वणजारे: गुरु पंथ खालसा के अमर प्रहरी (इतिहास, शहादत और परंपरा)

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वणजारे: गुरु पंथ खालसा के अमर प्रहरी (इतिहास, शहादत और परंपरा)

‘वणजारा’, ‘बनजारा’ या बंजारे शब्द का निर्माण ‘वणिक’ अथवा ‘बणिक’ शब्द से हुआ माना जाता है, जिसका अर्थ है—व्यापारी। बंजारे कोई साधारण व्यापारी नहीं, बल्कि प्राचीन आदिवासी क़बीले  के चक्रवर्ती व्यापारी थे। शब्द ‘वणजारा’ की उत्पत्ति ‘वण’ (पंजाबी ‘बण’—अर्थात जंगल) और ‘जारा’ (अर्थात घूमने वाला) से भी मानी जाती है। शब्दावली का यही मत सर्वाधिक स्वीकार्य है। आधुनिक लेखक ‘वणजारा’, बंजारा और ‘बनजारा’ शब्दों को समान अर्थों में प्रयोग करते हैं।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में ‘वणजारा’ शब्द प्रायः उस व्यक्ति के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है, जो इस संसार में अकाल पुरख के नाम की पूँजी को संचित कर, उसे अपने जीवन में प्रयोग कर उत्तम और गुणवान बनता है। पंजाब में नमक की खानें उपलब्ध थीं। वणजारे नमक का व्यापार भी करते थे। संस्कृत में नमक को ‘लवण’ कहा जाता है। संभवतः इसी कारण ‘लवण’ शब्द से ‘लुबाणा’ शब्द बना प्रतीत होता है, क्योंकि ये लोग नमक का व्यापार करते थे। कुछ लुबाणा लेखकों ने हाल ही में ‘लुबाणा’ शब्द की व्याख्या ‘लोबाणा’ के रूप में की है, जिसके अर्थ हैं—अत्यंत परिश्रमी कर्मी (कारीगर)।

आधुनिक काल में ‘वणजारा’. ‘बंजारा‘ या ‘बनजारा’ शब्द मुख्यतः उन व्यापारियों के लिए प्रयुक्त होता है, जो अनाज, नमक और पशुओं का व्यापार करते थे, तंबुओं में रहते थे और अपने परिवारों तथा क़ाफ़िलों के साथ घूमते-फिरते रहते थे। वणजारे कई शाखाओं और उप शाखाओं में विभक्त थे और पूरे भारत में फैले हुए थे। यह बैलों, गायों, घोड़ों, ऊँटों और तंबुओं के साथ बड़े – बड़े क़ाफ़िलों में चलते थे, जिनमें मुख्य रूप से परिवारों के समूह और क़बीले के लोग सम्मिलित रहते थे।

यदि संख्या की दृष्टि से सिखों में विचार किया जाए, तो वणजारा क़बीला सबसे प्रमुख है, जो समूचे दक्षिण भारत में सर्वाधिक फैला हुआ है। वणजारे उन सिखों में से हैं, जिन्होंने सिक्खी की जड़ें मजबूत करने के लिए अपने पूरे – के – पूरे परिवारों के रक्त से सिक्खी के पौधे को सींचा। वे इतने साहसी थे कि बचित्तर सिंह जैसे योद्धा हाथियों के मुँह मोड़ देने वाले बने। यदि किसी ने गुरबाणी की उत्तम व्याख्या की, तो वे भी इन्हीं में से एक भाई गुरदास के जैसे ज्ञानी थे। वणजारे सिखों में भाई मनी सिंह जैसे महापुरुष हुए, जिनकी निष्ठा इतनी अडिग थी कि उन्होंने अंग – अंग कटवा लिया, पर सिक्खी नहीं छोड़ी। गुरु को खोजने के लिए यदि मक्खण शाह जैसे लोगों ने मोहरें न्योछावर कर दीं, तो श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के धड़ का संस्कार करने के लिए लखी शाह वणजारे जैसे लोगों ने अपने ही घर को आग लगा दी। गुरु घर की दीवानगी भी ऐसी निभाई कि अपनों को भुलाकर गुरु घर के दीवाने बन गए।

इतिहास के अनुसार भाई मनसुख पहले वणजारा सिख हैं, जो न केवल गुरु घर से जुड़े, बल्कि जिन्होंने श्रीलंका के राजा शिवनाभ जैसे शासकों को भी श्री गुरु नानक देव जी का श्रद्धालु बनाकर सिक्खी को भारत की सीमाओं से बाहर फैलाने में सहायता की। छठे गुरु का एक अन्य सिख गढ़ ग्वालियर का दरोगा हरिदास वणजारा था।

लुबाणा जाति भी व्यापारी जमात का एक अंग थी। “पद्म चन्द्र संस्कृत कोष” में लिखा है कि मूल पद “लावणिक” है, जिसका अर्थ है- लूण (नमक) का कारोबार करने वाला व्यापारी। खाने-पीने का अन्य सामान- अन्न, फल या साग – पात आदि- तो हर कोई ज़मीन में पैदा कर सकता है, पर नमक नहीं; और नमक के बिना कोई नमकीन पदार्थ तैयार नहीं किया जा सकता। इसलिए नमक बेचने वाले लबाणियों का कारोबार और सम्मान विशेष रहा है, और धीरे-धीरे वणजारे तथा लुबाणे—दोनों जातियाँ घुल-मिल गईं। गुजरात में ये “लुहाणे”, आंध्र और कर्नाटक में “लबाने” या “लंबाड़ी” कहलाते हैं। पंजाब में बसे लुबाणियों के 10-12 गोत्र प्रसिद्ध हैं जैसे—अजरावत, दातला, पीलिया, पुरवाल, खसारिया, गोजालिया, गुज्जर, तदर्न, वामियाल और नारोवाल। वणजारा जाति से मिला – जुला होने के कारण रमाणा, उदाना, गुरुगरिया, गगनौत, डहोत, बंजरउँत और बड़तिया आदि अन्य गोत्र भी शामिल होते हैं। बहावलपुर रियासत में ये “रठोर” कहलाते हैं। “बहू-रूपिये” भी इनकी एक शाखा है।

