राग बिहागड़ा महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

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राग बिहागड़ा महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी

ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥

रागु बिहागड़ा महला ९ ॥

हरि की गति नहि कोऊ जानै ॥

जोगी जती तपी पचि हारे अरु बह लोग सिआने ॥१॥ रहाउ ॥

छिन महि राउ रंक कउ करई राउ रंक करि डारे ॥

रीते भरे भरे सखनावै यह ता को बिवहारे ॥१॥

अपनी माइआ आपि पसारी आपहि देखनहारा ॥

नाना रूप धरे बहु रंगी सभ ते रहे निआरा ॥२॥

अगनत अपारु अलख निरंजन जिह सभ जगु भरमाइओ ॥

सगल भरम तजि नानक प्राणी चरनि ताहि चित लाइओ ॥३॥१॥२॥

(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ५३७)

भावार्थ-

हरि की लीला को कोई भी जान नहीं सकता, (चाहे) योगी, यति, तपस्वी और अन्य बहुत से बुद्धिमान लोग (उस को जानने का प्रयास करते करते) दुःखी हो कर हार गए।१। रहाउ। (प्रभु) क्षण भर में निर्धन को राजा बना देता है और राजा को निर्धन बना देता है। खाली (बर्तनों) को भर देता है और भरे हुए (बर्तनों) को खाली कर देता है। यह उस का व्यवहार है।१। (उस प्रभु ने) अपनी माया स्वयं ही फैलाई हुई है और स्वयं ही उस को देखने वाला है। (वह) अनेक रूप-रंगों वाला कई प्रकार के रूप धारण करता है, (परन्तु) सब से निर्लिप्त रहता है।२। (वह) अगणित, अपार, अलक्ष्य (रूप वाला) है और माया के प्रभाव से रहित है, जिस माया ने समस्त जगत को भ्रम में डाला हुआ है। नानक (का कथन है कि) हे प्राणी! सब भ्रमों को छोड़ कर (हम ने) उस (प्रभु) के चरणों से चित्त लगाया है।३।१।२।

No one can fully comprehend the Divine play of the Lord; yogis, ascetics, renunciates, and many learned people have grown weary and defeated while attempting to understand it. In an instant, He turns the poor into kings and reduces kings to poverty; He fills the empty vessels and empties those that are full—such is His way. He Himself has spread His Maya and He Himself beholds it; assuming countless forms and colors, He remains unattached to all. He is innumerable, infinite, imperceptible, and untouched by the influence of Maya that has cast the entire world into delusion. Nanak declares, O being, having abandoned all illusions, we have fixed our consciousness at His feet.


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