भूले-बिसरे सतनामी सिख: इतिहास की उपेक्षित धरोहर

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भूले-बिसरे नानक पंथी: उड़ीसा की धरती पर गुरु चरणों की स्मृति

(जय सतनाम)

सतनामियों का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली रहा है। सतनामी सदा से शांतिपूर्ण और सादे जीवन को प्राथमिकता देने वाले लोग रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि सतनामियों की एक पुरानी और गौरवशाली परंपरा रही है। सतनामी पंथ प्रारंभ से ही एक जातिहीन समाज का पक्षधर रहा है। इस समाज का मूल उद्देश्य मानवता का विकास करना था, जिसमें जाति-धर्म से ऊपर उठकर प्रत्येक मनुष्य को समान समझा जाता था। समाज को संगठित करने और संचालित करने के लिए उनका एक धर्मसूत्र था, जिसे “मानव धर्म सूत्र” कहा जाता था। बताया जाता है कि इनकी प्राचीन शाखा आज के हरियाणा के नारनौल अथवा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों, मेवात, कोटामा आदि से संबंधित रही है।

इसके अतिरिक्त कोटला और बाराबंकी को भी अन्य शाखाओं के रूप में बताया जाता है। वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ को भी इसी शाखा से जोड़ा जा रहा है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखने पर विस्तृत जानकारी तो उपलब्ध नहीं होती, परंतु सन 1672 ईस्वी के आसपास “सतनामी विद्रोह” के नाम से कुछ ऐतिहासिक तथ्य सामने आते हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ के सतनामी आंदोलन से जोड़ा जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार नारनौल पहले पंजाब प्रांत में स्थित था, जो अब हरियाणा राज्य में आता है। यह दिल्ली से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक जिला है, जहाँ रेलवे स्टेशन भी है।

यह ज्ञात होता है कि किसी समय सतनामी यहाँ बड़ी संख्या में निवास करते थे। शारीरिक रूप से सतनामी स्वस्थ, सुडौल और आकर्षक व्यक्तित्व के थे तथा उनका रंग गेहुँआ था। उनका खान-पान और रहन-सहन उच्च कोटि का है। यह पूर्णतः शुद्ध शाकाहारी है और किसी की अधीनता स्वीकार नहीं करते। यह मांस और शराब का सेवन नहीं करते थे। कोई भी नया कार्य आरंभ करने से पूर्व “सतनाम” का उच्चारण अवश्य करते थे। उनके अनुसार सतनाम सत्य और पवित्रता दोनों का प्रतीक है। यह अपने प्राणों की आहुति देकर भी सत्य की रक्षा करना अपना कर्तव्य मानते है। 

सतनामी विद्रोह

उस समय पंजाब का मुगल सूबेदार दारा शिकोह स्वयं सतनामियों के सादगीपूर्ण जीवन और उच्च नैतिक गुणों से अत्यंत प्रभावित था। दारा शिकोह मुगल बादशाह शाहजहाँ का बड़ा पुत्र था और अकबर की “सुलह-ए-कुल” नीति का समर्थक था। वह सतनामियों का बहुत सम्मान करता था और समय-समय पर उनसे परामर्श भी करता रहता था।

सन 1657 ई. में जब शाहजहाँ बीमार पड़ा, तब किसी ने यह अफ़वाह फैला दी कि बादशाह की मृत्यु हो गई है। इस बात को दारा शिकोह ने जानबूझकर छिपाए रखा ताकि उसे दिल्ली का सिंहासन सहजता से मिल सके। शाहजहाँ दारा को गद्दी पर बैठाना चाहता था, किंतु औरंगज़ेब ने शाहजहाँ को कैद कर लिया और अपने तीनों भाइयों की हत्या कर सन 1658 ई. में दिल्ली के सिंहासन पर बैठ गया। औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। सत्ता संभालते ही उसने स्वयं को “ग़ाज़ी” घोषित किया और संपूर्ण भारत को इस्लामी राज्य बनाने का संकल्प लिया। वह अकबर के ‘सुलह-ए-कुल’ सिद्धांत का घोर विरोधी था।