सरकारी संरक्षण

मध्यकालीन समय में सेना को रसद, शस्त्र-सामग्री आदि पहुँचाने के लिए कोई स्थायी सरकारी विभाग नहीं था। सेना को विभिन्न स्थानों पर अपने सेनापतियों और बादशाहों की इच्छा के अनुसार विचरण करना पड़ता था। वणजारों का मुस्लिम सल्तनत की सेना से पहला संपर्क सिकंदर लोदी के समय हुआ, जो उन्हें 1504 ई. में धौलपुर पर आक्रमण के समय अपने साथ ले गया। उसी समय से वणजारों ने दक्षिण भारत की प्रत्येक सैनिक मुहिम में रसद पहुँचाने का कार्य संभाल लिया।

बादशाह अकबर के शासनकाल में वणजारे अकबर की सेना को रसद और समस्त सैन्य सामग्री उपलब्ध कराते थे। उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर अकबर ने उन्हें सभी प्रकार के लगान और चुंगियों से मुक्त कर दिया। बंजारों की छवि अत्यंत ईमानदार और विश्वसनीय व्यापारियों के रूप में स्थापित थी। उनके विरुद्ध कभी भी विश्वासघात की कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई। इसी कारण उन्हें धन का संपूर्ण भुगतान अग्रिम (साई) में ही दे दिया जाता था, ताकि आपूर्ति में कोई बाधा न आए। युद्धकाल में किसी भी पक्ष की सेना वणजारों पर आक्रमण नहीं करती थी।


सेना को रसद पहुँचाने के लिए कई बार वे एक लाख या उससे भी अधिक बैल गाड़ियों का उपयोग करते थे। केवल बैल गाड़ियाँ ही नहीं, बल्कि गायों के माध्यम से भी सामान ढोया जाता था। जब शाहजहाँ का वज़ीर आसिफ़ ख़ान सन 1630 ई. में दक्षिण की मुहिम पर गया, तो वणजारा क़बीले के दो दल उसके साथ रवाना हुए। उन्हें जहाँ चाहें वहाँ से घास और पानी लेने की पूरी छूट थी, बशर्ते वह सेना के साथ बने रहें। यह शर्त सोने की एक शिला / पट्टे पर अंकित है, जो आज भी दक्षिण हैदराबाद में विद्यमान है।

उस समय के लगभग सभी लेखक इस बात पर सहमत हैं कि वणजारे बड़ी संख्या में पशु रखते थे। ढुलाई के लिए बैल मुख्य पशु होने के कारण, उनका स्वामित्व स्वयं में ही उनकी समृद्धि और अन्य व्यापारियों की तुलना में उनकी सुविधा-संपन्न स्थिति का सूचक था। कुछ वणजारों के पास 1000 तक गाड़ियाँ भी होती थीं। औरंगज़ेब के समय प्रसिद्ध यात्री तवर्नियर ने वणजारों का एक क़ाफ़िला देखा, जिसमें 10 से 12 हज़ार बैल सभी प्रकार के ख़ज़ानों से लदे हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए उसने स्वयं देखा। उनके बैलों से प्रभावित होकर उसने लिखा कि एक जोड़ी बैलों की क़ीमत, उस समय कम से कम 600 रुपये होती थी। पुरातन स्त्रोतों के अनुसार वणजारे चार क़बीले में विभक्त थे और प्रत्येक की संख्या कम से कम एक लाख लोगों की थी। पहला क़बीला केवल मक्का / मकई का व्यापार करता था, दूसरा चावल का, तीसरा दालों का और चौथा नमक आदि का।

सिख इतिहास में भूमिका

पुरातन जन्म साखियों में उल्लेख मिलता है कि श्री गुरु नानक साहिब जी नानकमत्ता (ज़िला नैनीताल) से लगभग 60 मील दक्षिण की दूरी पर वणजारों के ‘टांडे’ में गए थे। यह स्थान मुरादाबाद से नैनीताल जाने वाली सड़क पर स्थित है। ‘इंपीरियल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया’ के अनुसार यह (टांडा) एक अत्यंत प्राचीन कस्बा था, जिसे प्रारंभ में वणजारों ने बसाया था और वे सामान्यतः वहीं निवास करते थे। ‘टांडा’ वणजारों के क़ाफ़िलों के पड़ाव-स्थल को कहा जाता था। श्री गुरु नानक साहिब जी यहाँ आए और परंपरा के अनुसार उन्होंने यह शब्द उच्चारित किए, जिसे गुरुवाणी में इस प्रकार से अंकित किया गया है-

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ 

सिरीरागु महला १ पहरे घरु १ ॥ 

पहिलै पहरै रैणि के वणजारिआ मित्रा हुकमि पड़आ गरभासि ॥ 

उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥ 

खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥ 

ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥ 

जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥ 

कहू नानक प्राणी पहिले पहरे ‘हकमि पड़आ गरभासि ॥१॥ 

(संसार में वाणिज्य के लिए आने वाले हे मनुष्य रूपी) वणिक मित्र! जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में प्रभु के हुक्म से (जीव माता के) गर्भ में स्थित होता है। हे वणिक मित्र! (गर्भ में) उलटे लटके हुए तपस्या करता है और (उस अवस्था से मुक्ति प्राप्त करने के लिए) प्रभु के आगे प्रार्थना करता है। उलटा लटक कर परमात्मा (के चरणों में) ध्यान मग्न हो कर प्रार्थना करता है। अमर्यादित स्थिति में (अर्थात् नग्न रूप में) ही कलियुग (अर्थात् संसार में) आता है और पुनः नग्न ही लौट जाता है। जैसी (कर्मफल लिखने वाली ईश्वरीय) कलम/लेखनी मस्तक पर चली है. वैसी ही (कर्मफल रूपी पूंजी) जीव के पास होती है। नानक का कथन है कि जीव ने जीवन रूपी रात्रि के प्रथम प्रहर में ईश्वर के हुक्म से (माता के) गर्भ में निवास पाया है।१।

दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥ 

हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥ 

हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥ 

चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥ 

जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥ 

कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥२॥

हे वणिक मित्र! आयु रूपी रात्रि के दूसरे प्रहर में (जन्म लेने के पश्चात प्रभु के चरणों में लगा हुआ) ध्यान भूल जाता है। हे वणिक मित्र ! (जन्म के पश्चात् बालक को) हाथों पर उठा उठा कर (प्रसन्नता पूर्वक) दुलारा जाता है, जैसे यशोदा के घर में कृष्ण (को प्रेमपूर्वक दुलारा जाता था)। प्राणी (बालक) को हाथों में नचाते हुए माता कहती है कि (यह) मेरा पुत्र है। हे मेरे अचेत एवं मूर्ख मनः याद रखो कि अंतकाल में कोई भी (तुम्हारा सम्बंधी) नहीं है। जिस (प्रभु) ने तुम्हारी सिरजना की है. उस को अपने हृदय में ध्यान धर कर (तुम) पहचानते नहीं। नानक का कथन है कि जीव आयु रूपी रात्रि के दूसरे प्रहर में (प्रमु में) ध्यान केंन्द्रित करना भूल गया है।२।

