ੴसतिगुर प्रसादि॥
चलते-चलते. . . .
(टीम खोज-विचार की पहेल)
लाहौर: इतिहास के झरोखों से. . . .
हमारे पंजाबी सभ्याचार में जीवन जीने वाले पुराने बुजुर्गों को बहुत याद आता है लाहौर सिंह! सचमुच पंजाबी सभ्याचार की राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक शक्ति के शिखर का केंद्र था शहर लाहौर! पंजाबी सभ्याचार के सुनहरी दौर का गवाह लाहौर! यह शहर दुनिया के किसी भी राज के लिए प्रेरणा स्त्रोत है। जहां ‘शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह’ के 40 वर्षों के शासनकाल में एक बार भी अकाल नहीं पड़ा। इस शासनकाल में कभी भी दंगा-फ़साद नहीं हुआ। किसी को भी मौत की सजा नहीं सुनाई गई। निश्चित ही ‘शेर-ए-पंजाब’ ने उस समय एक कुशल प्रशासक के रूप में पारस मणि से बिखरे हुए सिख इतिहास को एकत्रित उसे स्वर्णिम अक्षरों में शब्दांकित किया था। लाहौर जो दिल्ली और काबुल के तख़्तों के मध्य हिमालय पर्वत की भारतीय अडोल खड़ा रहा। वह लाहौर जिसने कभी झुकना या पीछे हटना कबूल नहीं किया। पंजाबी सभ्याचार में यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘जिस लाहौर नहीं तकिया, ओह जमिआ ही नहीं’ अर्थात जिसने लाहौर नहीं देखा वह इस धरती पर पैदा ही नहीं हुआ। इस दुनिया के और भी बड़े हिस्से में बड़े-बड़े शहर है जैसे न्यूयॉर्क, सिडनी, मेलबर्न, टोरंटो, मास्को, दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु इत्यादि परंतु किसी भी शहर के संबंध में ऐसी लोकोक्ति कहीं भी सुनी नहीं गई है। ‘श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी’ ने लाहौर शहर की स्तुति में फ़रमान किया है–
लाहौर सहरु अंम्रित सरु सिफती दा घरु।। (अंग क्रमांक 1412)
अर्थात ‘श्री गुरु अमरदास साहिब जी’ कथन करते है कि(श्री गुरु रामदास जी के आगमन पर) अब लाहौर शहर नामामृत का सरोवर तथा प्रभु-स्तुति का घर बन गया है।
जब सन 1947 ईस्वी. में देश का विभाजन हुआ जिसे हम आजादी कहते हैं, उस समय 10 लाख से ज्यादा लोग मज़हबी हिंसा में लाशों के ढेर में तब्दील हो गए थे। करोड़ों लोग उजड़ गए, घर-बार उखाड़ दिए गए। देखते ही देखते आंखों के सामने सभी कुछ पराया हो गया। मीठे पानी के कुएं खून से जहरीले हो गए। सदियों से दीवार से दीवार लगाकर बसे हुए पड़ोसी आंखें तरेर कर खून के प्यासे हो गए। अनगिनीत मां-बहनों के सामूहिक बलात्कार किए गए। जवान बेटियों को नग्न कर उनके जुलूस निकाले गए। सदियों से पाई-पाई जोड़ कर बनाई हुई जमीन-जायदादों के मालिकों को मुल्क के हुक्मरानों ने देखते ही देखते सब कुछ छोड़कर देश निकाला दे दिया। सत्ता के लालच में पंजाब उजड़ गया, लूटा-खसौटा गया। आंखों के सामने सब कुछ हो गया, जो बापू कहता था कि देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा, वह बापू घूम रहा था। पंजाब की लातों को दोनों हाथों से पकड़कर बेदर्दी से बीच में से चीर दिया गया। किसी भी हुक्मरान को न दया आई,न तरस आया। दोनों ही विभाजित देशों के हुक्मरानों की आंखों में बेबसी के, दर्द के आंसू नहीं छलके। सभी सत्ताधारी गांधी, नेहरू और पटेल के चेहरे पर रौनक थी परंतु हंसते-बसते