संत वीरभान ने सतनामियों से जज़िया कर वसूली का विरोध किया और इसे तत्काल समाप्त करने की माँग की। इससे क्रोधित होकर औरंगजेब ने उन्हें मृत्यु-दंड देने का आदेश दे दिया। संत वीरभान की फांसी की घोषणा से समस्त सतनामी समाज आक्रोशित हो उठा। विरोध स्वरूप जब औरंगजेब की शाही सवारी मथुरा में निकली, तब लगभग 2000 सतनामियों ने एकत्र होकर जज़िया कर हटाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया। किंतु जज़िया कर हटाने के स्थान पर औरंगजेब ने उन 2000 प्रदर्शनकारियों की हत्या करवा दी।

यहीं से सतनामी विद्रोह भड़क उठा। इस क्रूरता से आहत होकर सतनामियों ने चारों ओर विद्रोह प्रारंभ कर दिया और जज़िया कर न देने का संकल्प लिया। इसी दौरान कर वसूली को लेकर मुगल सैनिकों ने एक सतनामी की खुलेआम हत्या कर दी। इस घटना के बाद सतनामियों के भीतर मुगल शासन के प्रति तीव्र विद्रोह की भावना उत्पन्न हो गई और उन्होंने भी अनेक मुगल सैनिकों को मार गिराया। स्थानीय शासक सिकंदर ने क्रोधित होकर सतनामियों को जीवित या मृत पकड़ने का आदेश जारी कर दिया। इससे विद्रोह और अधिक उग्र हो गया। परिस्थितियाँ अत्यंत गंभीर हो गईं।

औरंगज़ेब के अनेक प्रयासों के बावजूद विद्रोह दबाया नहीं जा सका। सतनामी अपनी अद्वितीय शक्ति और असीम साहस के साथ मुगल सेनाओं का सामना करते रहे। अंततः औरंगज़ेब स्वयं दस हज़ार सशस्त्र सैनिकों की शाही सेना लेकर सतनामियों के दमन हेतु आया, किंतु सतनामी पीछे नहीं हटे। भयानक युद्ध हुआ। शाही सेनाओं में भगदड़ मच गई। अंततः औरंगजेब को युद्ध के स्थान पर सतनामियों के लिए भावनात्मक शांति की प्रार्थनाएँ और आयतें लिखवाकर झंडों पर टाँगनी पड़ीं। इसका सतनामियों पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा और तब कहीं जाकर विद्रोह शांत हुआ। इस संघर्ष में असंख्य सतनामी शहीद हो गए थे।

जो सतनामी जीवित बचे, उन्हें बाद में औरंगज़ेब द्वारा इस्लाम स्वीकार करने के लिए विवश किया गया। सतनामी मांस और शराब का सेवन नहीं करते थे, जबकि इस्लाम में पशु-वध और मांस-मदिरा का प्रयोग स्वीकार्य था। अतः अपने सतनाम पंथ की रक्षा के लिए विवश होकर वे नारनौल से दक्षिण की ओर मध्य भारत तथा छत्तीसगढ़ के जंगलों की ओर चले गए, जहाँ वे आज भी निवास कर रहे हैं।