तीजे पहरे रैणि के वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥ 

हरि का नाम न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥ 

हरि का नाम न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥ 

धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥ 

धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥ 

कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥३॥

हे वणिक मित्र! आयु रूपी रात्रि के तीसरे प्रहर में (तुम्हारा) चित धन और यौवन में लग जाता है। हे वणिक मित्र! (तुम) प्रभु-नाम की आराधना नहीं करते, जिस के करने से तुम बंधन मुक्त हो सकते हो। जीव हरि-नाम का स्मरण नहीं करता और मायावी प्रभाव में व्याकुल हुआ फिरता है। धन में मग्न होकर और यौवन में मस्त होकर व्यर्थ में श्रेष्ठ जन्म को गंवा देता है। (उस ने) धर्माधारित कर्म नहीं किया और शुभ कर्मों को अपना साथी न बनाया। नानक का कथन है कि आयु के तीसरे प्रहर में जीव का धन और यौवन में चित लग जाता है।३।

चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥ 

जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥ 

भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ 

झूठा रुदनु होआ दुोआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥ 

साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥ 

कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥४॥१॥३ 

हे वणिक मित्र! जीवन रूपी रात्रि के चौथे प्रहर में (जीवन रूपी) खेत का काटने वाला (यम) पहुंच जाता है। हे वणिक मित्र ! जब जीव को यम पकड़ कर चला लेता है, (तब) किसी (सम्बंधी अथवा मित्र) को इस भेद का बोध नहीं होता। प्रभु के रहस्य का भेद किसी को समझ नहीं आता, जब यम पकड़ कर चला लेता है। (उस मृत प्राणी के) आस-पास झूठा रुदन होने लगता है, (अपना कहा जाने वाला जीव) क्षण भर में पराया हो जाता है (अर्थात् उस के साथ सांसारिक सम्बंध खत्म हो जाते हैं)। (उस के मरणोपरांत) वही वस्तु उपलब्ध होती है, (जिस के साथ उस ने जीवन-भर) चित्त लगाया है। नानक का कथन है कि चौथे प्रहर में (जीवन रूपी) खेत यम रूप लावक काट लेता है ।४।१। (श्री गुरु ग्रंथ साहिब, अंग ७५)

वणजारों की सिक्खी में सहभागिता

वणजारों की सिक्खी में सहभागिता के विषय में जानना अत्यंत आवश्यक है। मुग़ल काल में वणजारे प्रायः सेना के लिए रसद पहुँचाने का कार्य करते थे। वे हिंदुस्तान के सभी कोनों में जाया करते थे और उनके साथ अत्यंत लंबे – लंबे क़ाफ़िले होते थे। गुरु साहिबान जब भी यात्राएँ करते थे, वे प्रायः इन्हीं क़ाफ़िलों के साथ सम्मिलित होकर यात्रा करते थे। इस प्रकार ये क़ाफ़िले गुरु साहिबान के संपर्क में आते गए और उनके श्रद्धालु बनते चले गए।

सिख इतिहास में कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवसर ऐसे हैं, जब गुरु साहिबान ने इन वणजारों के साथ यात्रा की—

सातवें पातशाह, गुरु हरिराय साहिब जी ने मक्खन शाह लुबाणा के साथ सियालकोट से कश्मीर तथा वापसी की यात्रा की। वे उसके गाँव मोटा टांडा, ज़िला झेलम (वर्तमान पाकिस्तान) में उसके यहाँ ठहरे। गुरु साहिबान ने वणजारों को गुरु के सिख बना दिया। इन्हीं में से मक्खन शाह और लख्खी शाह- दोनों ने सिख इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

गुरु हरगोबिंद साहिब जी जहाँगीर के साथ पहले ग्वालियर और फिर काश्मीर इन (वणजारों) के क़ाफ़िलों के साथ ही गए थे। (कुछ इतिहासकारों ने भ्रम वश इसे गुरु साहिब द्वारा बादशाह की नौकरी स्वीकार करना मान लिया, जो पूर्णतः गलत है।)

गुरु हरगोबिंद साहिब जी जब नानकमत्ता की ओर यात्रा पर गए, तब भी उन्होंने वणजारों के क़ाफ़िलों के साथ ही यात्रा की।

भाई मक्खन शाह लुबाना

भाई संतोक सिंह जी के अनुसार, एक बार मक्खण शाह का जहाज़ सामान सहित तूफ़ान में फँस गया और उसकी जान तथा माल दोनों संकट में पड़ गए। इस कठिन घड़ी में उसने अरदास / प्रार्थना की और प्रण किया कि यदि उसका जहाज़ सुरक्षित पार हो गया, तो वह अपने व्यापारिक लाभ का दसवाँ भाग गुरु चरणों में अर्पित करेगा। अरदास स्वीकार हुई, उसकी जान और माल दोनों बच गए। वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और इस अकाल पुरख की कृपा के लिए गुरु का धन्यवाद किया।

सबसे पहले वह दिल्ली पहुँचा, पर वहाँ उसे ज्ञात हुआ कि गुरु हरकृष्ण साहिब ज्योति-जोत समा गए हैं और उनके उत्तराधिकारी बकाला में हैं। यह सुनते ही वह तुरंत बकाला पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि गुरु गद्दी के असंख्य दावेदार उपस्थित हैं और प्रत्येक स्वयं को सच्चा गुरु तथा दूसरों को ढोंगी बता रहा है। उसने सभी को पांच – पांच स्वर्ण मुद्राएँ भेंट कीं। परंतु जब उसने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को पांच मुद्राएँ भेंट दी, तो गुरु साहिब ने उसे उसके प्रण की याद दिलाई। तभी उसे समझ में आ गया कि वही सच्चे गुरु हैं। आनंदित होकर वह अपने घर की छत पर चढ़ गया और ऊँचे स्वर में पुकारने लगा—


“गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे।”

