विनम्र श्रद्धांजलि (भोग): डॉ॰ मनमोहन सिंह जी (भारत के पूर्व प्रधानमंत्री)

Spread the love

 विनम्र श्रद्धांजलि (भोग): डॉ॰ मनमोहन सिंह जी (भारत के पूर्व प्रधानमंत्री)

भलो भलो रे कीरतनीआ।

राम रमा रामा गुन गाउ ।

छोड़ि माइआ के धंध सुआउ॥ 

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक 885)


संगत जी, स्नेही पाठकों आज दिनांक 03/01/2025 के दिवस पर हम एक ऐसी महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, जिन्होंने अपनी संपूर्ण आयु देश सेवा करते हुए अर्थशास्त्र को अपनी सांस-सांस में आत्मसात किया और देश एवं सिख समाज की निष्काम सेवाओं में अपना जीवन समर्पित कर “गुरु पंथ खालसा” के सेवादार और बेमिसाल अर्थशास्त्री के रूप में विश्व के मानस पटल पर स्वयं का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया। हरमन प्यारे, महान निष्काम, समर्पित सेवादार, देशभक्त, गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी कर्मठ, कर्मयोगी, हठयोगी, समाज सुधारक, लोकनायक, परोपकारी, मृदुभाषी, अर्थशास्त्र के महान विद्वान, गंभीर प्रकृति के मौन तपस्वी और सचखंड वासी, ऐसी अनेक प्रतिभाओं से संपन्न देश के प्रथम सिख प्रधानमंत्री, सरदार मनमोहन सिंह जी की मधुर स्मृतियों को ताजा करते हुए, श्रद्धा के सुमन आज देश का प्रत्येक नागरिक और विश्व का समस्त सिख समुदाय अपनी अंजुरी से अर्पित कर रहा है।

भारतीय राजनीति के आकाश पर एक विलक्षण नक्षत्र के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह का उदय न केवल उनके असाधारण ज्ञान और विनम्र व्यक्तित्व का प्रतीक है, अपितु उनकी नीति-निर्माण क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रमाण भी है। भारत के चौदहवें प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने सन 2004 ई. से सन 2014 ई. तक देश का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल ने भारतीय राजनीति में संयम, समर्पण, शुचिता और सेवा की एक नई परिभाषा गढ़ी।

डाॅ॰ मनमोहन सिंह जी का जन्म 26 सितम्बर, सन् 1932 ई. को ग्राम गाह (जो वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित है) में हुआ था। उनकी माता जी का नाम अमृत कौर और पिता जी का नाम गुरुमुख सिंह था। देश के विभाजन के उपरांत सरदार गुरुमुख सिंह का परिवार भारत आ गया। यहां पंजाब विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्त की। इसके पश्चात वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए, जहाँ से उन्होंने पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी॰ फिल॰ भी किया।

उनकी पुस्तक इंडियाज़ एक्सपोर्ट ट्रेंड्स एंड प्रोस्पेक्ट्स फॉर सेल्फ सस्टेंड ग्रोथ भारत की अंतर्मुखी व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना के रूप में जानी जाती है। डॉ॰ सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के रूप में वैश्विक ख्याति अर्जित की। आप जी पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्राध्यापक रहे। इसी दौरान आप संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) के सचिवालय में सलाहकार रहे तथा सन् 1987 ई. और सन् 1990 ई. में जेनेवा स्थित साउथ कमीशन में सचिव का दायित्व भी निभाया।

सन 1971 ई. में डाॅ॰ सिंह भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में शामिल हुए और इसके बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। भारत के आर्थिक इतिहास में एक क्रांतिकारी मोड़ तब आया, जब उन्होंने सन् 1991 ई. से 1996 ई. तक भारत के वित्त मंत्री का दायित्व संभाला। उन्हें भारत के आर्थिक सुधारों का प्रणेता माना जाता है। “आप देश के प्रथम ऐसे सिख है, जिनका हस्ताक्षर रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में भारतीय मुद्रा पर अंकित है”| डाॅ॰ सिंह का व्यक्तित्व आम जनमानस में उनके कार्यकाल की इन उपलब्धियों के इर्द-गिर्द चिरस्थायी हो गया है। उनके परिवार में उनकी धर्मपत्नी श्रीमती गुरशरण कौर और तीन पुत्रियाँ हैं।

