रमईया सिख समाज: धर्म, श्रम, संघर्ष और परंपरा की अविच्छिन्न यात्रा
भारतीय सिख समाज की व्यापक और बहुआयामी संरचना में रमईया सिख समाज एक ऐसा विशिष्ट समुदाय है, जिसने भौगोलिक दूरी, सीमित आर्थिक संसाधनों, ऐतिहासिक उपेक्षा और संगठित संस्थागत सहयोग के अभाव के बावजूद श्री गुरु नानक देव साहिब जी द्वारा प्रतिपादित सिक्खी के मूल सिद्धांतों- समानता, श्रम, सेवा और सत्य को पीढ़ी-दर-पीढ़ी न केवल जीवित रखा अपितु उन्हें अपने सामाजिक और व्यावहारिक जीवन का आधार भी बनाया। यह समाज मुख्यतः उत्तर प्रदेश के ज़िला बिजनौर की चाँदपुर–धामपुर तहसीलों में फैले बाईस से पच्चीस गाँवों में आबाद है, जिनमें चाँदपुर, नूरपुर और हलदौर इसके प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। इन गाँवों में रमईया सिख समाज पूर्ण रूप से भारतवासी होते हुए भी सतगुरु श्री गुरु नानक देव साहिब जी को अपना आध्यात्मिक आदर्श मानकर सिक्खी की मर्यादा का पालन करता आ रहा है।
रमईया सिख समाज गुरु नानक पंथी परंपरा से संबंधित है। गुरु साहिबानों के प्रकाश पर्व, श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी का शहीदी दिवस तथा बैसाखी पर्व इस समाज द्वारा अत्यंत श्रद्धा, सम्मान और सामूहिक सहभागिता के साथ मनाए जाते हैं। विशेष रूप से श्री गुरु नानक देव साहिब जी का प्रकाश पर्व यहाँ लगभग सत्ताइस सिखों की संस्थाओं के द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित किया जाता है, जो समाज की धार्मिक चेतना, संगठनात्मक सामर्थ्य और सामूहिक एकता का सशक्त प्रमाण है। रमईया समाज का मुख्य केंद्र भी इसी क्षेत्र में स्थित है, जिसकी सेवा-संभाल और देखरेख समाज स्वयं करता आ रहा है।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी के चरण-कमलों से पवित्र गुरुद्वारा हलदौर साहिब (ज़िला बिजनौर) भी रमईया सिख समाज की ही सेवा-संभाल में है। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार श्री गुरु नानक देव साहिब जी अपनी प्रथम उदासी (धर्म-प्रचार यात्रा) के दौरान सन 1510–1511 ईस्वी के लगभग खंड प्रदेश के तत्कालीन छोटे राज्य हलधर, आज के हलदौर में पधारे थे। राजा कमल नैन के गाँव के बाहर स्थित बगीचे में गुरु साहिब के चरण-कमलों से पवित्र यह स्थान ही आगे चलकर गुरुद्वारा के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। अनुमान है कि इसी काल में इस क्षेत्र के लोगों ने गुरु साहिब से चरण-पाहुल प्राप्त कर नानक नाम-लेवा सिख, नानक पंथी तथा सहजधारी सिख के रूप में अपनी पहचान बनाई।
‘रमईया’ शब्द का अर्थ है; घूम-घूमकर व्यापार अथवा काम-काज करने वाला। यही शब्द इस समाज की ऐतिहासिक पहचान और जीवन-पद्धति का आधार बना। प्राचीन काल से ही यह समाज गतिशील व्यापार, वाणिज्य और हस्तकला से जुड़ा रहा है। आभूषण, रत्न, वस्त्र, औषधियाँ तथा अन्य लघु व्यापारिक वस्तुएँ इनके पारंपरिक व्यवसाय रहे हैं। आज भी यह प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित होता है कि जहाँ-जहाँ रमईया समाज निवास करता है, वहाँ उसके सदस्य घूम-फिरकर ही अपनी आजीविका अर्जित करते हैं, चाहे वे गुरु नानक पंथी हों या सहजधारी सिख। आर्थिक दृष्टि से यह समाज साधारण जीवन शैली अपनाता है, किंतु धार्मिक आचरण, सामाजिक मर्यादा और आत्मसम्मान के प्रति सदैव सजग रहता है।
