राग मारू महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

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राग मारू महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥

मारू महला ९

हरि को नामु सदा सुखदाई ॥

जा कउ सिमरि अजामलु उधरिओ गनिका हू गति पाई ॥१॥ रहाउ ॥

पंचाली कउ राज सभा महि राम नाम सुधि आई ॥

ता को दूखु हरिओ करुणा मै अपनी पैज बढाई ॥१॥

जिह नर जसु किरपा निधि गाइओ ता कउ भइओ सहाई ॥

कहु नानक मै इही भरोसे गही आनि सरनाई ॥२॥१॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १००८)

भावार्थ-

हरि-नाम सदा (आत्मिक) सुख देने वाला है। जिस (नाम) का स्मरण कर (पापी) अजामिल का उद्धार हो गया और गणिका (वेश्या) ने भी सद्गति प्राप्त कर ली।१। रहाउ। (दुर्योधन की) राज्यसभा में द्रौपदी को राम-नाम का ध्यान आया। करुणामय (प्रभु ने) उस का दुःख दूर किया और अपनी मर्यादा को प्रतिष्ठित किया।१। जिस मनुष्य ने कृपा-निधान की गुणस्तुति की, उस को (प्रभु) सहायक हुआ। नानक का कथन है कि इस भरोसे पर मैंने (प्रभु की) शरण ग्रहण की है।२।१।

The Divine Name of Hari is forever the giver of inner peace; through its remembrance the sinner Ajamil was redeemed, and even the courtesan attained a noble state. In the royal court of Duryodhana, Draupadi remembered the Name of Ram, and the Compassionate Lord removed her suffering and upheld His own honor. Whoever praises the virtues of the Treasure of Mercy finds the Divine as their helper. Nanak declares that it is in this trust alone that I have sought refuge in the Divine.

मारू महला ९ ॥

अब मै कहा करउ री माई ॥

सगल जनमु बिखिअन सिउ खोइआ सिमरिओ नाहि कनाई ॥१॥ रहाउ ॥

काल फास जब गर महि मेली तिह सुधि सभ बिसराई ॥

राम नाम बिनु या संकट महि को अब होत सहाई ॥१॥

जो संपति अपनी करि मानी छिन महि भई पराई ॥

कहु नानक यह सोच रही मनि हरि जसु कबहू न गाई ॥२॥२॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १००८)

भावार्थ-

हे माता! अब मैं क्या करूं। सारा जन्म (मैंने) विषय-विकारों में लग कर खो दिया है, (परन्तु) प्रभु (के नाम) का स्मरण नहीं किया।१। रहाउ । जब काल/मृत्यु ने गले में फंदा डाला, (तब) उस ने (जीव की) होश गुम कर दी। राम नाम के बिना इस संकट में (भला) और कौन सहायक हो सकता है।१। मनुष्य जिस सम्पत्ति को अपना मान कर बैठा था, (वह) क्षण भर में पराई हो गई। नानक का कथन है कि मन में चिंता अथवा पश्चाताप होता है कि हरि-यश का कभी भी गायन नहीं किया।२।२।

O Mother, what should I do now, having wasted my entire life entangled in worldly passions and vices without remembering the Lord’s Name; when Death cast its noose around my neck, it stripped me of all awareness, and in such a crisis who else can be a helper without the Name of the Lord; the wealth that a human being considered his own became чуж in a single moment, and Nanak says that the mind is filled with anxiety and deep remorse for never having sung the praise of the Lord.

मारू महला ९॥

माई मै मन को मानु न तिआगिओ ॥

माइआ के मदि जनमु सिराइओ राम भजनि नही लागिओं ॥१॥ रहाउ ॥

जम को डंडु परिओ सिर ऊपरि तब सोवत तै जागिओ ॥

कहा होत अब कै पछुताए छूटत नाहिन भागिओ ॥१॥

इह चिंता उपजी घट महि जब गुर चरनन अनुरागिओ ॥

सुफलु जनमु नानक तब हुआ जउ प्रभ जस महि पागिओ ॥२॥३॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १००८)

भावार्थ-

हे माता! मैं ने अपने मन का अभिमान नहीं छोड़ा। मायावी नशे में (मैंने समस्त) जीवन व्यतीत कर दिया है, (परन्तु) राम-भजन में (बिल्कुल) लीन नहीं हुआ।१। रहाउ। (जब) यमराज का डंडा सिर पर पड़ा, तब (मायावी निद्रा में) सोया हुआ जागा। अब पश्चाताप करने से क्या होता है, भाग कर निकलने से भी छुटकारा नहीं हो सकता।१। जब मेरे हृदय में यह चिंता पैदा हुई, (तब) गुरु के चरणों से प्रेम पड़ गया। नानक (का कथन है कि मनुष्य) जन्म तब सफल हुआ है, जब प्रभु के यश में लीन हुआ है।२।३।

O Mother, I did not abandon the pride of my mind; intoxicated by illusion, I spent my entire life, yet I did not become absorbed in the remembrance of the Lord. (Pause) When the rod of Yama struck upon my head, I awoke from the sleep of illusion; now, of what use is repentance—there is no escape even by running away. When this anxiety arose within my heart, love for the Guru’s feet took hold, and Nanak says that human birth becomes truly fruitful only when one is absorbed in the praise of the Lord.

 

     


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