मक्खण शाह और उसके सहयोगियों ने स्थिति को ही बदल कर रख दिया।

इसे देखकर धीरमल अत्यंत क्रोधित हुआ और उसके मसंद सीहां ने गुरु साहिब पर गोली भी चलाई, किंतु निशाना चूक गया। जब सिखों को इसका पता चला, तो मक्खण शाह ने संगत के सहयोग से सीहां मसंद और धीरमल को उसकी समस्त संपत्ति सहित गुरु साहिब के समक्ष प्रस्तुत किया। गुरु साहिब ने उन्हें पूरी संपत्ति वापस करने का आदेश दिया, जिसमें गुरु अर्जुन साहिब जी द्वारा भाई गुरदास के हाथों लिखी हुई आदि ग्रंथ की बीड़ भी सम्मिलित थी। भाई संतोक सिंह के अनुसार, मक्खण शाह लुबाणा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के साथ अमृतसर भी गया और चक्क नानकी / श्री आनंदपुर साहिब के बसने तक गुरु जी के साथ ही रहा। चक्क नानकी नगर बसाने के लिए भूमि क्रय के समय मक्खण शाह ने संगत के साथ भेंट अर्पित कर अपना योगदान दिया। बाद में उसने गुरु साहिब से विदा ली और गुरु साहिब ने उसे गुरु – नाम जपने तथा सिक्खी के प्रचार – प्रसार की आज्ञा दी।

 

बाबा लक्खी शाह बंजारा

बाबा लख्खी शाह, भाई गोधू राम के पुत्र, गाँव खैरपुर, ज़िला मुज़फ़्फ़रगढ़ (पाकिस्तान) के निवासी थे। वे वणजारा क़बीले से संबंधित थे। वणजारे संपन्न व्यापारी होते थे और लख्खी शाह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। वे गुरु साहिबान की सेवा में पूर्ण समर्पित सिख थे तथा रायसीना गाँव के निवासी थे। जब 11 नवंबर सन 1675 ई. को श्री गुरु तेग बहादुर साहिब साहिब जी का शहीदी संस्कार हुआ, तब गुरु साहिब का पार्थिव शरीर दिल्ली के चाँदनी चौक में पड़ा हुआ था।

 

भाई नगाहिया सिंह 

यह लखी शाह वणजारे का बड़ा सुपुत्र था, जिसने गुरु तेग बहादुर जी का शव घर लाकर भीतर-ही-भीतर दाह दिया था। यह बड़ा निर्भय सूरबीर योद्धा था, जो मुग़ल सेना की अमृतसर पर हुई अचानक चढ़ाई की खबर सुनकर दिल्ली से अमृतसर पहुँचा और वहीं 9 वैशाख 1766 (बि. 29 मार्च 1709 ई.) को रणभूमि में जूझकर शहीद हुआ। यह उस समय की बात है जब दशमेश गुरु के जोती-जोत समाने के उपरांत सिंह बड़े उदासीन दिन काट रहे थे और बाबा बंदा सिंह बहादुर अभी पंजाब नहीं पहुँचा था; लेकिन ऐसी हालत में भी भाई नगाहिया सिंह ने अगुवाई की।

नायक भगवंत सिंह

यह भागू वणजारा के नाम से प्रसिद्ध था, जो भाई मनी सिंह जी के चाचे नठिए का पुत्र था। इसके आठ भाई थे—भगवंत सिंह, कुइर सिंह, बाज़ सिंह, शाम सिंह—ये चारों बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ 11 हाड़ 1773 को शहीद हुए; मंगत सिंह और रण सिंह भाई मनी सिंह के साथ हाड़ सुदी पंचमी 1791 बि. को शहीद हुए; और सुखा सिंह तथा लाल सिंह ने 15 मघ्घर 1767 बि. को सरहंद में जूझकर शहादत पाई। भगवंत सिंह बड़ा दाना पुरुष था, जो दक्षिण वाले अपने टांडे सहित सरकारी ठेकेदारी करता था और मुग़ल फौजों को रसदें भेजता रहता था।

इसके काम से खुश होकर औरंगज़ेब ने इसे “पंज हज़ारी” का मनसब प्रदान किया था। हालात बदले तो नायक भगवंत सिंह ने यूसुफज़ई अफगानों के साथ मिलकर बन्नू के पास बंगश में छोटी-सी आज़ाद स्टेट बना ली। यह जानकर औरंगा बहुत क्रोधित हुआ और उसने इसका “पंज हज़ारी” मनसब छीन लिया, लेकिन यह दाना पुरुष था—इसने मुग़ल फौजों को रसद पहुँचाने का काम जारी रखा। इस कारण बादशाह ने इसे माफ़ कर दिया और पुनः बहाल करके “पंज-हज़ारी” का मनसब, खिलअत और घोड़ा तथा हाथी देकर सम्मानित किया।

फिर जब बंदा सिंह बहादुर को 4 कत्तक 1765 बि. को पंजाब की ओर भेजने की योजना बनी, तो इसी भगवंत सिंह नायक ने अपने टांडे में बंदा सिंह को छिपा-छुपाकर पंजाब पहुँचाया था।

पहिले सिंह बनजारे रले। फड़ हथ बरछे बैल लद्द बले।

और जितनी भी मुहिमें हुईं तथा मुग़ल फौजों से टकराव हुए, उनमें ये चारों भाई शामिल रहे; और बाज़ सिंह को तो सरहंद का सूबेदार ही नियुक्त कर दिया गया था। अंततः गुरदास नंगल से सबको गिरफ़्तार करके दिल्ली लाया गया और बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ ही तसीहे देकर शहीद कर दिया गया।

शहीद भाई मणी सिंह जी

भाई मणी सिंह जी, एक दिव्य आत्मा और सिख धर्म के महान शहीद, का जन्म 10 मार्च 1644 ईस्वी को पंजाब के संगरूर जिले के ग्राम लोंगोवाल में हुआ। कुछ विद्वानों के मतानुसार, उनका जन्म ग्राम अलीपुर, जिला मुजफ्फरनगर (अब पाकिस्तान) में भी माना जाता है। उनके पिता जी का नाम भाई माई दास और माता जी का नाम मधरी बाई (सीतो) था।

