सिंधी सिख : इतिहास, आस्था और समकालीन यथार्थ
सिंधी सिखों का संबंध सिंध प्रांत से है, जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है। सन 1947 ई. से पूर्व, जब देश का विभाजन नहीं हुआ था, उस समय सिंध प्रांत में हिंदुओं और मुसलमानों की जनसंख्या का अनुपात लगभग 20% और 80% था। सिंध प्रांत की एक विशिष्ट विशेषता यह थी कि इतनी अधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद वहाँ कभी भी सांप्रदायिक तनाव नहीं पनपा। दोनों समुदायों के बीच पारस्परिक सौहार्द, सहयोग और सह-अस्तित्व की परंपरा बनी रही। गैर-मुस्लिम सिंधियों पर कृषि भूमि खरीदने और उसका स्वामित्व रखने पर प्रतिबंध था, किंतु अंग्रेज़ी शासनकाल में यह प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया। व्यापार और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से सिंधी हिंदुओं ने उल्लेखनीय समृद्धि अर्जित की। वे आर्थिक रूप से संपन्न थे और उनकी सम्पन्नता के कारण कई स्थानीय मुस्लिम निर्धन वर्ग को उन पर आश्रित होना पड़ता था।
सिंधी सिखों पर विचार करने से पूर्व, वहाँ के हिंदू समाज को समझना आवश्यक है कारण सिंधी सिखों का विकास और उद्भव सिंधी हिंदू समाज के भीतर से ही हुआ।
सिंधी समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सन 715 ईस्वी तक सिंध प्रांत पूर्णतः हिंदू समाज और धर्म का क्षेत्र था। इसी काल में सिंध के हिंदू राजाओं को पराजित कर, मुस्लिम आक्रमणकारी मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर पहली इस्लामी सत्ता स्थापित की। यह भारतीय उपमहाद्वीप पर पहला इस्लामी आक्रमण और विजय थी। इसके पश्चात् लंबे समय तक भारत के द्वार मुस्लिम आक्रमणकारियों के लिए खुले रहे, जब तक कि पंजाब में विकसित हुई सिख शक्ति ने न केवल इन आक्रमणों को रोका, बल्कि आगे बढ़कर शेर – ए – पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों पर भी अधिकार स्थापित कर लिया।
मुहम्मद बिन क़ासिम को किसी कारणवश ख़लीफ़ा द्वारा मृत्युदंड दे दिया गया। इसके परिणामस्वरूप, सिंध में हिंदुओं के व्यापक नरसंहार और लूटपाट का दौर समाप्त हो गया। उनकी अनुपस्थिति में अन्य मुस्लिम अधिकारियों ने सिंध की पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था को ही जारी रखा, जिसमें हिंदू और सिंधी अधिकारियों की संख्या अधिक थी। साथ ही, इस्लाम के प्रचार हेतु बड़ी संख्या में मुल्ला, मौलवियों को लाया गया। इन प्रचारकों को आवश्यक सुविधाएँ प्रायः मुस्लिम शासन के अधीन हिंदू अधिकारियों द्वारा ही प्रदान की जाती थीं। इसका परिणाम यह हुआ कि सिंध में इस्लाम का प्रसार बिना रक्तपात के शांतिपूर्वक हुआ।
धीरे – धीरे मुस्लिम जनसंख्या बढ़कर लगभग 80% तक पहुँच गई, किंतु हिंदुओं और सिंधी मुसलमानों के बीच कभी स्थायी टकराव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। यह सौहार्दपूर्ण स्थिति सन 1947 ई. के भारत-पाक विभाजन के समय भी बनी रही। सिंधी मुसलमान, सिंधी हिंदुओं और सिखों को सिंध छोड़ने से रोकते रहे, किंतु भारत से आए कुछ मुस्लिम शरणार्थियों द्वारा सिंधी सिखों पर हमले किए जाने लगे, जिससे सिखों को सिंध छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। इसके बावजूद, कुछ सिंधी हिंदू वहीं रह गए, जिनमें सिखों की संख्या लगभग अस्सी हज़ार से एक लाख के बीच आँकी जाती है। पाकिस्तान में रहने वाला यही वर्ग आज भी वहाँ स्थित गुरुद्वारों के दर्शन हेतु आने वाले सिख श्रद्धालुओं की सेवा और स्वागत अत्यंत श्रद्धा एवं सम्मान के साथ करता है।