राजनीतिक जीवन

सन 1985 ई. में, राजीव गांधी के शासनकाल के दौरान डॉ॰ मनमोहन सिंह को भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस पद पर उन्होंने पांच वर्षों तक अपनी सेवा प्रदान की। सन् 1990 ई. में उन्हें प्रधानमंत्री का आर्थिक सलाहकार बनाया गया। जब पी. वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने सन् 1991 ई. में डॉ॰ मनमोहन सिंह को अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा। उस समय डॉ॰ मनमोहन सिंह न तो लोकसभा के सदस्य थे और न ही राज्यसभा के। बावजूद इसके, उन्हें देश हित में एक सक्षम आर्थिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया। इसके तुरंत पश्चात सन् 1992 ई. में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में भी नियुक्त किया गया। उनके नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में कई ऐतिहासिक बदलाव हुए। सन् 1991 ई. में संवैधानिक नियमों के तहत, उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया गया, और इस हेतु असम से उनका निर्वाचन हुआ।

डॉ॰ मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को भारतीय अर्थव्यवस्था के सुधार हेतु एक प्रभावी उपाय के रूप में प्रस्तुत किया और इसे विश्व बाजार से जोड़ दिया। उन्होंने आयात-निर्यात प्रक्रिया को सरल बनाया और लाइसेंस एवं परमिट राज को समाप्त किया। निजी पूंजी को प्रोत्साहित करते हुए घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों के लिए विशेष नीतियां विकसित की।

उस समय जब नई अर्थव्यवस्था अपने प्रारंभिक चरण में थी, तब प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव को तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा। विपक्ष ने उन्हें इन आर्थिक सुधारों के संभावित खतरों से आगाह किया, लेकिन प्रधानमंत्री राव ने डॉ॰ मनमोहन सिंह की दूरदर्शिता पर विश्वास बनाए रखा। परिणामस्वरूप, मात्र दो वर्षों में ही इन सुधारों के सकारात्मक परिणाम दिखने लगे। आलोचकों के स्वर मद्धिम पड़ गए और भारतीय अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय परिवर्तन होने लगा। इस प्रकार, एक गैर-राजनीतिक व्यक्तित्व, जो अर्थशास्त्र का प्राध्यापक था, ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया और देश की डगमगाई अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने का महान कार्य किया।

पद

प्रखर-प्रज्ञा के धनी डॉ॰ मनमोहन सिंह ने अपने करियर की शुरुआत शिक्षा के क्षेत्र से की। वे पहले पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत रहे। सन् 1971 में, उन्हें भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया। सन् 1972 में, वे वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद पर आसीन हुए। इसके बाद, वे वित्त मंत्रालय में सचिव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार, और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष जैसे प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत रहे।

डॉ॰ मनमोहन सिंह सन् 1991 ई. से राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। सन् 1998 से 2004 तक वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे। उन्होंने 22 मई, सन् 2004 ई. को 72 वर्ष की आयु में पहली बार प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। उनका पहला कार्यकाल अप्रैल सन् 2009 ई. में सफलता के साथ पूर्ण हुआ। इसके पश्चात् लोकसभा चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन पुनः विजयी हुआ, और डॉ॰ सिंह ने दूसरी बार प्रधानमंत्री का पद संभाला।

प्रधानमंत्री रहते हुए, डॉ॰ मनमोहन सिंह ने दो बार बाईपास सर्जरी करवाई। उनकी दूसरी सर्जरी फरवरी सन् 2009 ई. में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में विशेषज्ञ शल्य चिकित्सकों की देखरेख में संपन्न हुई।

प्रधानमंत्री डॉ॰ सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में पी. चिदंबरम को भारतीय अर्थव्यवस्था का दायित्व सौंपा, जिसे उन्होंने अत्यंत कुशलता से निभाया। यद्यपि सन् 2009 ई. की वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव भारत पर भी पड़ा, लेकिन भारत की सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था के कारण वह अमेरिका और अन्य देशों की तुलना में इस संकट से कहीं अधिक कुशलता से उबरने में सक्षम रहा।

डॉ॰ सिंह ने अपने प्रत्येक पद पर कार्य करते हुए, भारत की अर्थव्यवस्था को स्थायित्व और प्रगति के पथ पर अग्रसर करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव

डॉ॰ मनमोहन सिंह के जीवन के विभिन्न पड़ाव उनके बहुआयामी व्यक्तित्व और अतुलनीय योगदान को प्रतिबिंबित करते हैं।

    • सन् 1957 से सन् 1965: चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य किया।

    • सन् 1969 से सन् 1971: दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्राध्यापक रहे।