अमृत ग्रहण और गुरु सेवा

अप्रैल 1699 की ऐतिहासिक बैसाखी पर, उन्होंने खंडे-बाटे का अमृत ग्रहण किया और गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रिय सिख बन गए। भाई मणी सिंह जी ने अपने जीवनकाल में अनेक युद्धों में भाग लिया और गुरु घर की कई महत्वपूर्ण सेवाएं निभाई। उनकी लगन और सेवा भावना के कारण उन्हें गुरु घर के दीवान के पद पर नियुक्त किया गया। आनंदपुर साहिब के युद्ध के दौरान जब सरसा नदी के किनारे गुरु परिवार बिछड़ गया, तो भाई मणी सिंह जी ने माता सुंदर कौर जी और माता साहिब कौर जी को सुरक्षित दिल्ली पहुँचाया।

साहित्य और प्रशासनिक योगदान

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की पुनः बीड़ लेखन में उन्होंने एक लेखक के रूप में योगदान दिया। भाई मणी सिंह जी को दरबार साहिब के तीसरे हेड ग्रंथि के रूप में भी सेवा का अवसर मिला। उन्होंने संगत और गुरुद्वारा प्रबंधन में अनुकरणीय कार्य किए।

सिख एकता के प्रयास

बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद, सिख पंथ दो भागों में विभाजित हो गया—तत्त खालसा और बंदी खालसा। इन दोनों दलों को एकजुट करने में भाई मणी सिंह जी ने अपनी प्रखर बुद्धि और समर्पण से अहम भूमिका निभाई।

शहादत की अनमोल गाथा

दिवाली के अवसर पर सरबत खालसा के आयोजन हेतु उन्होंने जकरिया खान से अनुमति मांगी। इसके लिए उन्होंने दस हजार रुपये कर देने का वचन दिया। लेकिन जकरिया खान की बदनीयत से संगत पर हमला हुआ, जिससे कई सिख शहीद हुए। जब भाई मणी सिंह जी ने विरोध किया, तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें धर्म परिवर्तन करने या शहीदी स्वीकारने की शर्त दी गई। भाई मणी सिंह जी ने धर्म परिवर्तन से इनकार कर 14 जून 1734 को लाहौर के नखाश चौक में अपने अंग-प्रत्यंग कटवाकर शहादत को गले लगाया।

परिवार की शहादत और साहित्यिक योगदान

भाई मणी सिंह जी के परिवार में 12 भाई थे, जिनमें से 11 ने सिख धर्म के लिए शहादत दी। उनके 10 पुत्रों में से 7 ने भी बलिदान दिया। उनके दादा भाई बल्लू राय जी ने श्री गुरु हरगोबिंद जी की सेना में युद्ध करते हुए वीरगति पाई। साहित्यिक क्षेत्र में भी भाई मणी सिंह जी का योगदान अद्वितीय है। उन्होंने ज्ञान रत्नावली, भगत रत्नावली, और गुरु विलास पातशाही 6वीं जैसे ग्रंथों की रचना की।

भाई मणी सिंह जी का जीवन त्याग, समर्पण और वीरता की अनुपम मिसाल है, जो हर सिख के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी शहादत हमें सत्य और धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की शिक्षा देती है।

वणजारे सिख अपने नाम के साथ ‘सिंह’ लगाते हैं। हर टांडे में एक ‘अर्दासिया’ होता है। दो धड़ों में लड़ाई हो रही हो और अर्दासिया श्री गुरु नानक की अरदास कर दे, तो दोनों धड़े लड़ाई बीच में छोड़कर अपने-अपने घरों को चले जाते हैं। लड़के के विवाह के समय पगड़ी में गुरु नानक के नाम का रुपया बाँधे बिना शादी नहीं हो सकती। यह रुपया शादी में सबसे कीमती और ज़रूरी वस्तु माना जाता है। विवाहिता लड़की नानक साहिब के नाम का चूड़ा पहनती है। शादी के समय ‘सई’ गर्म करके दूल्हे की बाँह पर गुरु नानक के नाम का दाग दिया जाता है।

75 प्रतिशत वणजारों के पास ज़मीन है, पर उपज लेने के लिए साधनों की कमी है। गुरु गोबिंद सिंह जी के समय से वणजारे अपने-अपने टांडों में नगाड़े रखते चले आ रहे हैं। गुरु नानक साहिब के नाम की छाप इनके मनों पर अमिट है। ये बड़े गर्व से कहते हैं कि गुरु तेग बहादुर जी के धड़ का संस्कार लखी शाह वणजारे ने किया था; इस कारण आधी सिखी तो इनकी है।

 

महान सिख योध्दा भाई बचित्तर सिंह जी

साधारण क़द काठी के, ग़ज़ब के फुर्तीले, चुस्त-चालाक, चतुर और चोटी के सूरमा, महान शूरवीर योद्धा, दिलेर भाई बचित्तर सिंह का जन्म भाई मणी सिंह जी के गृह में 12 अप्रैल सन् 1663 ई. को ग्राम अलीपुर ज़िला मुजफ़्फरनगर में हुआ था। आप भाई माई दास जी के पोते और भाई बल्लू जी के परपोते थे। भाई मनी सिंह जी ने अपने 5 पुत्रों को श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब’ की सेवाओं में समर्पित किया था। ‘गुरु पंथ खालसा’ के इतिहास में भाई मनी सिंह जी का नाम अत्यंत सम्मान से लिया जाता है। कारण इस परिवार के 50 से ज़्यादा सिखों ने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिये अपनी शहीदियाँ अर्पित की थीं। भाई मनी सिंह जी के 12 भाई थे जिनमें से 11 ने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिये शहादत का जाम पिया था। और भाई मनी सिंह जी के 10 सुपुत्रों में से 8 सुपुत्रों ने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिये कुर्बानी दी थी। इन्ही में से एक भाई बचित्तर सिंह जी थे। जिन्होनें अपनी आयु का अधिकतम समय गुरु पातशाह जी के चरणों में सेवाएँ अर्पित करते हुए व्यतीत किया था। गुरु पातशाह जी के आप जी अत्यंत निकटवर्ती स्नेहियों में से एक थे और गुरु पातशाह जी भी उन्हें हमेशा अपनी बख़्शीशों से नवाज़ा करते थे। आप जी शूरवीर योद्धा के साथ-साथ बहुत ही संवेदनशील एवं कर्मशील सेवक थे। आप जी ने गुरु पातशाह जी के सान्निध्य में रहते हुये, प्रत्येक युद्ध में अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व कर, अपने कुशल योद्धा होने का प्रमाण दिया था। आप जी को कृपाण (तलवार) चलाने में अत्यंत महारथ हासिल थी। अनेक युद्धों में आप जी ने अपनी कृपाण के जोहर से शत्रुओं को धूल चटा कर परास्त किया था। आप जी ने गुरु पातशाह जी द्वारा लड़े गए सभी युद्धों में हिस्सा लेकर, अपने शौर्य और निष्ठा का परिचय दिया था। 