सिंधी सिखों की उत्पत्ति
ऐसा माना जाता है कि लगभग सन 1508 ईस्वी के आसपास श्री गुरु नानक देव साहिब जी भुज और कच्छ क्षेत्र में पधारे थे। इसके अतिरिक्त, मक्का – मदीना की यात्रा के समय भी गुरु साहिब सिंध प्रांत से होकर गुज़रे थे। इस दौरान उनके उपदेशों और दर्शन के प्रभाव से अनेक सिंधी हिंदू, मुसलमान और सूफ़ी गुरु-घर से जुड़ गए। गुरबाणी के स्पष्ट और सार्वभौमिक संदेश के कारण अधिकांश सिंधी हिंदू उससे गहराई से प्रभावित हुए। इस सत्य पर लगभग पैंतीस वर्ष बाद बाबा श्रीचंद जी की यात्रा ने और भी दृढ़ मुहर लगा दी। आगे चलकर उदासी संप्रदाय के अनेक साधुओं ने सिंध प्रांत में अपने – अपने डेरे स्थापित किए। सक्खर के निकट सिंधु नदी के एक द्वीप पर स्थित ‘साधु बेला’ की स्थापना मीहां शाही शाखा के एक उदासी साधु बाबा बनखंडी ने सन् 1823 ईस्वी में की थी, जो आज एक अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित है। श्री गुरु नानक देव साहिब जी के वंशज बाबा गुरुपत जी ने सिंध प्रदेश में ‘जिज्ञासु’ नामक एक उप-संप्रदाय का भी प्रचार किया। उदासी साधु बाबा स्वरूप दास ने शिकारपुर नगर में श्री गुरु नानक देव जी की धर्म-साधना का एक केंद्र स्थापित किया।
उदासी साधुओं के अतिरिक्त निर्मल संतों ने भी सिंध में सिख धर्म का व्यापक प्रचार किया और अनेक डेरे स्थापित किए। वहाँ प्रचार करने वालों में महंत बुद्धा सिंह, संत गुलाब सिंह, संत प्रीतम सिंह आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सिंघ सभा आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने भी सिंध में सिक्खी का खूब प्रचार किया। चीफ खालसा दीवान के कार्यकर्ता भी इस दिशा में अत्यंत सक्रिय रहे। संत अतर सिंह मस्तुआणे वाले, भाई अर्जुन सिंह बागड़ियां वाले, सरदार हरबंस सिंह अटारी वाले, भाई हीरा सिंह रागी तथा सेवा पंथ के धार्मिक नेताओं ने भी कई बार वहाँ जाकर सिख धर्म का प्रचार किया।
इनके अतिरिक्त स्वयं सिंधी सिखों ने भी सिक्खी के प्रचार में गहरी रुचि दिखाई। इस संदर्भ में साधु टी. एल. वासवानी और दादा चेलाराम जैसे नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देश-विभाजन से पूर्व प्रतिवर्ष कथावाचक, प्रचारक और कीर्तनिए सिख प्रचार के लिए सिंध प्रांत जाते रहते थे।
हालाँकि, सिंधी सिखों में गुरसिखी के साथ-साथ उदासी मत, सूफ़ी प्रभाव तथा हिंदू मूर्ति पूजा की परंपराएँ भी किसी न किसी रूप में बनी रहीं। आगे चलकर सिंध में सिंधी सिखों ने धर्मशालाएँ स्थापित कीं, जहाँ गुरबाणी का पाठ, शिक्षण और गायन होता था। वे पंजाब स्थित श्री ननकाना साहिब और अमृतसर जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों की यात्राएँ करने लगे। इस प्रकार सिंधी सिखों का सिख मुख्यधारा से घनिष्ठ संबंध स्थापित होता गया। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस प्रक्रिया का न तो सिंधी मुसलमानों ने और न ही हिंदुओं ने कभी विरोध किया। निस्संदेह, यह सिंधियों की प्राचीन सहिष्णुता और धार्मिक उदारता का ही परिणाम था।
