युग प्रवर्तक: श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी

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ੴ सतिगुर प्रसादि॥

प्रासंगिक—

युग प्रवर्तक: श्री गुरु गोविन्द सिंह साहिब जी के 358 वें प्रकाश पर्व पर विशेष—

(टीम खोज-विचार की पहल)

युग प्रवर्तक: श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी

 हक्  हक् अंदेश गुरु गोविंद सिंह, बादशाह दरवेश गुरु गोविंद सिंह

करुणा, कलम और कृपाण के धनी ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की दसवीं ज्योत, युगांत कारी, युग दृष्टा, भक्ति और शक्ति की मूर्ति, महान विचारक, दार्शनिक, महाबली योद्धा, ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ का प्रकाश (आविर्भाव) 22 दिसंबर सन् 1666 ईस्वी. को माता गुजरी जी की कोख से हुआ था, जब आप जी का प्रकाश हुआ तो उस समय में गुरु पिता ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ इस धरा का भार उतारने के लिए पूर्व की और यात्रा करते समय ढाका (बांग्लादेश) में थे।

एक युगांतकारी और युगदृष्टा गुरु का जीवन प्रकाश पुंज की भांति होता है, जिसके सद्कार्य, सुविचार और इंसानियत के लिये किये गये लोक-कल्याण के कार्य संपूर्ण विश्व को एक नई रोशनी देकर प्रकाशित करते हैं। आप जी ने अपने सत्कर्मों से वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भूतकाल से प्रेरित होकर, एक स्वर्णिम वैभवशाली भविष्य की कल्पना की थी और उस कल्पना को साकार करने हेतु अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। इस देश के गौरवशाली इतिहास में युगांतकारी दशम् गुरु पातशाह जी ने अपने समय की तत्कालीन विसंगतियों से ग्रस्त, धर्म और राष्ट्र की पीड़ा का अनुभव कर, भविष्य के स्वर्णिम काल के लिये न केवल धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए अपना सर्ववंश शहीद करवा कर, त्याग, संयम और समर्पण का एक नया इतिहास रचित किया अपितु अनीति, अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध कठोर संघर्ष और कर्म ज्ञान और भक्ति के प्रति समर्पण अर्थात् एक संत के रूप में समर्पण और एक सिपाही के रूप में कठिन संघर्ष कर वह “संत-सिपाही” कहलाये।

गुरु दशम् पिता ने अपने उद्देश्य “धर्म चलावन संत उबारन, दुष्ट सबन को मूल उपारन” को प्राप्त करने हेतु आप जी ने इंसानियत के प्रहरी के रूप में समाज के शताब्दियों से पीड़ित शोषित और उपेक्षित वर्ग की चिंता कर उनका सहारा बने। आप जी ने ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ की नींव रख सामाजिक समरसता की आधारशिला को रखा था। एक अनोखे महान साहित्यकार के रूप में भक्ति और शक्ति को समर्पित साहित्य का सृजन किया। जहां गुरु पातशाह जी साहस, स्वाभिमान एवं त्याग की मूर्ति थे, वहीं आप भी विनम्रता और सद्भावना की भी प्रतिमूर्ति थे। आप जी का जीवन जितना विविधता से भरा हुआ था वहीं आप जी का व्यक्तित्व इतना ही विशाल विराट और महान था। इन विशेषताओं के कारण ही आप जी युगांतकारी, युग दृष्टा के रूप में प्रतिष्ठित हुए। निश्चित ही आपका जीवन एक बिजली की चमक की तरह था, आसमान में चमकती बिजली की आयु भले ही लंबी नहीं होती परंतु जितनी भी होती है उसमें कणखर चमक और आवाज होती है, जो सभी का ध्यान आकर्षित करती है।