1 सितंबर, सन् 1700 ई. को जब 22 पहाड़ी राजाओं ने मिलकर, एक मदमस्त और बलशाली हाथी को शराब पिलाकर लौह गढ़ के क़िले का दरवाज़ा तोड़ने की योजना बनाई थी तो भाई बचित्तर सिंह जी को गुरु पातशाह जी ने इस मदमस्त हाथी से युद्ध करने के लिये विशेष रूप से चुना था। उस  समय में भाई बचित्तर सिंह ने वचन किए थे है गुरु पातशाह! यदि आप जी का आशीर्वाद मेरे शीश पर है तो मैं यह शराब के नशे में मदमस्त और बलशाली हाथी क्या? अपितु स्वर्ग में निवास करने वाले हाथी अरावत का भी कपाल फाड़ सकता हूँ। गुरु पातशाह जी ने भाई बचित्तर सिंह जी को अपना नागिनी भाला (बरछा) विशेष रूप से इस मदमस्त हाथी के कपाल को भेदने के लिए बख़्शीश किया था। 

दैत्याकार मदमस्त और बलशाली हाथी जिसका संपूर्ण शरीर लोहे की ढ़ालों से ढका हुआ था और उसकी सूंड पर दो धारी तलवार बाँधी गई थी। यह मदमस्त हाथी चिंघाड़ता हुआ बड़ी तेजी से लौह गढ़ क़िले की और दौड़ता चला आ रहा था तो भाई बचित्तर सिंह जी एक कमांडो की तरह क़िले से बाहर आये और घोड़े को तेजी से दौड़ाते हुए, जब घोड़ा मदमस्त हाथी के सामने आकर अपने दोनों पैरों पर खड़ा हो गया तो भाई बचित्तर सिंह जी ने अपनी पूरी शक्ति से, गुरु पातशाह जी के आशीर्वाद से नागिनी बरछे (भाले) से हाथी के कपाल पर एक अत्यंत शक्तिशाली प्रहार किया था। यह नागिनी बरछे (भाले) का प्रहार इतना शक्तिशाली था कि वह हाथी के कपाल पर बँधे लोहे के तवों को फाड़ता हुआ, सीधा हाथी के मस्तक/कपाल में घुस गया था।  

इस फुर्तीले, बलशाली और लाजवाब वार का कोई तोड़ नहीं था। हाथी के मस्तक से लहू की तेज धाराएँ बहने लगी थी और वहाँ मुड़कर अपनी ही सेना पर चिंघाड़ते हुए, अपनी ही सेना को कुचलने लगा था। इस एक आक्रमण ने पूरे युद्ध का पासा पलट दिया था और 22 पहाड़ी राजाओं की फ़ौज ताश के पत्तों के महल की तरह धराशाई हो गई थी। 

5 और 6 दिसंबर सन् 1705 ई. की रात को जब गुरु पातशाह जी ने श्री आनंदपुर साहिब का क़िला छोड़ने का फैसला किया तो भाई विचित्तर सिंह उन 40 लोगों में से एक थे, जिन्होंने गुरु पातशाह जी के साथ जीने-मरने का प्रण किया था। सुरक्षा की दृष्टि से गुरु पातशाह जी ने भाई विचित्तर सिंह जी को एक सौ सैनिकों की सेना का नायक नियुक्त कर, क़िले में स्थित लोगों के जत्थे (वहीर) के साथ क़िले से बाहर भेजा था। यह जत्था श्री आनंदपुर साहिब से कीरतपुर तक की यात्रा आसानी से कर सका था और वहाँ से जब इस जत्थे ने सरसा नदी के किनारे की ओर प्रस्थान किया तो पीछे से बड़ी संख्या में शत्रु सेना ने गोलियों और तीरों की बौछार कर हमला कर दिया था। गुरु पातशाह जी ने समय की नज़ाकत को देखते हुए अलग-अलग जत्थों को अलग-अलग स्थानों पर तैनात कर दिया था। गुरु पातशाह जी ने भाई विचित्तर सिंह जी को हिदायत दी थी कि वह सरसा नदी को पार कर रोपड़ नामक स्थान की ओर प्रस्थान करें ताकि सरहिंद से आ रही मुग़ल फ़ौजों को रोका जा सके। जब भाई विचित्तर सिंह जी का जत्था ग्राम मलकपुर रंगड़ा (जिसे वर्तमान समय में केवल मलकपुर नाम से संबोधित किया जाता है) में पहुँचे तो उस स्थान पर उनका मुकाबला स्थानीय रंगड़ और मुग़ल फ़ौजों से हुआ था। इस स्थान पर घमासान युद्ध हुआ और सौ सिखों के इस जत्थे ने शत्रु सेना के सैकड़ों सैनिकों को मारकर, शहीदी का जाम पिया था। इस युद्ध में भाई बचित्तर सिंह जी अत्यंत गंभीर रूप से घायल हो कर युद्ध के मैदान में अचेत पड़े हुये थे, शत्रु सेना ने उन्हें मृत समझकर छोड़ दिया था। पीछे से आ रहे साहिबज़ादा बाबा अजीत सिंह जी, भाई मदन सिंह जी और उनके साथियों ने जब युद्ध के मैदान में भाई बचित्तर सिंह जी को जख़्मी अवस्था में पाया तो उन्हें वहाँ से उठाकर उस स्थान से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोटला निहंग खान के निवास स्थान पर ले गए थे, श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब पहले से ही इस स्थान पर मौजूद थे और भाई बचित्तर सिंह जी का इलाज भाई निहंग खान के निवास स्थान पर प्रारंभ कर दिया गया था। भाई कोटला निहंग खान की बेटी बीबी मुमताज ने उनकी अत्यंत सेवा-सुश्रुषा की थी, परंतु भाई बचित्तर सिंह जी के जख़्म अत्यंत गहरे थे और खून भी बहुत बह चुका था इस कारण से वह बच ना सके और शहीद हो गये। 