इस काल तक सिंधी सिख प्रायः सहजधारी ही थे। केशधारी और अमृतधारी सिंधी सिखों की उपस्थिति का उल्लेख सन 1901 ई. के आसपास से मिलता है। उस समय दरबार साहिब, अमृतसर के हज़ूरी रागी भाई शाम सिंह जी ने अपनी सिंध यात्राओं के दौरान अमृत प्रचार आरंभ किया। इसके फलस्वरूप अनेक सहजधारी सिंधी सिख अमृतधारी बने और उनकी संख्या लगभग एक लाख तक पहुँच गई।
सन 1947 ई. तक केशधारी और अमृतधारी सिंधी सिखों की संख्या कम से कम दो लाख थी। इनमें से लगभग पचास हज़ार सिख पाकिस्तान में ही रह गए, जबकि लगभग डेढ़ लाख सिंधी सिख शरणार्थी बनकर भारत आ गए। इनमें से कम से कम बीस हज़ार सिख विदेशों में बस गए, जहाँ आज उनकी संख्या पचास हज़ार से कम नहीं मानी जाती।
पाकिस्तान के सिंधी सिख
पाकिस्तान में रहने वाले सिंधी सिखों की संख्या लगभग पचास हज़ार मानी जाती है। इनकी अधिकांश आबादी सिंध प्रांत में ही निवास करती है। समूचा भारतीय सिख समाज इनका अत्यंत कृतज्ञ है कारण श्री ननकाना साहिब, श्री पंजा साहिब तथा अन्य ऐतिहासिक गुरुधामों के दर्शन हेतु आने वाली भारतीय सिख संगत की सेवा, सत्कार और आतिथ्य का दायित्व ये सिंधी सिख प्रेमपूर्वक निभाते हैं। इनका सिंध में निवास प्राचीन काल से चला आ रहा है। यद्यपि दूर – दराज़ के कस्बों और गाँवों में गुरुद्वारे उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी इन गुरु-प्रिय सिखों ने प्रत्येक ज़िले के मुख्यालय नगर में कम – से – कम एक गुरुद्वारा अवश्य स्थापित किया हुआ है। आज तक सिंधी सिखों और मुसलमानों के बीच किसी भी प्रकार के टकराव की कोई घटना सामने नहीं आई है। सिंधी सिख व्यापार, दुकानदारी, साहूकारी तथा सरकारी सेवाओं से जुड़े हुए हैं। वे आर्थिक रूप से समृद्ध हैं और स्थानीय समाज में उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त है। इतनी अल्पसंख्यक संख्या में होते हुए भी पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी वातावरण वाले देश में आदर और प्रतिष्ठा के साथ रह पाना वास्तव में सिंधी सिखों की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, जिससे संपूर्ण सिख समाज को प्रेरणा लेनी चाहिए।
गुरु पंथ के लिए सिंधी सिखों का संभावित योगदान
सिंधी सिखों में शिक्षा का स्तर शत-प्रतिशत है और उनमें बेरोज़गारी लगभग न के बराबर है। उनका रहन-सहन और जीवन-शैली उच्च स्तर की है। इन्हीं गुणों के कारण भारतीय समाज में भी सिंधी सिखों का सामाजिक दर्जा अत्यंत ऊँचा और सम्मानजनक है। यह स्थिति संपूर्ण गुरु पंथ खालसा के लिए गर्व का विषय है। सिंधी सिखों की दूरदर्शी योजनाओं, आर्थिक सामर्थ्य और संगठन क्षमता से पूरा सिख समाज लाभ उठा सकता है। वे अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में योग्य सिख युवाओं को रोजगार प्रदान कर सकते हैं, जैसा कि पंजाब एंड सिंध बैंक के चेयरमैन सरदार इंद्रजीत सिंह ने एक अनुकरणीय उदाहरण देश में प्रस्तुत किया था।
