राग जैतसरी महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
ੴ सतिगुरु प्रसादि ॥
जैतसरी महला ९
भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ॥
जो जो करम कीओ लालच लगि तिह तिह आपु बंधाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
समझ न परी बिखै रस रचिओ जसु हरि को बिसराइओ ॥
संगि सुआमी सो जानिओ नाहिन बनु खोजन कउ धाइओ ॥१॥
रतनु रामु घट ही के भीतरि ता को ‘गिआनु न पाइओ ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु बिरथा जनमु गवाइओ ॥२॥१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७०२)
भावार्थ-
भूला हुआ मन माया में फंसा हुआ है। इस ने लालच में पड़ कर जो जो कार्य किए हैं, उन से (अपने आप को) और बंधन में डाला है।१। रहाउ। इस को (वास्तविकता का) बोध नहीं हुआ और विषय-वासनाओं के रस में लीन रहा। (इस प्रकार) हरि-यश का विस्मृण कर दिया। (अपने) साथ विचरण करने वाले प्रभु को जाना ही नहीं; (प्रभु को) ढूंढने के लिए जंगलों में भागता रहा।१। राम (नाम रूप) रत्न मनुष्य के) हृदय/शरीर में ही है, उस का ज्ञान प्राप्त न कर सका। दास नानक (का कथन है कि) भगवान् के भजन के बिना, व्यर्थ में जन्म गंवा दिया।२।१।
The deluded mind remains entangled in Maya; driven by greed, whatever actions it has performed have only bound it more tightly in bondage. It failed to awaken to reality and stayed immersed in the pleasures of sense desires, thus forgetting the glory of the Divine. It did not recognize the Lord who walks alongside it at every moment and instead ran into forests searching for Him. The jewel of the Divine Name abides within the human heart and body, yet this understanding was not attained. Servant Nanak declares that without devotion to the Divine, this human birth has been wasted in vain.
जैतसरी महला ९ ॥
हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥
जम को त्रास भइओ उर अंतरि सरनि गही किरपा निधि तेरी ॥१॥ रहाउ ॥
महा पतित मुगध लोभी फुनि करत पाप अब हारा ॥
भै मरबे को बिसरत नाहिन तिह चिंता तनु जारा ॥१॥
कीए उपाव मुकति के कारनि दह दिसि कउ उठि धाइआ ॥
घट ही भीतरि बसै निरंजनु ता को मरमु न पाइआ ॥२॥
नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु तपु कउनु करमु अब कीजै ॥
नानक हारि परिओ सरनागति अझै दानु प्रभ दीजै ॥३॥२॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७०३)
भावार्थ-
हे हरि जी! मेरी प्रतिष्ठा को बचा लो। यम का डर (मेरे) हृदय में व्यापक हो रहा है, (उस से बचने के लिए) हे कृपा-निधान (प्रभु!) (मैं ने) तुम्हारी शरण ग्रहण की है। १ । रहाउ। (मैं) बड़ा पतित, मूर्ख और लोभी हूं। इस के अतिरिक्त, पाप करते करते अब हार गया हूं। मरने का भय (मेरे मन से) विस्मृत नहीं होता, उस की चिंता ने मेरे शरीर को जला रखा है।१। मुक्ति (की प्राप्ति) के लिए कई उपाए किए और दसों दिशाओं में भागता दौड़ता रहा। (परन्तु) प्रभु तो शरीर/हृदय में बसता है, उस का भेद नहीं पा सका।२। (मुझ में) न गुण हैं, न ही कुछ जप तप (किया है)। अब (मृत्यु से) बचने के लिए कौन सा उद्यम किया जाए। नानक (का कथन है कि) हे प्रभु! (मैं) हार कर (तुम्हारी) शरण में आ पड़ा हूं, (मुझे) अभय दान प्रदान करो।३।२।
O Lord Hari, preserve my honor; the fear of death spreads through my heart, and to be saved from it, O Treasure of Compassion, I have sought refuge in You. I am deeply fallen, foolish, and greedy, and after committing sins again and again, I am utterly exhausted; the fear of dying never leaves my mind, and its anxiety burns my entire being. I tried many means to attain liberation and ran in all ten directions, yet I failed to realize that the Divine abides within the body and the heart. I possess no virtues, nor have I practiced true meditation or austerity—what effort remains by which I might escape death? Nanak declares: O Lord, defeated and weary, I have come into Your refuge; grant me the gift of fearlessnes.
जैतसरी महला ९ ॥
मन रे साचा गहो बिचारा ॥
राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इहु संसारा ॥१॥ रहाउ ॥
जा कउ जोगी खोजत हारे पाइओ नाहि तिह पारा ॥
सो सुआमी तुम निकटि पछानो रूप रेख ते निआरा ॥१॥
पावन नाम जगत मै हरि को कबहू नाहि संभारा ॥
नानक सरनि परिओ जग बंदन राखहु बिरदु तुहारा ॥२॥३॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक ७०३)
भावार्थ-
हे मन ! (यह) सच्चा विचार ग्रहण कर लो। राम नाम के बिना समस्त संसार को झूठा समझो।१। रहाउ। जिस (प्रभु) को योगी खोजते खोजते हार गए, (परन्तु) उस का पार न पा सके, उस स्वामी को तुम समीप समझो, जो रूप-रेखा से विलग है।१। जगत में हरि का नाम पवित्र है, (उस को तुम ने) कभी स्मरण नहीं किया। हे संसार के वंदनीय (प्रभु!) नानक तुम्हारी शरण में पड़ा है, रक्षा करो, (क्योंकि यह तुम्हारा) विरद है। २।३।