आप जी की शहीदी 8 दिसंबर, सन् 1705 ई. को हुई थी। आप जी का अंतिम संस्कार भाई गुरमा सिंह गहुणिआं-सैनी और भाई बग्गा सिंह जी बढ़ई ने रात्रि के अंतिम पहर में कर दिया था। इस तरह से अपना संपूर्ण जीवन भाई बचित्तर सिंह जी गुरु चरणों में अर्पित कर, शहीदी प्राप्त कर गये थे। 

ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि भाई निहंग कोटला जी की बेटी बीबी मुमताज जिसका निकाह बस्सी पठाना के एक मुस्लिम युवक से होना तय था। इस बेटी के पिता भाई कोटला निहंग खान के निवास स्थान पर जब मुग़ल फ़ौज तलाशी ले रही थी तो भाई बचित्तर सिंह जी का जीवन बचाने के लिए उन्होंने फ़ौज के सूबेदार को झूठ बोला था और अत्यंत दृढ़ता से जवाब दिया था कि, मेरी बेटी मुमताज अपने खाविंद (पति) के साथ कमरे में आराम कर रही है। कारण बीती रात यह दोनों लंबी यात्रा करके आये हैं, इस्लाम धर्म की परंपरा के अनुसार गैर जनाने घर में पराये मर्दों का प्रवेश वर्जित है, जिसके कारण फ़ौजदार को विश्वास हो गया और उसने कहा कि आपकी बेटी अर्थात् मेरी बेटी है और मुग़ल फ़़ौज वहाँ से चली गई थी। इन मुस्लिम संस्कारों में पली-बढ़ी बीबी ने इसे इलाही हुक्म मानकर, भाई विचित्तर सिंह जी के चरणों में अपने शीश को निवा कर, उसे अपना  खाविंद मान लिया था और आप जी ने बाद में भाई विचित्तर सिंह की विधवा के रूप में अपना जीवन व्यतीत किया था। भविष्य में आप जी माई मुमताज के नाम से प्रसिद्ध हुई थी। दीर्घायु माई मुमताज ने गुरु चरणों से जुड़कर सारी उम्र गुजार दी थी।  आप जी अपनी तमाम उम्र यही वचन करती रही थी– 

वाह-वाह गुरु गोविंद सिंह भाणे का खाविंद गुरु गोविंद सिंह!

धन्य थी माई मुमताज जिसने अपने पिता के वचनों पर तमाम उम्र एक विधवा के रूप में गुरु पातशाह जी का यशगान किया था। वर्तमान समय में माई मुमताज की कब्र और मज़ार ग्राम बड़ी (जो कि कोटला निहंग खान से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है) की एक पहाड़ी पर स्थित है। इस ग्राम बड़ी की एक अन्य पहाड़ी पर माई मुमताज की मधुर स्मृतियों में गुरुद्वारा साहिब की विलोभनीय इमारत सुशोभित है। ऐतिहासिक स्रोतों से यह भी ज्ञात होता है कि, भाई कोटला निहंग खान की इसी बेटी मुमताज के भाई का नाम आलम खान था और आलम खान के ससुर रामकल्ला जी थे, रामकल्ला जी की सेवा में नूरामाही नामक सेवादार उनकी तामिर करता था इस नूरामाही की बहन का नाम रज़िया था, इसी बहन रज़िया ने अपनी आँखों से छोटे साहिबज़ादों की शहादत को देखकर उसका वृतांत सभी को दिया था। भाई बचित्तर सिंह जी के दो पुत्र भाई संग्राम सिंह और भाई राम सिंह जी थे जिन्होंने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिये अपना जीवन अर्पित कर, शहीदी का जाम पिया था। भाई संग्राम सिंह 13 मई सन् 1710 ई. को चप्पड़ चिड़ी के युद्ध (सरहिंद के युद्ध) में शहीद हुये थे और भाई राम सिंह जी बंदा सिंह बहादुर के साथ 9 जून सन् 1716 ई. को दिल्ली में शहीद हुए थे।

शूरवीर भाई बचित्तर सिंह जी का नाम ‘गुरु पंथ खालसा’ के इतिहास में अपना यादगार स्थान रखता है। कई वारों में और दूसरी ऐतिहासिक रचनाओं में समय-समय पर अंज़ाम दिये गये, भाई बचित्तर सिंह जी के बहादुरी, निडरता और दिलेरी के कारनामों को बड़ी संजीदगी से पेश किया गया है–

बोलिआ चित्र – बचित्र सिंह, रण होली खेलां जाई कै॥

पहिला खंडा झाड़ना, रुसतम दे सिर कतराह कै॥

(वार पातशाही दसवीं की, पंजाबी वारां, संपादक पिआरा सिंह पदम्, पृष्ठ क्रमांक 258, 1980 की आवृत्ति)।

बरछा मारिआ मारिआ बचित्तर सिंह कुंभ विच उठाए ॥

रणों के हाथी भज कै फिर राजी पाए ॥

बरछा सिंह बचित्तर दा मुल महिंगे होइआ ॥

(पंजाबी वारां पिआरा सिंह पदम्, सफा क्रमांक 274)।

बचित्तर सिंह तेरी बरछी रोशन, तेरी सांग झरमल करै ॥

तेरे नाम थी रिपु थर-थर कापै, तेरी परबत हलक परै ॥

(देसा सिंह भट्ट का दोहा, भाई भागू सिंह के आनंद कारज (परिणय बंधन) अमृतसर में सन् 1706 ई. में पढ़ा गया था)।

(नोट– इस पूरे इतिहास की जानकारी भट्ट बही मुलतानी सिंधी और भट्ट बही तलउढ़ा में भी अंकित है)।

 

शहीद भाई बाज सिंह 

पूरे विश्व में अपने अद्वितीय युद्ध कौशल, शूरवीरता और इंसानियत के लिए सिखों ने सदैव जुल्म के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जब भारत में इस्लामीकरण की जबरदस्त कोशिश की जा रही थीं, तब शहीद बाज सिंह ने अपनी वीरता से तख्त पर बैठे फर्रुखसियर को भी तख्त छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। यह है वह इतिहास, जिसे आज भी याद किया जाता है।

इतिहास के पन्नों में बादशाह फर्रुखसियर की क्रूरता

बादशाह फर्रुखसियर, जिसका पूरा नाम अब्बुल मुजफ्फर मोहम्मद शाह फर्रुखसियर था, सन 1713 ई. से सन 1719 ई. तक दिल्ली में शासन कर रहा था। फर्रुखसियर ने सिखों के खिलाफ अत्याचार की पराकाष्ठा करते हुए सात दिनों में 740 सिख योद्धाओं को शहीद किया। हर दिन सौ से अधिक सिखों को शहीद किया जाता था। ये सिख वीर निडर होकर, बिना किसी भय के, अपनी शहादत को गले लगाते हुए अपने धर्म की रक्षा कर रहे थे।