पंजाब के चेहरे की रौनक क़लम की चंद लकीरों ने मातम में बदल दी थी। अफसोस. . . . हमारे पंजाबी सभ्याचार का लाहौर हमसे अलग कर दिया गया था। जो लाहौर हमारे दुख, सुख, गर्म, सर्द हवाओं और हमारे जन्म एवं मरने पर, हमारी खुशियों और हमारे एहसास-आहटों का प्रतीक था, उस लाहौर को हमारे पंजाबी सभ्याचार से अलग कर दिया गया था। हमारा लाहौर हमसे बेगाना हो गया। उस समय लाहौर दहाड़े मार-मार कर खूब रोया था। हुक्मरानों को बहुत निवेदन किए परंतु हुक्मरान उजड़े पंजाब को अनदेखा कर आजादी के जश्न में मस्त थे। अकेला लाहौर ही क्यों? हमारे पंजाबी सभ्याचार का ननकाना साहिब, हमारा हसन अब्दाल, हमारा पंजा साहिब, हमारी रावलपिंडी, हमारा झंग सियाल, हमारा लायलपुर, हमारा सियालकोट क्यों हमसे अलग कर दिए? क्यों केवल और केवल पंजाब एवं बंगाल का विभाजन आवश्यक था? सीमाएं तो गुजरात और राजस्थान की भी पाकिस्तान से जुड़ी हुई थी उन्हें क्यों नहीं विभाजित किया गया? या पंजाब और बंगाल के क्रांतिकारियों द्वारा देश की आजादी में सक्रिय भाग लेने के कारण इन दोनों राज्यों से बदला लेने के लिए इन राज्यों को क़लम की लकीर से चीर दिया गया। मेरी लेखनी को माफ करना. . . मैं इसे विभाजन नहीं, बीच में से चीरना ही लिखूंगा, क्या गुजरात और राजस्थान में हिंदू और मुसलमान दोनों कौम निवास नहीं करती थी? फिर विभाजन का सिद्धांत इन राज्यों पर क्यों लागू नहीं हुआ? विभाजन का यह सिद्धांत हमारे पंजाबी सभ्याचार के हिस्से में ही क्यों आया? बाबा नानक के अंतिम समय में खेती करने वाला स्थान करतारपुर हमारे देश की सीमा से केवल 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, कई वर्षों की मांग के पश्चात वर्तमान समय में इस स्थान के चंद घंटों के दर्शन के लिए, दुनिया भर की कागजी कार्यवाही कर प्रत्येक श्रद्धालु को 20 अमेरिकी डॉलर अदा कर, जाने का आदेश प्राप्त होता है। यह कैसी विडंबना है? या कैसी विवशता है? और तो और यदि आपके पास पासपोर्ट हो तो ही इस गुरुधाम के आप दर्शन कर सकते हैं और यह सभी असहनीय कष्ट इसलिये उठाने पड़ते हैं कि हमारे पंजाबी सभ्याचार के पास हमारा लाहौर नहीं रहा! हमारा तख़्त हमसे बेदर्दी से अलग कर दिया।
वर्तमान समय में भी पंजाबी सभ्याचार में जीने वाले हमारे लोग जो कठिनाइयों का सामना करते हैं उनका कोई ना कोई संबंध लाहौर से अवश्य होता है, फिर चाहे वह पंजाबी भाषा हो, चाहे संस्कृति हो या चाहे हमारी पहचान! पंजाबी सभ्याचार पर खानपान, राजनीति, धर्म, साहित्य, गीत-संगीत प्रत्येक क्षेत्र में लाहौरी सभ्यता का असर पड़ा है। लाहौर की टकसाली बोली जिसे पंजाबी बोली के नाम से संबोधित किया जाता है, भाषा ऐसी जैसे शक्कर के पतासे और मिश्री से भी मीठी! यह सभी हमारी विरासतों को इस विभाजन ने हमारे पंजाबी सभ्याचार से अलग कर दिया। यदि मनोवैज्ञानिक तौर से हम विश्लेषण करें तो विभाजन के पश्चात हमारे पंजाबी सभ्याचार के विचार वर्तमान समय में भी लाहौर शहर के संबंध में कोई बदले नहीं है। लाहौर के तख़्त के दम पर हमारे पंजाबी सभ्याचार दे काबुल और कंधार के तख़्तों को नेस्तनाबूद कर दिया था। दरियाए खेबर