भाई काहन सिंह जी नाभा के महान कोश के अनुसार सतनामी सिख ‘सतनाम’ के उपासक है और यह गुरु घासी दास जी द्वारा चलाया गया एक पंथ है। इस सतनामी पंथ के प्रवर्तक गुरु घासी दास का जन्म महानदी जोगनदी कछार वनांचल सोनाखान रियासत के ग्राम गिरौदपुरी में मंहगूदास एवं माता अमरौतीन के घर अगहन पूर्णिमा तद अनुसार 18 दिसंबर सन  1835 ई. में  गोसाई कुल में हुआ। उनके दादा मेदिनीराय जी गोसाई श्री संपन्न और प्रतिष्ठित वैद्य एवं पशु चिकित्सक थे, गुरु घासी दास जी को सतनाम और जीव दया का मंत्र अपने दादा मेदिनीराय जी गोसाई से विरासत में मिला था; उन्होंने अपने भाई करतार को अपना दूत बताते हुए यह उपदेश दिया कि पूजा, तीर्थ, जप-तप आदि के स्थान पर सतनाम का जाप ही सर्वोत्तम है। उनके पुत्र बालक दास ने भी पिता की भाँति सतनाम का प्रचार किया और उनके बहुत से शिष्य बने, जो सतनामी कहलाए। ब्रिटिश शासन ने गुरु बालक दास को सन् 1820 ई. में ‘राजा’ की मान्यता दी तथा उन्हें सोने की मूठ वाली तलवार भेंट की। ये आपस में मिलते समय ‘जय सतनाम’ कहते थे और इसी नाम की माला फेरते थे। इनका परम ग्रंथ ‘वाण नामक’ फर्रुखाबाद के सतनामियों के पास बताया जाता है। सतनामी लोग नशों से बहुत परहेज़ करते हैं।

सतनामी समाज बाबा गुरु घासीदास जी को अपना गुरु मानता है, जो साबित सूरत (पूर्ण स्वरूपधारी) थे। इनके प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं—

  1. पूजा-स्थल को गुरुद्वारा साहिब कहना।
  2. केवल सतनाम (परमात्मा) की उपासना करना।
  3. संपूर्ण मानवता की एक ही जाति है—“मानव जाति”।
  4. संपूर्ण मानवता का एक ही धर्म है—सतनाम पंथ।
  5. जीव-हत्या करना अपराध है, अतः हिंसा न करें।
  6. तंबाकू तथा अन्य नशों से दूर रहें।
  7. अंधविश्वास से दूर रहें।
  8. आपसी भाईचारे और मेल-मिलाप को बढ़ावा दें।
  9. हीन-भावना का त्याग करें।
  10. स्त्री और पुरुष समान हैं।
  11. मूर्ति-पूजा न करें।
  12. अपनी मेहनत की कमाई करें।

वर्तमान समय में सतनामी लोग छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में निवास करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर, झुग्गियों-झोंपड़ियों में रहते हैं। अधिकांश लोग जंगलों से लकड़ी काटकर अपना जीवन यापन करते हैं। इनमें से बहुत से सतनाम का जाप करते हैं। इनका अपना साहित्य लेखन सन 1907 ई. से मिलता है; इसके पूर्व इनका साहित्य मौखिक और वाचिक परंपरा अनुसार चला आ रहा है। यद्यपि इनमें से कई लोग पढ़े-लिखे भी है और बाबा घासी दास जी को अपना गुरु मानते हैं।

इस समाज के द्वारा बाबा घासी दास की कर्मस्थली भंडारपुरी रायपुर (छत्तीसगढ़) में भव्य मोती महल गुरुद्वारा सुशोभीत है और संत द्वारा का निर्माण कराया गया, जिससे सतनाम पंथ का संगठित प्रचार-प्रसार हो सके। महल के ठीक सामने “सूरज” और “चाँद” नाम से दो जैतखाम (विजय स्तंभ) स्थापित किए गए। इन जैतखामों पर धर्मध्वज ‘पालो’ चढ़ाया जाता था। सन् 1830 ई. में दशहरा के दूसरे दिन, विजया एकादशी पर “भंडार दशहरा” अथवा “गुरु दर्शन मेला” का शुभारंभ हुआ, जो आज भी परंपरा के रूप में चलता आ रहा है। इस अवसर पर गुरु परंपरा के प्रतिनिधि, गुरु घासीदास सेत सुमन घोड़े पर, राजा गुरु बालक दास, गुरु साहेब दास हाथी पर तथा गुरु आगर दास सांवले घोड़े पर सवार होकर शोभायात्रा निकालते थे। आसपास के अखाड़ा दलों की भागीदारी से यह आयोजन अत्यंत भव्य स्वरूप ग्रहण करता था।