    • सन् 1976: दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में मानद प्राध्यापक के रूप में सेवा दी।

    • सन् 1982 से सन् 1985: भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में कार्यभार संभाला।

    • सन् 1985 से सन् 1987: भारत सरकार के योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में देश की विकास योजनाओं में योगदान दिया।

    • सन् 1990 से सन् 1991: भारतीय प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार के रूप में अपनी विशेषज्ञता प्रदान की।

    • सन् 1991: नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री के रूप में भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी।

    • सन् 1991: असम से राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।

    • सन् 1995: दूसरी बार राज्यसभा के सदस्य बने।

    • सन् 1996: दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में मानद प्राध्यापक नियुक्त हुए।

    • सन् 1999: दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता प्राप्त नहीं हुई।

    • सन् 2001: तीसरी बार राज्यसभा सदस्य चुने गए और सदन में विपक्ष के नेता के रूप में कार्य किया।

    • सन् 2004: भारतीय गणराज्य के प्रधानमंत्री का पदभार संभाला।

इसके अतिरिक्त, डॉ॰ मनमोहन सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किए। उनके जीवन का प्रत्येक पड़ाव उनकी विद्वता, कुशल नेतृत्व, और देश सेवा के प्रति समर्पण का साक्षी है।

पुरस्कार एवं सम्मान

डॉ॰ मनमोहन सिंह का सार्वजनिक जीवन न केवल उनकी विद्वता और नेतृत्व क्षमता का प्रमाण है, बल्कि उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से भी नवाज़ा गया।

    • सन् 1987: पद्म विभूषण से सम्मानित।

    • सन् 1993 और 1994: “एशिया मनी अवार्ड फॉर फाइनेंस मिनिस्टर ऑफ द ईयर”।

    • सन् 1994: “यूरो मनी अवार्ड फॉर द फाइनेंस मिनिस्टर”।

    • सन् 1995: इण्डियन साइंस कांग्रेस का “जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार”।

    • सन् 2002: “सर्वश्रेष्ठ सांसद” का सम्मान।

    • सन् 1956: कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय का “एडम स्मिथ पुरस्कार”।

डॉ॰ सिंह ने अपने प्रभावशाली राजनीतिक जीवन में भारत का कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में प्रतिनिधित्व किया। आप जी सन् 1991 से राज्यसभा के सदस्य रहे और सन् 1998 तथा सन् 2004 में संसद में विपक्ष के नेता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रधानमंत्री के रूप में, उन्हें सन् 2004 के बाद भी कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से अलंकृत किया गया:

    • सन् 2010: सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान “ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुलअज़ीज़”।

    • सन् 2010: “वर्ल्ड स्टेट्समैन अवार्ड”।

    • सन् 2014: जापान का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान “ऑर्डर ऑफ द पॉलाउनिया फ्लावर्स”।

इन सम्मानों के अतिरिक्त, डॉ॰ मनमोहन सिंह को कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड सहित कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से मानद डिग्रियाँ प्राप्त हुई हैं। उनका जीवन देश-विदेश में भारतीय विद्वता और नेतृत्व का प्रतीक है।

प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल

सन 2004 ई. में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद, डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने नेतृत्व में कई ऐतिहासिक योजनाओं और नीतियों को लागू किया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) और सूचना का अधिकार (RTI) जैसे कार्यक्रमों ने भारत के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को नया आयाम दिया। उनके कार्यकाल के दौरान, उन्होंने आर्थिक सुधारों को जारी रखा और कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में महत्वपूर्ण निवेश किया। उन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को सफलतापूर्वक संपन्न किया, जो भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम था। उनकी नेतृत्व क्षमता ने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मान दिलाया।

विदेश नीति में योगदान

डॉ. मनमोहन सिंह की विदेश नीति ने भारत को एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय संघ के साथ भारत के संबंधों को मजबूत किया। उनकी कूटनीतिक कुशलता ने भारत को वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक मंचों पर एक प्रमुख भूमिका निभाने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने विकासशील देशों के साथ सहयोग को बढ़ावा दिया और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) को सक्रिय रूप से समर्थन दिया।