बाज सिंह की वीरता और शौर्य

जब फर्रुखसियर ने शहीदों की यह भयावह तस्वीर देखी, तो उसने सुना कि सिखों में एक महान योद्धा बाज सिंह है, जो अपनी वीरता और बहादुरी के लिए प्रसिद्ध है। इस पर फर्रुखसियर ने आदेश दिया कि बाज सिंह को पकड़कर उसके सामने पेश किया जाए। बाज सिंह को पिंजरे में बंद करके दरबार में लाया गया।

फर्रुखसियर ने बाज सिंह से कहा, “हमने सुना है कि तुम बड़े शूरवीर और बहादुर हो, लेकिन अब तुम मेरे पिंजरे में बंद हो। कहां गई तुम्हारी बहादुरी?”

बाज सिंह ने उत्तर दिया, “पिंजरे में भेड़-बकरियों को भी बंद नहीं किया जाता, यह केवल शेरों के लिए होता है। हम जैसे शेर तुझे खौफ दिखाने के लिए पैदा हुए हैं। अगर तुम मेरी बहादुरी देखना चाहते हो, तो मुझे पिंजरे से बाहर निकालकर मेरे हाथ खोल दो। मैं तुम्हें दिखाऊं क्या होता है एक गुरु का सच्चा सिख?”

फर्रुखसियर ने बाज सिंह की चुनौती स्वीकार कर दी और अपने सैनिकों से बाज सिंह को पिंजरे से बाहर निकालने का आदेश दिया, केवल एक हाथ की हथकड़ी खोलने के लिए।

दृढ़ता और शौर्य की मिसाल

जैसे ही बाज सिंह का हाथ खोला गया, उसने अपने अद्वितीय युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। उसने तुरंत पास खड़ी सैनिकों की तलवार छीन ली और एक के बाद एक 13 मुगल सैनिकों को मौत की नींद सुला दिया। इस साहसिक कार्य को देखकर फर्रुखसियर भयभीत हो गया और अपनी 25,000 सैनिकों की सेना के सामने भी वह भाग खड़ा हुआ।

बाज सिंह ने शेर की तरह दहाड़ते हुए फर्रुखसियर को चुनौती दी, “तुम कहां भाग रहे हो? अभी तो तुम्हारी सेना ने मेरे एक हाथ की हथकड़ी खोली है, दूसरी हाथ की हथकड़ी खोलनी बाकी है।”

लेकिन, दुर्भाग्य से, मुगल सेना ने बाज सिंह को चारों ओर से घेर लिया और उसने शौर्य से लड़ते हुए शहादत प्राप्त की।

शहीदी की गाथा और इतिहास

बाज सिंह वही वीर था, जिसे गुरु श्री गोविंद सिंह साहिब जी ने अपने पांच सिखों में से एक के रूप में भेजा था। यह वही सिख था जिसने भाई फतेह सिंह के साथ मिलकर वजीर खान पर हमला किया था और सरहिंद की विजय प्राप्त की थी। बाज सिंह की वीरता और उसकी शहादत को हर सिख को याद रखना चाहिए।

शहीद बाज सिंह और उनके तीन भाई— राम सिंह, शाम सिंह, और सुक्खा सिंह सभी ने ‘गुरु पंथ खालसा’ के लिए अपनी जान की आहुति दी थी। 7 से 9 जून, सन 1716 ई. के बीच भाई बाज सिंह को शहीद किया गया।

 

महत्वपूर्ण तथ्य

डॉ. हरिभजन सिंह, पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला की खोज के अनुसार, वणजारों के भारत में 20,000 टांडे हैं और इनकी संख्या पाँच करोड़ है, जो भारत के 22 सूबों में फैली हुई है। पर मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (47 लाख), महाराष्ट्र (62 लाख), आंध्र प्रदेश (71 लाख), कर्नाटक (67 लाख), उत्तर प्रदेश (58 लाख), उड़ीसा (33 लाख), बिहार (35 लाख), राजस्थान (32 लाख)—इन राज्यों के क्षेत्रों में इनके टांडों की भरमार है। जिस शहर/ग्राम के पास ये बस्ती बसाते हैं, उसे टांडा कहते हैं और टांडे का नाम उसी शहर/ग्राम के नाम पर ही रख देते हैं। टांडे के मुखिया को ‘नायक’ कहा जाता है। ये अपना संबंध राठौर, चौहान, पवार और यादवों से जोड़ते हैं और राजपूत भी कहलाते हैं। महाराष्ट्र में भारी संख्या होने के कारण श्री वी. पी. नायक और सुधाकरराव नायक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने, पर उन्होंने अपने आप को श्री गुरु नानक का सिख घोषित नहीं किया; पर टांडों का कुछ सुधार तो अवश्य किया।

आंध्र में वणजारों का आना महाराजा रणजीत सिंह की सेना के आने से संबंधित है। जो 1200 सिख सिपाही आए, उनमें से बहुत से वणजारे थे, जिनके परिवारों का बड़ा विस्तार हुआ। पर 90 प्रतिशत वणजारे गरीबी रेखा से नीचे ही हैं। इन्हें संभालने और गुरु घर से पक्के तौर पर जोड़कर रखने की बहुत आवश्यकता है।

नोट 1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।

2. गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरबाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।

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Foot Notes (as given)

  1. Roads & Communications in Mughal India, Abul Khair Muhemmod Farooque, Idarah-i-Adaleiyat-i-Delhi.
  2. Encyclopaedia of Sikhism (abridged), by Dr. Dharam Singh, 2013, page 704.
  3. Roads & Communications in Mughal India, Page 66.
  4. Ibid
  5. Ibid
  6. Imperial Gazetteer of India, 1908, Vol. 230, Page 221.
  7. Sri Guru Granth Sahib, Page 74.
  8. Makhan Shah, Sri Gurpratap Suraj Granth, Ras 11, Adhyai 3–17.
  9. Ibid
  10. Encyclopaedia of Sikhism (abridged), by S. Dr. Dharam Singh vide Lakhi Shah.
  11. Vanjare: Prof. Pyara Singh ‘PADAM’

-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’

 

 

 

 


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