बचपन में आपका बाल सुलभ मन मित्रों के साथ अलग-अलग दल बनाकर युद्ध जैसे असामान्य खेलों में रमता था। आप जी हमेशा तीर-कमान और गुलेल से लक्ष्य संधान कर अपनी अलौकिक प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे। उस समय में पटना के राजा फतेह चंद और उनकी पत्नी संतान प्राप्ति की मनोकामना के साथ आप जी का ध्यान लगाते हैं तो एक दिन बाल गोविंद राय राज महल में जाकर रानी की गोद में बैठकर ममतामयी आवाज में कहते हैं, देख मां मैं आ गया! रानी का ममतत्व जाग जाता है, रानी तब अचंभित होती है जब बाल गोविंद राय उस समय महल में बने पूरी छोले और खीर की मांग करते हैं। वर्तमान समय में पटना साहिब जी में उस राज महल में गुरुद्वारा बाल लीला साहिब सुशोभित है और इस गुरुद्वारे में प्रतिदिन पूरी-छोले और खीर प्रसादी के रूप में वितरित की जाती है। उस समय में आप जी ने अपने स्वाभिमान का परिचय देते हुये नवाब की जाती हुई सवारी को सलाम करने से मना कर दिया था।

जब बाल गोविंद राय अपने पिता ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ की आज्ञा से श्री पटना साहिब जी से श्री आनंदपुर साहिब आये तो उनकी सुलभ बाल लीलाओं ने सभी आनंदपुर वासियों का दिल जीत लिया था। उस समय में माता गुजर कौर जी के मार्गदर्शन में आपको शस्त्र और शास्त्र की विधिवत शिक्षा प्रदान की गई थी। गुरुवाणी के ज्ञान के अतिरिक्त हिंदी, ब्रजभाषा, संस्कृत, अरबी और फारसी भाषाओं के ज्ञान की उत्तम समुचित व्यवस्था आप जी के लिए की गई थी साथ ही घुड़सवारी और युद्ध कला आदि का प्रशिक्षण भी आप जी को दिया गया था। कारण आप जी के दारोमदार और व्यक्तित्व से ही भविष्य की रणनीतियों का निर्धारण होना शेष था।

उस समय में बादशाह औरंगज़ेब की धार्मिक नीतियों ने देश में त्राहि-त्राहि मचा दी थी। हिंदू कश्मीरी ब्राह्मणों को चुन-चुन कर, इस्लाम धर्म में उनका धर्म परिवर्तित करवाया जा रहा था ऐसे कठिन समय में ब्राह्मणों का एक दल गुरु पातशाह जी की शरण में ‘श्री आनंदपुर साहिब जी’ में आया और उन्होंने अपनी पीड़ा गुरु पातशाह जी के समक्ष व्यक्त की, उनकी व्यथा और वेदना सुनकर गुरु पातशाह जी चिंतित मुद्रा में बोले के इस कठिन समय में किसी महान धर्मात्मा को अपनी शहादत देने की आवश्यकता है। पास ही विराजमान 9 वर्षीय गोविंद राय ने कहा कि पिता जी इस समय आप से बड़ा कौन धर्मात्मा महापुरुष है? ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहब जी’ ने उस समय इसे अकाल पुरख की आज्ञा मानकर कश्मीरी पंडितों से वचन किये की जाओं और कह दो औरंगज़ेब से कि यदि ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ इस्लाम स्वीकार कर लेंगे तो हम सभी भी धर्म परिवर्तित कर लेंगे, इस चुनौती की परिणीति उनकी शहादत में हुई और 11 नवंबर सन् 1675 ईस्वी. को दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु पातशाह जी ने अपने साथी भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी के साथ तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए महान शहादत अर्पित की थी।

ऐसे कठिन समय में 9 वर्ष की बाल अवस्था में ही बाल गोविंद राय को गुरु गद्दी पर सन् 1675 ईस्वी. में विराजमान कर दिया गया था। निश्चिती इस कठिन समय में आप जी को माता गुजरी जी का आशीर्वाद और मार्गदर्शन मिला था। माता जी ने एक आदर्श माता के साथ  साथ एक ज़िम्मेदार पिता का दायित्व भी बखूबी निभाया था। आप जी को ‘गुरु के महल’ के रूप में माता जीतो जी, माता सुंदरी जी और माता साहिब कौर जी का सानिध्य प्राप्त हुआ था। आप जी को 4 साहिबज़ादों, साहिबजादा अजीत सिंह जी, साहिबजादा जुझार सिंह जी, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह की प्राप्ति पुत्र रत्न के रूप में हुई थी। आप जी की रचित प्रमुख वाणियां जाप साहिब, त्वप्रसादि, सबद् हजारे, चौपाई साहिब, दशम् ग्रंथ और ज़फ़रनामा है।