शिक्षित, अनुभवी और दूरदृष्टि संपन्न सिंधी सिख, पंथक समस्याओं के समाधान में नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं तथा सिख समाज को अनपढ़ और अल्प दृष्टि वाले नेताओं द्वारा चलाए जाने वाले आंदोलनों के संभावित खतरों से बचा सकते हैं। सिंधी सिखों का अन्य समुदायों- जैसे मारवाड़ी, गुजराती और मुंबई के निवासी वर्ग से घनिष्ठ संबंध और सौहार्द है। इन समुदायों में सिखों की सकारात्मक छवि प्रस्तुत करने में सिंधी सिख महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। समृद्ध सिंधी सिखों को पंजाब में उद्योग-धंधे स्थापित करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, जिससे सिख युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकें। यह सब तभी संभव है, जब दोनों ओर से सहयोग हो अर्थात् सिक्खी की मुख्यधारा में भी सिंधी सिखों को पूरा मान-सम्मान और उचित महत्व देना आवश्यक है।
सहजधारी सिंधी सिखों के प्रति सिख समाज का कर्तव्य
सहजधारी सिंधी सिख, सिख समाज का अत्यंत प्रिय और संवेदनशील वर्ग हैं। गुरबाणी के प्रति उनका प्रेम और आदर असीम है। यद्यपि वे केशधारी नहीं हैं, फिर भी गुरु साहिबानों के प्रति उनकी श्रद्धा और सम्मान किसी भी रूप में कम नहीं अपितु अनेक बार अधिक ही प्रतीत होता है। हाल के वर्षों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप की प्राप्ति से संबंधित कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनके कारण सहजधारी सिखों को अपने घरों या गुरुद्वारों में गुरु साहिब के स्वरूप प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति उनके प्रेम, सेवा और श्रद्धा को देखते हुए दूर की जानी चाहिए।
पंजाब से बाहर रहने वाली सहजधारी सिंधी सिखों की नई पीढ़ी गुरुमुखी लिपि से प्रायः अपरिचित है। अतः उनके लिए हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी भाषाओं में गुरबाणी की उपलब्धता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। सहजधारी सिंधी सिख निश्चित ही सिख कौम की एक प्रकार से रक्षा-दीवार के समान हैं। उनकी देखभाल, संरक्षण और सम्मान सिख समाज का नैतिक दायित्व और कर्तव्य है।
सिंधी सहज धारियों की श्रद्धा के अद्भुत उदाहरण
इस आलेख में सहजधारी सिंधी सिखों की गुरबाणी के प्रति श्रद्धा, आस्था और पूर्ण समर्पण की कुछ प्रत्यक्ष देखी गई घटनाओं को प्रस्तुत करना अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है। इन उदाहरणों से रूबरू होते ही मन स्वतः ही स्वयं को अत्यंत लघु अनुभव करने लगता है और उन सिंधी सिख भाई-बहनों का गुरमुख व्यक्तित्व एक उच्च, विरल और प्रेरणादायी शिखर पर प्रतिष्ठित दिखाई देता है। इन प्रसंगों का साक्षात्कार करने पर पाठक भी अनायास उसी भावभूमि में पहुँच जाता है, जहाँ श्रद्धा से मस्तक स्वयं ही नत हो जाता है और इन गुरु-प्रिय आत्माओं के चरणों में शीश झुकाने को मन हो उठता है।