श्री गुरु नानक देव साहिब जी का मिशन जाति-अभिमान और सामाजिक ऊँच-नीच के पूर्ण विरोध पर आधारित था। प्राचीन समाज में जहाँ जाति-अभिमानियों का वर्चस्व था और कमजोर वर्गों को दबाकर रखा जाता था, वहीं गुरु साहिब उन लोगों के साथ खड़े हुए जिन्हें समाज ने ‘नीच’ कहकर तिरस्कृत किया था। मलिक भागो के वैभवशाली व्यंजनों को अस्वीकार कर, मेहनतकश भाई लालो के घर की साधारण कोदरे की रोटी को आनंदपूर्वक स्वीकार करना इसी दृष्टिकोण का प्रतीक है। गुरु साहिब की यह वाणी रमईया समाज के धार्मिक और सामाजिक मानस में गहराई तक रची-बसी है—
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥
नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥
(अंग क्रमांक: 15)
ऐतिहासिक साक्ष्यों और समाज की सामूहिक स्मृति के आधार पर यह अनुमान प्रबल होता है कि रमईया सिख समाज लगभग पाँच सौ वर्षों से इस क्षेत्र में आबाद है। श्री गुरु नानक देव साहिब जी की दूसरी उदासी (दक्षिण भारत की धर्म-प्रचार यात्रा) के दौरान जिन-जिन क्षेत्रों में गुरु साहिब गए, वहाँ-वहाँ आज भी रमईया समाज की बस्तियाँ विद्यमान हैं। दिल्ली के नानक पियाऊ क्षेत्र में कभी रमईया बस्ती स्थित थी और उस क्षेत्र को ‘रमईया चौक’ के नाम से जाना जाता था। इसी प्रकार हैदराबाद (गोलकुंडा), पालमनूर (महबूबनगर), कर्नूल, अनंतपुर तथा कर्नाटक के बेल्लारी नगर में आज भी रमईया समाज निवास करता है और गुरुद्वारा साहिब स्थापित हैं। संगठित धर्म-प्रचार के अभाव में इन क्षेत्रों के रमईया लोग सहजधारी ही रह गए, किंतु नानक पंथी परंपरा से उनका संबंध कभी समाप्त नहीं हुआ।
बिजनौर क्षेत्र का रमईया सिख समाज इस दृष्टि से विशिष्ट है कि यहाँ सिक्खी की मर्यादाएँ अपेक्षाकृत अधिक संगठित रूप में जीवित रहीं। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी रमईया समाज को औपचारिक मान्यता प्रदान की। 23 अगस्त सन 1932 ई. को प्रकाशित एक पुस्तक में बिजनौर में आयोजित रमईया सिख समाज के विशाल सम्मेलन का उल्लेख मिलता है, जिसमें शिरोमणि कमेटी द्वारा प्रचारक भेजे गए तथा धर्म-प्रचार की हिंदी पुस्तिकाएँ वितरित की गईं। सन 1957 ईस्वी की डॉक्टर केलकर रिपोर्ट में भी रमईया समाज का उल्लेख मिलता है। इंदौर स्थित गुरुद्वारा इमली साहिब में उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाण भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि उदासियों के पश्चात उस गुरुद्वारे की सेवा-संभाल रमईया सिखों ने पूर्ण निष्ठा से की थी।
शैक्षिक दृष्टि से रमईया सिख समाज ने उल्लेखनीय प्रगति की है। खालसा इंटर कॉलेज, नूरपुर (बिजनौर) तथा श्री गुरु गोबिंद सिंह खालसा विद्यालय, खासपुरा (बिजनौर) से शिक्षा प्राप्त कर समाज के अनेक युवक-युवतियाँ एम.बी.बी.एस. डॉक्टर, अधिवक्ता, पुलिस निरीक्षक, प्राचार्य तथा अन्य उच्च पदों पर आसीन होकर देश की सेवा कर रहे हैं। विदेशों में बसे समाज के सदस्य भी विभिन्न सेवाओं में रहते हुए समाज और देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