गुरु पातशाह जी ने समाज में चेतना जागृत करने हेतु साहित्य की भूमिका पर विशेष बल दिया और विभिन्न प्रदेशों के कवियों, लेखकों को गुरु दरबार में आमंत्रित कर उन्हें रचनाओं को रचित करने हेतु प्रोत्साहित किया। उस समय में इन कवियों की वीर रस की रचनाओं ने समाज में नई ऊर्जा और अभूतपूर्व चेतना का निर्माण किया था। उस समय निर्मल पंथ की चढ़दी कला में आपका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। समय की हुकूमत से टकराने के लिए गुरु पातशाह जी ने उत्तम योद्धा और रणबांकुरे तैयार किये थे, केवल 42 वर्ष की छोटी आयु में आप जी ने 14 युद्ध लड़े थे पर सभी युद्धों पर निश्चय कर अपनी जीत करी थी। आप जी के पहले युद्ध पहाड़ी राजाओं से होते रहे तत्पश्चात पहाड़ी राजा और मुगल शासन की संयुक्त सेना का डटकर मुकाबला कर आप जी ने अपनी जीत को देश और धर्म की रक्षा के लिए हासिल किया था।

दशम पिता गुरु पातशाह जी ने 13 अप्रैल सन् 1699 ईस्वी. बैसाखी पर्व पर ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ की साजना मानवता के कल्याण एवं जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने के लिए की थी, आप जी ने देश के विभिन्न भागों से पधारे अपने 5 सिखों की परीक्षा लेकर उन्हें सर्वप्रथम खंड़े-बाटे की पाहुल अमृत छका कर, (अमृत पान की विधि) पंज प्यारे सजाये एवं गुरु पातशाह जी ने पांच ककार कंघा, केश, कड़ा, कृपाण और कच्छा को धारण करना अनिवार्य किया। साथ ही गुरु पातशाह जी ने आप स्वयं भी इन पांच प्यारों से अमृत पान कर, गुरु और चेला को एक कर, एक सामाजिक समरसता की आधारशिला को रखा था।

‘गुरु पंथ ख़ालसा’ की स्थापना (सन् 1699 ई.) के पश्चात गुरु पातशाह जी के समक्ष युद्ध की चुनौतियां लगातार दस्तक देती रही, ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ की ख़ालसा फ़ौज विजय पर विजय प्राप्त कर रही थी इससे औरंगज़ेब ने बौखलाकर, मुगल सैनिकों और 22 पहाड़ी राजाओं की सेना ने संयुक्त रूप से गुरु पातशाह जी पर एक साथ आक्रमण करने का निश्चय किया था।

गुरु पातशाह जी ने इन युद्धों में शत्रु सेना का डटकर मुकाबला किया था। जब समय ने करवट बदली तो एक कठिन समय में मजबूरन आनंदपुर साहिब का किला दिसंबर की पिछली रात को छोड़ना पड़ा था, सरसा नदी के किनारे पर शत्रुओं ने अपनी सौगंध और धर्म को त्याग कर पीछे से आक्रमण कर दिया था। अचानक हुये युद्ध में सैकड़ों जांबाज सिख सैनिक वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। कई सिख सैनिक सरसा नदी की बाढ़ में बह गए थे। गुरु पातशाह जी का बहुमूल्य सामान और महत्वपूर्ण साहित्य भी इस बाढ़ के प्रवाह में बह गया था। इस अफरातफरी में गुरु पातशाह जी का संपूर्ण परिवार उजड़ गया था। गुरु पातशाह जी अपने दो बड़े साहिबज़ादे, साहिबजादा अजीत सिंह और साहिबजादा जुझार सिंह एवं 5 प्यारे और 40 सिखों के साथ चमकौर की गढ़ी में पहुंचे थे और माता गुजरी जी अपने दोनों छोटे साहबजादे, साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह जी के साथ उनके रसोइये गंगाराम (गंगू) के साथ उसके गांव सेहड़ी पहुंच गए थे। माता साहिब कौर जी और माता सुंदरी जी गुरु पातशाह जी के विद्या दरबार के विद्वान भाई मनी सिंह जी के साथ हरिद्वार पहुंच गए थे। जिस स्थान पर गुरु परिवार बिछड़ा था वर्तमान समय में उस स्थान पर गुरुद्वारा “परिवार बिछौडा़ साहिब जी’ सुशोभित है।

