भूले-बिसरे नानक पंथी: उड़ीसा की धरती पर गुरु चरणों की स्मृति

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भूले-बिसरे नानक पंथी: उड़ीसा की धरती पर गुरु चरणों की स्मृति

उड़ीसा की पावन धरती से कुछ समय पूर्व सिख जगत के लिए एक अत्यंत पीड़ादायक समाचार प्राप्त हुआ कि ऐतिहासिक जगन्नाथ पुरी मंदिर के समक्ष स्थित ‘मंगू मठ’ जो श्री गुरु नानक देव साहिब जी की पुरी उदासी से संबंधित माना जाता रहा है, को राज्य प्रशासन द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। यह घटना केवल एक भवन के टूटने की नहीं थी अपितु उस ऐतिहासिक स्मृति के आहत होने की थी, जो सदियों से नानक नाम लेवा श्रद्धालुओं के विश्वास का आधार बनी हुई थी।

यदि पुरी के आसपास स्थित गुरुद्वारा आरती साहिब तथा अन्य संबंधित स्थलों का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक अध्ययन किया जाए तो यह अनुभूति और भी गहरी हो जाती है कि सिख कौम ने केवल नानक पंथियों को ही नहीं अपितु गुरु साहिबानों की उदासियों से जुड़े उन अमूल्य स्थलों को भी उपेक्षित कर दिया है, जो भारत के विविध प्रांतों में बिखरे पड़े हैं।

इन्हीं प्रश्नों के समाधान और सत्य की खोज की भावना से प्रेरित होकर हमारी टीम “खोज–विचार” 15 फरवरी सन 2022 ई. को पटियाला से प्रस्थान कर दिल्ली हवाई अड्डे पहुँची और वहाँ से उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर पहुँची। भुवनेश्वर से रेलमार्ग द्वारा भद्रक और वहाँ से सड़क मार्ग से 16 फरवरी को जमझाड़ी रोड होते हुए बालासोर ज़िले के गाँव बिरंचीपुर पहुँची। 

बिरंचीपुर: जहाँ मूल मंत्र अब भी गूँजता है

गाँव में प्रवेश करते ही विभिन्न रंगों से सुसज्जित एक मंदिर दृष्टिगोचर हुआ, जिसे स्थानीय लोग “गुरु नानक मंदिर” कहते हैं। यह वही स्थान है जहाँ, स्थानीय परंपरा के अनुसार, श्री गुरु नानक देव साहिब जी अपनी प्रथम उदासी के दौरान उड़ीसा की यात्रा में ठहरे थे।

इस गाँव में हमारी टीम की भेंट बुजुर्ग भास्कर साहू और उनके परिवार एवं अन्य ग्राम वासियों से हुई। अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले यह आदिवासी परिवार आज भी मूल मंत्र का पाठ करते है। एक छोटे से मंदिर में रखी प्राचीन हस्तलिखित पोथी के समक्ष वे उड़िया मिश्रित भाषा में अरदास करते हैं। जिस प्रकार हम श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश कर, श्रद्धा प्रकट करते हैं, उसी प्रकार यह लोग भी करते है; साथ ही उस पोथी को रुमाला साहिब में लपेटकर अत्यंत सम्मान पूर्वक सुरक्षित रखते हैं।

इस पुरातन पोथी के कुछ अंशों के अध्ययन से ज्ञात हुआ कि वह ‘आसा की वार’ का एक प्राचीन हस्तलिखित गुटका साहिब है। इस स्थान पर एक पुरातन कड़ा भी सुरक्षित रखा गया है, जो समय के साथ हरे रंग का हो चुका है। स्थानीय परिवार का विश्वास है कि यह कड़ा स्वयं श्री गुरु नानक देव साहिब जी का है। एक ताँबे का प्राचीन कटोरा भी वहाँ विद्यमान है। कुछ स्थानीय शोध कर्ताओं ने इन वस्तुओं का निजी प्रयोगशाला में परीक्षण करवाया, जिससे उनकी प्राचीनता की पुष्टि हुई है।