पहला उदाहरण एक सिंधी युवती का है, जिसका विवाह भी उस समय नहीं हुआ था। वह दिल्ली के जनपथ रोड पर ‘बर्ड एंड कंपनी’ में कार्यरत थी। उसके पर्स में एक रुमाल में लिपटा हुआ एक अत्यंत छोटा-सा गुटका साहिब हमेशा रहता था, जिसका आकार लगभग तीन गुणा दो इंच था। कहा जाता है कि वह संपूर्ण गुरबाणी का स्वरूप था, जो जर्मनी में मुद्रित हुआ था। वह युवती अपनी ड्यूटी के दौरान बार – बार उस गुटके को पर्स से निकालकर श्रद्धापूर्वक दर्शन करती, नमस्कार करती और कभी – कभी किसी पृष्ठ को देख भी लेती। यद्यपि वह यह कार्य गुप्त रूप से करती थी, फिर भी यह बात लोगों की दृष्टि से छिप नहीं पाती थी। बार – बार आग्रह करने पर भी उसने वह गुटका किसी को दिखाने से दृढ़तापूर्वक मना कर दिया। उसका कथन था कि- “गुरबाणी मेरे जीवन और मेरे परिवार की रक्षा और सफलता का आधार है। मैं इससे हर क्षण जुड़ी रहूँगी और आनंद में जीवन व्यतीत करूँगी।” वह युवती पहनावे में सहजधारी थी, किंतु उसके घर में नियमित नितनेम होता था।
दूसरा उदाहरण एक नवविवाहिता सिंधी युवती का है, जिसके मायके और ससुराल दोनों ही सहजधारी सिख परिवार थे। उसके ससुर के पिता स्वस्थ और संपन्न व्यक्ति थे। परिवार में तीन पुत्र थे। मध्य पुत्र के एकमात्र पुत्र से उस युवती का आनंद कारज (परिणय बंधन) संपन्न हुआ था। बड़े पुत्र की कोई संतान नहीं थी और छोटे पुत्र की दो बेटियाँ थीं, जिनका विवाह हो चुका था। सबसे बड़ा पुत्र ‘मैक्स फैक्टर’ कंपनी से सेवानिवृत्त हुआ था। सेवानिवृत्ति के बाद वह अपने अवकाश समय में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पाठ करना चाहता था, किंतु जिस स्वरूप का प्रकाश घर में था, उसका पाठ प्रायः उसके पिता ही करते रहते थे। समाधान के रूप में उसने अपने घर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का एक और प्रकाश स्थापित कर लिया। इस प्रकार घर में दो गुरु-प्रकाश हो गए और पिता-पुत्र प्रेमपूर्वक गुरबाणी का रसास्वादन करने लगे।
इसी अवधि में मध्य पुत्र के पुत्र का विवाह हुआ। विवाहोपरांत जो बहू उस घर में आई, वह गुरमुख, गुरबाणी प्रेमी परिवार की संतान थी। उसके पिता ने दहेज में बहुत कुछ दिया, किंतु सबसे महान दान था- प्रथम संस्करण सहित श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का एक संपूर्ण स्वरूप, रुमालों और आवश्यक सामग्री सहित। साथ ही उन्होंने दृढ़ निर्देश दिया कि प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक प्रकाश कर, हुक्मनामा लिया जाए। विवाह के पश्चात् उस युवती ने अपने पति, ससुर और परदादा को अपने पिता की इस आज्ञा के बारे में बताया और मायके से लाए गए गुरु-स्वरूप के प्रकाश की व्यवस्था करने का निवेदन किया, जिसे परिवार ने प्रसन्नता से स्वीकार किया। इस प्रकार उस घर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के तीन – तीन प्रकाश हो गए। उस परिवार पर सुख और कृपा की वर्षा होने लगी। यह परिवार दिल्ली में निवास करता है।
तीसरा उदाहरण भी दिल्ली के एक सिंधी परिवार से संबंधित है, जहाँ गुरबाणी के प्रति श्रद्धा के साथ – साथ माता – पिता के सम्मान और सेवा की अद्भुत शिक्षा मिलती है। परिवार का मुखिया बर्तनों और धातुओं का एक बड़ा व्यापारी है। पाकिस्तान बनने के बाद यह परिवार शरणार्थी के रूप में दिल्ली आया था। उस समय उनके पास कुछ भी नहीं था। परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं, किंतु गुरु पर उनका अटूट विश्वास था। वे निरंतर श्री गुरु नानक देव साहिब जी को स्मरण करते रहते और कष्टों से मुक्ति की आशा रखते। अंततः गुरु की कृपा से उन्हें कार्य का मार्ग मिला। किसी प्रकार सौ रुपये की व्यवस्था कर उन्होंने सड़क किनारे बैठकर पीतल के बर्तन बेचना आरंभ किया। प्रारंभ में वे केवल पीतल के गिलास और कटोरियाँ ही बेचते थे। गुरु की कृपा और अपनी मेहनत से उनका कार्य सफल होने लगा। उससे न केवल परिवार का भरण-पोषण होने लगा अपितु एक छोटे-से घर का किराया भी निकलने लगा और कुछ बचत भी होने लगी। समय के साथ यह परिवार बड़े व्यापारी बन गया और कारों व कोठियों का स्वामी हो गया।