मोती महल की स्थापत्य कला अद्वितीय थी। शिखर पर चार कंगूरों में तीन बंदरों और एक गरजते शेर की आकृतियाँ, सहस्त्र कमल पर स्वर्ण कलश, त्रिशरण के प्रतीक सात ज्योतिर्पुंज तथा लहराता धर्मध्वज; ये सभी प्रतीक सतनाम दर्शन की व्याख्या करते थे। यह भवन केवल स्थापत्य नहीं अपितु जीवंत आध्यात्मिक दृष्टांत था।

दुर्भाग्यवश, आकाशीय बिजली गिरने से यह ऐतिहासिक इमारत क्षतिग्रस्त हो गई। तत्पश्चात सुन्दरलाल पटवा सरकार के काल में इसे पुरातत्व विभाग के अधीन कर जीर्णोद्धार का निर्णय लिया गया। परंतु आगे चलकर नव-निर्माण की प्रक्रिया अधूरी रह गई। पुरानी संरचना को हटाकर तलघर बनाया गया, ऊपर एक मंज़िल लकड़ी के स्तंभों सहित निर्मित की गई, किंतु कार्य पूर्ण न हो सका। लगभग 35 वर्षों से यह निर्माण अधूरा और जीर्ण अवस्था में है। परिणामस्वरूप एक पूरी पीढ़ी उस मूल भव्य धरोहर के दर्शन से वंचित रह गई।

सबसे पीड़ादायक तथ्य यह है कि मूलतः स्थापित “सूरज-चाँद” नामक जोड़ा जैतखाम में आज केवल एक जैतखाम (सूरज नाम) विद्यमान है। दूसरे “चाँदनाम” जैतखाम का केवल खाली चबूतरा शेष है। प्रतिवर्ष दशहरा मेले में एक ही जैतखाम पर धर्मध्वज चढ़ाया जाता है, जबकि दूसरे के चबूतरे में ध्वज को अस्थायी रूप से स्थापित किया जाता है। यह स्थिति सतनाम समाज की आस्था के अनुरूप नहीं प्रतीत होती।

पुरातत्व विभाग द्वारा महल की बाह्य और आंतरिक संरचना की वीडियोग्राफी कराई गई थी, परंतु वर्तमान में उसका अभिलेख कहाँ सुरक्षित है, यह स्पष्ट नहीं है। यदि वे अभिलेख सुरक्षित और सार्वजनिक हों, तो मूल स्वरूप के पुनर्निर्माण में सहायक हो सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए “चाँदनाम” जैतखाम का पुनर्स्थापन किया जाए तथा अधूरे निर्माण कार्य को पूर्ण किया जाए। यह केवल स्थापत्य का प्रश्न नहीं, बल्कि लाखों अनुयायियों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा विषय है।

इस समाज की शोभायात्रा गुरु घासीदास जी के जन्मोत्सव एवं अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में बड़े शान से निकलती है, इन झांकियों में सप्त श्वेत ध्वज वाहकों के पीछे पंथी नृत्य व शस्त्र चलाते अखाड़े अपने करतब दिखाते है। इस समाज के इतिहासकारों का कहना है कि हमारे पूर्वज मुगलों के हमलों के समय पंजाब से उजड़कर यहाँ आ गए थे। उजड़ने के कारण निर्धन हो गए। यहाँ के ब्राह्मणों ने इन्हें ‘शूद्र’ कहकर तिरस्कार करना शुरू कर दिया। इनकी संख्या सन 1984 ई. में लगभग 56 लाख बताई जाती थी, जो आज करोड़ों में है।

