वारकरी संप्रदाय : सामाजिक समरसता और निर्गुण भक्ति का संगम

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वारकरी संप्रदाय : सामाजिक समरसता और निर्गुण भक्ति का संगम

संतों, महापुरुषों और भक्तों की पुण्य भूमि महाराष्ट्र भारतीय भक्तिकाल की वह दिव्य प्रयोगशाला है, जहाँ सगुण और निर्गुण दोनों धाराओं ने एक साथ लोक हृदय को आलोकित किया। इसी भूमि पर भक्त ज्ञानेश्वर माऊली, संत तुकाराम जी महाराज, निवृत्तिनाथ, सोपानदेव, मुक्ताबाई, गोरा कुम्भार, सावता माली, जनाबाई, बंका धेड़, सेननाई (सेना न्हावी), नरहरि सुनार, बहिणाबाई सहित असंख्य संत स्वरूपों का प्रकाश हुआ, जिन्होंने भक्ति को कर्मकांड की सीमाओं से मुक्त कर जीवन का सहज धर्म बना दिया। इन संत परंपराओं के बीच जिस आध्यात्मिक प्रवाह ने जनसामान्य को सबसे अधिक संगठित, अनुशासित और सामूहिक रूप दिया, वही वारकरी संप्रदाय के रूप में 13वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के भीतर विकसित हुआ। यह संप्रदाय भगवान विठ्ठल जिन्हें विठोबा भी कहा जाता है की भक्ति पर केंद्रित है, और विठ्ठल उपासना के माध्यम से समता, सादगी, विवेक, करुणा तथा सामाजिक समरसता का संदेश देता है।

वारकरी आंदोलन का मूल स्वभाव लोकधर्मी है। इसमें भक्ति केवल एकांत साधना नहीं अपितु जनसंगति की सामूहिक अनुभूति है। यहाँ अध्यात्म का अर्थ पलायन नहीं अपितु जीवन के भीतर ही शुद्ध आचरण, श्रम, सत्य और प्रभु स्मरण का सतत अभ्यास है। इसी कारण वारकरी परंपरा में व्यक्तिगत साधना के साथ – साथ सामाजिक चेतना का भी अद्भुत समन्वय दिखाई देता है; जहाँ ऊँच – नीच, जाति – भेद, अमीर – गरीब, विद्वान – अविद्वान जैसी दीवारें स्वतः गिरने लगती हैं और मानव – समाज एक साझा भक्ति भाव में बंध जाता है।

वारकरी संप्रदाय की आधारशिला संत ज्ञानेश्वर महाराज जी ने रखी। ‘ज्ञानेश्वरी’ और ‘अमृतानुभव’ जैसे ग्रंथों द्वारा उन्होंने भक्ति को दार्शनिक गहराई प्रदान की, और साथ ही उसे लोकभाषा के सहज माध्यम से जन – जन तक पहुँचाया। ज्ञानेश्वर माऊली की वाणी ने अध्यात्म को जनसामान्य की भाषा में उतारकर एक प्रकार से आध्यात्मिक लोकतंत्र की नींव रख दी, जहाँ प्रभु का मार्ग किसी एक वर्ग या जाति का विशेषाधिकार नहीं अपितु हर मनुष्य का सहज अधिकार है। उन्होंने जातिवाद और बाह्य आडंबरों का विरोध करते हुए समता और विवेक का संदेश दिया। आगे चलकर नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संतों ने इस परंपरा को विस्तारित किया और उसे जन आंदोलन का रूप दिया। संत बहिणाबाई के अभंगों में यह ऐतिहासिक सत्य बड़े प्रभाव से उपस्थित होता है—


“ज्ञानदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस।”
अर्थात ज्ञानेश्वर ने नींव रखी और तुकाराम उस परंपरा के शिखर बने।

संत तुकाराम महाराज जी को वारकरी संप्रदाय का शिखर इसलिए माना जाता है कि उन्होंने सरल, सहज और हृदयस्पर्शी अभंगों में भक्ति के साथ सामाजिक सुधार का भी संदेश दिया। उनके अभंगों में लोक जीवन की पीड़ा, श्रम शीलता, करुणा, सत्य, आत्मसंयम और प्रभु प्रेम एक साथ बहते हैं। ज्ञानेश्वर माऊली द्वारा स्थापित जिस नींव को उन्होंने ऊँचाई दी, उसी से “ज्ञानोबा माऊली तुकाराम” का जयघोष जनमानस में स्थायी रूप से प्रतिष्ठित हुआ। यह जयघोष केवल दो नामों का उच्चारण नहीं अपितु उस समूची चेतना का उद्घोष है, जिसमें भक्ति समाज को जोड़ने का माध्यम बन जाती है।

वारकरी संप्रदाय की सबसे विशिष्ट पहचान ‘वारी’ परंपरा है। आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी के अवसर पर पंढरपुर की ओर पैदल यात्रा करना वारकरी जीवन का मूल अनुशासन है। यह यात्रा केवल इस मार्ग पर चलना नहीं अपितु मन का भी एक सतत चलना है; जहाँ पग – पग पर ‘नाम’ का स्मरण, संगत की लय, अभंगों का गान, और समानता का व्यवहार मनुष्य को भीतर से बदलता है। वारी में कोई छोटा – बड़ा नहीं, सब एक पंक्ति में, एक धुन में, एक भाव में चलते हैं। इसी सामूहिकता में वारकरी परंपरा का सौंदर्य है, और इसी सामूहिकता में उसका सामाजिक संदेश भी है। इसलिए वारकरी संप्रदाय में परमार्थ को व्यक्तिगत नहीं अपितु सामूहिक रूप में साधा जाता है; अंधश्रद्धा का विरोध कर विवेकपूर्ण भक्ति पर बल दिया जाता है; और भक्ति को श्रम, सेवा व सत्य के साथ जोड़ा जाता है। अभंग, कीर्तन, पोवाड़े इन सभी लोकविधाओं ने इस परंपरा को जन – जन का सांस्कृतिक उत्सव बना दिया।

इतिहास की दृष्टि से देखें तो भक्त नामदेव जी के समय महाराष्ट्र में नाथ पंथ और महानुभाव पंथ का भी प्रभाव था। नाथ पंथ “अलख निरंजन” की योगी परक साधना का समर्थक तथा बाह्याडंबरों का विरोधी था, जबकि महानुभाव पंथ वैदिक कर्मकांड एवं बहु देवोपासना का विरोध करते हुए भी मूर्ति पूजा को सर्वथा निषिद्ध नहीं मानता था। इसी पृष्ठभूमि में पंढरपुर के विठोबा की उपासना एक लोकप्रिय जनधारा के रूप में विद्यमान थी। सामान्य जनता आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी को पंढरपुर जाकर विठ्ठल के दर्शन हेतु वारी (यात्रा) करती थी और जो इस वारी का नियमित आचरण करते थे, वे ही वारकरी कहलाए। विठ्ठल उपासना का यही “पंथ” वारकरी संप्रदाय के रूप में पहचाना गया, और इसी संप्रदाय के प्रमुख भक्तों में भक्त नामदेव जी का नाम अग्रणी है।

भक्त नामदेव जी का व्यक्तित्व केवल महाराष्ट्र की संत परंपरा का गौरव नहीं अपितु भारतीय भक्ति चेतना का वह सेतु है, जो दक्षिण से पश्चिम की विठ्ठल भक्ति को उत्तर भारत की निर्गुण साधना तक पहुँचाता है और आगे चलकर उसी धारा को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सार्वभौमिक आध्यात्मिक मंच पर प्रतिष्ठित करता है। भक्त नामदेव जी वारकरी परंपरा के अनुगामी होते हुए भी निर्गुण भक्ति के प्रमुख प्रचारक के रूप में उभरे। वे अग्रणी कवि, महात्मा, महान कीर्तनकार और महान अभंगकार माने जाते हैं। उनके जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने भक्ति को केवल भावनात्मक नहीं रहने दिया अपितु उसे सामाजिक समता, मानवीय करुणा और ईश्वर की सर्वव्यापकता के सिद्धांत से जोड़ा। यही कारण है कि उनकी वाणी में एक तरफ विठ्ठल भक्ति की तन्मयता मिलती है, तो दूसरी तरफ उस ‘अकाल पुरख’ की सर्वव्यापक सत्ता का उज्ज्वल बोध, जिसके संदर्भ में यह उद्घोष अत्यंत प्रभावी बन उठता है—

“सभु गोबिंदु है, सभु गोबिंदु है, गोबिंद बिनु नहीं कोई॥”

यह पंक्ति केवल काव्य नहीं, एक आध्यात्मिक घोषणा है; जिसमें भेद की दीवारें टूटती हैं और समूचा जगत ‘एक’ प्रभुसत्ता में समाहित दिखाई देता है।

भक्त नामदेव महाराज का जन्म 1270 ईस्वी (शके 1192) में महाराष्ट्र के सातारा जिले में कृष्णा नदी के तट पर बसे नरसी बामणी नामक ग्राम में हुआ। कुछ ऐतिहासिक स्रोत जन्मतिथि 26 अक्टूबर तथा कुछ 4 नवंबर बताते हैं। उनके पिता दामाशेट और माता गोणाई देवी/गौना बाई थीं। परिवार विठ्ठल का परम भक्त था, अतः नामदेव जी के भीतर भक्ति का संस्कार विरासत में ही अंकित हो गया। उनका विवाह गोविंद सेठी की पुत्री राधाबाई से हुआ। परिवार पालन हेतु वे किरत भी करते थे, किंतु उनका मन सदैव प्रभु स्मरण में सराबोर रहता। उन्होंने विसोबा खेचर को गुरु रूप में स्वीकार किया। वे भक्त ज्ञानेश्वर के समकालीन थे और आयु में लगभग पाँच वर्ष बड़े माने जाते हैं। भक्त नामदेव जी ने संत ज्ञानेश्वर माऊली जी के साथ महाराष्ट्र भ्रमण करते हुए अनेक भक्ति गीत रचे और जनता जनार्दन को समता व प्रभु भक्ति का पाठ पढ़ाया। ज्ञानेश्वर माऊली के परलोकगमन के बाद उन्होंने संपूर्ण भारत का भ्रमण किया; मराठी के साथ – साथ हिंदी में भी रचनाएँ लिखीं; और दीर्घकाल तक पंजाब में निवास कर भगवत की पताका का परचम फहराया। आज भी महाराष्ट्र और पंजाब में उनके रचित गीत भक्ति और प्रेम के साथ गाए जाते हैं; यह उनकी वाणी की जीवित परंपरा है।

भारतीय भक्ति आंदोलन के अनेक प्रवाह समय की धूल में आंशिक रूप से ओझल हो जाते हैं; परंतु जब हम वारकरी संप्रदाय और भक्त नामदेव जी को एक साथ देख कर समझते हैं, तब यह तथ्य सामने आता है कि भारत की आध्यात्मिक चेतना सदैव सीमाओं को लांघती रही है, भाषा की सीमा, प्रांत की सीमा, जाति की सीमा और संप्रदाय की सीमा। नामदेव जी की वाणी इसी अखंडता की साक्षी है। एक ओर वे पंढरपुर की परिक्रमा में विठ्ठल-भक्ति के रंग में रचे-पचे हैं, दूसरी ओर निर्गुण प्रभु की ऐसी व्यापक दृष्टि रखते हैं जो “सभु गोबिंदु” कहकर संपूर्ण सृष्टि को एक ही प्रभु सत्ता में समेट देती है। इसी सार्वभौमिकता के कारण उनकी वाणी को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में स्थान मिला और यही स्थान उन्हें केवल महाराष्ट्र का संत नहीं अपितु समूची भारतीय भक्ति परंपरा का साझा प्रकाश स्तंभ बना देता है।

इस प्रकार वारकरी संप्रदाय का इतिहास केवल एक धार्मिक पंथ का इतिहास नहीं अपितु समाज के परिवर्तन की वह कथा भी है जिसमें संतों ने लोकभाषा में आध्यात्मिक सत्य उतारकर मनुष्य को मनुष्य से जोड़ा; और भक्त नामदेव जी ने उसी लोक भक्ति को निर्गुण चेतना की ऊँचाई देकर उसे भारत विस्तार तक पहुँचा दिया। 

भक्ति काल के समय में भक्त नामदेव जी (पंजाबी में भक्त शब्द को भगत कहकर संबोधित किया जाता है) एक सर्वश्रेष्ठ भक्त हुए हैं| विरासत में मिले हुए आध्यात्मिक संस्कारों के कारण आप बाल्यकाल से ही भक्ति भाव में लीन हो गए थे| उस समय भक्त नामदेव जी अपने हम उम्र साथियों के साथ खेलते हुए भी, आप जी हमेशा हरि चिंतन में सराबोर रहते थे|  

भक्त नामदेव जी के विचार अत्यंत पवित्र है, भाव अत्यंत महान है, आप की वाणी के ज्ञाता है| आप जी की वाणी को भाई गुरदास जी ने अपनी वाणी में इस तरह अंकित किया गया है– 

कंम कितै पिउ चलिआ नामदेउ नो आखि सिधाइआ।

ठाकुर दी सेवा करीं दुधु पीआवणु कहि समझाइआ।

नामदेउ इसनानु करि कपल गाइ दुहि कै लै आइआ।

ठाकुर नो नहावालिकै चरणोदकु लै तिलकु चड़हाइआ।

हथि जोड़ि बिनती करै दूधु पीअहु जी गोबिंद राइआ।

निहचउ करि आराधिआ होइ दइआलु दरसु दिखलाइआ।

भरी कटोरी नामदेवि लै ठाकुर नो दूध पीआइआ।

              (वारां 10 भाई गुरदास जी).

अर्थात जब भक्त नामदेव जी के पिता किसी काम का से घर से बाहर जा रहे थे तो उन्होंने अपने बेटे को उपरोक्त आदेश देकर कहा कि आपको अमृतवेले (ब्रह्म मुहूर्त) में उठकर, ठाकुर जी को स्नान करना है और उनके लिए घर से मांझी हुई स्वच्छ गागर में नदी से जल भरकर लाना है एवं इस पवित्र जल से ठाकुर जी को स्नान करवाना है| साथ ही बगीचे में खिले हुए फूलों को तोड़कर, उन फूलों की माला बनाकर ठाकुर जी के गले में अलंकृत करनी है केवल इतना ही नहीं घर के आंगन में जो कपिला गाय हैं उसका दूध दुहकर / निकालकर के उस दूध को ठाकुर जी को अर्पण करना है| इस पूजा की विधि का नित्य कर्म आपके पिताजी करते थे परंतु कामकाज के कारण भक्त नामदेव जी के पिता घर से बाहर जा रहे हैं इसलिए इस नित्य कर्म की सेवा की जवाबदेही भक्त नामदेव जी को उनके पिता जी के द्वारा उन्हें सौंप दी गई थी| साथ ही निर्देश दिए कि जितने दिनों तक में घर पर वापस नहीं आता तब तक इस नित्यकर्म को लगातार करना है| 

बाल भक्त नामदेव जी, प्रतिदिन दिनचर्या के मुताबिक अमृतवेले (ब्रह्म मुहूर्त) में उठे और पीतल की स्वच्छ गागर को सिर पर रखकर नदी के तट पर जब आप गए और स्नान कर, जब गागर को पानी भरा तो आपकी नजर नदी के जल – जंतुओं पर पड़ी| इन जल – जंतुओं में कुछ मछली, मेंढक और कछुए थे| आप जी ने अपने मुखारविंद से अमर गीत की पवित्र वाणी का उच्चारण किया, जिसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में इस तरह अंकित किया गया है— 

आनीले कुंभ भराईले ऊदक ठाकुर कउ इसनानु करउ॥

बइआलीस लख जी जल महि होते बीठलु भैला काइ करउ॥

                (अंग क्रमांक 485).

अर्थात है विट्ठल में क्या करूं? मैं तो पिताजी की आज्ञा अनुसार स्वच्छ जल भरा परंतु इस पानी को तो जल – जंतुओं ने अपवित्र कर दिया है| (ऐसा माना जाता है कि 84 लाख योनियों में से 42 लाख जीव – जंतु पानी में पाए जाते हैं, ऐसा माना जाता है कि, इस भूभाग का आधा हिस्सा पानी में समाहित है और शेष 21 लाख योनियां भू भाग पर एवं अन्य 21 लाख नभ जंतु आकाश मंडल में पाए जाते हैं) जब इन जीव – जंतुओं का नित्य कर्म इस पानी में ही होता है, उनके सभी क्रिया – क्रम तो पानी में ही होते हैं, इस अवस्था में भक्त नामदेव जी कहते हैं, हे प्रभु! मैं इस अपवित्र जल से आपको स्थान नहीं करवा सकता और आप जी घर पर बिना पानी भरे ही खाली गागर लेकर लौट आते हैं| साथ ही सोच रहे हैं कि आज ठाकुर जी को स्थान नहीं करवाएंगे| जब यह विचार भक्त जी के मन में आया तो आप जी की आयु केवल 11 वर्ष की थी| इस आयु में भी आपके विचार अत्यंत प्रबल, परिपक्व है, बुद्धि अत्यंत उज्जवल है, तत्पश्चात आप जी एक छोटी टोकरी लेकर बगीचे में गए और फूल तोड़ने लगे तो उस समय फूलों पर भंवरे, तितलियां और शहद की मक्खियों मंडरा रही थी, शहद की मक्खियां फूलों से रस चूस रही थी| बाल भक्त नामदेव जी के मन में विचार आता है कि यह फूल भी पावन और पवित्र नहीं है इन फूलों का रसपान तो शहद की मक्खियों, तितलियां और भंवरे कर जाते हैं तो लिहाजा ठाकुर जी! मैं इन अपवित्र फूलों की माला आपको कैसे अर्पित करूं? इन अपवित्र फूलों से आपको कैसे अलंकृत करूं? जिसे गुरबाणी में इस तरह से अंकित किया गया है– 

आनीले फूल परोईले माला ठाकुर की हउ पूज करउ॥

पहिले बासु लई है भवरह बीठल भैला काइ करउ॥

(अंग क्रमांक 485).

इस अस्वस्थ अवस्था में आप जी को ध्यान आया कि पिताजी ने कहा था कि घर के आंगन में बंधी कपिला गाय के दूध से ठाकुर जी को भोग लगाना है, उस समय आपने अपनी माता से कहा कि आप दूध दुहकर दे दो कारण उस दूध से ठाकुर जी को भोग लगाना है| उस समय माताजी ने गाय के बछड़े को खोला और बछड़ा कपिल गाय के थन को चूसने लगा तो भक्त नामदेव जी ने अपनी माता जी से प्रश्न किया की है माता जी! क्या पहले यह बछड़ा दूध पिएगा? माताजी ने उत्तर दिया कि हां बेटा पहले यह बछड़ा दूध पिएगा कारण गाय दूध तभी देती है जब उसे बछड़ा पीता है| उस समय आप जी ने कहा माता जी मुझे ऐसा दूध नहीं चाहिए| मैं कैसे इस झूठे दूध का भोग ठाकुर जी को लगा सकता हूं? जिसे गुरबाणी में इस तरह से अंकित किया गया है—

आनीले दूधु रीधाईले खीरं ठाकुर कउ नैवेदु करउ॥

पहिले दूधु बिटारिओ बछरै बीठलु भैला काइ करउ॥

(अंग क्रमांक 485).

तत्पश्चात उस दिन भक्त नामदेव जी के घर में ठाकुर जी का स्नान भी नहीं हुआ और ठाकुर जी को दूध का भोग भी नहीं लगा एवं ना ही ठाकुर जी की पूजा हुई| इस अवस्था में भक्त नामदेव जी बैठकर सोच रहे हैं कि पिताजी जब घर आएंगे तो जरूर नाराज होंगे, क्रोधित होंगे, इस अवस्था में जब आप चिंतातुर होकर बैठे तो उस समय में आपका हृदय तल में ध्वनि की एक अनुगूंज उठी, जिसे गुरबाणी में इस तरह से अंकित किया गया है-

ईभै बीठलु ऊभै बीठलु बीठल बिनु संसारु नहीं॥

थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिओ तूं सरब मही॥

(अंग क्रमांक 485).

यहाँ भी विठ्ठल भगवान है, वहाँ भी विठ्ठल भगवान है। विठ्ठल के बिना संसार का अस्तित्व नहीं। नामदेव प्रार्थना करता है, हे विठ्ठल भगवान! विश्व के कोने – कोने में हर जगह तू ही तू सभी में बस रहा है| हे प्रभु! जब मैंने सोचा कि मैं तुम्हें स्नान कराऊं तो जीव – जंतुओं के रूप में तुम पहले से ही जल में मौजूद थे और मन में विचार आया कि स्नान तो उसे करवाया जाता है जो मैला हो जाता है| क्या तुम मैले हो जाते हो? हे प्रभु! तुम तो स्वच्छ हो, तुम तो पावन हो, तुम तो पवित्र हो, तुम तो अति पवित्र हो, तो मैं तुमको कैसे स्नान करवाओं? और तुम्हें मैं क्या स्नान करवाता? तुम तो स्वयं जल – जंतुओं के रूप में आठों पहर जल में विचरण कर रहे हो, तुम तो सभी जगह हो, सागर में, नदियों में, झीलों में रहते हो, तुम्हें मैं कैसे स्नान करा सकता हूं? हे प्रभु! जब मैंने सोचा कि मैं फूलों की माला बनाकर तुम्हें अर्पण करूं, तो तुम तितली बनकर, शहद की मक्खी बनकर, भंवरा बनकर उन फूलों का रस ग्रहण कर लेते हो| अब मैं तुम्हें क्या माला अर्पण करूं? जब मैंने सोचा कि तुम्हें कपिला गाय के दूध का भोग लगाओ तो तुम स्वयं बछड़े के रूप में पहले से दुग्धपान कर रहे थे| गाय तुम, बछड़ा तुम, दूध तुम ही हो! हर स्थान पर प्रभु तू ही तू है. . . . 

ईभै बीठलु ऊभै बीठलु बीठल बिनु संसारु नहीं॥

इस तरह से ब्रह्म ज्ञान का पूर्ण बोध भक्त नामदेव जी के हृदय तल में पैदा हुआ था| (विशेष– महाराष्ट्र के लोग प्रभु – परमेश्वर को विठ्ठल कहकर भी संबोधित करते हैं, विठ्ठल मराठी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है, अज्ञानी को स्वीकृति देना एवं महापुरुषों को गले लगाना)| इस स्थान की वाणी में आपने विट्ठल शब्द का प्रयोग किया है| महाराष्ट्र के पंढरपुर शहर में विठ्ठल भगवान का अति प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर भी है| इस महान तीर्थ स्थान पर लाखों भक्त दर्शन करने के लिए जुड़ते हैं| भक्त नामदेव जी भी अपने विठ्ठल की भक्ति में लीन है)| 

भक्ति की जीती – जागती मिसाल-

जैसे – जैसे भक्त नामदेव जी युवावस्था में आये तो उस समय प्रचलित शिक्षा – दीक्षा को हासिल कर, आपने अपने हृदय तल में निर्गुण भक्ति की उपासना को विशेष आयाम दिए थे| उस समय प्राप्त संस्कार और संस्कृति के अनुसार जब आप जी मंदिरों में दर्शन हेतु गए तो छोटी जात में जन्म लेने के कारण आप जी से पुजारियों के द्वारा दुर्व्यवहार किया गया था, जिसे आपने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी में इस तरह अंकित किया है– 

हसत खेलत तेरे देहुरे आइआ॥

भगति करत नामा पकरि उठाइआ॥

            (अंग क्रमांक 1164).

हे ईश्वर! मैं खुशी-खुशी झूमता हुआ तेरे मंदिर में दर्शन के लिए आया था लेकिन यह नामदेव जब भक्ति करने बैठा तो वहाँ के ब्राह्मण, पुजारियों ने इसे पकड़ कर उठा दिया। कारण आप शूद्र जाति से संबंध रखते थे और उस समय शूद्र जाति के व्यक्तियों के लिए मंदिरों में प्रवेश निषिद्ध था| इस कारण से भक्त नामदेव जी को धक्के मार कर मंदिर में से बाहर निकाल दिया था| उस समय आप जी भक्ति भाव में लीन होकर, मंदिरों में जो पूजा अर्चना होती है उसमें शामिल होकर प्रभु – परमेश्वर का नाम लेना चाहते थे परंतु मंदिर के पुजारी ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया था| पुजारी के इस व्यवहार से दुखी होकर आपने मंदिर के पिछवाड़े जाकर अपनी चादर बिछा ली और आसन लगाकर जैसे – जैसे आपने प्रभु भक्ति में लीन होकर उस प्रभु – परमेश्वर के गीत गाना प्रारंभ किए, वैसे – वैसे मंदिर का मुख्य द्वार भक्त नामदेव जी की ओर हो गया था| मंदिर में स्थापित मूर्तियों का मुंह भक्त नामदेव जी की ओर हो गया था| गुरबाणी में इस घटना को तरह से अंकित किया गया है-

फेरि दीआ देहुरा नामे कउ पंडीअन कउ पिछवारला॥

                          (अंग क्रमांक 1292)

भक्त नामदेव जी की प्रार्थना सुनकर ईश्वर ने मन्दिर का मुँह उसकी तरफ कर दिया और पंडितों की तरफ पीठ कर दी। इस घटना से अभिप्रेरित होकर श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने भी अपनी वाणी में अंकित किया है-

अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ॥

जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ॥

                   (अंग क्रमांक 451)

अहंकारी एवं निन्दकों को प्रभु ने पीठ देकर अपने भक्त नामदेव जी को दर्शन दिए। नानक ने भी ऐसे अपने भगवान की भक्ति की है कि अंत काल तक वह प्रभु – परमेश्वर उन्हें मुक्त करेगा। 

उपरोक्त घटना कोई कपोल – कल्पित नहीं है, वर्तमान समय में भी औंढा नागनाथ नामक स्थान पर यह मंदिर सुशोभित है| यह ऐतिहासिक स्थान सचखंड श्री हजूर साहिब नांदेड़ से केवल 40 से 50 किलोमीटर दूरी पर हिंगोली जिले में स्थित है| औरंगाबाद, नांदेड़ रोड पर  औंढा नामक यह स्थान महाराष्ट्र का अति प्रसिद्ध तीर्थस्थान है| वर्तमान समय में भक्त नामदेव जी का स्थान भी इस मंदिर में सुशोभित है| उस समय जब आप शारीरिक रूप से इस धरती पर मौजूद थे तो आपको मंदिर के पुजारी ने धक्के मार कर बाहर निकाल दिया था परंतु प्रभु की महिमा ऐसी है कि वर्तमान समय में उनकी मूर्ति मंदिर के द्वारा के बाहर स्थापित है और दूर से ही मंदिर के पुजारी आवाज देते हैं, आओ भक्त नामदेव जी के दर्शन इस स्थान पर करो! आओ भक्त नामदेव जी के इस स्थान पर दर्शन करो! वर्तमान समय में यह अजूबा आज भी निर्गुण भक्ति की जीती – जागती मिसाल है| जहां मंदिर का द्वारा एक और दूसरी ओर मंदिर में सुशोभित मूर्तियों का मुंह है|

सत्ताधीशों से संघर्ष-

उस भक्ति काल के समय में भक्त नामदेव जी महाराष्ट्र में भ्रमण कर मानवता के लिए एक पवित्र वातावरण, अपनी निर्गुण भक्ति से स्थापित कर रहे थे| निश्चित ही भक्तों का आविर्भाव ही वातावरण को पवित्र कर देता है| इनके भक्ति गीतों से सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है| यह ऊर्जा संपूर्ण ब्रह्मांड को पवित्र करती है तत्पश्चात आप जी ने संपूर्ण भारतवर्ष का भी देशाटन किया था| 

जब देशाटन करते हुए आप देश की राजधानी दिल्ली में पहुंचे तो उस समय वहां पर उपस्थित श्रोताओं के हृदय स्थल पर आपके भक्ति संगीत ने प्रभु – परमेश्वर के नाम की अमिट छाप को अंकित किया और चारों ओर लोगों ने इकट्ठा होकर निर्गुण भक्ति को आत्मसात करना प्रारंभ कर दिया| उस समय की सत्ता को यह मंजूर नहीं था, उस समय के सुल्तान सिकंदर लोदी ने नाराजगी व्यक्त की कारण जनता – जनार्दन भक्त नामदेव जी का बहुसंख्या में सम्मान करने लगी थी| इससे सत्ताधीश सुल्तान को अपनी गद्यी खतरे में नजर आ रही थी| इस कारण से भक्त नामदेव जी को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके सामने आजाद होने की शर्त रखी की सुल्तान के घर की कपिला गाय की मृत्यु हो गई है| उसे आप अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के बल से पुनर्जीवित करें! उस समय निर्गुण भक्ति के उपासक भक्त नामदेव जी ने सुल्तान को कहा की जन्म और मरण उस प्रभु – परमेश्वर के हाथ में है, जिसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी में में इस तरह अंकित किया गया है-

मेरा कीआ कछू न होइ॥

करि है रामु होइ है सोइ॥

(अंग क्रमांक 1165)

मेरे करने से तो कुछ नहीं हो सकता, हाँ जो राम करता है, वही होता है और होगा”|

अर्थात जन्म – मरण राम के हाथ में है, मेरे हाथ में नहीं! उस समय क्रोधित होकर सुल्तान ने भक्त नामदेव जी को कैद कर दिया था| 

उस समय दिल्ली निवासी समझदार और विद्वान लोगों ने एकत्रित  होकर, आपस में विचार – विमर्श किया कि भक्त नामदेव जी एक महत्वपूर्ण संत है और ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए कि राज हठ के सामने इन्हें अपनी जान गवना पड़ जाए| उस समय सभी एकत्रित सज्जन सुल्तान को मिलने गए परंतु जब कभी भी राज हठ और भक्ति हठ का टकराव होता है तो आदिकाल से ही इतिहास गवाह है कि राज हठ के लिए एक कयामत ही होती है कारण सच्चाई के साथ सत्ताधीशों का मेलजोल कभी रहा ही नहीं! निश्चित ही सत्यवादी संत सत्ताधारियों के झूठ से कभी भी सहमत नहीं होते हैं| सुल्तान ने आदेश दिया था कि भक्त नामदेव जी को कठोर सजा दी जाए परंतु उस समय दिल्ली के सज्जन पुरुषों ने सुल्तान को समझाया कि यह बहुमूल्य संत पुरुष है और इनके अस्तित्व से इंसानियत को नई दिशा और दशा प्राप्त होती है| ऐसे भक्त तो चंदन का चलता – फिरता वृक्ष होते हैं जो अपने चारों ओर के वातावरण को महकाते हैं| इनका व्यवहार मानवीय जीवन में शीतलता प्रदान करता है इस कारण से आप उन्हें आजाद कर दें| उस समय अहंकारी सत्ताधीश अपनी सत्ता हठ में अड़े रहे और किसी भी कीमत पर भक्त नामदेव जी को रिहा करने के लिए तैयार नहीं हुए थे| उस समय दिल्ली के सज्जन पुरुषों ने सुल्तान से कहा कि आप भक्त नामदेव जी के वजन के बराबर हमारे से सोना ले लेवें और भक्त जी को आजाद कर दो परंतु सुल्तान तैयार नहीं हुए| सभी एकत्रित सज्जन पुरुषों ने सुल्तान से कहा कि मरी हुई कपिला गाय भक्त नामदेव जी पुनर्जीवित करना नहीं चाहते हैं और आप धन – दौलत लेकर भी उन्हें आजाद नहीं करना चाहते तो कोई तीसरा उपाय बताओ? जिससे कि भक्त नामदेव जी आजाद हो जाए| उस समय सुल्तान ने कहा कि अब केवल एक ही मार्ग बचा है, यदि भक्त नामदेव जी राम का नाम लेना छोड़ दें और खुदा – खुदा के नाम को रटने लगे, तब भक्त नामदेव जी को उपरोक्त आदेश के संबंध में समझाया गया तो उन्होंने सुल्तान के आदेश को मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया था| उस समय भक्त नामदेव जी की माता जी गौना बाई ने उन्हें समझा कर कहा कि-

छोडि रामु की न भजहि खुदाइ॥

         (अंग क्रमांक 1165)

तू राम को छोड़कर खुदा की बंदगी क्यों नहीं करता! अर्थात राम का नाम छोड़ दे और खुदा – खुदा कहना प्रारंभ कर दें, इससे तेरी जान बच जाएगी परंतु भक्त नामदेव जी ने स्पष्ट इनकार कर दिया था| उस समय माता गौना बाई ने कहा कि मैं तो कई बार तुम्हारे मुख से खुदा और अल्लाह के नाम की धुन को सुना है| खुदा के गीतों को सुना है तुम स्वयं ही तो कहते हो की राम और खुदा में कोई भेद नहीं है| जिसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में की वाणी में इस तरह अंकित किया गया है-

मै अंधुले की टेक तेरा नामु खुंदकारा॥

मै गरीब मै मसकीन तेरा नामु है अधारा॥रहाउ॥

करीमाँ रहीमाँ अलाह तू गंनी॥

हाजरा हजूरि दरि पेसि तूं मनी॥

दरीआउ तू दिहंद तू बिसीआर तू धनी॥

देहि लेहि एकु तूं दिगर को नही॥

(अंग क्रमांक 727)

अर्थात हे मालिक! तेरा नाम ही मुझ अंधे (ज्ञानहीन) को लकड़ी के समान सहारा है। मैं गरीब एवं मसकीन हूँ और तेरा नाम ही मेरा आसरा है॥रहाउ॥ 

तू ही जीव के सामने साक्षात् है! तू हर समय मेरे अन्दर एवं मेरे सामने रहता है| तू दया का दरिया है, तू ही दाता है, तू ही बेअंत है और तू ही धनी है। एक तू ही जीवों को सब कुछ देता और लेता है, तेरे सिवा अन्य कोई नहीं है|

गुरबाणी के इस शब्द में लगभग सभी नाम इस्लाम धर्म से संबंधित है, जैसे करीमाँ, रहीमाँ तू गनी, हाजरा हजूर, दर टेक, तु मनी यह सभी नाम इस्लामी है तो उस समय भक्त नामदेव जी की माता जी ने कहा कि तुम तो कई बार अल्लाह – अल्लाह की धुन रटते हो! कई बार करीम – करीम और रहीम – रहीम का उच्चारण करते हो! यदि तुम ऐसा करते हो तो तुम्हारी सजा माफ हो जाएगी तो आज क्या हो गया है?

उस समय भक्त नामदेव जी ने अपनी माताजी से कहा कि जब मैं अल्लाह और खुदा के नाम का उच्चारण करता हूं तो अपनी मौज में करता हूं, अपनी मस्ती में करता हूं परंतु आज यदि मैं ऐसा करूंगा तो यह मेरी मजबूरी होगी, जबरदस्ती होगी, दबाव होगा ओर सच तो यह है कि मैं दबाव में यह कहने को तैयार नहीं हूं, दबाव में आकर तो मैं राम कहने को भी तैयार नहीं हूं फिर मैं खुदा कैसे कहूंगा? मैं तो मौज में, मस्ती में कहता हूं और कहते हैं कि–

सात घड़ी जब बीती सुनी, अजू ना आए त्रिभुवन धनी|

उस समय भक्त नामदेव जी ने प्रार्थना कर अपना फैसला उस प्रभु – परमेश्वर पर छोड़ दिया था| इतिहास गवाह है कि कई बार उस प्रभु – परमेश्वर की महिमा भक्तों की जय – जयकार करने से ही प्रकट होती है| ऐसी ही घटना घटित हुई और मरी हुई कपिला गाय उठकर बैठ गई| साथ ही सुल्तान के पेट में शूल पड़ गए असहनीय दर्द प्रारंभ हो गया, एक और मरी हुई गाय पुनर्जीवित हो गई थी तो दूसरी और सुल्तान दर्द से कहराने लगा था| सुल्तान को अपनी करनी पर आत्मग्लानि हुई और पछतावा हुआ उसने भक्त नामदेव जी के चरणों में अपना शीश झुकाकर, नतमस्तक होकर माथा टेका, इस घटना से प्रभावित होकर ही तो श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने अपनी वाणी में अंकित किया है– 

हरि जुगु जुगु भगत उपाइआ पैज रखदा आइआ राम राजे॥

हरणाखसु दुसटु हरि मारिआ प्रहलादु तराइआ॥

अहंकारीआ निंदका पिठि देइ नामदेउ मुखि लाइआ॥

जन नानक ऐसा हरि सेविआ अंति लए छडाइआ॥

                    (अंग क्रमांक 451)

अहंकारी एवं निन्दकों को प्रभु ने पीठ देकर अपने भक्त नामदेव को दर्शन दिए। नानक ने भी ऐसे अपने भगवान की भक्ति की है कि अंतकाल वह उसे भी बचा लेगा| ईश्वर ने प्रत्येक युग में अपने भक्त उत्पन्न किए हैं और संकट के समय उनकी रक्षा करता आ रहा है। दुष्ट हिरण्यकश्यप का हरि ने संहार कर दिया और अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की। 

निर्गुण भक्ति के स्वरूप–

भक्त नामदेव जी पूरे देश में भ्रमण करते हुए प्रत्येक स्थान पर निर्गुण भक्ति का उपदेश व संदेश देते हुए महाराष्ट्र के पंढरपुर शहर में आए| इस स्थान पर भी पुजारीयों के द्वारा आपके साथ पुनः दुर्व्यवहार किया गया कारण आप जाति से शुद्र थे| उस समय पंढरपुर में आप जी ने अपने अभंगो और गुरुवाणी में अंकित पदों की ऐसी सुरीली और सुरमई महफिल लगाई के स्थानीय नागरिक आपके द्वारा की जा रही प्रभु-भक्ति में लीन हो गए| उस समय स्थानीय विद्वान, सज्जनों ने आपसे पूछा कि आपने अपने हृदय तल को प्रभु-भक्ति में कैसे लीन किया है? इसकी क्या युक्ति है? कौन सा तौर-तरीका है? अब यदि ठंडे पानी से भरे गिलास के सामने एक प्यासा बैठकर पूछे कि इस पानी को पीने का तरीका क्या है? इससे स्पष्ट है कि वह व्यक्ति प्यासा नहीं है| इसी प्रकार से 36 प्रकार के व्यंजन सुंदर थाल में संजो कर के परोसे गए हो और भूखा व्यक्ति यह पूछे कि इस भोजन को ग्रहण करने का तरीका क्या है? इससे स्पष्ट है कि वह व्यक्ति भूखा नहीं है, जब व्यक्ति के हृदय तल में राम नाम की भूख पैदा होती है तो वह स्वयं ईश्वर के गीत अलापना प्रारंभ कर देता है उसे तरीका बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जैसे भूख से व्याकुल बच्चा रोने लगता है, सत्संग में बैठे श्रद्धालुओं को जब सच की भूख लगती है तो राम नाम की रचना स्वयं ही होठों पर, हृदय तल पर आ जाती है| निश्चित ही प्रकृति का नियम है कि जब दो वस्तुओं को जोड़ना हो तो तीसरे की आवश्यकता होती है, जैसे दो ईंटों को जोड़ना है तो सीमेंट, गारे की आवश्यकता होती है| दो कागजों को जोड़ना है तो गोंद की आवश्यकता होती है| जब दो कपड़ों को जोड़ना है तो सुई धागे से सिलाई करने की आवश्यकता पड़ती है| वैसे ही जब अपने हृदय तल को प्रभु-परमेश्वर से जोड़ना है तो भक्त नामदेव जी द्वारा उद्बोधित वाणी को गुरबाणी में इस तरह अंकित किया गया है—

सुइने की सूई रुपे का धागा॥

नामे का चितु हरि सउ लागा॥

   (अंग क्रमांक 485).

अर्थात भक्त नामदेव जी ने अपने चित्त (हृदय तल) को हरि के साथ जोड़ लिया है| इसे जोड़ने के लिए अपने सुई-धागे का उपयोग किया है| सोने की सुई और चांदी का धागा अर्थात गुरु मंत्र से ध्यान को जोड़ना! जैसे राम – राम, वाहिगुरु – वाहिगुरु का उच्चारण करें (यह सोने की सुई है) और इसमें ज्ञान को जोड़ना धागा है| यदि आपका ध्यान जुड़ा होगा तो ही आप सुन पाओगे, भक्त नामदेव जी कहते हैं कि सुई चलती जाती है, धागा चलता जाता है और मेरा हृदय प्रभु – परमेश्वर से जुड़ता जाता है|

यदि दुनियादारी पर हम दृष्टिगोचर करें तो दुनिया में लोगों के पास सुई तो है परंतु धागा नहीं है| राम – राम तो रट रहे हैं परंतु ध्यान कहीं और है, वाहिगुरु – वाहिगुरु का उच्चारण तो कर रहे हैं परंतु ध्यान नहीं है| जब हरी से हृदय तल जुड़ जाता है तो हरी तो आनंद स्वरूप है, जब आनंद स्वरूप हरी से जुड़ जाओगे तो आपकी अवस्था आनंदमयी हो जाएगी और हृदय तल को शीतलता प्राप्त होगी| जब आपका हृदय उस परम स्वप्न से, परमानंद से जुड़ता है, तो हृदय तल में सुगम-संगीत की मधुर धुन सुनाई पड़ती है| जिसे गुरबाणी में इस तरह अंकित किया गया है—

मित का चितु अनूपु मरंमु न जानीऐ॥

गाहक गुनी अपार सु ततु पछानीऐ॥

चितहि चितु समाइ त होवै रंगु घना॥

हरिहाँ चंचल चोरहि मारि त पावहि सचु धना॥

      (अंग क्रमांक 1362).

अर्थात जब परमात्मा से चित्त लग जाता है तो परम नाद की उत्पत्ति होती है, परम संगीत सुनाई पड़ता है, अनहद की ध्वनि सुनाई पड़ती है| यदि दिल प्रभु में समा जाए तो अत्यंत आनंद प्राप्त होता है। अगर कामादिक चंचल चोरों को मार दिया जाए तो सच्चा धन (प्रभु) प्राप्त हो जाता है| 

भक्त नामदेव जी ने अपनी वाणी में इस तरह से अंकित किया है—

अणमड़िआ मंदलु बाजै॥

बिनु सावण घनहरु गाजै॥

बादल बिनु बरखा होई॥

जउ ततु बिचारै कोई॥

(अंग क्रमांक 657).

अर्थात ऐसा प्रतीत होता है जैसे खाल के बिना मढ़ा हुआ ढोलक बजता हो, सावन के बिना ही बादल गरजता है। बादल के बिना ही वर्षा होती है, निश्चित ही जब कोई परम-तत्व का विचार करता है तो ही ऐसा प्रतीत होता है| राग और ताल के साथ संगीत लगातार बज रहा है| दुनिया में जितने भी श्रेष्ठ भक्त हुए सभी का कहना कहना है कि हमारे हृदय तल में संगीत और राग की धुन बजती रहती है| इन रागों के जनक दाते भी भक्त ही तो हैं, राग अर्थात परम सुंदरता और परम संगीत है, परम रस और शीतलता प्रदान करने वाला, परमानंद है| भक्त नामदेव जी ने अपनी वाणी में अंकित किया है–

प्रणवति नामदेउ नाकहि बिना॥

ना सोहै बतीस लखना॥ (अंग क्रमांक 1163)

अर्थात शारीरिक तौर पर यदि मनुष्य के पास 32 लक्षण है पर दैविक सुंदरता, देवी गुण के स्वप्न ना हो तो यह 32 लक्षण किसी भी काम के नहीं है अर्थात प्रभु से जुड़ना परम संगीत से जुड़ना है, प्रकृति से जुड़ना है, परम स्वप्न से जोड़ना है|

निर्गुण भक्ति पर आधारित भक्त नामदेव जी का एक अत्यंत हृदयस्पर्शी सबद को श्री गुरू ग्रंथ साहिब जी इस तरह अंकित किया गया है—

सतिगुर प्रसादि॥

आसा बाणी श्री नामदेउ जी की।

एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई॥

माइआ चित्र बचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई॥

सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंद बिनु नही कोई॥

सूतु एकु मणि सत सहंस जैसे ओति पोति प्रभु सोई॥रहाउ॥

जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल ते भिंन न होई॥

इहु परपंचु पारब्रहम की लीला बिचरत आन न होई॥

मिथिआ भरमु अरु सुपन मनोरथ सति पदारथु जानिआ॥

सुक्रित मनसा गुर उपदेसी जागत ही मनु मानिआ॥

कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बीचारी॥

घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी॥

(अंग क्रमांक 485).

ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। एक ईश्वर ही अनेक रूपों में सर्वव्यापक है और जिधर भी दृष्टि जाती है, उधर ही प्रभु का प्रचार-प्रसार दिखाई देता है। सारी दुनिया को आकर्षित करने वाली माया का रूप बड़ा विचित्र है और इसे कोई विरला मनुष्य ही समझता है। जगत में सब कुछ गोविन्द ही गोविन्द है तथा गोविन्द के बिना कुछ भी नहीं। एक सूत्र में जैसे सैकड़ों एवं हजारों मणियाँ पिरोई होती हैं वैसे ही प्रभु ने संसार को ताने-बाने की तरह पिरोया हुआ है॥रहाउ॥ जैसे जल तरंगें, झाग एवं बुलबुले जल से अलग नहीं होते वैसे ही यह प्रपंच सारी सृष्टि परब्रह्म की एक लीला है। विचार करने पर मनुष्य इसे अलग नहीं पाता है| मिथ्या भ्रम एवं स्वप्न की वस्तुओं को मनुष्य सत्य पदार्थ समझता है। गुरु ने मुझे शुभ कर्म करने की मंशा धारण का उपदेश दिया है और मेरे जाग्रत मन ने इसे स्वीकार कर लिया है| भक्त नामदेव जी कहते हैं कि हे भाई! अपने मन में विचार कर देख लो यह सारी जगत-रचना हरि की रची हुई है। घट-घट में और सभी के भीतर केवल एक मुरारी प्रभु ही मौजूद है| 

भावना प्रधान भक्त नामदेव जी—

भक्त नामदेव जी भावना प्रधान भक्त हुए हैं| जो हृदय तल में भावना प्रधान है, जज्बे प्रधान है, बस वो ही प्रभु का भक्त है| जो मनुष्य बौद्धिक तल से जीवन बसर कर रहा है उसके हृदय में विचार प्रधान होंगे और जो मनुष्य हृदय तल से जीवन बसर कर रहा है उसका हृदय भावना प्रधान होगा| विद्वान कहते हैं जिस मनुष्य में इन दोनों विधाओं का अभाव है वह मनुष्य नहीं अपितु पशु है| विचारों से प्रभु-परमेश्वर को समझा जा सकता है और भावनाओं से प्रभु-परमेश्वर से जुड़ा जा सकता है| यदि भाव ना हुए तो जुड़ ही नहीं सकेंगे और यदि विचार ना हुए तो समझ ही नहीं सकेंगे| जन्म से मनुष्य भाव को साथ लाता है इससे स्पष्ट है कि विचारों से ज्यादा मानवीय जीवन में भावों की आवश्यकता है| निश्चित ही भाव प्रथम है, पश्चात विचार!  भावों से ही मासूम बालक अपने परिवार से जुड़ा रहता है| परमात्मा को विचारों से समझ कर ही भाव और जज्बे पैदा किए जाते हैं और जुड़ा जाता है| जब भाव प्रधान भक्त नामदेव जी के हृदय तल में भाव कमजोर पड़ जाते हैं तो उस अवस्था में आपने अपनी वाणी में इस तरह अंकित किया है–

मोहि लागती तालाबेली॥ बछरे बिनु गाइ अकेली॥

पानीआ बिनु मीनु तलफै॥ ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा॥रहाउ॥

(अंग क्रमांक 874).

