राग जैजावंती महला ९ में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की वाणी
रागु जैजावंती महला ९ ॥
रामु सिमरि रामु सिमरि इहै तेरे काजि है ॥
माइआ को संगु तिआगु प्रभ जू की सरनि लागु ॥
जगत सुख मानु मिथिआ झूठी सभ साजु है ॥१॥ रहाउ ॥
सुपने जिउ धनु पछानु काहे परि करत मानु ॥
बारू की भीति जैसे बसुधा को राजु है ॥१॥
नानकु जनु कहतु बात बिनसि जैहै तेरो गातु ॥
छिनु छिनु करि गड़ओ कालु तैसे जातु आजु है ॥२॥१॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १३५२)
भावार्थ-
(हे जिज्ञासु! राम-नाम) का स्मरण करो, राम-नाम का स्मरण करो, यह तुम्हारा (करने योग्य) कर्म है। (तुम) माया के संग को त्याग दो, प्रभु की शरण में पड़ जाओ। जगत के सुखों को झूठा/नश्वर समझो। (सांसारिक) प्रपंच सब झूठा है। १। रहाउ। धन को स्वप्न के समान (अस्थायी) पहचानो, (फिर) किस पर अभिमान करते हो? रेत की दीवार के समान धरती के राज्य को समझो।१। दास नानक (यह) बात कहता है कि तुम्हारा शरीर भी नश्वर है। (जैसे) क्षण क्षण करके ‘कल’ बीत गया है, वैसे ‘आज’ गुज़र जाएगा। २।१।
O seeker, remember the Name of the Lord, remember the Name of the Lord—this alone is your true duty; renounce attachment to Maya and take refuge in the Lord, understanding the pleasures of the world to be false and perishable, for all worldly entanglements are unreal. (Pause) Recognize wealth to be like a dream and ask yourself, upon what do you take pride; consider earthly kingdoms to be like walls made of sand. Servant Nanak says this as well: your body too is perishable—just as “tomorrow” has passed moment by moment, so too will “today” pass away.
जैजावंती महला ९ ॥
रामु भजु रामु भजु जनमु सिरातु है ॥
कहउ कहा बार बार समझत नह किउ गवार ॥
बिनसत नह लगै बार ओरे सम गातु है ॥१॥ रहाउ ॥
सगल भरम डारि देहि गोबिंद को नाम लेहि ॥
अंति बार संगि तेरै इहै एकु जातु है ॥१॥
बिखिआ बिखु जिउ बिसारि प्रभ कौ जसु हीए धारि ॥
नानक जन कहि पुकारि अउसरु बिहातु है ॥२॥२॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १३५२)
भावार्थ-
(हे भाई!) प्रभु का स्मरण करो, प्रभु का स्मरण करो, तुम्हारा जन्म बीतता जा रहा है। (मैं मुझे) बार बार क्या कहूं? हे मूर्ख! तुम क्यों नहीं समझ रहे? (तुम्हारा) शरीर ओले के समान है, (इस को) नष्ट होने में देर नहीं लगती।१। रहाउ। (मन से) सब भ्रम निकाल वो, प्रभु का नाम जपो (क्योंकि) अंततः यही एक तुम्हारे साथ जाता है।१। माया को विष के समान भुला दो, परमात्मा के यश को हृदय में धारण कर लो। दास नानक पुकार कर कह रहा है कि (यह) अवसर हाथ से मत जाने दो।२।२।
O brother, remember the Lord, remember the Lord, for your life is passing away; how many times must I say this to myself—O foolish one, why do you not understand? Your body is like hail, it does not take long to be destroyed. (Pause) Remove all doubt from the mind and meditate on the Name of the Lord, for in the end this alone accompanies you. Forget Maya as you would poison and enshrine the praise of the Supreme Being within your heart; servant Nanak cries out, do not let this precious opportunity slip from your hands.
