राग बसंत हिंडोल महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥
रागु बसंतु हिंडोल महला ९ ॥
साधो इहु तनु मिथिआ जानउ ॥
या भीतरि जो रामु बसतु है साचो ताहि पछानो ॥१॥ रहाउ ॥
इहु जगु है संपति सुपने की देखि कहा ऐड़ानो ॥
संगि तिहारे कछू न चाले ताहि कहा लपटानी ॥१॥
उसतति निंदा दीऊ परहरि हरि कीरति उरि आनी ॥
जन नानक सभ ही मै पूरन एक पुरख भगवानी ॥२॥१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ११८६)
भावार्थ-
हे साधु जनों! इस शरीर को झूठा/नश्वर समझो। इस में जो प्रभु बसता है, उस को सदा स्थायी समझो।१। रहाउ। (हे भाई!) यह जगत स्वप्न की सम्पत्ति के समान है। (इस को) देख कर क्यों अहंकारी हो रहे हो?। (अंततः) तुम्हारे साथ कुछ भी नहीं जाता, (फिर) उस से क्यों लिपटे हो ।१। स्तुति और निंदा दोनों को त्याग कर हरि-यश को हृदय में धारण करो। दास नानक (का कथन है कि) एक भगवान पुरुष ही सब में व्याप्त हो रहा है।२।१।
O holy people, consider this body to be false and perishable, and know the Lord who dwells within it to be eternal and everlasting. (Pause) This world is like wealth seen in a dream—why then do you become arrogant upon beholding it; in the end nothing accompanies you, so why remain attached to it? Abandon both praise and slander and enshrine the praise of the Lord within your heart; says servant Nanak, the One Supreme Being alone pervades all.