इस परिवार ने अपने घर के भूतल पर एक सुंदर कक्ष में अत्यंत श्रद्धा और भव्य साज-सज्जा के साथ श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश किया था। पूरा परिवार प्रेम और समर्पण से सेवा करता और मनवांछित फल प्राप्त करता रहा। भूतल पर प्रकाश करने का कारण यह था कि परिवार के मुखिया को बढ़ती आयु के कारण घुटनों में दर्द रहने लगा था और सीढ़ियाँ चढ़ना कठिन हो गया था।
इसी दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। एक संस्था, जो स्वयं को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सम्मान की प्रहरी बताती थी, जबरन हस्तक्षेप करने लगी। उसके कुछ युवक उन घरों या संस्थानों में पहुँच जाते, जहाँ उदासी, सहजधारी या अन्य समुदायों द्वारा गुरु-प्रकाश किया गया होता, और वे गुरु स्वरूप को बलपूर्वक उठा ले जाते। ऐसी घटनाओं की खबरें पढ़-सुनकर यह परिवार भी भयभीत हो गया। इसी भय के कारण उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश तीसरी मंज़िल के एक छोटे-से कमरे में स्थानांतरित कर दिया। अब प्रतिदिन प्रातः और सायं परिवार का मुखिया घुटनों के दर्द को सहते हुए बड़ी कठिनाई से तीसरी मंज़िल पर जाकर दर्शन करता और माथा टेकता है।
इन कष्टों से गुरु तो भली – भाँति परिचित हैं; परंतु प्रश्न यह है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का जबरन “सम्मान” करवाने वालों को गुरु कौन-सी शाबाशी देंगे? उस परिवार ने भूतल (ग्राउंड फ़्लोर) के उस कक्ष को, जहाँ पहले गुरु-प्रकाश होता था, आज भी उसी अवस्था में खाली रखा हुआ है। वहाँ पीढ़ा, सिरहाने और रुमाले यथावत रखे हैं, ताकि यदि कभी तथाकथित ‘सत्कार सभाओं’ के लोग आ जाएँ, तो यह परिवार विवश होकर यह कह सके कि- हाँ, पहले हमारे घर में गुरु-प्रकाश होता था, परंतु आपके भय के कारण हमने उसे बंद कर दिया। देखिए, यह परिवार गुरु साहिब के दर्शन और सेवा भी छिप-छिपकर, चोरी-चोरी करता रहा है। गुरु कृपा करें।
इसी बीच एक और घटनाक्रम घटित हुआ। परिवार के वृद्ध मुखिया और उनकी पत्नी दिल्ली की भीषण गर्मी सहने में असमर्थ हो गए थे। उनके आज्ञाकारी और समर्पित इकलौते पुत्र ने हिमाचल प्रदेश के सोलन में उनके लिए एक फ़्लैट लेकर रहने की व्यवस्था कर दी। आजकल परिवार का सारा व्यापार वही पुत्र संभाल रहा है। माता-पिता मई, जून की तपती गर्मी से बचने के लिए सोलन चले तो गए, जहाँ मौसम शीतल था और स्वास्थ्य की कोई विशेष समस्या नहीं थी परंतु श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से बिछोह का दुःख उन्हें भीतर ही भीतर व्याकुल किए हुए था। उनके फ़्लैट में गुरु-प्रकाश नहीं था; दर्शन और सेवा के बिना उनका मन तड़पता रहता था।