चमकौर की गढ़ी में एक और दस लाख की विशाल सेना थी और दूसरी और मात्र 40 सैनिक! मुगलों ने तीन दिशाओं से आक्रमण किया। घनघोर युद्ध हुआ और गुरु पातशाह जी के निर्देश पर पांच-पांच ख़ालसा सैनिक ‘बोले सो निहालः सत श्री अकाल’ का जयघोष कर बारी-बारी से गढ़ी से बाहर आते रहे और यथासंभव अत्यंत वीरता का प्रदर्शन कर, शत्रु सेना का भारी नुकसान कर वीरगति को प्राप्त होते रहे। सिखों ने गुरु पातशाह जी से साहिबज़ादों के साथ रात के अंधेरे में गढ़ी से बाहर सुरक्षित निकल जाने का निवेदन किया, पर गुरु पातशाह जी ने कहा कि आप सभी मेरे पुत्र हैं! उन्होंने पहले 17 वर्ष के ज्येष्ठ साहिबज़ादे अजीत सिंह को युद्ध के लिए स्वयं तैयार किया और आशीर्वाद देकर पांच सिखों के साथ में भेजा। रणभूमि में बाबा अजीत सिंह अपने शौर्य और युद्ध कौशल का अद्भुत परिचय देते हुए ‘शहादत’ का जाम पिया। इसके पश्चात मात्र 13 वर्ष की किशोरावस्था के साहिबज़ादे जुझार सिंह ने अपने भाई की वीरता से उत्साहित होकर रणभूमि में जाने की आज्ञा मांगी और गुरु पिता का आशीर्वाद लेकर पांच सिखों के साथ साहिबजादा जुझार सिंह जी ने युद्ध भूमि में शत्रुओं का जमकर प्रतिकार कर शत्रु सेना के दांत खट्टे कर दिए। एक जुझारू योद्धा की तरह साहिबजादा जुझार सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए। (शहीदी: 23 दिसंबर सन् 1705 ईस्वी.) दोनों साहिबज़ादों की ‘शहादत’ पर गुरु पातशाह ना दुखी हुए और ना उदास! पंचम गुरु शहीदों के सरताज ‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ की रचित वाणी ‘तेरा कीआ मीठा लागै॥ हरि नामु पदारथु नानकु माँगै॥ का स्मरण कर उन्होंने अकाल पुरख का शुकराना किया और कहा, “दोनों साहिबज़ादे सिक्खी सिद्क में पूरे उतरे हैं और परीक्षा में पास हुए”। 

माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबज़ादों, साहिबजादा जोरावर सिंह (जन्म:28 नवंबर सन् 1696 ईस्वी. स्थान: श्री आनंदपुर साहिब जी) और साहिबजादा फतेह सिंह जी (जन्म:12 दिसंबर सन् 1698 ईस्वी. स्थान: श्री आनंदपुर साहिब जी) को जब गुरु घर का रसोइया गंगू उर्फ गंगाराम अपने घर लाया तो उनके ज़ेवरात, आभूषण, सोने की मोहरें इत्यादि क़ीमती समान देखकर और सरकारी इनाम के लालच में उसका ईमान डोल गया और उसने माता जी साहिबज़ादों को ग़िरफ्तार करवा दिया था। माता गुजरी जी ने रात भर साहिबज़ादों को धर्म और न्याय के लिये ‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ और ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के महान बलिदानों की साखियां सुनाई और उनका मनोबल बढ़ाया। साथ ही किसी भय या ‘लालच में आकर अपने धर्म से विचलित ना होने की सीख दी।

अगले दिन दोनों साहिबज़ादों को नवाब वजीर ख़ान की कचहरी में पेश किया गया। जब दीवान सुच्चा नंद ने साहिबज़ादों से नवाब साहब को झुक कर सलाम करने का कहा तो उनका उत्तर था, ‘हमारा शीश केवल अकाल पुरख के अलावा किसी के सामने नहीं झुक सकता! साम, दाम, दंड और भेद के उपायों द्वारा साहिबज़ादों को धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल करने के लिये उकसा कर, प्रयत्न किये गये और बड़े साहिबज़ादों एवं गुरु पातशाह की मृत्यु की ग़लत सूचना दी गई। सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम के प्रलोभन दिये गये। दीवान सुच्चा नंद ने नवाब को भड़काया साहिबज़ादों को बागी के बागी पुत्र कहा। उनके जीवन को मुगल सल्तनत के लिये भावी खतरा बताया और उन्हें सजा-ए-मौत देने का सुझाव दिया परंतु क़ाजी का सुझाव था कि इस्लाम में बच्चों को सजा की अनुमति नहीं हैं, तब नवाब वजीर ख़ान ने साहिबज़ादों को निर्णय लेने के लिये समय दिया। दो दिन तक पुनः भय और प्रलोभन द्वारा साहिबज़ादों के धर्म परिवर्तन का प्रयास किया गया, परंतु वे रंचमात्र भी भयभीत नहीं हुए थे कारण जगत् माता गुजरी जी ने आपको गुरुवाणी का निम्न फरमान अच्छी तरह से दृढ़ करवा दिया था, गुरु वाणी का फरमान है—

प्रभ किरपा ते प्राणी छुटै॥ 

जिसु प्रभु राखै तिसु नाही दूख॥

          (अंग क्रमांक 293)

अर्थात् प्रभु की कृपा से ही जीव की मुक्ति होती है। जिसकी प्रभु-परमेश्वर रक्षा करता है उसे कोई दुख नहीं लगता है।

अंततः क्रूर नवाब ने क़ाजी के सुझाव पर दोनों साहिबज़ादों को जीवित दीवार में चुनवा देने का अमानवीय एवं क्रूरतम आदेश दिया। इस सरहिंद की कचहरी में उस समय में मलेरकोटला के नवाब शेर मोहम्मद ख़ान भी उपस्थित थे और उन्होंने उस समय में वजीर ख़ान को ऐसी नीच हरकत करने के लिये बहुत लताड़ा था और इस सजा का डटकर विरोध किया था, जबकि नवाब के दोनों सगे भाई नाहर ख़ान और खीजर ख़ान चमकौर के युद्ध में सिखों के हाथों से मारे गये थे। नवाब शेर मोहम्मद ख़ान ने जो वचन सरहिंद की कचहरी में कहे थे, वह निम्नलिखित है—

वैर गुरु दे संग तुमारा, इन मासुमों ने किआ बिगाड़ा॥

शीरखोर मत बालक मारो, ना हक जुलम करो नबारो॥

वजीर ख़ान ने एक ना सुनी और दीवार में जीवित चुनते समय जहां उन्हें इस्लाम स्वीकार करवाने के प्रयास किए गए वहां दोनों साहिबज़ादे वाहिगुरु के नाम का जाप करते रहे। दीवार के कंधों तक आने पर दीवार गिर गई, तब तक दोनों साहिबज़ादे बेहोश हो चुके थे। बाद में कुरान के विरुद्ध वजीर ख़ान के आदेश पर जल्लाद साशल बेग व बाशल बेग द्वारा साहिबज़ादों के गले रेत दिए गये। (शहीदी: 26 दिसंबर सन् 1705 ईस्वी.) साहिबज़ादों की शहादत का दुःखद समाचर माता गुजरी जी के लिये ह्रदय विदारक सिद्ध हुआ और उन्होंने उस अकाल पुरख का ध्यान कर, अपने प्राण त्याग कर ब्रह्मलीन (अकाल चलाना) हो गई। (कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार मुगल सैनिकों ने माता गुजरी जी को ठंडे बुर्ज से धक्का देकर शहीद किया था)।

अमर शहादत के इस पवित्र स्थल पर सुशोभित है ‘गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब’ जी। जगत माता गुजरी जी और साहिबज़ादों के अंतिम संस्कार की घटना भी उल्लेखनीय है। गुरुदेव के एक श्रद्धालु दीवान टोडरमल को अंतिम संस्कार के लिये इस शर्त पर अनुमति दी गई कि वे आवश्यक ज़मीन के क्षेत्रफल के बराबर सोने की अशर्फियां खड़ी कर (बिछाकर नहीं उसका मूल्य चुकाएंगे। अंतिम संस्कार स्थल पर सुशोभित है, ‘गुरुद्वारा श्री जोती (ज्योति) सरूप (स्वरूप) साहिब।

चमकौर की गढ़ी से सफलतापूर्वक निकलकर गुरु पातशाह जी दिन-रात पैदल चलकर माछी वाडे़ के घने ग़िरफ्तारलों में पहुंच गये, अत्यंत कठिन परिस्थिति एवं दिसंबर की सर्द रातों में गुरु पातशाह ईंटों का तकिया बनाकर धरती पर सोने को विवश थे, इसी स्थान पर गुरु पातशाह जी के दो मुस्लिम श्रद्धालुओं ने आप जी को उच्च का पीर बनाकर लुधियाना के जट्टा पूरा में पहुंचा दिया था। इसी स्थान पर गुरु पातशाह जी को ज्ञात हुआ कि नवाब वजीर ख़ान के द्वारा छोटे साहिबज़ादों और माता गुजरी को शहीद करवा दिया गया है। उस समय में गुरु पातशाह जी ने वचन कर कहा कि मेरे साहिबज़ादे अमर हो गये और अब सरहिंद की ईंट से ईंट बज जाएगी। साथ ही गुरु पातशाह जी ने पास ही लगा पौधा ज़मीन से उखाड़ कर वचन किये कि अब मुगलों की जड़ें इस धरती पर से इसी तरह उखाड़ दी जाएगी।

इस घटना के पश्चात गुरु पातशाह जी के ख़ालसाओं ने खदिराणे की ढ़ाब पर लौट कर आए 40 मुक्तों से मिलकर आर-पार का युद्ध किया था। इस युद्ध में शत्रु सेना बहुत बुरी तरह से पराजित हुई थी, सिखों को अभूतपूर्व विजय प्राप्त हुई थी परंतु कई सैनिक और 40 मुक्तें भी वीरगति को प्राप्त हो गये थे। इन युद्धों में अद्भुत विजय प्राप्त कर गुरु पातशाह जी ने स्वयं एक महान सेनानायक की भूमिका को अदा किया था। इस स्थान पर गुरुद्वारा ‘श्री मुक्तसर साहिब जी’ सुशोभित है।

इन ऐतिहासिक परिपेक्ष्यों के दौरान गुरु पातशाह जी लगातार यात्राएं कर रहे थे, इन यात्राओं के द्वारा आप जी ‘धर्म चलावन: संत उबारन्’ के महा वाक्य के अनुसार अपने लक्ष्य की और निरंतर बढ़ रहे थे। इसके पश्चात लगातार यात्राएं कर आप जी ने साबों की तलवंडी (दमदमा साहिब जी) नामक स्थान पर पहुंच गये और इसी स्थान पर गुरु जी को शांति व स्थायित्व प्राप्त हुआ। इस स्थान पर, आप जी की वर्षों के पश्चात माता साहिब कौर जी और माता सुंदरी जी से मुलाकात हुई थी। इस स्थान से आप जी ने अपने धर्म प्रचार-प्रसार के कार्य को प्रारंभ किया एवं प्रचारकों को गुरुवाणी का विशेष प्रशिक्षण दिया था। इस स्थान (दीना-कंगड़ इलाके में भाई देसा सिंह जी की चौपाल) से आप जी ने औरंगज़ेब को अत्यंत कठोर भाषा में ज़फ़रनामा (विजय पत्र) फारसी भाषा में लिखा था। विद्वानों के द्वारा ऐसा माना जाता है कि ज़फ़रनामा फारसी भाषा की सर्वोत्तम रचना है। इस स्थान के महत्व को समझते हुए इस ‘साबों की तलवंडी’ को ‘गुरु की काशी’ कहकर भी संबोधित किया जाता है। इसी स्थान पर गुरु पातशाह जी ने ‘आदि ग्रंथ’ में ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ की वाणी को जोड़कर ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की संपूर्णता को संपन्न किया था। अपने जीवन के अत्यंत कठिन दिनों के पश्चात गुरु पातशाह जी इस स्थान पर दम लिया था इसलिए इस स्थान को ‘श्री दमदमा साहिब जी’ कहकर भी संबोधित किया गया है। वर्तमान समय में यह स्थान ‘श्री दमदमा साहिब जी’ सिख धर्म के महान तख़्त के रूप में सुशोभित है। आप जी के समकालीन शासक शहैनशाह औरंगज़ेब (सन् 1658 ईस्वी. से सन् 1707 ईस्वी, तक) एवं शहैनशाह बहादुर शाह जफर (सन् 1707 ईस्वी. से सन् 1708 ईस्वी, तक) थे।

ज़फ़रनामा (विजय पत्र) को पढ़कर औरंगज़ेब अत्यंत व्याकुल और व्यथित हो गया और उसे इतनी आत्मग्लानि हुई थी उसने अपना शरीर त्याग दिया था, औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात गुरु पातशाह जी अपनी दक्षिण की यात्रा करते हुए ‘अबचल नगर श्री हजूर साहिब नांदेड़’ (महाराष्ट्र) में पहुंच गए थे। इस नांदेड़ नामक स्थान से गुरु पातशाह जी ने अपने ख़ालसाई मिशन को पुनः प्रारंभ किया था। इस स्थान पर अधिक से अधिक संगत ने सिख धर्म को ग्रहण कर, अमृत पान कर ‘गुरु पंथ ख़ालसा’ में दीक्षित हो गये थे। इसी स्थान पर आप जी ने बैरागी माधव दास को सच का आईना दिखा कर ‘गुरु का बंदा’ बना लिया और इस बंदा सिंह बहादुर ने अमृत पान कर सिख धर्म को स्वीकार कर लिया था। गुरु पातशाह जी ने अपने इस वीर सेनानी को 5 तीर, एक शमशीर और 5 सिखोंं के साथ हुकुमनामा देकर, धर्म युद्ध के लिए पंजाब की और जाने की आज्ञा प्रदान की थी।

इधर वजीर ख़ान ने षड़यंत्र कर, गुरु पातशाह जी को शहीद करने के लिए गुल ख़ान और जमशेद ख़ान नामक पठानों को प्रलोभन देकर नांदेड़ भेजा था। दोनों ही पठान अत्यंत चतुराई से गुरु पातशाह जी के श्रद्धालु बन गए और एक दिन अचानक रहिरास साहिब जी के पाठ के पश्चात उन्होंने मिलकर गुरु पातशाह जी पर छुरे से, धोखे से वार कर दिया|  गुरु पातशाह जी ने अपनी कृपाण से दोनों को समाप्त कर दिया था अर्थात् उनका जीवन समाप्त कर दिया था। उस समय  गुरु पातशाह जी के पेट पर लगे गंभीर घाव को टांके लगाकर सिल दिया गया था परंतु कुछ दिनों के पश्चात कमान पर तीर चलाते हुए यह सिला हुआ घाव खुल गया एवं रक्त स्त्राव होने लगा था, तभी  गुरु पातशाह जी को पूर्वाभास हो चला था कि उनका अकाल पुरख से मिलने का समय निकट आ गया है।

7 अक्टूबर सन 1708 ईस्वी. गुरु पातशाह जी ने संगत को एकत्र कर देहधारी गुरु परंपरा की समाप्ति की घोषणा की एवं ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ को गुरु गद्दी पर विराजमान कर अपनी अंतिम फतेह “वाहिगुरु जी का ख़ालसा, वाहिगुरु जी की फतेह! का जयघोष कर ज्योति-ज्योत (अकाल चलाना) समा गये थे। वर्तमान समय में यह स्थान सिख धर्म के प्रसिद्ध तख़्त के रूप में ‘अबचल नगर’ गुरुद्वारा श्री सचखंड हजूर साहिब नांदेड़’ (महाराष्ट्र) सुशोभित है।

ऐसे महान युगांतकारी, युग दृष्टा, युग प्रवर्तक: ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ को सादर नमन!

नोट 1. ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है एवं लेखों में प्रकाशित चित्र काल्पनिक है।

2. गुरुवाणी का हिंदी अनुवाद गुरुवाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।

साभार— लेख में प्रकाशित गुरुवाणी के पद्यो की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज-विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।

✍️ डॉ॰ रणजीत सिंह अरोरा ‘अर्श’ पुणे।© (04/01/25).

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बाबा दीप सिंह जी के प्रकाश पर्व पर विशेष

KHOJ VICHAR CHANNLE


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