ऐतिहासिक तथ्यों से स्पष्ट रूप से सामने आता है कि सतनामी सिख समाज का इतिहास वैचारिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और गौरवपूर्ण रहा है, किंतु वर्तमान समय में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर उनकी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। सरल जीवन-शैली और साधारण बाह्य स्वरूप के पीछे इस समाज में असाधारण बौद्धिक क्षमता, श्रमशीलता और आत्मिक चेतना निहित है। दुर्भाग्यवश, अशिक्षा, संसाधनों की कमी और संगठित मार्गदर्शन के अभाव में इनकी प्रतिभा समुचित दिशा नहीं पा सकी है।

यह एक स्थापित यथार्थ है कि सतनामी सिखों की नई पीढ़ी में नैसर्गिक समझ, तीव्र बुद्धि और सीखने की सहज क्षमता विद्यमान है, किंतु औपचारिक शिक्षा, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और समकालीन अवसरों के अभाव में वे अपने सामर्थ्य को पूर्ण रूप से विकसित नहीं कर पा रहे हैं। अतः सतनामी सिख बस्तियों में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक संस्थानों, तकनीकी एवं व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों तथा आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से जोड़ने वाले प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। यदि इस समाज की युवा पीढ़ी को सुनियोजित शिक्षा, तकनीकी कौशल और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़ने के अवसर प्रदान किए जाएँ, तो न केवल सतनामी सिख समाज का सर्वांगीण उत्थान संभव है अपितु यह समाज राष्ट्र और गुरु पंथ खालसा दोनों के लिए एक सशक्त, आत्मनिर्भर और प्रेरणादायी शक्ति के रूप में उभर सकता है।

आभार-

आदरणीय डॉ. अनिल भटपहरी जी के प्रति मैं अपनी हृदय पूर्ण कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। हिंदी एवं छत्तीसगढ़ी साहित्य के प्रतिष्ठित साहित्यकार, शोधकर्ता, संपादक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में आपका बहुआयामी योगदान अत्यंत प्रेरणास्पद है। साहित्य, शोध, संगीत और कला, इन सभी क्षेत्रों में आपकी सक्रिय उपस्थिति आपके व्यक्तित्व की संवेदनशीलता और व्यापक दृष्टि को दर्शाती है। ‘गुरु घासीदास और उनका सतनाम पंथ’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के माध्यम से आपने सतनाम पंथ की वैचारिक और ऐतिहासिक आधारभूमि को गंभीरता से प्रस्तुत किया है। मेरे आलेख “भूले-बिसरे सतनामी सिख: इतिहास की उपेक्षित धरोहर” में प्रकाशित चित्रों के संदर्भ में आपने जो विशेष सहयोग प्रदान किया, वह इस शोध कार्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। आपके मार्गदर्शन और सहयोग के बिना यह प्रस्तुति पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाती। आपकी विद्वत्ता, सरलता और समाज के प्रति प्रतिबद्धता निश्चय ही अनुकरणीय है। आपसे मो. क्रमांक 9617777514 पर संपर्क किया जा सकता है|

इसी क्रम में आदरणीय श्री जगदीश कुरे जी के प्रति भी मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। सतनामी सिख समाज के इतिहास, संघर्ष और सांस्कृतिक अस्मिता को उजागर करने हेतु आपका शोधपरक और जागरूकता से परिपूर्ण लेखन अत्यंत प्रेरणादायी है। आपने उपेक्षित अध्यायों को मुख्यधारा से जोड़ने का जो साहसिक प्रयास किया है, वही मेरे इस आलेख की प्रेरणा बना। समाजशास्त्र में आपकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और पत्रकारिता के क्षेत्र में आपकी सजग दृष्टि ने सतनामी समाज के यथार्थ को सशक्त स्वर प्रदान किया है। आप से ई-मेल [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है।

आप दोनों विद्वानों के लेखन और सहयोग से ही यह आलेख सार्थक रूप में प्रस्तुत हो सका है। आप दोनों के प्रति पुनः विनम्र नमन।

चित्र स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख से प्राप्त।

जय सतनाम।

सादर आभार सहित

-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’


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