भूले-बिसरे नानक पंथी: संख्या, संरचना और सामाजिक दायित्व

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भूले-बिसरे नानक पंथी: संख्या, संरचना और सामाजिक दायित्व

(संख्या से आगे- इतिहास, वास्तविकता और पंथिक दायित्व)

— डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’

“नानक नाम-लेवा” सिखों की संख्या को लेकर आज दो धारणाएँ अधिक सुनाई देती हैं—कहीं दो करोड़, तो कहीं बीस करोड़ या उससे भी अधिक। यह प्रश्न केवल आँकड़ों का नहीं है; यह इतिहास के सत्य, विरासत की निरंतरता, और हमारी पंथिक जिम्मेदारी का भी है। जब हम “सिख” की परिभाषा को केवल औपचारिक पहचान-पत्रों, जनगणना के खानों या बाह्य प्रतीकों तक सीमित कर देते हैं, तब करोड़ों ऐसे लोग; जो श्री गुरु नानक देव साहिब जी की वाणी, नाम और परंपरा से भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, अपने ही पंथ की मुख्यधारा से दूर धकेल दिए जाते हैं।

श्री गुरु नानक देव साहिब जी का विश्व-मानव संदेश और तीन करोड़ का संकेत

इतिहास बताता है कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने सिख सिद्धांत का संदेश घर-घर पहुँचाने के लिए लगभग 36,000 मील का पैदल भ्रमण कर मानवता को अकाल पुरुख से जोड़ा। इसी संदर्भ में यह कथन भी उद्धृत किया जाता है कि गुरु साहिब ने तीन करोड़ लोगों को अकाल पुरुष से जोड़ा; कहा जाता है कि इस तथ्य का उल्लेख मुस्लिमों के क़ादियानी मत के आचार्य मिर्ज़ा गुलाम अहमद कादियानी ने भी किया। अब प्रश्न उठता है- क्या सन 1469 से सन 2026 तक इन 557 वर्षों के बाद यह संख्या घटकर मात्र दो करोड़ रह गई होगी? ऐसा हरगिज़ नहीं हो सकता है।

यहाँ मूल बात यह है कि “नानक नाम-लेवा” का दायरा भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत व्यापक है और यह दायरा केवल पंजाब या बड़े नगरों तक सीमित नहीं रहा।

दस गुरुओं का 239 वर्षों का संघर्ष: सिक्खी की कीमत

श्री गुरु नानक देव साहिब जी से प्रारंभ होकर दसों गुरु-जामों में जो सिक्खी विकसित हुई, वह 239 वर्षों के सतत संघर्ष, तपस्या और शहादत की देन है; कारावास की काल-कोठरियाँ, तप्त तवियों पर दी गई यातनाएँ, दिल्ली के चाँदनी चौक में शीश अर्पण कर दी गई शहादत, और बड़े तथा छोटे साहिबजादों की कुर्बानियाँ; इन सबने सिक्खी के उस बाग़ को पुष्पित-पल्लवित किया जिसे आज हम गर्व से “गुरु पंथ खालसा” कहते हैं। सिख धर्म के प्रसार हेतु किसी भी प्रकार की कुर्बानी से संकोच नहीं किया गया। इसलिए आज हमारा दायित्व केवल इतिहास पढ़ना नहीं, इतिहास का ऋण चुकाना भी है।

“20 करोड़” की ओर संकेत: सिकलीगर-वनजारे और व्यापक सर्वेक्षण की अनुभूति

महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री गोपीनाथ मुंडे द्वारा अपने समय में भारत के प्रधानमंत्री को दिए गए एक विज्ञापन में पाँच करोड़ सिकलीगर और सात करोड़ वनजारे नानक-नाम लेवा होने का उल्लेख किया गया था। इन समूहों में से अनेक केशधारी, साबत-सूरत हैं, और सभी किसी न किसी रूप में श्री गुरु नानक देव साहिब जी की परंपरा से जुड़े हैं।

हमारी टीम खोज-विचार ने जब गाँवों, शहरों, कस्बों, जंगलों, नदी-नालों के किनारों तक घूम-फिरकर सिक्खी का प्रचार-प्रसार करते हुए सर्वेक्षण किया, तो प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि यह हमारे भाई किसी छोटी संख्या में नहीं अपितु करोड़ों की संख्या में फैले हुए हैं। इसलिए जो लोग सिखों की संख्या कम बताते हैं, वस्तुतः हम आज तक इस विशाल नानक-नाम लेवा समाज की वास्तविकता का पूर्ण आकलन नहीं कर रहे।

श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी, बाबा श्रीचंद जी और दूरस्थ समाजों का जुड़ाव

गुरु साहिबों के प्रचार-प्रसार के दौरान अनेक समाज गुरु-घर से जुड़े। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के असम प्रवास के समय भी असंख्य लोग गुरु-घर से जुड़े। इसी प्रकार बाबा श्रीचंद जी की उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, बंगाल और उड़ीसा की यात्राओं में भी अनेक समुदाय गुरु नानक के घर के श्रद्धालु बने। आज भारत के आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि कई राज्यों में ऐसे समुदाय हैं जिन्होंने श्री गुरु नानक देव साहिब जी की सिक्खी को किसी न किसी रूप में परंपरागत रूप से बचाकर रखा है।

उदासी परंपरा: प्रचार और निशान साहिब की परंपरा

श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के समय उदासी संत कृपाल दास जी ने भंगाणी के युद्ध में भाग लेकर हयात खाँ का वध किया, यह उदासी परंपरा की सक्रिय भूमिका का उदाहरण है। मुगल काल में उदासी संप्रदाय के संतों ने पंजाब और पंजाब से बाहर भारत के दूर-दराज क्षेत्रों में सिख धर्म का प्रचार किया। कई स्थानों पर गुरुद्वारों में निशान साहिब स्थापित करने की परंपरा का श्रेय भी परंपरागत रूप से उदासी संतों को ही दिया जाता है।

निर्मले संत: टीकाकारी, शब्दकोश-निर्माण और ऐतिहासिक सेवाएँ

निर्मले संतों ने गुरबाणी की टीकाकारी तथा शब्दकोश-निर्माण में विशेष योगदान दिया। उन्होंने देश-विदेश जाकर सिक्खी का प्रचार किया। परंपरा में यह भी उल्लेख मिलता है कि महारानी जिंदां को नेपाल तक पहुँचाने में निर्मले संतों की भूमिका रही, साथ ही देश की आजादी के आंदोलन में भी निर्मले संतों की भूमिका उल्लेखनीय है। इस समूचे परिदृश्य से यह स्पष्ट है कि नानक-नाम लेवा समाज का विस्तार केवल एक दिशा में नहीं, अपितु अनेक परंपरागत धाराओं के माध्यम से हुआ।

सिंधी नानक पंथी सिख: श्रद्धा, सेवा और विशेष संदर्भ

सिंध प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) से जुड़े सिख “सिंधी सिख” कहलाते हैं। नानक पंथी सिंधी सिखों में बहुसंख्यक हिंदू भी हैं, किंतु उनकी श्री गुरु नानक देव साहिब जी के प्रति श्रद्धा अत्यंत गहरी है। पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में बचे हुए अनेक गुरुद्वारों की सेवा-संभाल सिंधी नानक पंथियों द्वारा की जाती है।

सिंधी सिखों में भाई शाम सिंह कभी दरबार साहिब अमृतसर के हजूरी रागी भी रहे। उन्होंने सिंध यात्राओं में अमृत प्रचार आरंभ किया। दादा चेलाराम जी का परिवार, भाई चतर सिंह, भाई चमनजीत सिंह जी लाल, संत गुरप्रीत सिंह जी (रिंकू वीर जी) तथा अन्य सिंधी महापुरुष सिख धर्म का प्रचार कर रहे हैं। मुंबई के उल्हासनगर में सिंधी नानक पंथियों की बड़ी संख्या है, जो श्री गुरु नानक देव साहिब जी के गुरु पर्व पर धूमधाम से नगर कीर्तन निकालते हैं।

यह भी सत्य है कि आर्थिक दृष्टि से उदासी, निर्मले और अनेक सिंधी नानक पंथी अपेक्षाकृत संपन्न हैं; किंतु सिकलीगर, वनजारे और सतनामी जैसे समुदाय कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारणों से आर्थिक रूप से पिछड़ गए हैं और आज भी अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहें हैं।

नागपुर: सिकलीगर सिखों की सेवा का प्रमुख केंद्र

नागपुर तथा उसके आसपास सिकलीगर और वनजारे बड़ी संख्या में रहते हैं। पिछली कई दशकों से अनेक सिख व्यक्तित्वों और जत्थेबंदियों द्वारा नागपुर एवं आसपास के क्षेत्रों में इन परिवारों की सेवा-संभाल का कार्य प्रारंभ किया गया। लगभग सन 1970 ई. के आसपास, जब सिख जगत को सिकलीगरों की वास्तविक स्थिति के बारे में न तो पर्याप्त जानकारी थी, न चिंता, तब नागपुर और मुंबई के कुछ समाजसेवियों ने मिलकर इस केंद्रीय नगर में उनकी सेवा का बीड़ा उठाया। आज भी अनेक संस्थाएँ गंभीरता और सुव्यवस्थित ढंग से कार्य कर, इन समाजों में सिक्खी का प्रचार-प्रसार कर रही हैं।

मूल समस्या: दूरियाँ, गुरुद्वारों का अभाव और उपेक्षा की त्रासदी

आज अनेक दूरस्थ क्षेत्रों में स्थिति यह है कि 50-50 किलोमीटर की दूरी तक भी गुरुद्वारा उपलब्ध नहीं। परिणामस्वरूप कुछ स्थानों पर लोग गुटका साहिब के चारों ओर फेरे लेकर आनंद-कारज (परिणय बंधन) करने को विवश हैं। यह विवशता किसी समुदाय की कमी नहीं, अपितु हमारी सामूहिक व्यवस्था की कमी का संकेत है।

यह नानक नाम-लेवा हमसे बहुत कुछ नहीं माँगते; वह केवल प्रेम, सम्मान, संपर्क और मार्गदर्शन चाहते हैं। यदि अब भी उनकी सुध न ली गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ और इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगी।

आवश्यक कदम: जो करना ही होगा

अब समय है कि हम केवल भावुक अपील न करें, अपितु योजनाबद्ध ढंग से काम करें। इसलिए निम्न कार्यों की तत्काल आवश्यकता है—

  1. जात-पात का परित्याग करके इन उपेक्षित, भूले-बिसरे नानक नाम-लेवों को अपना भाई मानकर प्रेम दिया जाए, इन्हें सिक्खी की मुख्य धारा से जोड़ा जाए।
  2. हर सिख स्वयं को प्रचारक माने और बारी-बारी से इन दूरस्थ समुदायों तक जाकर सिक्खी का संदेश पहुँचा कर आत्मीय संबंध स्थापित करें।
  3. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र जैसे वनों/दूरस्थ बस्तियों वाले क्षेत्रों में सिक्खी को समर्पित प्रचारक भेजे जाएँ; संबंधित राज्य गुरुद्वारा कमेटियाँ इसमें विशेष सहायक बन सकती हैं।
  4. इन समुदायों को पंजाब और दिल्ली के ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन कराए जाएँ, ताकि उनका आत्मिक-संबंध मजबूत हो और वह मुख्यधारा से आत्मीयता अनुभव करें।
  5. संपन्न दानवीर सिखों के जत्थे उन पिछड़े क्षेत्रों की यात्रा करें, ताकि वह मौके पर ही जीवन-स्तर सुधार के कार्यक्रम, संसाधन और ढाँचा तैयार कर सकें।
  6. श्री गुरु नानक देव साहिब जी का प्रकाश पर्व तथा अन्य गुरु पर्व इन क्षेत्रों में भी बड़े स्तर पर मनाए जाएँ; स्थानीय प्रमुख नानक-नाम लेवाओं को सम्मानित कर उनकी हौसला-अफज़ाई की जाए।

विशेष फंड: बिना संसाधन सेवा नहीं, और बिना संयम संसाधन नहीं

  1. इन पिछड़े, निमाणे और निताणे सिखों की खुशहाली हेतु विशेष कोष (Special Fund) बनाया जाए—
    (क) हर गुरुद्वारा कमेटी अपने बजट से इसका एक हिस्सा दे।
    (ख) हर सिख अपनी किरत-कमाई से यथाशक्ति योगदान दे।
    (ग) यह भी स्पष्ट समझना होगा कि अनावश्यक खर्च, जैसे दिखावटी रस्मों पर, अत्यधिक सजावट, विलासिता, महंगे शौक, गैर-जरूरी आडंबर की अपेक्षा यह धन पिछड़े नानक-नाम लेवाओं की सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए।
    (घ) बड़े संस्थागत खर्च—जैसे गुरुपर्वों पर अत्यधिक आतिशबाजी, अत्यधिक सजावट, गुरुद्वारों पर सोना लगाना इत्यादि, इनसे अधिक जरूरी काम यह है कि अपने बिछड़े भाई हमारे साथ जुड़ें और सम्मान से जी सकें।

रोजगार और आत्मनिर्भरता: “दया” नहीं, “व्यवस्था” चाहिए

  1. सिकलीगर सिख योग्यता की दृष्टि से कारीगर हैं; उनके लिए सहायक धंधे/वर्कशॉप/यूनिटें खोली जाएँ।
  2. वणजारे और सतनामी समुदायों के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार की व्यवस्था हो; जैसे पशुपालन, कुटीर उद्योग, हस्तकला, मरम्मत-कौशल, और अन्य श्रम-आधारित प्रशिक्षण।
  3. व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र (कौशल विकास कार्यशालाएँ) खोली जाएँ, जहाँ विभिन्न व्यवसायों की व्यवस्थित शिक्षा दी जाए।
  4. शिक्षा हेतु विद्यालय/कॉलेज, स्वास्थ्य हेतु डिस्पेंसरी/मेडिकल सहायता, तथा जीवन की मूलभूत जरूरतों; घर, पानी, स्वच्छता की योजना बने।
  5. इन समाजों के बच्चे-बच्चों के आनंद कारज और उनकी शिक्षा के लिए विशेष प्रबंध किए जाए।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप: नियम, श्रद्धा और व्यावहारिक समाधान

यह भी एक संवेदनशील विषय है कि भले ही अनेक सिंधी नानक पंथी अभी केशधारी न हों, पर उनकी गुरवाणी के प्रति श्रद्धा और सम्मान अथाह है। कुछ समय पहले श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप की प्राप्ति को लेकर कड़े नियम बने, जिनके कारण कुछ नानक पंथियों को अपने घरों/स्थानों के लिए स्वरूप प्राप्त करने में कठिनाई आती है। इस विषय पर सहानुभूति और विवेक से पुनर्विचार होना चाहिए, ताकि मर्यादा भी बनी रहे और श्रद्धालु भी वंचित न रहें।

समापन: संख्या की बहस नहीं, पंथ की परीक्षा

अंततः प्रश्न यह नहीं कि नानक नाम-लेवा दो करोड़ हैं या बीस करोड़ से भी अधिक; वास्तविक प्रश्न यह है कि हम उन्हें अपना मानते हैं या नहीं? क्या हम उनके लिए केवल भाषण करेंगे या व्यवस्था भी बनाएँगे?

आइए, ऊँच-नीच, जात-पात, ईर्ष्या-द्वेष, अहंकार और लालसा छोड़कर इन उपेक्षित, भूले-बिसरे, किंतु अमूल्य नानक पंथी हीरों के निकट जाएँ। उन्हें प्रेम और सम्मान देकर साथ जोड़ें; यही श्री गुरु नानक देव साहिब जी की प्रसन्नता का मार्ग है, यही पंथ की एकता और व्यापकता की सच्ची कसौटी है।

अब भी समय है- जागने का, जोड़ने का और बिछड़ों को गले लगाने का।

 

 

 


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