चुनौतियाँ और आलोचनाएँ

प्रधानमंत्री के रूप में, डॉ. मनमोहन सिंह को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आर्थिक असमानता, भ्रष्टाचार और वैश्विक आर्थिक मंदी जैसी समस्याएं उनके कार्यकाल के दौरान प्रमुख रहीं। उनके नेतृत्व की शांत और संयमित शैली की प्रशंसा तो हुई, लेकिन उनकी चुप्पी को लेकर आलोचना भी हुई। इसके बावजूद, उनके कार्यों ने दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ा और उनकी नीतियों ने भारत के आर्थिक विकास की नींव मजबूत की।

व्यक्तित्व और दृष्टिकोण

डॉ. मनमोहन सिंह का व्यक्तित्व उनके नाम के अनुरूप ‘मन’ और ‘मोहन’ का संगम है। उनकी सरलता, सादगी और गहन चिंतनशीलता उन्हें भीड़ से अलग बनाती है। उनके विचार और कार्य मानवता, नैतिकता और विकास के मूल्यों पर आधारित हैं। वे एक आदर्श नेता हैं, जिन्होंने अपने जीवन और कार्यों से यह सिद्ध किया है कि राजनीति में भी नैतिकता और बेमिसाल ईमानदारी बनाए रखी जा सकती है।

विरासत

डॉ. मनमोहन सिंह का योगदान भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अमूल्य है। उन्होंने न केवल एक राजनेता के रूप में अपितु एक विचारक और अर्थशास्त्री के रूप में भी अपनी छाप छोड़ी है। उनकी नीतियों और विचारों ने भारत को एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में मदद की। उनके नेतृत्व और दृष्टिकोण से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ियाँ उनकी विरासत को आगे बढ़ाएँगी। निश्चित ही “गुरु पंथ खालसा” के महान और विनम्र सेवादार डॉ. मनमोहन सिंह केवल एक राजनीतिज्ञ नहीं, अपितु एक विचारक, अर्थशास्त्री और मानवतावादी थे। इस महान विभूति का जीवन उन सभी के लिए प्रेरणा है जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करना चाहते हैं। उनकी उपलब्धियां और दृष्टिकोण भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी। हमेशा मौन रहने वाले इस महान देशभक्त के लिए यही कहना ठीक होगा–

परिंदों को मंजिल मिलेगी हमेशा, यह फैले हुए उनके पंख बोलते है।

वो ही लोग खामोश रहते है अक्सर, जमाने में जिनके हुनर बोलते है।

डॉ. मनमोहन सिंह के अंतस् में संवेदना का झरना कल-कल करता बहता रहता था, उनसे मिलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उनकी वाणी की शीतलता का अनुभव होता था निश्चित ही मौन तपस्वी डॉ. मनमोहन सिंह अर्थशास्त्र के अप्रतिम विद्वान थे, देश की आर्थिक स्थिती के उन्नयन और देश के रुपये की प्रतिष्ठा के लिए आप जी जीवन भर  संघर्शशील रहे। डॉ. मनमोहन सिंह का जीवन भारतीय समाज के लिए एक प्रकाश स्तंभ है, जो यह दिखाता है कि किस प्रकार गहन ज्ञान, समर्पण, शुचिता और सेवा भाव के साथ एक व्यक्ति अपने राष्ट्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा सकता है। दिनांक 26 दिसंबर सन 2025 ई. को आप जी 92 वर्ष की आयु में अपनी सफल सांसरिक यात्रा पूर्ण कर (अकाल चलाना) ब्रह्मलीन हो गए।

“गुरु पंथ खालसा” के ऐसे महान सेवादार जिनका जीवन एक गुरमुख का जीवन, एक गुरसिख के जीवन चरित्र की सभी विधाओं का उत्तम संगम ऐसे हमारे प्यारे पूर्व प्रधानमंत्री जी थे। ऐसे महान गुरु सिखों के लिए भाई गुरदास जी ने अपनी वाणी में अंकित किया है-

गुरमुख पर उपकारी विरला आइआ।

गुरमुख सुख पाइ आप गवाइआ।

गुरमुख साखी शबद सिख सुनाइआ।

गुरमुख शबद विचार सच कमाइआ।

सच रिदै मुहि सच सच सुहाइआ।

गुरमुख जनम सवार जगत तराइआ ॥

(वारा भाई गुरदास जी क्रमांक 19)

ऐसे महान गुरु सिख को हम सभी “गुरु पंथ खालसा” के सेवादार, संपूर्ण सिख समुदाय और नानक नाम लेवा संगत आज उनके भोग के दिवस पर श्रद्धांजलि के सुमन अर्पित करते हैं|

वाहिगुरु जी का खालसा। वाहिगुरु जी की फतेह ॥


Spread the love
3 1 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments