वणजारे: गुरु पंथ खालसा के अमर प्रहरी (शोध-पत्र)
(इतिहास, शहादत और परंपरा)
1. प्रस्तावना
भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास में वणजारा समुदाय एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह समुदाय केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा अपितु अपने संगठन, गतिशीलता, आर्थिक सामर्थ्य और सांस्कृतिक चेतना के कारण मध्यकालीन भारत की सामाजिक संरचना में अत्यंत प्रभावशाली रहा। विशेषतः सिख इतिहास में वणजारों की भूमिका केवल सहयोगात्मक नहीं अपितु संरक्षक, संवाहक और शहादत परंपरा के रूप में दृष्टिगत होती है। प्रस्तुत शोध-पत्र में ‘वणजारा’ शब्द की व्युत्पत्ति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, लुबाणा संबंध, सरकारी संरक्षण तथा सिख इतिहास में उनकी विशेष भूमिका का विश्लेषण किया जा रहा है।
2. ‘वणजारा’ शब्द की व्युत्पत्ति एवं भाषिक परिप्रेक्ष्य
‘वणजारा’, ‘बनजारा’ अथवा ‘बंजारा’ शब्द की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों में सामान्यतः यह मत प्रचलित है कि यह ‘वणिक’ अथवा ‘बणिक’ शब्द से निर्मित है, जिसका अर्थ व्यापारी होता है। तथापि यह व्यापारी सामान्य अर्थ में नहीं अपितु दूरगामी काफ़िलों के साथ चलने वाले चक्रवर्ती व्यापारी थे, जो अनाज, नमक, पशु एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं का विशाल स्तर पर व्यापार करते थे।
एक अन्य भाषिक मत के अनुसार ‘वणजारा’ शब्द ‘वण’ (पंजाबी ‘बण’ अर्थात् वन/जंगल) और ‘जारा’ (अर्थात् घूमने वाला) से बना है। यह व्युत्पत्ति उनके जीवन, स्वभाव, वनांचलों में भ्रमणशील व्यापार को अधिक सटीक रूप में अभिव्यक्त करती है। आधुनिक साहित्य में ‘वणजारा’, ‘बंजारा’ और ‘बनजारा’ शब्दों का परस्पर पर्यायवाची रूप में प्रयोग होता है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में ‘वणजारा’ शब्द आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है। यहाँ वणजारा वह साधक है, जो इस संसार में अकाल पुरख के नाम की पूँजी संचित कर उसे अपने जीवन में धारण करता है। इस प्रकार ‘वणजारा’ शब्द व्यापारिक अर्थ से आगे बढ़कर आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण कर लेता है।
3. लवण से लुबाणा : व्यापार और जातीय रूपांतरण
पंजाब में नमक की खानें प्राचीन काल से उपलब्ध थीं। वणजारे नमक के प्रमुख व्यापारी रहे। संस्कृत में नमक को ‘लवण’ कहा जाता है। संभवतः ‘लवण’ से ‘लावणिक’ और तत्पश्चात ‘लुबाणा’ शब्द की उत्पत्ति हुई। “पद्म चन्द्र संस्कृत कोष” में ‘लावणिक’ का अर्थ लूण (नमक) का व्यापार करने वाला व्यापारी बताया गया है।
नमक मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है; भोजन की अन्य वस्तुएँ उगाई जा सकती हैं, परंतु नमक प्राकृतिक खनिज है। इस कारण लुबाणों का व्यापार अत्यंत सम्मानित रहा। कालांतर में वणजारा और लुबाणा समुदायों में घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ और अनेक स्थानों पर दोनों जातियाँ परस्पर घुल-मिल गईं।
भौगोलिक विविधता के अनुसार इनके नाम भी परिवर्तित हुए गुजरात में ‘लुहाणे’, आंध्र एवं कर्नाटक में ‘लबाने’ या ‘लंबाड़ी’, बहावलपुर क्षेत्र में ‘राठोड़’ और अन्यत्र ‘बहू-रूपिये’ जैसी शाखाएँ प्रचलित रहीं। पंजाब में लुबाणियों के अनेक गोत्र प्रसिद्ध हैं—अजरावत, दातला, पीलिया, पुरवाल, खसारिया, गोजालिया, गुज्जर, तदर्न, वामियाल, नारोवाल आदि। वणजारा जाति से संबद्ध रमाणा, उदाना, गुरुगरिया, गगनौत, डहोत, बंजरउँत और बड़तिया जैसे गोत्र भी उल्लेखनीय हैं।
4. सामाजिक-आर्थिक संरचना और सैन्य संबंध
मध्यकालीन भारत में सेनाओं को रसद, अनाज, शस्त्र-सामग्री और पशुधन की आपूर्ति हेतु कोई संगठित सरकारी विभाग नहीं था। इस रिक्त स्थान को वणजारों ने भरा। सिकंदर लोदी (सन 1504 ई.) के समय से वणजारों का मुस्लिम सल्तनत की सेना से औपचारिक संपर्क स्थापित हुआ। धौलपुर अभियान के उपरांत वह दक्षिण भारत की सैनिक मुहिमों में रसद पहुँचाने लगे।
अकबर के शासनकाल में वणजारे मुगल सेना के प्रमुख आपूर्तिकर्ता बने। उनकी ईमानदारी और विश्वसनीयता से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें लगान एवं चुंगी से मुक्त कर दिया। उन्हें अग्रिम भुगतान (साई) प्रदान किया जाता था, जिससे आपूर्ति में बाधा न आए। युद्धकाल में भी किसी भी पक्ष की सेना वणजारों पर आक्रमण नहीं करती थी।
इतिहासकारों और यात्रियों के वर्णनानुसार वणजारों के काफ़िले अत्यंत विशाल होते थे। अनेक अवसरों पर एक लाख तक बैलगाड़ियों का उपयोग होता था। फ्रांसीसी यात्री तवर्नियर ने औरंगज़ेब काल में 10 से 12 हज़ार बैलों से युक्त काफ़िला देखा। उस समय एक जोड़ी बैलों का मूल्य लगभग 600 रुपये तक था, जो उनकी आर्थिक समृद्धि का सूचक है।
चार प्रमुख क़बीलों का उल्लेख मिलता है; मक्का, चावल, दालें और नमक का व्यापार करने वाले। प्रत्येक की संख्या एक लाख तक मानी गई है। यह संरचना उनके संगठित आर्थिक तंत्र और व्यापक नेटवर्क का प्रमाण है।
5. सिख इतिहास में वणजारों की प्रारंभिक भूमिका
पुरातन जन्म साखियों में उल्लेख है कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी नानकमत्ता (ज़िला नैनीताल) से लगभग 60 मील दक्षिण स्थित वणजारों के ‘टांडे’ में पधारे। ‘टांडा’ शब्द वणजारों के काफ़िलों के पड़ाव-स्थल के लिए प्रयुक्त होता था। “इंपीरियल गज़ेटियर ऑफ इंडिया” के अनुसार यह एक प्राचीन कस्बा था, जिसकी स्थापना वणजारों ने की थी।
परंपरा के अनुसार यहाँ श्री गुरु नानक साहिब जी ने ‘सिरीरागु महला १’ के अंतर्गत ‘वणजारिआ मित्रा’ संबोधन से जीवन की चार अवस्थाओं का आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 75)। इस वाणी में वणजारा मानव-जीवन का प्रतीक बन जाता है-
-
- प्रथम प्रहर : गर्भावस्था और ईश्वर के हुक्म में बंधन।
-
- द्वितीय प्रहर : बाल्यावस्था में ईश्वर-स्मरण का विस्मरण।
-
- तृतीय प्रहर : यौवन में धन-मोह में आसक्ति।
-
- चतुर्थ प्रहर : मृत्यु के समय कर्मफल का प्रतिफल।
इस प्रकार गुरु वाणी में वणजारा सांसारिक व्यापारी नहीं अपितु आत्मा का यात्री है, जो जीवन-रात्रि के चार प्रहरों में कर्मों की पूँजी संचित करता है।
6. वणजारों की सिक्खी में सहभागिता
वणजारों की सिक्खी में सहभागिता का अध्ययन सिख इतिहास की संरचना को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है। मुग़ल काल में वणजारे मुख्यतः सेना को रसद, शस्त्र-सामग्री और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का कार्य करते थे। उनके विशाल काफ़िले हिंदुस्तान के कोने-कोने में विचरण करते थे। बैलों, ऊँटों और गाड़ियों से युक्त यह काफ़िले केवल व्यापारिक संस्थान नहीं थे अपितु गतिशील सामाजिक इकाइयाँ थे।
गुरु साहिबान जब भी लंबी यात्राओं पर निकलते, तो प्रायः ऐसे ही काफ़िलों के साथ सम्मिलित होकर यात्रा करते थे। इससे एक ओर सुरक्षा एवं सुविधा सुनिश्चित होती, तो दूसरी ओर वणजारों को गुरु-संगत का अवसर प्राप्त होता। इसी निरंतर संपर्क ने वणजारा समुदाय को गुरु परंपरा से गहरे रूप में जोड़ा। कालांतर में यही समुदाय श्रद्धालु, सेवक और शहादत देने वाले सिखों के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
7. गुरु साहिबान और वणजारा काफ़िलों का ऐतिहासिक संबंध
सिख इतिहास में अनेक महत्त्वपूर्ण अवसर ऐसे हैं, जब गुरु साहिबान ने वणजारों के साथ यात्राएँ कीं। छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी जहाँगीर के साथ ग्वालियर और तत्पश्चात कश्मीर गए। यह यात्रा वणजारा काफ़िलों के साथ संपन्न हुई। कुछ इतिहासकारों ने भ्रमवश इसे बादशाह की नौकरी स्वीकार करना कहा है, परंतु यह तथ्यात्मक रूप से असंगत है। यह यात्रा परिस्थितिजन्य राजनीतिक संदर्भों में थी, न कि अधीनता की स्वीकृति। इसी प्रकार जब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी नानकमत्ता की ओर गए, तब भी उन्होंने वणजारों के काफ़िलों के साथ यात्रा की।
सातवें पातशाह श्री गुरु हरिराय साहिब जी ने मक्खन शाह लुबाणा के साथ सियालकोट से कश्मीर और पुनः वापसी की यात्रा की। वह झेलम ज़िले (वर्तमान पाकिस्तान) के मोटा टांडा ग्राम में उसके निवास पर ठहरे। गुरु साहिबान के सत्संग और प्रभाव से वणजारा समुदाय गुरु के सिख बनते गए। इसी समुदाय से मक्खन शाह और लख्खी शाह जैसे महान व्यक्तित्व उभरे, जिन्होंने सिख इतिहास में अमिट छाप छोड़ी।
8. भाई मक्खन शाह लुबाणा : गुरु-खोज और निष्ठा का प्रतीक
भाई संतोक सिंह जी के अनुसार, एक बार मक्खन शाह का जहाज़ तूफ़ान में फँस गया। प्राण और व्यापार; दोनों संकट में थे। उस कठिन घड़ी में उसने अरदास (प्रार्थना) की और प्रण किया कि यदि जहाज़ सुरक्षित पार हो गया तो वह अपने लाभ का दसवां भाग गुरु चरणों में अर्पित करेगा। अरदास स्वीकार हुई, जहाज़ और माल सुरक्षित बच गए।
वह पहले दिल्ली पहुँचा, जहाँ उसे ज्ञात हुआ कि श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी ज्योति-जोत समा गए हैं और उनके उत्तराधिकारी बकाला में हैं। वह तत्काल बकाला पहुँचा। वहाँ अनेक दावेदार स्वयं को सच्चा गुरु घोषित कर रहे थे। उसने प्रत्येक को पाँच-पाँच स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं।
जब उसने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को पाँच मुद्राएँ अर्पित कीं, तो गुरु साहिब ने उसे उसके दसवें भाग के प्रण की स्मृति दिलाई। उसी क्षण उसे ज्ञात हो गया कि यही सच्चे गुरु हैं। वह आनंद-विभोर होकर छत पर चढ़ गया और उद्घोष किया-
“गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे।”
यह उद्घोष केवल घोषणा नहीं था; यह गुरु-परंपरा की पुनः प्राणप्रतिष्ठा थी।
इस घटना से धीरमल अत्यंत क्रोधित हुआ और उसके मसंद सीहां ने गुरु साहिब पर गोली चलाई, किंतु वह निशाना चूक गया। तत्पश्चात मक्खन शाह ने संगत के सहयोग से धीरमल और सीहां की मुश्कें बाँधकर उसे गुरु साहिब के समक्ष प्रस्तुत किया। गुरु साहिब ने उनकी संपत्ति, जिसमें भाई गुरदास द्वारा लिखित आदि ग्रंथ की बीड़ भी सम्मिलित थी, उन्हें वापस करने का आदेश दिया।
भाई संतोक सिंह के अनुसार, मक्खन शाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के साथ अमृतसर गए और चक्क नानकी (श्री आनंदपुर साहिब) की स्थापना तक उनके साथ ही रहें। नगर बसाने हेतु भूमि-क्रय में उसने भेंट अर्पित कर महत्वपूर्ण योगदान दिया। विदा लेते समय गुरु साहिब ने उसे नाम-जप और सिक्खी-प्रचार की आज्ञा दी।
9. लख्खी शाह बंजारा : गुरु-प्रेम का अद्वितीय उदाहरण
बाबा लख्खी शाह, भाई गोधू राम के पुत्र, खैरपुर (ज़िला मुज़फ़्फ़रगढ़, पाकिस्तान) के निवासी थे। वह वणजारा क़बीले के संपन्न एवं प्रतिष्ठित व्यापारी थे। वह गुरु साहिबान के प्रति पूर्णतः समर्पित सिख थे और रायसीना ग्राम में निवास करते थे।
11 नवंबर सन 1675 ई. को जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शहीदी संस्कार हुआ, तब उनका पार्थिव शरीर चाँदनी चौक में पड़ा था। परिस्थितियाँ अत्यंत भयावह थीं। ऐसे समय में लख्खी शाह ने अद्वितीय साहस दिखाया। उन्होंने गुरु साहिब का शरीर अपने घर लाकर भीतर ही भीतर दाह-संस्कार किया। गुरु-प्रेम की यह घटना सिख इतिहास में अमर है।
10. भाई नगाहिया सिंह : उत्तराधिकार में वीरता
भाई नगाहिया सिंह, लख्खी शाह वणजारे का ज्येष्ठ पुत्र था। उसने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का पार्थिव शरीर घर लाकर दाह-संस्कार में भूमिका निभाई। वह निर्भीक और पराक्रमी योद्धा था।
जब मुग़ल सेना की अमृतसर पर अचानक चढ़ाई की सूचना मिली, तब वह दिल्ली से अमृतसर पहुँचा और 9 वैशाख 1766 बि. (29 मार्च 1709 ई.) को रणभूमि में जूझकर शहीद हुआ। यह वह समय था जब दशमेश गुरु ज्योति-जोत समा चुके थे और सिख समुदाय कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था। बाबा बंदा सिंह बहादुर अभी पंजाब नहीं पहुँचे थे, किंतु ऐसे समय में भी भाई नगाहिया सिंह ने अग्रणी भूमिका निभाई।
11. नायक भगवंत सिंह (भागू वणजारा) और उनके वीर बंधु
नायक भगवंत सिंह, जिन्हें भागू वणजारा के नाम से जाना जाता है, भाई मणी सिंह जी के चाचा नठिए का पुत्र था। उसके आठ भाई थे; भगवंत सिंह, कुइर सिंह, बाज़ सिंह, शाम सिंह यह चारों बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ 11 हाड़ 1773 बि. को शहीद हुए।
मंगत सिंह और रण सिंह भाई मणी सिंह के साथ हाड़ सुदी पंचमी 1791 बि. को शहीद हुए। सुखा सिंह और लाल सिंह ने 15 मघ्घर 1767 बि. को सरहिंद में जूझकर शहादत प्राप्त की।
भगवंत सिंह दक्षिण में अपने टांडे सहित सरकारी ठेकेदारी करता था और मुग़ल सेना को रसद भेजता था। उसकी कुशलता से प्रसन्न होकर औरंगज़ेब ने उसे “पंज हज़ारी” का मनसब प्रदान किया। परिस्थितियाँ बदलीं तो उसने यूसुफ़ज़ई अफ़गानों के साथ मिलकर बन्नू के समीप एक स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
औरंगज़ेब ने उसका मनसब छीन लिया, किंतु उसने रसद-आपूर्ति जारी रखी। अंततः उसे पुनः “पंज हज़ारी” का मनसब, खिलअत, घोड़ा और हाथी देकर सम्मानित किया गया।
जब बंदा सिंह बहादुर को पंजाब भेजने की योजना बनी, तो इसी नायक भगवंत सिंह ने उन्हें अपने टांडे में छिपाकर सुरक्षित पंजाब पहुँचाया।
“पहिले सिंह बनजारे रले। फड़ हथ बरछे बैल लद्द बले।”
बंदा सिंह बहादुर के साथ हुए संघर्षों में यह चारों भाई सम्मिलित रहे। बाज़ सिंह को सरहंद का सूबेदार नियुक्त किया गया। अंततः गुरदास नंगल से गिरफ़्तारी के पश्चात सभी को दिल्ली लाया गया और बंदा सिंह बहादुर के साथ ही इन्हें भी कठोर यातनाएँ देकर शहीद कर दिया गया।
12. शहीद भाई मणी सिंह जी : जन्म, दीक्षा, सेवा और शहादत
सिख इतिहास के आलोक-स्तंभों में शहीद भाई मणी सिंह जी का नाम एक ऐसी दिव्य आत्मा के रूप में अंकित है, जिसने शास्त्र की साधना को शस्त्र की मर्यादा से जोड़ा और गुरु-घर की सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। भाई मणी सिंह जी का जन्म 10 मार्च 1644 ईस्वी को पंजाब के ज़िला संगरूर के ग्राम लोंगोवाल में हुआ माना जाता है; यद्यपि कुछ विद्वानों के मतानुसार उनका जन्म ग्राम अलीपुर, ज़िला मुज़फ्फरनगर (अब पाकिस्तान) में भी स्वीकार किया गया है। उनके पिता का नाम भाई माई दास तथा माता का नाम मधरी बाई (सीतो) बताया गया है।
12.1 अमृत-ग्रहण एवं गुरु-सेवा
अप्रैल सन 1699 ई. की ऐतिहासिक बैसाखी पर उन्होंने खंडे-बाटे का अमृत ग्रहण किया और श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के प्रिय सिखों में प्रतिष्ठित हुए। अपने जीवनकाल में उन्होंने अनेक युद्धों में भाग लिया और गुरु-घर की अनेक महत्त्वपूर्ण सेवाएँ निभाईं। उनकी लगन और सेवा-भावना के कारण उन्हें गुरु-घर के दीवान के पद पर नियुक्त किया गया।
श्री आनंद पुर साहिब जी के युद्ध के प्रसंग में, जब सरसा नदी के किनारे गुरु-परिवार बिछुड़ गया, तब भाई मणी सिंह जी ने माता सुंदर कौर जी और माता साहिब कौर जी को सुरक्षित दिल्ली पहुँचाया। यह घटना उनके संगठन-शक्ति, निष्ठा और संकट-समय में धैर्य का प्रमाण है।
12.2 साहित्यिक एवं प्रशासनिक योगदान
भाई मणी सिंह जी का योगदान केवल रणभूमि तक सीमित नहीं रहा। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पुनः बीड़-लेखन परंपरा में उन्होंने एक लेखक के रूप में योगदान दिया। उन्हें दरबार साहिब के तीसरे हेड ग्रंथि के रूप में सेवा का अवसर भी प्राप्त हुआ। संगत तथा गुरुद्वारा-प्रबंधन में उनकी भूमिका अनुकरणीय मानी जाती है।
12.3 सिख एकता के प्रयास
बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद सिख पंथ में दो धाराएँ—तत्त खालसा और बंदी खालसा उभर आईं। इन दोनों दलों को एकत्र करने हेतु भाई मणी सिंह जी ने अपनी प्रखर बुद्धि और समर्पण से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस प्रसंग में उनका व्यक्तित्व एक ऐसे सेतु के रूप में सामने आता है, जो पंथ की एकता को केवल विचार से नहीं, आचरण से भी दृढ़ करता है।
12.4 शहादत की अनमोल गाथा
दिवाली के अवसर पर सरबत खालसा के आयोजन हेतु भाई मणी सिंह जी ने जकरिया खान से अनुमति माँगी और दस हज़ार रुपये देने का वचन दिया। किंतु जकरिया खान की बदनीयत से संगत पर हमला हुआ और अनेक सिख शहीद हुए। विरोध करने पर भाई मणी सिंह जी को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें धर्म परिवर्तन करने अथवा शहादत स्वीकारने की शर्त दी गई। भाई मणी सिंह जी ने धर्म परिवर्तन से इंकार कर 14 जून 1734 ई. को लाहौर के नखास चौक में अपने अंग-प्रत्यंग कटवाकर शहादत स्वीकार की।
12.5 परिवार की शहादत और ग्रंथ-रचना
भाई मणी सिंह जी के परिवार में 12 भाई थे, जिनमें से 11 ने सिख धर्म के लिए शहादत दी। उनके 10 पुत्रों में से 7 ने शहादत अर्पण की थी। उनके दादा भाई बल्लू राय जी ने श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की सेना में युद्ध करते हुए वीरगति पाई। साहित्यिक क्षेत्र में भी भाई मणी सिंह जी का योगदान विशिष्ट माना जाता है। उनके नाम से ज्ञान रत्नावली, भगत रत्नावली और गुरु विलास पातशाही 6वीं जैसे ग्रंथों की रचना का उल्लेख मिलता है।
इन समस्त प्रसंगों से यह निष्कर्ष दृढ़ होता है कि भाई मणी सिंह जी का जीवन त्याग, समर्पण, विद्वत्ता और शौर्य का अनुपम संगम था; एक ऐसी प्रेरणा, जो हर सिख को सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने का संदेश देती है।
13. वणजारा सिखों की परंपरागत धार्मिक-सामाजिक संरचना
वणजारा सिख अपने नाम के साथ सामान्यतः ‘सिंह’ लगाते हैं। उनके प्रत्येक टांडे में एक ‘अरदासिया’ होता है। यदि दो धड़ों में संघर्ष चल रहा हो और अरदासिया श्री गुरु नानक देव साहिब जीi की अरदास कर देने के पश्चात दोनों धड़े लड़ाई बीच में छोड़कर अपने-अपने घर लौट जाते हैं।
विवाह-संस्कार में भी गुरु-स्मृति की एक विशिष्ट परंपरा दिखाई देती है। लड़के के विवाह के समय पगड़ी में श्री गुरु नानक देव साहिब जी के नाम का रुपया बाँधे बिना शादी नहीं हो सकती। यह रुपया विवाह में सबसे कीमती और आवश्यक वस्तु माना जाता है। विवाहिता लड़की श्री गुरु नानक देव साहिब जी के नाम का चूड़ा पहनती है। विवाह के समय ‘सई’ गर्म करके दूल्हे की बाँह पर श्री गुरु नानक देव साहिब जी के नाम का दाग देने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
इसके साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि लगभग 75 प्रतिशत वणजारों के पास भूमि है, पर उपज लेने के लिए साधनों की कमी बताई गई है। श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी के समय से वणजारे अपने-अपने टांडों में नगाड़े रखते चले आ रहे हैं। श्री गुरु नानक देव साहिब जी के नाम की छाप उनके मनों पर अमिट है। वे गर्व से कहते हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के धड़ का संस्कार लख्खी शाह वणजारे ने किया था; इस कारण “आधी सिक्खी” तो उनकी है अर्थात यह कथन अहं नहीं अपितु गुरु-परंपरा से आत्मीय संबद्धता की लोक-अभिव्यक्ति है।
14. महान सिख योद्धा भाई बचित्तर सिंह जी : जीवन, युद्ध और शहादत
भाई बचित्तर सिंह जी का चित्रण सिख इतिहास में एक ऐसे शूरवीर के रूप में मिलता है, जो साधारण कद-काठी के होते हुए भी असाधारण फुर्ती, बुद्धि, साहस और रण-कौशल का प्रतीक था। उनका जन्म 12 अप्रैल सन 1663 ई. को ग्राम अलीपुर, ज़िला मुज़फ्फरनगर में, भाई मणी सिंह जी के गृह में हुआ बताया गया है। वे भाई माई दास जी के पोते और भाई बल्लू जी के परपोते थे।
भाई मणी सिंह जी ने अपने पाँच पुत्रों को श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी की सेवाओं में समर्पित किया था। ‘गुरु पंथ खालसा’ के इतिहास में भाई मणी सिंह जी के परिवार का नाम विशेष सम्मान से लिया जाता है, क्योंकि इस परिवार के 50 से अधिक सिखों ने पंथ के लिए शहादत अर्पित की। भाई मणी सिंह जी के 12 भाइयों में से 11 शहीद हुए और उनके 10 सुपुत्रों में से 8 ने पंथ के लिए शहादत दी; इन्हीं में से एक थे भाई बचित्तर सिंह जी।
वह श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी के अत्यंत निकटवर्ती स्नेही माने गए हैं। वह शूरवीर योद्धा होने के साथ-साथ संवेदनशील एवं कर्मशील सेवक भी थे। युद्धों में अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व कर उन्होंने स्वयं को कुशल योद्धा सिद्ध किया। कृपाण-चलाने में उन्हें विशेष महारथ प्राप्त थी और गुरु-पातशाह द्वारा लड़े गए युद्धों में सहभागिता कर उन्होंने अपनी निष्ठा का परिचय दिया।
14.1 लोह गढ़ के किले पर मदमस्त हाथी और ‘नागिनी भाला’ का पराक्रम (1 सितंबर सन 1700 ई.)
1 सितंबर 1700 ई. को 22 पहाड़ी राजाओं ने मिलकर एक मदमस्त और बलशाली हाथी को शराब पिलाकर लौह गढ़ के किले का द्वार तोड़ने की योजना बनाई। इस चुनौती के सामने श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी ने भाई बचित्तर सिंह जी को विशेष रूप से चुना। उस समय भाई बचित्तर सिंह जी ने वचन किए कि गुरु-पातशाह का आशीर्वाद उनके शीश पर है तो वे इस हाथी ही नहीं, स्वर्ग के ऐरावत का भी कपाल फाड़ सकते हैं।
गुरु-पातशाह ने उन्हें अपना “नागिनी भाला” (बरछा) विशेष रूप से उस हाथी के कपाल को भेदने हेतु प्रदान किया। मदमस्त हाथी का शरीर लोहे की ढालों से ढका था और उसकी सूंड पर दोधारी तलवार बँधी थी। वह चिंघाड़ता हुआ किले की ओर बढ़ा, तब भाई बचित्तर सिंह जी एक कमांडो की भाँति किले से बाहर आए। घोड़ा जब हाथी के सामने दोनों पैरों पर खड़ा हुआ, तब भाई बचित्तर सिंह जी ने पूर्ण शक्ति से “नागिनी भाले” का प्रहार किया; जो लोहे के तवों को फाड़ता हुआ सीधे हाथी के मस्तक में घुस गया। हाथी के मस्तक से रक्तधाराएँ बहने लगीं और वह पलटकर अपनी ही सेना को कुचलने लगा। इस एक आक्रमण ने पूरे युद्ध का पासा पलट दिया और 22 पहाड़ी राजाओं की सेना धराशायी हो गई।
14.2 श्री आनंदपुर साहिब जी से प्रस्थान, मलकपुर रंगड़ा का युद्ध और शहादत
5–6 दिसंबर सन 1704 ई (कुछ इतिहासकार इसे 1705 ई. भी लिखते है) की रात्रि, जब श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी ने श्री आनंदपुर साहिब जी का किला छोड़ने का निर्णय किया, तब भाई बचित्तर सिंह जी उन 40 लोगों में सम्मिलित बताए गए हैं, जिन्होंने गुरु-पातशाह के साथ जीने-मरने का प्रण किया था। सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें 100 सैनिकों के जत्थे का नायक नियुक्त कर, एक दल के साथ बाहर भेजा गया। यह जत्था श्री आनंदपुर साहिब जी से कीरतपुर तक पहुँचा और वहाँ से सरसा नदी की ओर बढ़ा, जहाँ शत्रु सेना ने गोलियों और तीरों की बौछार कर हमला किया। गुरु-पातशाह ने अलग-अलग जत्थों को अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया और भाई बचित्तर सिंह जी को निर्देश दिया कि वे सरसा पार कर रोपड़ की ओर जाएँ ताकि सरहिंद से आ रही मुग़ल फौजों को रोका जा सके।
जब जत्था ग्राम मलकपुर रंगड़ा (वर्तमान मलकपुर) पहुँचा, तब वहाँ स्थानीय रंगड़ और मुग़ल फौजों के साथ घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में सौ सिखों के जत्थे ने शत्रु के सैकड़ों सैनिकों को मारकर शहादत पाई। भाई बचित्तर सिंह जी गंभीर रूप से घायल होकर अचेत अवस्था में रणभूमि में पड़े रहे; शत्रु ने उन्हें मृत समझकर छोड़ दिया।
पीछे से आ रहे साहिबज़ादा अजीत सिंह जी, भाई मदन सिंह जी और साथियों ने उन्हें घायल अवस्था में पाया और लगभग 6 किलोमीटर दूर कोटला निहंग खान के निवास स्थान पर ले गए। श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी पहले से वहाँ उपस्थित थे; उपचार आरंभ हुआ। भाई निहंग खान की पुत्री बीबी मुमताज ने उनकी सेवा-शुश्रूषा की, किंतु घाव अत्यंत गहरे होने और रक्तस्राव अधिक होने के कारण भाई बचित्तर सिंह जी बच न सके और 8 दिसंबर सन 1704 ई. को शहीद हो गए। उनका अंतिम संस्कार भाई गुरमा सिंह गहुणिआं-सैनी तथा भाई बग्गा सिंह जी बढ़ई ने रात्रि के अंतिम पहर में किया।
14.3 माई मुमताज : सेवा, संकल्प और स्मृति-स्थल
ऐतिहासिक स्रोतों से यह भी वर्णित है कि बीबी मुमताज का निकाह बस्सी पठाना के एक मुस्लिम युवक से तय था। जब मुग़ल फौज कोटला निहंग खान के निवास पर तलाशी ले रही थी, तब भाई बचित्तर सिंह जी का जीवन बचाने हेतु उन्होंने सूबेदार को यह कहकर रोक दिया कि उनकी बेटी मुमताज अपने खाविंद (पति) के साथ कमरे में है और इस्लामी मर्यादा के अनुसार गैर-जनाना घर में पराए पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। फौजदार आश्वस्त होकर लौट गया।
बाद में बीबी मुमताज ने इसे इलाही हुक्म मानकर भाई बचित्तर सिंह जी को अपना खाविंद स्वीकार किया और आगे चलकर वह माई मुमताज के नाम से प्रसिद्ध हुईं। वे जीवन भर गुरु-चरणों से जुड़ी रहीं और यह वचन करती रहीं—
“वाह-वाह गुरु गोबिंद सिह, भाणे का खाविंद गोबिंद सिह”
वर्तमान समय में माई मुमताज की कब्र/मज़ार ग्राम बड़ी की एक पहाड़ी पर बताई जाती है, जो कोटला निहंग खान नामक स्थान से लगभग 20 किलोमीटर दूर है। ग्राम बड़ी की एक अन्य पहाड़ी पर उनकी स्मृति में गुरुद्वारा साहिब की इमारत का उल्लेख भी मिलता है। इसी प्रसंग में ऐतिहासिक स्रोतों द्वारा आलम खान, रामकल्ला जी, नूरामाही तथा रज़िया (जिन्होंने छोटे साहिबज़ादों की शहादत का वृत्तांत दिया) की कड़ियों का उल्लेख भी किया जाता है।
14.4 वंश-परंपरा और आगे की शहादतें
भाई बचित्तर सिंह जी के दो पुत्र; भाई संग्राम सिंह और भाई राम सिंह जी का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने गुरु पंथ खालसा के लिए जीवन अर्पित कर शहादत पाई। भाई संग्राम सिंह 13 मई सन 1710 ई. को चप्पड़ चिड़ी (सरहिंद) के युद्ध में शहीद हुए और भाई राम सिंह जी 9 जून सन 1716 ई. को दिल्ली में बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ शहीद हुए।
14.5 वारों और ऐतिहासिक रचनाओं में भाई बचित्तर सिंह जी
सिख इतिहास में भाई बचित्तर सिंह जी का नाम वारों और ऐतिहासिक रचनाओं में समय-समय पर प्रस्तुत हुआ है। उदाहरणस्वरूप—
“बोलिआ चित्र – बचित्र सिंह, रण होली खेलां जाई कै॥
पहिला खंडा झाड़ना, रुसतम दे सिर कतराह कै॥”
(वार पातशाही दसवीं की, पंजाबी वारां, संपादक पिआरा सिंह पदम्, पृष्ठ क्रमांक 258, सन 1980 ई. की आवृत्ति)
“बरछा मारिआ मारिआ बचित्तर सिंह कुंभ विच उठाए ॥
रणों के हाथी भज कै फिर राजी पाए ॥
बरछा सिंह बचित्तर दा मुल महिंगे होइआ ॥”
(पंजाबी वारां पिआरा सिंह पदम्, पृष्ठ क्रमांक 274)
“बचित्तर सिंह तेरी बरछी रोशन, तेरी सांग झरमल करै ॥
तेरे नाम थी रिपु थर-थर कापै, तेरी परबत हलक परै ॥”
(देसा सिंह भट्ट का दोहा, भाई भागू सिंह के आनंद कारज (परिणय बंधन) अमृतसर, सन् 1706 ई. में पढ़ा गया)
(नोट— इस पूरे इतिहास की जानकारी भट्ट बही मुलतानी सिंधी और भट्ट बही तलउढ़ा में भी अंकित होने का उल्लेख किया गया है।)
15. शहीद भाई बाज सिंह : सिख शौर्य, मानवता और जुल्म-विरोध की जीवंत परंपरा
सिख इतिहास का मूल स्वभाव यही रहा है कि वह अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना सिखाता है और यह संघर्ष केवल युद्ध कौशल तक सीमित नहीं अपितु मानवता, धर्म और आत्मसम्मान की रक्षा का संकल्प भी है। जब भारत में इस्लामीकरण की जबरदस्त कोशिशें तीव्र थीं, तब शहीद भाई बाज सिंह जैसे योद्धाओं ने अपनी वीरता से सत्ता के सिंहासन तक को हिला दिया। परंपरा में यह वर्णित है कि उनकी निर्भीकता और रण-कौशल ने दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह फर्रुखसियर को भी भयभीत कर दिया और वह तख्त छोड़कर भागने पर विवश हो गया। यही वह इतिहास है, जिसे आज भी स्मरण किया जाता है और जिसके भीतर सिख चेतना का अडिग स्वरूप उजागर होता है।
16. बादशाह फर्रुखसियर की क्रूरता : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
बादशाह फर्रुखसियर, जिसका पूरा नाम अब्बुल मुजफ्फर मोहम्मद शाह फर्रुखसियर था, सन 1713 ई. से सन 1719 ई. तक दिल्ली का शासक रहा। वर्णित है कि उसने सिखों के विरुद्ध अत्याचार की पराकाष्ठा करते हुए सात दिनों में 740 सिख योद्धाओं को शहीद कराया; प्रतिदिन सौ से अधिक सिखों को शहीद किया जाता था। इन परिस्थितियों में भी सिख वीर भयभीत नहीं हुए; वे धर्म-रक्षा का संकल्प लेकर शहादत को स्वीकार करते रहे। इस क्रूर समय-चक्र में ही भाई बाज सिंह का प्रसंग सामने आता है, जो सिख शौर्य का अत्यंत तीक्ष्ण प्रतीक बनकर इतिहास में स्थापित हुआ।
17. भाई बाज सिंह : वीरता, चुनौती और शहादत
जब फर्रुखसियर ने शहीदों की यह भयावह तस्वीर देखी, तब उसने सुना कि सिखों में एक महान योद्धा बाज सिंह है, जो अपने युद्ध-कौशल और निर्भीकता के लिए प्रसिद्ध है। फर्रुखसियर ने आदेश दिया कि बाज सिंह को पकड़कर उसके सामने प्रस्तुत किया जाए। भाई बाज सिंह को पिंजरे में बंद करके दरबार में लाया गया।
दरबार में फर्रुखसियर ने कहा- “हमने सुना है कि तुम बड़े शूरवीर और बहादुर हो, लेकिन अब तुम मेरे पिंजरे में बंद हो; कहाँ गई तुम्हारी बहादुरी?”
भाई बाज सिंह ने उत्तर दिया- “पिंजरे में भेड़-बकरियों को भी बंद नहीं किया जाता; यह केवल शेरों के लिए होता है। हम जैसे शेर तुझे खौफ दिखाने के लिए पैदा हुए हैं। अगर तुम मेरी बहादुरी देखना चाहते हो, तो मुझे पिंजरे से बाहर निकालकर मेरे हाथ खोल दो; मैं तुम्हें दिखाऊँ क्या होता है एक गुरु का सच्चा सिख?”
फर्रुखसियर ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया और सैनिकों को आदेश दिया कि भाई बाज सिंह को पिंजरे से बाहर निकालकर केवल एक हाथ की हथकड़ी खोल दी जाए।
17.1 दृढ़ता और शौर्य की मिसाल
जैसे ही भाई बाज सिंह का एक हाथ खुला, उसने तत्काल पास खड़े सैनिक की तलवार छीन ली और अपने अद्वितीय युद्ध-कौशल का प्रदर्शन करते हुए एक के बाद एक 13 मुगल सैनिकों को मार गिराया। इस दृश्य से फर्रुखसियर भयभीत हो उठा और वर्णित है कि अपनी 25,000 सैनिकों की सेना की उपस्थिति के बावजूद वह भाग खड़ा हुआ।
भाई बाज सिंह ने सिंह-गर्जना के साथ उसे ललकारा- “तुम कहाँ भाग रहे हो? अभी तो तुम्हारी सेना ने मेरे एक हाथ की हथकड़ी खोली है; दूसरी हाथ की हथकड़ी खोलनी बाकी है।”
परंतु अंततः मुगल सेना ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और भाई बाज सिंह ने शौर्यपूर्वक युद्ध करते हुए शहादत प्राप्त की।
18. शहीदी की गाथा और सिख इतिहास में स्थान
भाई बाज सिंह वही वीर बताए जाते हैं जिन्हें श्री गुरु गोबिंद सिह साहिब जी ने अपने पाँच सिखों में से एक के रूप में भेजा था। यह भी वर्णित है कि उन्होंने भाई फतेह सिंह के साथ मिलकर वजीर खान पर आक्रमण किया और सरहिंद की विजय के प्रसंग में योगदान दिया। उनकी शहादत और वीरता सिख इतिहास की स्मृति में इसलिए भी अमूल्य है कि वह केवल व्यक्तिगत पराक्रम नहीं अपितु गुरु-आज्ञा, धर्म-रक्षा और निर्भीक चेतना का समवेत रूप है।
भाई बाज सिंह और उनके तीन भाई- राम सिंह, शाम सिंह, और सुक्खा सिंह, सभी ने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिए जीवन अर्पित किया। उल्लेखित है कि 7 से 9 जून सन 1716 ई. के बीच भाई बाज सिंह को शहीद किया गया।
19. समकालीन तथ्य : वणजारों के टांडे, जनसंख्या और सामाजिक-सांस्कृतिक स्वरूप
वणजारा समाज केवल इतिहास के भीतर नहीं, बल्कि वर्तमान भारत के सामाजिक परिदृश्य में भी एक बड़ा वास्तविक तथ्य है। डॉ. हरभजन सिंह (Punjabi University, Patiala) की शोध-आधारित जानकारी के अनुसार भारत में वणजारों के लगभग 20,000 टांडे हैं और उनकी संख्या पाँच करोड़ (सन 2020 ई. तक) बताई गई है, जो भारत के 22 सूबों में फैली हुई है। विशेषतः मध्य प्रदेश (47 लाख), महाराष्ट्र (62 लाख), आंध्र प्रदेश (71 लाख), कर्नाटक (67 लाख), उत्तर प्रदेश (58 लाख), उड़ीसा (33 लाख), बिहार (35 लाख), राजस्थान (32 लाख), इन क्षेत्रों में उनके टांडों की भरमार बताई गई है।
जिस शहर/ग्राम के पास ये बस्ती बसाते हैं, उसे टांडा कहा जाता है और टांडे का नाम प्रायः उसी शहर/ग्राम के नाम पर रखा जाता है। टांडे के मुखिया को ‘नायक’ कहा जाता है। वणजारे अपना संबंध राठौर, चौहान, पवार और यादवों से जोड़ते हैं तथा राजपूत भी कहलाते हैं। महाराष्ट्र में भारी संख्या होने के कारण श्री वी. पी. नायक और सुधाकरराव नायक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, पर उन्होंने अपने आप को श्री गुरु नानक देव साहिब जी का सिख घोषित नहीं किया; किंतु टांडों का कुछ सुधार अवश्य हुआ, ऐसा वर्णित है।
आंध्र में वणजारों का आगमन महाराजा रणजीत सिंह की सेना के आगमन से जोड़ा गया है। कहा गया है कि जो 1400 सिख सिपाही (चौदह रिसालों) में आए, उनमें से बहुत से वणजारे थे; उनके परिवारों का बड़ा विस्तार हुआ। तथापि यह भी रेखांकित किया गया है कि 90 प्रतिशत वणजारे गरीबी रेखा से नीचे हैं। इसलिए उन्हें संभालने और गुरु घर से पक्के तौर पर जोड़कर रखने की आवश्यकता विशेष रूप से सामने आती है।
20. उपसंहार : इतिहास, शहादत और परंपरा की समेकित दृष्टि
वणजारा समुदाय की सिक्खी में सहभागिता केवल संगत तक सीमित नहीं रही; वह गुरु-खोज, गुरु-सेवा, नगर-स्थापना, शहीदी संस्कार, सैन्य नेतृत्व और स्वतंत्रता-संघर्ष तक विस्तृत हुई।
मक्खन शाह की गुरु-खोज, लख्खी शाह का आत्मोत्सर्ग, नगाहिया सिंह का रण में दी गई शहादत और भगवंत सिंह व उनके बंधुओं की शौर्य-गाथा इस तथ्य की पुष्टि करती है कि वणजारे केवल व्यापारिक काफ़िलों के संचालक नहीं थे अपितु गुरु पंथ खालसा के अमर प्रहरी थे।
इस भाग में प्रस्तुत प्रसंग यह स्पष्ट करते हैं कि वणजारा परंपरा में सेवा, शौर्य और शहादत एक साथ प्रवाहित हुए हैं। शहीद भाई मणी सिंह जी का जीवन सिख प्रशासन, साहित्य और पंथ-एकता के लिए प्रेरक आधार बनता है, वहीं भाई बचित्तर सिंह जी का पराक्रम गुरु कालीन युद्ध इतिहास में उस अद्वितीय क्षण का प्रतीक है, जिसने सामूहिक मनोबल और युद्ध परिणति दोनों को प्रभावित किया। वणजारा समाज की लोक परंपराएँ भी यह दर्शाती हैं कि गुरु स्मृति उनके दैनिक जीवन की संस्कृति में एक जीवित संस्कार की तरह प्रतिष्ठित रही है।
इस शोध-पत्र से यह निष्कर्ष उभरता है कि वणजारे केवल भ्रमणशील व्यापारी समुदाय नहीं रहे, बल्कि वह गुरु परंपरा के सहयात्री, गुरु-कार्य के सहयोगी, और संकटकाल में गुरु पंथ खालसा के अमर प्रहरी सिद्ध हुए। एक ओर मक्खन शाह लुबाणा जैसे व्यक्तित्व गुरु की खोज और गुरु प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक प्रसंग में दिखाई देते हैं, दूसरी ओर लख्खी शाह और नगाहिया सिंह जैसे नाम शहादत काल के साहस को उजागर करते हैं। वहीं शहीद भाई मणी सिंह जी और भाई बचित्तर सिंह जी के प्रसंग वणजारा परंपरा के भीतर शस्त्र-शास्त्र की एकसाथ बहती धारा को प्रमाणित करते हैं।
शहीद भाई बाज सिंह का प्रसंग इस समूचे विमर्श को उस चरम बिंदु तक ले जाता है जहाँ वीरता केवल युद्ध नहीं रहती अपितु जुल्म के विरुद्ध लोक-चेतना की घोषणा बन जाती है। समकालीन आँकड़े और सामाजिक यथार्थ यह संकेत करते हैं कि इतिहास की यह दीप्त परंपरा आज भी सामाजिक संरचना में जीवित है; आवश्यकता केवल इतनी है कि इस समुदाय को गुरु घर के साथ आत्मीय और संगठित रूप से जोड़कर उनकी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जड़ों को पुनः सुदृढ़ किया जाए।
गुरु वाणी में ‘वणजारा’ का प्रतीकात्मक प्रयोग इस बात का संकेत है कि यह समुदाय उस युग में इतना व्यापक और परिचित था कि उसे मानव जीवन के आध्यात्मिक रूपक के रूप में प्रयुक्त किया जा सका। अतः वणजारों की भूमिका को केवल व्यापारिक समुदाय के रूप में नहीं अपितु भारतीय इतिहास और गुरु परंपरा के एक सशक्त आधार-स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस प्रकार, वणजारा समाज की कथा, इतिहास, शहादत और परंपरा; गुरु पंथ खालसा की उस व्यापक धारा का प्रतिबिंब है, जिसमें सेवा, साहस, और सत्य के लिए दी गई शहादतें, समय के पार जाकर भी प्रेरणा बनता रहता है।
21. टिप्पणियाँ (Notes)
-
- श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरमुखी में सम्मानपूर्वक ‘अंग’ कहकर संबोधित किया जाता है।
-
- गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर ऐप को मानक मानकर किया गया है।
Foot Notes
Roads & Communications in Mughal India, Abul Khair Muhemmod Farooque, Idarah-i-Adaleiyat-i-Delhi.
-
- Encyclopaedia of Sikhism (abridged), by Dr. Dharam Singh, 2013, page 704.
-
- Roads & Communications in Mughal India, Page 66.
-
- Ibid
-
- Ibid
-
- Imperial Gazetteer of India, 1908, Vol. 230, Page 221.
-
- Sri Guru Granth Sahib, Page 74.
-
- Makhan Shah, Sri Gurpratap Suraj Granth, Ras 11, Adhyai 3–17.
-
- Ibid
-
- Encyclopaedia of Sikhism (abridged), by S. Dr. Dharam Singh vide Lakhi Shah.
-
- Vanjare, Prof. Pyara Singh ‘PADAM’.
–सादर आभार सहित
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’
अवंतिका रेसीडेन्सी, सोमवार पेठ, पुणे – 411011
ईमेल: [email protected] मो. 9096222223,9371010244