सेवा, संरक्षण और पुनर्जीवन

सन 2021 ई. में टीम खोज–विचार पहली बार यहाँ पहुँची थी। उस समय यह स्थान जीर्ण–शीर्ण अवस्था में था। संगत के सहयोग से यहाँ गुरुद्वारा साहिब का बोर्ड लगवाया गया, उड़िया भाषा में भी सूचना–पट स्थापित किया गया, जल की व्यवस्था हेतु हैंडपंप लगाया गया तथा गुरु पंथ खालसा का बसंती रंग का निशान सुशोभित किया गया। पुरातन काल में यहाँ केवल एक झोपड़ी हुआ करती थी; विगत लगभग सौ वर्षों से वर्तमान मंदिर विद्यमान है।

गुरुद्वारा साहिब के दोनों ओर तालाब स्थित हैं, जो इस स्थल की रमणीकता को और बढ़ाता हैं। वर्ष में एक बार यहाँ भव्य उत्सव मनाया जाता है। उस दिन उड़िया भाषा में गुरबाणी का गायन होता है, लंगर तैयार किया जाता है और पाँच गाँवों की संगत एकत्र होकर उस पुरातन कड़े के दर्शन करती है।

आस्था और परंपरा का संगम

स्थानीय परंपरा के अनुसार यहाँ पूजा–पद्धति का स्वरूप सिख मर्यादा से भिन्न है, किंतु श्रद्धा और विश्वास की निर्मल धारा उसमें स्पष्ट रूप से प्रवाहित होती है। कड़ाह प्रसाद की देग पर कृपाण भेंट किए बिना ही ऊपरी सतह पर पंजे जैसा चिन्ह उभर आने की परंपरा यहाँ प्रचलित है। गुरबाणी का गायन, शबद का उच्चारण और “गुरु मान्यो ग्रंथ” का जयघोष वातावरण को आध्यात्मिक भाव से भर देता है।

स्थानीय बुजुर्ग उड़िया भाषा में शबद् गाते हैं, महिलाएँ टूटी–फूटी हिंदी में इतिहास सुनाती हैं, और अंत में पहले गुरु साहिब को भोग लगाकर ही लंगर वितरित किया जाता है। यह सब देखकर प्रतीत होता है कि यद्यपि विधि भिन्न है, किंतु भावना शुद्ध है और यही भावना श्री गुरु नानक देव साहिब जी की शिक्षाओं का मूल है।

एक व्यापक प्रश्न

जब हम बिरंचीपुर से विदा हुए तो इतिहासकार डॉक्टर खोजी की आवाज़ अब भी कानों में गूँज रही थी—“ऐसी सैकड़ों जगहें हैं और सैकड़ों–हज़ारों नानक पंथी हैं, जिन्हें सिख कौम भूल चुकी है।”

श्री गुरु नानक देव साहिब जी का 550वाँ प्रकाश पर्व आया और बीत गया। यह लेख केवल एक गाँव का वृत्तांत नहीं अपितु एक प्रश्न है; क्या हम अगली शताब्दी तक ऐसे भूले–बिसरे परिवारों को खोजने, समझने और उन्हें सिक्खी के मानचित्र पर स्थान देने का प्रयास करेंगे?

उड़ीसा की इस आदिवासी धरती पर आज भी मूल मंत्र की गूँज सुनाई देती है। निर्धन किन्तु आस्थावान यह आदिवासी हमें स्मरण कराते है कि गुरु की ज्योति केवल बड़े गुरुद्वारों और भव्य भवनों में ही नहीं अपितु उन अनाम हृदयों में भी प्रज्वलित है, जो श्रद्धा से “इक ओंकार” का उच्चारण करते हैं।

वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।

 

 

 

 

 

 


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