इसी बीच दिल्ली में एक और संयोग बना। सोलन गए वृद्ध दंपति के पुत्र का एक मित्र, जो शराब पीने के कारण पेट की बीमारी से ग्रस्त होकर अस्पताल में भर्ती था, एक सिख ट्रांसपोर्टर था। उस ट्रांसपोर्टर का हालचाल जानने यह सिंधी सहजधारी मित्र अस्पताल पहुँचा। बातचीत के दौरान ट्रांसपोर्टर ने सोलन में रह रहे “अंकल – आंटी” का हाल पूछा। उत्तर में सिंधी भाई ने कहा- “मम्मी – पापा इन दिनों बहुत दुखी हैं।” कारण पूछने पर उसने बताया- “स्वास्थ्य तो ठीक है, पहाड़ों का मौसम भी सुहावना है, पर घर में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश नहीं है; इसी कारण वे हर समय उदास रहते हैं।”
“तो इसमें कठिनाई क्या है? आप श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी ले जाकर प्रकाश कर दीजिए,” ट्रांसपोर्टर ने सहज भाव से सुझाव दिया। सिंधी सहजधारी ने दुःख प्रकट करते हुए कहा- “यह इतना सरल नहीं है। शिरोमणि कमेटी वही स्वरूप देती है, जब कोई अमृतधारी सिंह स्वयं आकर उसे किसी सिंह के घर ले जाए।”
“छोड़िए जी, कमेटी की बातें। सारा इंतज़ाम मैं करूँगा,” ट्रांसपोर्टर जो स्वयं शराब का आदी था ने मित्रता निभाते हुए कहा। उसने अमृतसर स्थित अपने कार्यालय के प्रबंधक से कहकर गुरु साहिब जी का एक स्वरूप सोलन भिजवा दिया। सोलन में किसी ‘सत्कार समिति’ का भय नहीं था, और श्रद्धालु सहजधारी माता – पिता आज श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की सेवा और दर्शन का आनंद लेकर प्रसन्नता से दिन व्यतीत कर रहे हैं। इस प्रकार सिंधी परिवारों में ऐसी अनेक मिसालें हैं, जो गुरु के प्रति उनके अपार प्रेम को उजागर करती हैं।
भारत में बसे सिंधी प्रारंभ में सिख धर्म के अत्यंत निकट रहे और उन्होंने कई गुरुद्वारे भी स्थापित किए, किंतु धीरे-धीरे वे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के प्रति पूर्ण आस्था रखते हुए भी सिक्खी से कुछ दूरी बनाते जा रहे हैं। वे अपने गुरुधामों को गुरुद्वारों के स्थान पर मंदिर अथवा आश्रम कहलाना स्वीकार कर लेते हैं। स्वभावतः वे शांत, सज्जन और सौम्य प्रवृत्ति के हैं। ‘सिख पंथ विश्वकोश’ के कर्ता डॉ. रतन सिंह जग्गी के अनुसार, ये सिख आध्यात्मिकता में विश्वास रखते हैं, परंतु कट्टरता से दूर रहते हैं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति की स्थापना और उसके बाद उसमें राजनीति के प्रवेश के कारण वे अपने गुरुधामों को असुरक्षित मानने लगे हैं।
दूसरी ओर, सिख धर्म में बढ़ती कट्टरता और कर्मकांडीय प्रवृत्तियाँ भी इन्हें भयभीत करती हैं। मताधिकार के प्रश्न पर केशधारी सिखों को पंथ से दूर रखने की प्रवृत्ति ने भी इन्हें सिक्खी से विमुख किया है। यद्यपि ये सिख पंथ की सर्वोच्च संस्था से कुछ दूरी बनाते जा रहे हैं, फिर भी निर्मल और उदासी संप्रदायों के अत्यंत निकट बने हुए हैं। इन संप्रदायों द्वारा संचालित विद्यालयों और समाज-सेवा केंद्रों में सिंधी सिख खुलकर दान देते हैं।