जैजावंती महला ९
रे मन कउन गति होइ है तेरी ॥
इह जग महि राम नामु सो तउ नही सुनिओ कानि ॥
बिखिअन सिउ अति लुभानि मति नाहिन फेरी ॥१॥ रहाउ ॥
मानस को जनमु लीनु सिमरनु नह निमख कीनु ॥
दारा सुख भइओ दीनु पगहु परी बेरी ॥१॥
नानक जन कहि पुकारि सुपनै जिउ जग पसारु ॥
सिमरत नह किउ मुरारि माइआ जा की चेरी ॥२॥३॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १३५२)
भावार्थ-
हे मन! तुम्हारी क्या दशा हो गई है? इस जगत में राम का नाम ही (सर्वश्रेष्ठ) है। वह तो (तुम ने) कानों से सुना नहीं। (तुम) विषयों में बहुत खचित हो रहे हो। (इन की ओर से तुम कभी) सुरति को मोडते नहीं।१। रहाउ। (तुम ने) मनुष्य का जन्म लिया है (परन्तु) निमिष भर भी स्मरण नहीं किया। (तुम) स्त्री के सुख के वश में हो गए हो, (अतः तुम्हारे) पैरों में बेड़ी पड़ गई है।१। दास नानक पुकार कर कह रहा है कि जगत का प्रसार स्वप्न के समान है। (तुम) प्रभु का स्मरण क्यों नहीं करते? जिस की माया सेविका है।२।३।
O mind, what condition have you fallen into; in this world the Name of the Lord alone is supreme, yet you have not listened to it with your ears, remaining deeply entangled in sensual pleasures and never turning your awareness away from them. (Pause) You have obtained human birth, yet you did not remember the Lord even for a moment; overpowered by the pleasure of lust, fetters have been fastened to your feet. Servant Nanak cries aloud that the expanse of the world is like a dream—why do you not remember the Lord, whose Maya itself serves Him?
जैजावंती महला ९ ॥
बीत जैहै बीत जैहै जनमु अकाजु रे ॥
निसि दिनु सुनि कै पुरान समझत नह रे अजान ॥
कालु तउ पहूचिओ आनि कहा जैहै भाजि रे ॥१॥ रहाउ ॥
असथिरु जो मानिओ देह सो तउ तेरउ होइ है खेह ॥
किउ न हरि को नाम लेहि मूरख निलाज रे ॥१॥
राम भगति हीए आनि छाडि दे तै मन को मानु ॥
नानक जन इह बखानि जग महि बिराजु रे ॥२॥४॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी, अंग क्रमांक १३५२)
हे (जिज्ञासु! स्मरण के बिना) व्यर्थ में (तुम्हारा) जन्म बीतता जा रहा है। रात दिन पुराणों (की कथा) सुन कर हे नासमझ ! (तुम) समझते नहीं हो कि काल तो (तुम्हारे सिर पर) आ पहुंचा है, दौड़ कर कहां जाओगे?।१। रहाउ। जिस देह को (तुम ने) स्थायी मान रखा है, वह तुम्हारी (देह) तो राख हो जाती है। हे निर्लज्ज! हे मूर्ख! (फिर तुम) हरि के नाम का स्मरण क्यों नहीं करते।१। (तुम) राम की भक्ति को हृदय में लाओ और मन का (झूठा) अभिमान त्याग दो। दास नानक यह बखान करता है कि जगत में (इस तरह) रहो (अर्थात् ऐसे ढंग से जीवन को व्यतीत करो) ।२।४।
O seeker, without remembrance your birth is passing away in vain; day and night, O ignorant one, you listen to the recitations of the Puranas, yet you do not understand that Death has already arrived over your head—where will you run to escape? (Pause) The body which you have taken to be permanent ultimately turns to ashes; O shameless one, O fool, why do you not remember the Name of the Lord? Bring devotion to the Lord into your heart and renounce the false pride of the mind; servant Nanak proclaims that this is the way one should live in the world.