयं इसकी परीक्षा करके देख लो।”

गुरु जी ने एक कीमती लाल (रत्न) भाई मरदाना को देते हुए कहा कि इसे नगर में ले जाकर इसकी कीमत पूछो। मरदाना ने जब नगर में जाकर उस रत्न को दिखाया, तो किसी ने उसकी कीमत दो मूली बताई, किसी ने एक किलो मिठाई, तो किसी ने दो गज कपड़ा। आगे चलकर जौहरी बाजार में किसी ने दस, किसी ने सौ, किसी ने दो सौ रुपये मूल्य आँका। अंततः जब वह लाल सालसराय जौहरी के सामने रखा गया, तो उसने कहा- “भाई, यह लाल अमूल्य है। करोड़ रुपये भी इसकी सही कीमत नहीं। मैं इसका मूल्य नहीं दे सकता, केवल सौ रुपये नजराने के रूप में स्वीकार कर लो।”

मरदाना सौ रुपये लेकर गुरु चरणों में उपस्थित हुए और पूरी कथा सुनाई। गुरु साहिब ने कहा- “अब तुम्हें उत्तर मिल गया। मानव देह इस लाल की तरह अमूल्य है, पर उसकी पहचान वोही करता है जो सालसराय जैसे परखिए हों। शेष लोग उसे विषय-विकारों में खो देते हैं।” फिर गुरु जी ने मरदाना को आदेश दिया कि यह रुपये वापस लौटा आओ।

जब मरदाना रुपये लौटाने पहुँचे, तो सालसराय ने लेने से मना कर दिया। मरदाना ने कहा- “मेरे स्वामी भी इन्हें स्वीकार नहीं कर रहे।” इस प्रकार गुरु और जौहरी के बीच रुपये लौटाने के कई चक्कर लगे। अंततः सालसराय समझ गया कि यह कोई पूर्ण पुरुष है, जिसे धन का लोभ नहीं। उसने रुपये स्वीकार किए और अपने सेवक अधरक्का अरोड़ा को मिठाइयों के साथ गुरु जी के दर्शन हेतु भेजा।

गुरु साहिब ने कहा- “यह भाई मरदाना के प्रश्न का पूर्ण उत्तर है। जिन पर करतार ने बुद्धि की कृपा की है, वोही मनुष्य देह की कद्र जानते हैं; अन्यथा विषय-विकारों में फँसकर पश्चाताप ही शेष रहता है। परमेश्वर की भक्ति और ज्ञान के बिना मानव जीवन पशु के समान है।”

सालसराय गुरु साहिब को अपनी धर्मशाला ले आए और अत्यंत श्रद्धा से सेवा की। गुरु जी तीन माह तक वहीं ठहरे और संगत को उपदेश देकर निहाल करते रहे। प्रस्थान के समय संगत ने निवेदन किया- “अब आपके बाद हमारा मार्गदर्शन कौन करेगा?” तब गुरु जी ने सालसराय के सेवक अधरक्का को मंजी प्रदान की। इसके पश्चात सालसराय ने अपनी संपन्नता की परवाह किए बिना, सर्वप्रथम उसी सेवक के चरणों में शीश नवाया।

प्रस्थान के समय सालसराय के प्रश्न पर गुरु जी ने कहा- “गुरमुखों को सदा दर्शन होते हैं,” और पटना नगर को वरदान दिया कि यहाँ भविष्य में इस स्थान पर एक सतपुरुष प्रकट होगा। यही नगर आगे चलकर दसवें पातशाह की जन्मभूमि बना। इसी सालसराय की संतानों में विजय चंद मैणी खत्री हुए, जो गुरु गोबिंद सिंह जी के परम भक्त थे और जिनके घर बाल गुरु सदा खेला करते थे।

शिक्षा

यह प्रसंग हमें सिखाता है कि विषय-विकारों में उलझने के स्थान पर नाम-सिमरण द्वारा अमूल्य मनुष्य जन्म को सफल बनाना चाहिए, मिथ्या अहंकार का त्याग कर गुरमुखों की संगत अपनानी चाहिए, और अपने उन सिख भाई-बहनों की ओर संवेदनशील दृष्टि रखनी चाहिए जो आज भी उपेक्षा के बावजूद सिक्खी की मर्यादा को सँजोए हुए हैं।

उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट है कि- सिख समाज में जौहरी सिखों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है; सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक हर दृष्टि से इनकी स्थिति दयनीय है। इन साधारण से दिखने वाले सिखों में असाधारण प्रतिभा छिपी हुई है। इस प्रतिभा को अशिक्षा और गरीबी के चंगुल से बाहर निकालने के लिए जौहरी सिखों की बस्तियों में, शैक्षणिक संस्थान, तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र और आधुनिक तकनीकी ज्ञान की नितांत आवश्यकता है।

सामान्य धारणा है कि जौहरी सिखों के बच्चों में जन्मजात पारखी नजर और सुलभ बुद्धि होती है, किंतु औपचारिक शिक्षा और आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण के अभाव में ये कुशल और प्रतिभाशाली लोग दर – दर भटकने को विवश हैं। यदि जौहरी सिख समुदाय की नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीकी शिक्षा और अवसर प्रदान किए जाएँ, तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आ सकते हैं।

आभार-

उपरोक्त आलेख डॉ. हरप्रीत कौर खुराना ([email protected]) द्वारा जौहरी सिख समाज पर किए गए गहन, शोधपरक और मार्गदर्शन लेखन से प्रेरित होकर लिखा गया है। जौहरी सिखों के जीवन, परंपरा और परिवर्तनशील सामाजिक यथार्थ पर उनके अकादमिक कार्य ने इस विषय को समझने की सुदृढ़ वैचारिक भूमि प्रदान की है। मैं उनके इस महत्त्वपूर्ण शोध योगदान के प्रति हार्दिक कृतज्ञता एवं सादर आभार व्यक्त करता हूँ।

सादर आभार सहित

-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’


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