इसके बावजूद यह एक पीड़ादायक यथार्थ है कि सिख पंथ की शीर्ष संस्थाओं, विशेषतः शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और सिख राजनीतिक नेतृत्व द्वारा रमईया सिख समाज की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। आज भी इस क्षेत्र में धार्मिक साहित्य, गुरुमुखी लिपि और संगठित शिक्षण की अत्यंत आवश्यकता है। सीमित साधनों में समाज द्वारा बच्चों को गुरुमुखी अक्षरों से परिचित कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, किंतु प्रशिक्षित गुरसिख शिक्षकों और स्थायी प्रचारकों के अभाव में यह कार्य अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पा रहा है।
रमईया एवं वणजारे सिख समाज की वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट संकेत देती है कि यदि संगठित सिख संस्थाएँ दीर्घकालिक योजना के अंतर्गत इस क्षेत्र को अपनाएँ, तो यहाँ सिक्खी की सुदृढ़ फसल उगाई जा सकती है। समाज की अपेक्षाएं न तो अतिरंजित हैं और न ही अनुचित अपितु समय और परिस्थितियों से उत्पन्न स्वाभाविक आवश्यकताएं हैं। आज भी श्री गुरु नानक देव साहिब जी के उपदेशों पर चलते हुए, सिक्खी की परंपरा को संजोते हुए, रमईया सिख समाज बिजनौर के इन गाँवों में निष्ठा और आत्मसम्मान के साथ जीवित है; यह स्वयं में सिख इतिहास की एक मौन, किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गाथा है।
आभार–
यह आलेख “रमईया सिख समाज : धर्म, श्रम, संघर्ष और परंपरा की अविच्छिन्न यात्रा” गुरमुखी साहित्य के दो समर्पित साधकों; सतनाम सिंह कोमल (ईमेल: [email protected]) तथा जतिंदरपाल सिंह (बिजनौर) की रचनाओं, चिंतन और दीर्घकालिक समाज-साधना से गहराई से प्रेरित होकर लिखा गया है।
सतनाम सिंह कोमल जी की साहित्यिक साधना, उनकी कविताएँ, ग़ज़लें, गीत और नज़्में, तथा धार्मिक और सामाजिक विषयों पर उनकी संवेदनशील दृष्टि ने इस विषय को वैचारिक गहराई और मानवीय स्पर्श प्रदान किया है। वहीं, जतिंदरपाल सिंह जी द्वारा रमईया सिख समाज को सिख मुख्यधारा से जोड़ने हेतु किए गए दशकों लंबे सतत प्रयास, उनके लेखन, वक्तव्यों और सामाजिक नेतृत्व ने इस आलेख को ऐतिहासिक दृष्टि और यथार्थ की ठोस भूमि प्रदान की है।
मैं इन दोनों विद्वान लेखकों के प्रति हृदय से कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनकी रचनात्मक ऊर्जा, प्रतिबद्धता और समाज–चिंतन ने मुझे इस उपेक्षित किंतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण विषय पर लेखन के लिए प्रेरित किया। उनका योगदान न केवल रमईया सिख समाज के इतिहास को संरक्षित करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी दिशा–निर्देशक सिद्ध होगा।
साथ ही आलेख में प्रस्तुत चित्र सरदार राजन सिंह जी मुंशी स्थायी पता: कबीर नगर नूरपुर जिला बिजनौर यू.पी. अस्थायी पता: सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल रोड, मालवीय गंज इटारसी म.प्र (ईमेल: [email protected]मो.8956071313 के सहयोग से प्राप्त किए गये है|
–सादर आभार सहित
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’