ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीर्घ लेख
चलते–चलते. . . .
(टीम खोज–विचार का उपक्रम)
भेषी (भेखी) सिक्ख, सिक्ख को न मारे तो कौम कभी न हारे (भाग-1)
(नोट— लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) में जो सिख किसान शहीद हुए, उन्हें समर्पित है यह लेख)।
(टीम खोज–विचार की पहेल)
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीर्घ लेख
चलते-चलते. . . .
(टीम खोज-विचार की पहेल)
भेषी (भेखी) सिक्ख, सिक्ख को न मारे तो कौम कभी न हारे (भाग-1)
वर्तमान समय में इस देश में आजादी के पश्चात सबसे बड़ा ‘किसानों का आंदोलन’ केन्द्र सरकार द्वारा पारित किये गये तीन काले कानूनों के विरोध में विगत एक वर्ष से ‘गुरु पंथ-खालसा’ के सेवादारों के सहयोग और समर्थन से पुरे हौंसले और हिम्मत के साथ चल रहा है, इस आंदोलन को पंजाब सरकार और सिखों की सिरमोर संस्था ‘शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी’ एवं सभी जत्थेबंदियों का पूर्ण सहयोग और समर्थन प्राप्त हुआ है, शायद यह आंदोलन बहुत पहले ही समाप्त हो जाना चाहिये था परंतु हमारी कौम के कुछ भेषी सिक्ख और गद्दारों ने गद्दारी कर, विवेक शुन्य होकर, वर्तमान सरकार को ‘अंधभक्तों’ के रुप में अपना पूर्ण समर्थन दिया है। यह वो लोग है जो ‘पद, प्रतिष्ठा, पैसों के लिये और नकारात्मक कार्यों को अंजाम देकर स्वयं की और आम लोगों का ध्यान आकर्षित करने हेतु अपना पूर्ण सहयोग-समर्थन एवं उल-जलूल दलींले देकर, सरकार का साथ देकर स्वयं की महानता को साबित करने का मूर्खतापूर्ण प्रयास कर रहे है। ऐसे लोगों के कारण ही सरकार और उनके नुमाइंदों के इतने हौंसले बड़ गये है कि देश के गृह राज्यमंत्री के बेटे ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर हमारे कई सिक्ख नौजवान किसानों को बर्बरता से अपनी थार गाड़ी से कुचल कर उन्हें शहीद कर दिया। शर्म से उस समय हमारी गर्दन झुक जाती है कि जब हमारे ही कुछ भेषी सिक्ख, गद्दारी कर ऐसे कातिलों के समर्थन में अपनी आवाज बुलंद करते है। ऐसे ‘पंथिक गद्दारों’ को सच्चाई का रास्ता दिखाकर उन्हें पुन: ‘गुरु पंथ-खालसा’ की मुख्य धारा से जोड़ने हेतु इस लेख को सृजितकर, रचित किया जा रहा है।
सिक्ख धर्म में राज और योग, मीरी और पीरी (भक्ति और शक्ति), धर्म और राजनिती को सामांतर रुप से रखकर जोडा़ गया है। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि धर्म और राजनिती अलग-अलग है। इसलिये धार्मीक व्यक्ति संसारिक कार्यों में भाग नही ले सकते है और संसारिक व्यक्ति धार्मीक कार्यों का नेतृत्व नही कर सकते है। यदि धर्म और राजनिती को विश्लेषित किया जाये तो धर्म केवल कुछ आदर्शवादी व्यक्तियों का समुदाय बन कर कमजोर और शक्तिहीन हो जाता है एवं राजनिती जुल्म, आतंक और जबरजस्ती के स्वरुप में परेशानी का रुप धारण कर लेती है। यह सच है कि धर्म के बिना नीति कुछ नहीं होती है और राजनीतिक ताकतों के बिना धर्म बेजान सा दिखने वाला उसुलों का समुदाय बनकर रह जाता है। जहां राजनीति होगी निश्चित ही वहां भेषी सिखों के रुप में गद्दार भी होंगे। इन गद्दारों का इतिहास ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ के समय से ही चला आ रहा है। इतिहास गवाह है कि दीवान जय राम जी (श्री गुरु नानक देव साहिब जी के जीजा जी) ने नवाब लोधी को सिफारिश कर ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की ‘मोदी खाने’ के मुख्य प्रबंधक के रूप में नियुक्ति करवायी थी। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ ने अपने कार्यकाल में ‘मोदी खाने’ का उत्तम प्रबंध किया था। ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ का प्रबंध अत्यंत उत्तम और कृतिशिल था। ‘मोदी खाने’ का सभी हिसाब-किताब, हिसाब रखने वाले मुनीम भवानी दास जी के पास लिखवा दिया जाता था। इस कार्यकाल में गुरु जी ने अपने संदेश “नाम जपो, कीरत करो, और वंड छकों” के सिद्धान्त को वास्तविकता के रुप में कर दिखाया था। उस समय गुरु जी नौकरी कर और ‘मोदी खाने’ के उत्तम प्रबंध के कारण थोड़े ही समय में ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की ख्याति पूरे इलाके में फैल गई थी और गुरु जी की जय-जयकार होने लगी थी। उस समय के भ्रष्ट अधिकारियों और मंत्रियों को यह सहन नहीं हो रहा था और इन सभी भ्रष्ट लोगों का नेतृत्व जादो राय नामक गद्दार कर रहा था। जादो राय ने गद्दारी कर नवाब लोधी को ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ कि सख्त शिकायत की और बताया कि ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ है और गुरु जी ने ‘मोदी खाने’ को लूट लिया है। इन झूठी शिकायतों के परिणाम स्वरुप ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ को 3 दिन तक नजरबंद करके रखा गया (उस स्थान पर वर्तमान समय में गुरुद्वारा कोठड़ी साहिब जी सुशोभित है) और 3 दिनों के लेखा-परीक्षण (ऑडिट) के पश्चात हिसाब में 321 “बहलौली दिनार” अधिक पाये गये। इस तरह से एक और बार भी गुरु जी के ऊपर झूठे इल्जाम लगाये और उस समय जब लेखा-परीक्षण किया तो 760 ‘बहलौली दिनार’ हिसाब में अधिक पाये गये थे।
‘श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी’ के बड़े भ्राता पृथ्वी चंद ने गद्दारी कर, समय की वर्तमान सरकार के साथ मिलकर गुरु पातशाहा जी के खिलाफ अनेक षड्यंत्र को अंजाम दिया था साथ ही पृथ्वी चंद ने गुरता गद्दी के लालच में 6वीं पातशाही ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ को षड्यंत्र के तहत मारने की कोशिश भी की थी।
इसी प्रकार 6वीं पातशाही ‘श्री गुरु हरगोविंद साहिब जी’ के समय में संगत के अनुरोध पर जब गुरु साहिब जी ने गद्दार चंदू की बेटी से परिणय बंधन (आनंद कारज) करने से मना कर दिया था तो इसी चंदू ने गद्दारी करते हुए जहांगीर के दरबार में गुरु पातशाह जी की झूठी चुगली खाई थी। इस झूठी चुगली के कारण ही गुरु पातशाहा जी को ‘तुज़के जहांगीरी’ के कानून ‘यासा-ए-सियासत’ अनुसार कठोर शिक्षा देकर तड़पा-तड़पा कर शहीद किया था।
यदि गुरुओं के इतिहास को अवलोकित करें तो 9वीं पातशाही ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ को 7वीं पातशाही ‘श्री गुरु हर राय साहिब जी’ के भ्राता रामराय जी के पुत्र धीरमल ने भी गद्दारी करते हुये, गुरु गद्दी के लालच में आकर ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ पर गोली चलवायी थी।
‘श्री गुरु गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ के साथ उनके रसोईया गंगू और करीबी सुच्चानंद ने गद्दारी करते हुये वजीर खान के पास चुगली कर माता गुजरी जी और छोटे साहिबजादों को गिरफ्तार करवाया था। इसी तरह से पहाड़ी राजाओं ने भी गाय की झूठी कसमों को खाकर गद्दारी करते हुए ‘श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी’ पर पिछे से हमला किया था।
शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह के खालसा राज को समाप्त करने में डोगरा सिख राम सिंह और धर्म सिंह जैसे गद्दारों ने अपना नाम इतिहास में अंकित किया था। ऐसे अनेक उदाहरण इस ‘गुरु पंथ-खालसा’ के इतिहास में उपलब्ध है। लिखने का तात्पर्य यह है कि इन गद्दारों की परंपरा ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ के समय से ही चली आ रही है। वर्तमान समय में जो भेषी सिक्ख ‘किसान आंदोलन’ के तहत केंद्र की सत्ताधारी सरकार की चाटुकारिता करते हुए ‘गुरु पंथ-खालसा’ से पैसे, प्रतिष्ठा और पद की लालसा में गद्दारी कर रहे हैं और विवेकहीन, विवेक शुन्य होकर, अपने आप को ‘अंध भक्त’ कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते हैं, ऐसे सभी ‘अंध भक्त’ भेषी सिक्खों का नाम इतिहास में उपरोक्त अधोरेखित गद्दारों की सूची में अंकित होगा। ऐसे ‘गुरु पंथ-खालसा’ के गद्दारों को ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की वाणी ने लाखों लानत दी हैं। ऐसे गद्दारों के संबंध में ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ की वाणी में क्या अंकित करती है? इसे समझने का प्रयास इस लेख के द्वारा किया जाएगा।
‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ की बाबर वाणी में जो लानत बाबर को दी थी उसे गुरवाणी में इस तरह अंकित किया गया है:-
खुरासान खसमाना कीआ हिंदुसतानु डराइआ॥
आपै दोसु न देई करता जमु करि मुगलु चड़ाइआ॥
एती मार पई करलाणे तैं की दरदु न आइआ॥
करता तूं सभना का सोई॥
जे सकता सकते कउ मारे ता मनि रोसु न होई॥
(अंग क्रमांक 360)
अर्थात् खुरासान नामक स्थान को फतेह कर, बाबर ने हिंदूस्तान पर बर्बरतापूर्वक आक्रमण कर हिंदुस्तान को डराया था। सृष्टि का निर्माता स्वंय पर इल्जाम न लेकर उसने मुगलों को मौत का फरिश्ता बना कर भेजा था। इतना जुल्म और मार पड़ी की आम लोगों में त्राहि-त्राहि मच गई। उस समय ‘श्री गुरु नानक देव साहिब जी’ ने लानत देकर बाबर से पूछा कि क्या तुम्हें इन आम लोगों पर क्रूरता से अत्याचार कर तरस नही आया? है मालक! तुम तो सभी के एक जैसे रक्षणहार हो, यदि एक ताकतवर दूसरे ताकतवर को मारे तो गुस्सा नही आता है परंतु यदि एक ताकतवर निर्बल पर जुल्म करे तो क्या? वर्तमान समय में ताकतवर लोग निर्दोषों को सरेआम गाडीयों से कुचलकर हत्या कर रहे है और गद्दार (भेषी सिक्ख) ‘गुरु पंथ-खालसा’ से गद्दारी कर, ऐसे जुल्मी शासकों की चाटुकारिता करते हुये नही थक रहें है।
(नोट:- इस लेख का भाग-2 शीघ्र ही प्रकाशित होगा। लेख के भाग-2 का प्रारंभ गुरुवाणी की वाणी–
कुता राज बहालिए फिरि चकी चटै॥. . . के महावाक्य के अनुसार होगा।
क्रमशः
नोट:-1. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पृष्ठों को गुरुमुखी में सम्मान पूर्वक अंग कहकर संबोधित किया जाता है।
२. गुरबाणी का हिंदी अनुवाद गुरबाणी सर्चर एप को मानक मानकर किया गया है।
साभार:- इस चलते-चलते लेखों की श्रृंखला के प्रेरणा स्त्रोत और आधार स्तंभ इतिहासकार सरदार भगवान सिंह जी खोजी है। लेख में प्रकाशित गुरवाणी की पंक्तियों की जानकारी और विश्लेषण सरदार गुरदयाल सिंह जी (खोज-विचार टीम के प्रमुख सेवादार) के द्वारा प्राप्त की गई है।
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