अनेक समृद्ध सिंधी सिख अपने घरों में गुरु-प्रकाश करते हैं। बच्चों के नाम श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी से हुक्म लेकर रखते हैं और विवाह-संस्कार भी आनंद कारज विधि से गुरु-साहिब की उपस्थिति में संपन्न करते हैं। विदेशों में भी उन्होंने अनेक गुरुद्वारे स्थापित करवाए हैं। गुरु-घर से उनका प्रेम असीम है। डॉ. रतन सिंह जग्गी के अनुसार, यदि सिख पंथ में चल रही कट्टरता की यह प्रवृत्ति यूँ ही चलती रही, तो जैसे – जैसे अन्य संप्रदाय गुरु पंथ से दूर होते गए हैं, वैसे ही पंथ का एक और बड़ा वर्ग भी उससे अलग हो जाएगा, जिसका प्रभाव कौम के विकास पर गंभीर परिणाम उत्पन्न करेगा। शिरोमणि समिति पर चढ़ा राजनीतिक आवरण इस स्थिति का प्रमुख कारण है। शिरोमणि समिति तथा समस्त पंथक नेतृत्व और संगठनों को एकजुट होकर गुरु पंथ के विस्तार और विकास पर गंभीर विचार करना चाहिए।
गुरु-घर के प्रेमियों और नानक नाम-लेवाओं को एक निशान के नीचे एकत्र करने के लिए खुले हृदय से उनका स्वागत किया जाना चाहिए। जिस प्रकार राष्ट्रीय शक्ति बिखर रही है, उस पर चिंतन और स्वस्थ प्रयास अनिवार्य हैं। श्री गुरु नानक देव साहिब जी के प्रकाश पर्व की छठी अर्ध-शताब्दी के आयोजनों में सिंधी समाज द्वारा की गई सेवाएं उल्लेखनीय रही, इन सेवाओं ने गुरु पंथ खालसा के सभी सेवादारों का मन मोह लिया था। आज धर्म से जुड़े अनेक पहलू ऐसे हैं, जिनका सम्यक मूल्यांकन आवश्यक है।
आभार–प्रकटन
मेरे इस लेख ‘’सिंधी सिख : इतिहास, आस्था और समकालीन यथार्थ’ के सृजन में जिन विद्वान लेखकों के लेखन से वैचारिक दिशा, ऐतिहासिक आधार और भावात्मक प्रेरणा प्राप्त हुई, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मेरा नैतिक और साहित्यिक दायित्व है।
सर्वप्रथम, प्रतिष्ठित लेखक दलजीत सिंह जी बेदी– जो सुप्रसिद्ध साहित्यकार बेदी लाल सिंह जी के पुत्र हैं के प्रति मैं अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। आपका गुरुमुखी आलेख ‘सिंधी सिखां दी सिख धर्म संबंधी श्रद्धा भावना’ (ग्रंथ : भूले-बिसरे नानक पंथी) मेरे इस लेख का एक महत्वपूर्ण आधार रहा है। सिख धर्म और सिख कौम से जुड़े व्यक्तित्वों पर आपका गहन, संतुलित और तथ्यपरक लेखन मेरे लिए मार्गदर्शक सिद्ध हुआ। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति और चीफ खालसा दीवान द्वारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मारक ग्रंथों के संपादन में आपका योगदान सिख इतिहास के संरक्षण की दिशा में अत्यंत सराहनीय है।
इसी प्रकार, आदरणीय कर्मजीत सिंह औजला जी- प्रख्यात लेखक, चिंतक और साहित्यिक संस्था ‘सिरजणहारा’ के अध्यक्ष के प्रति भी मैं विशेष कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। आपका गुरुमुखी आलेख ‘सिंधी सिख’ (ग्रंथ : भूले-बिसरे नानक पंथी) इस विषय को समझने और प्रस्तुत करने में मेरे लिए अत्यंत सहायक रहा। आपके बहुआयामी साहित्यिक योगदान, चाहे वह उपन्यास हो, नाटक, लघुकथा, इतिहास, धर्म या दर्शन- सदैव शोधार्थियों और लेखकों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे हैं।
इन दोनों विद्वान लेखकों के लेखन से प्रभावित होकर ही मैंने ‘‘’सिंधी सिख : इतिहास, आस्था और समकालीन यथार्थ’ विषय पर यह लेख लिखने का साहस किया है। मेरे इस प्रयास में यदि कोई सार्थकता और प्रामाणिकता दृष्टिगोचर होती है, तो उसका श्रेय इन दोनों लेखकों की वैचारिक प्रेरणा और साहित्यिक विरासत को ही जाता है। मैं हृदय से इन दोनों के प्रति अपना विनम्र आभार और सम्मान प्रकट करता हूँ।
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’ पुणे।©