में वर्तमान समय में भी शूरवीर योद्धा सरदार हरि सिंह नलवा के घोड़ों के टापू की अनुगूंज गूंज रही है। यदि लाहौर शहर के इतिहास को समझना है तो हमें पिछले 500 वर्षों के इतिहास को अवलोकित करना होगा, गुरुओं के काल से लेकर बाबा बंदा सिंह बहादुर, सिख मिसलें, शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्णिम, गौरवशाली राज और इसके पश्चात सन 1947 ईस्वी तक भी हमारे पंजाबी सभ्याचार की आत्मीयता लाहौरी तहज़ीब से रही है। ‘श्री गुरु नानक देव जी’ के समय इस शहर में आक्रांता बाबर के द्वारा हमला कर शहर निवासियों का जीना दुर्भर कर उन्हें असहनिय कष्ट दिये था, पुरे शहर में आग लगा दी गई थी। उस समय के वर्तांत को गुरु साहिब जी ने गुरुवाणी में अंकित किया है–
लाहौर सहरु जहरु कहरु सवा पहरु|| (अंग क्रमांक 1412)
अर्थात लाहौर शहर में जुल्म का जहर फैला हुआ है, सवा पहर मासूम लोगों पर मौत का कहर मचा हुआ है। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की पांचवी ज्योत ‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ की शहादत, शहीदी गंज नाम से आज भी स्थित है, इसी स्थान पर गुरु के सिखों को दी गई असहनीय यातनाएं वर्तमान समय में भी ह्रदय को संवेदनशील कर रोमांचित कर देती हैं। माताओं के गले में बच्चों के टुकड़े-टुकड़े कर उनके हार डाले गए थे, रोज सवा मन का आटा पीसना और एक-एक रोटी खाकर भी उस अकाल पुरख वाहिगुरु का शुकराना अदा करना और गुरु के भाणे (रजा) में जीवन व्यतीत करती हुई हमारी माताएं! असहनीय कष्टों को झेलकर भी पुन: एक बार ‘गुरु पंथ खालसा’ के अनुयायियों ने अपनी अक्क्षुण शूरवीरता का परिचय देकर, सिख धर्म की परंपरा और उसके उत्कर्ष एवं पराकाष्ठा के निशान के परचम को लहरा कर, अपनी अद्वितीय सिख विरासत को विशेष आयाम इसी शहर में प्रदान किए थे। सिखों की इस कत्लगाह को हमने अपने बाहुबल से सिखों के शक्ति केंद्र में तब्दील कर दिया था। शहर लाहौर से हमारे पंजाबी सभ्याचार की प्रगाढ़ आत्मीयता कभी भी समाप्त नहीं हो सकती है, कभी भी लाहौर को भुलाया नहीं जा सकता है।
यदि हम वर्तमान समय में नई पीढ़ी की बात करें और कहे कि यह पीढ़ी निर्मोही हो गई हैं, यह अपने पंजाबी सभ्याचार को भूल गई, यह पीढ़ी हमारी विरासत को भूल गई है। ऐसा क्यों हुआ? इस अपसंस्कृति के जन्म लेने का क्या कारण है? यदि हम इसकी तह तक जाएं तो निश्चित ही हमारे पंजाबी सभ्याचार से लाहौर को अलग कर जो कशाघात किया गया उसी का ही यह नतीजा है। जब हमने अपनी राजनीतिक शक्ति और भाषा को ही खो दिया कारण हमारी लाहौरी तहज़ीब हमसे अलग कर दी गई। लाहौर ने वर्तमान समय में भी अपना सांस्कृतिक और सादा जीवन एवं श्रृंगार और शर्म नहीं छोड़ी है। लाहौर में वर्तमान समय में भी अपने हाथों से कीरत करना नहीं छोड़ा। लाहौर आज भी कामचोर और आवारा नहीं हुआ है। यह सभी तथ्य लाहौर के ऊंचे किरदार की निशानी है। अफसोस. . . . अच्छा भाई लाहौर सिंह हमेशा चढ़दी कला में रहना, सुखी बसना और रहती दुनिया तक तेरी शान ऐसी ही बनी रहें। सदा इसी तरह दुआ सलाम होती रहें।
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