अर्थात जैसे पानी के बिना मछली तड़पती है, जैसे गाय के बिना उसका बछड़ा व्याकुल होकर पुकारता है, हे प्रभु! जब भी आप से रंचक मात्रा भी विछोड़ा हो तो भावनाएं कमजोर पड़ जाती है, जज्बे कमजोर हो जाते हैं, जब ऐसी अवस्था हो तो इंसान का कभी भी कथा-कीर्तन और सत्संग में मन नहीं लगेगा|

इन वाणियो से ज्ञात होता है कि भक्त नामदेव जी निर्गुण भक्ति के उपासक थे| एक सर्वे समावेशक, सर्व व्यापक ब्रह्म के उपासक थे| आप जी ने अपनी वाणी में अंकित किया है–

हिंदू पूजै देहुरा मुसलमाणु मसीति ॥

नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीति ॥ (अंग क्रमांक 847).

हिन्दू मन्दिर में पूजा करता है और मुसलमान मस्जिद में सजदा करता है। नामदेव ने तो उस परमात्मा का ही स्मरण किया है जो सर्व व्यापक है, जो मंदिर अथवा मस्जिद में कहीं नहीं है।

अब प्रश्न यह है कि प्रभु-परमेश्वर जब मंदिर और मस्जिद में नहीं है तो फिर कहां है? इस प्रश्न का उत्तर आपने अपनी वाणी से दिया है जिसे गुरबाणी में इस तरह अंकित किया गया है—

सभै घट रामु बोलै रामा बोलै॥ राम बिना को बोलै रे॥रहाउ॥

(अंग क्रमांक 988).

अर्थात मेरा राम तो घट-घट में बोल रहा है और राम के बिना कौन बोल सकता है? राम ही तो बोल रहा है, पशुओं में, पक्षियों में, मनुष्यों में, राम ही तो बोल रहा है, पवन की सायं-सायं में, राम ही बोल रहा है, सागर की लहरों की गर्जना, में बादलों की गर्जना में और सागर एवं बादलों की गर्जना में ही नहीं अपितु कोयल की कुहू-कुहू की आवाज में, बुलबुलों के चहचाहने में, है प्रभु! तू ही तो घट-घट में बोल रहा है| निश्चित ही इस तरह के व्यापक ब्रह्म और व्यापक परमात्मा के भक्त नामदेव जी उपासक है| ऐसे परमात्मा की निर्गुण भक्ति में लीन भक्त नामदेव जी की दृष्टि में ईश्वर एक सदानंद है, अखंड ज्योत है, अब उस प्रभु तक पहुंचने के लिए और उसे प्रभु को प्राप्त करने के लिए भक्त नामदेव जी ने अपनी वाणी में उद्बोधित किया है, जिसे श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में इस तरह अंकित किया गया है—

जिउ आकासै पंखीअलो खोजु निरखिओ न जाई॥

जिउ जल माझै माछलो मारगु पेखणो न जाई॥

जिउ आकासै घडूअलो म्रिग त्रिसना भरिआ॥

नामे चे सुआमी बीठलो जिनि तीनै जरिआ॥

  (अंग क्रमांक 525).

अर्थात उसे प्रभु तक पहुंचाने का मार्ग क्या है? भक्त जी कहते हैं, जैसे जल में मछली चलती है तो मार्ग अपने आप प्रशस्त होता है| बना बनाया कोई मार्ग नहीं है, चलने से ही मार्ग का निर्माण होता है, आकाश में कोई बनी बनाई सड़क नहीं है, पक्षी जब उड़ते हैं तो मार्ग प्रशस्त होता है| वैसे कोई मार्ग नहीं है, उड़ने से मार्ग बन जाता है| ठीक इसी तरह से आप प्रभु-परमेश्वर की भक्ति में जैसे-जैसे लीन होंगे तो मार्ग अपने आप प्रशस्त हो जाएगा| भक्ति का मार्ग बना बनाया नहीं है, जपने से, स्मरण करने से, मार्ग बन जाएगा| जमीन पर बनी बनाई सड़क मिल सकती है, फिर भी चलना तो हमें ही पड़ता है| सड़क बनाने की आवश्यकता नहीं परंतु आध्यात्मिक मंडल में तो ऐसा है कि जैसे-जैसे हम चलेंगे सड़क अपने आप बनती जाएगी| हम पृथ्वी पर भी देखते हैं लगातार मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाता है तो पगडंडी बन जाती है, मार्ग बन जाता है| आध्यात्मिक मंडल में जब हम राम-राम, वाहिगुरु-वाहिगुरु जपना आरंभ कर दें तो बस मार्ग बनता जाएगा| इस मार्ग से आप ईश्वर तक, उस अकाल पुरख तक पहुंच सकते हैं| राम नाम में लीन, विठ्ठल – विठ्ठल में लीन भक्त नामदेव जी ने जगत को ही विठ्ठल के नाम में लीन करते गए और वर्तमान समय में भी अपनी निर्गुण भक्ति से लगातार कर रहे हैं| पूरे देश में देशाटन करते-करते हुए आपने अनेक व्यक्तियों को राम के नाम में लीन किया, विठ्ठल के नाम में लीन किया और एक दिन केवल मानसिक तौर पर ही नहीं अपितु शारीरिक तौर पर भी उस विठ्ठल में लीन हो गए| उस प्रभु में लीन हो गए| इस परम लीन अवस्था को गुरबाणी में इस तरह अंकित किया गया है—

सूरज किरणि मिले जल का जलु हूआ राम॥

जोती जोति रली संपूरनु थीआ राम॥

(अंग क्रमांक 846).

जैसे सूर्य की किरण सूर्य में मिल जाती है और जल का जल में मेल हो जाता है, वैसे ही आत्म ज्योति, परम ज्योति में मिल गई है और जीव रुपी अंश सम्पूर्ण हो गया है। भक्त नामदेव जी ने अपनी सांसारिक यात्रा संपूर्ण कर, जीवन के अंतिम 18 वर्षों तक सुबा पंजाब के ग्राम घुमान जिला गुरदासपुर में अपनी आयु के 80 वर्ष पूर्ण कर 2 माघ संवत 1407 विक्रमी (सन 1350) को ब्रह्मलीन हो गये| इस स्थान पर वर्तमान समय में गुरुद्वारा तापियाणा साहिब जी सुशोभित है और इस स्थान पर हर साल दो माघ को बहुत बड़ा मेला लगता है और लाखों की संख्या में नानक पंथी वारकरी श्रद्धालु उपस्थित होकर, भक्त नामदेव जी के चरणों में नतमस्तक होते हैं|

निर्गुण भक्ति के महान स्वरूप भक्त नामदेव जी के चरणों में सादर नमन!

नोट:-1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।

2. गुरबाणी का हिंदी अनुवाद गुरबाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।

3. चित्र स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख से प्राप्त।

 

 

 

 


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