राग बिलावलु महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥
रागु बिलावलु महला ९
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥
अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥
गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥
नारद कहत सुनत धूअ बारिक भजन माहि लपटानी ॥१॥
अमर निरभे पढ़ पाइओ जगत जाहि हैरानी ॥
अचल नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानी ॥२॥१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८३०)
भावार्थ-
(हे भाई!) प्रभु के नाम को दुःख दूर करने वाला समझो। (यह बात) हृदय में जान लो कि जिस (के नाम के) स्मरण से अजामिल और गणिका (जैसे पापी) मुक्त हो गए। १ ।रहाउ। क्षण भर में (तेंदुए द्वारा ग्रस्त) हाथी का भय दूर हो गया, जब (उस ने) राम-नाम का उच्चारण किया। नारद का कहा हुआ (उपदेश) बालक ध्रुव सुन कर (राम-नाम के) भजन में लीन हो गया ।१। (उस ने) अचल, अमर और निर्भय पद प्राप्त कर लिया. (जिस से) संसार आश्चर्य चकित हो गया। नानक का कथन है कि हरि भक्तों का रक्षक है, तुम सदा उसे अपने निकट समझो।२।१।
O brother, understand the Divine Name as the remover of sorrow, and know this truth within your heart—that through remembrance of this Name, even sinners such as Ajamil and the courtesan were liberated. In a single moment, the fear of the elephant seized by the leopard was dispelled when he uttered the Name of Ram, and upon hearing Narad’s instruction, the child Dhruva became absorbed in devotion to the Divine Name. He attained an unshakable, immortal, and fearless state, leaving the world in wonder. Nanak declares that the Lord is the protector of His devotees; therefore, always consider Him to be close at hand.
बिलावलु महला ९ ॥
हरि के नाम बिना दुख पावै ॥
भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेटु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥
कहा भइओ तीरथ व्रत *कीए राम सरनि नही आवै ॥
जोग जग निहफल तिह मानउ जो प्रभ जसु बिसरावै ॥१॥
मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥
कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥२॥२॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८३०)
भावार्थ-
(जीव) प्रभु के नाम (का स्मरण किए) बिना दुःख पाता है। भक्ति ने बिना मनुष्य का संशय दूर नहीं होता। यह भेद गुरु बताता है।१। रहाउ। क्या होता है तीर्थ-स्नान करने अथवा व्रत रखने से, (यदि मनुष्य) राम की शरण में नहीं आता। उस के योग और यज्ञ (जैसे किए कर्म) व्यर्थ समझो, यदि (वह) प्रभु का यश विस्मृत कर देता है।१। (जो व्यक्ति) मान और मोह को त्याग कर प्रभु की गुणस्तुति करता है, नानक का कथन है कि इस ढंग (से की उपासना से) कोई ही व्यक्ति जीवन-मुक्त कहलाता है।२।२।
Without remembrance of the Divine Name, a being continues to suffer, and without devotion the doubts of the human mind are not dispelled—this truth is revealed by the Guru. What is gained by pilgrimages or fasting if one does not take refuge in the Divine? Consider yoga and sacrificial rites futile if a person forgets the praise of the Lord. Nanak declares that only the one who renounces pride and attachment and sings the Divine’s praises in this manner is truly liberated while still living.
बिलावलु महला ९ ॥
जा मै भजनु राम को नाही ॥
तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥
तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥
निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥१॥
जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥
तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥२॥
कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेटु बतावै ॥
कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥३॥३॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ८३०)
भावार्थ-
जिस (व्यक्ति के हृदय में) राम-भजन नहीं है, (तब मन में) यह समझ लो कि उस मनुष्य ने (अपना) जन्म व्यर्थ में गंवा दिया है।१। रहाउ। (जो व्यक्ति) तीर्थ-स्नान करता है (परन्तु यदि) उस का मन वश में नहीं है, (तो) तुम उस के धर्म-कर्म को निष्फल समझो। यह (बात) मैं उस को सच कह रहा हूं।१। जैसे पत्थर को जल में रखने से उस पर जल का प्रभाव नहीं पड़ता, वैसे ही तुम उस प्राणी को समझो जो भक्ति से वंचित है।२। कलियुग में मुक्ति नाम से ही प्राप्त होती है, गुरु ने यह भेद (की बात) बताई है। नानक का कथन है कि वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो प्रभु का गुणगान करता है।३।३।
If the devotion of the Divine is absent from a person’s heart, understand that such a human life has been wasted in vain. Even if one performs pilgrimages, if the mind is not brought under discipline, know that all religious actions are fruitless—this I state as the plain truth. Just as a stone placed in water remains unaffected by it, so too is a being devoid of devotion untouched by spiritual grace. In this age of Kali, liberation is attained through the Divine Name alone; the Guru has revealed this secret. Nanak declares that truly noble is the one who sings the praises of the Lord.