भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं में हिंदी का महत्व
(10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस पर विशेष-)
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Toggleभारत की आत्मा उसकी भाषाओं में बसती है और उन भाषाओं में हिंदी वह सेतु है, जिसने विविधता में एकता के इस विराट राष्ट्र को वैचारिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक सूत्र में बाँधने का ऐतिहासिक कार्य किया है। यद्यपि प्रत्येक समाज, प्रत्येक क्षेत्र और प्रत्येक समुदाय अपनी–अपनी मातृभाषा पर गर्व करता है, फिर भी राष्ट्रव्यापी संवाद, सांस्कृतिक समन्वय और वैचारिक एकात्मता के लिए हिंदी ने सदैव एक सर्वमान्य और स्वीकार्य माध्यम का दायित्व निभाया है। इसी परिप्रेक्ष्य में यदि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं में हिंदी के महत्व का मूल्यांकन किया जाए, तो गुरु पंथ खालसा और पंजाब की पावन भूमि का योगदान अत्यंत गौरवपूर्ण और प्रेरणादायी प्रतीत होता है।
पंजाबी सभ्यता और संस्कृति में जीवन व्यतीत करने वाले साहित्यकारों, संतों और विद्वानों ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक हिंदी के प्रचार–प्रसार में जो भूमिका निभाई है, वह केवल भाषाई योगदान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का सशक्त उदाहरण है। पंजाब की धरती, जिसे वीरता, त्याग और आध्यात्मिक ऊँचाइयों के लिए जाना जाता है, भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भी उतनी ही समृद्ध रही है। यह तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में से एक ऋग्वेद की रचना इसी भूभाग में मानी जाती है। वहीं हिंदी साहित्य का प्रथम महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ रचने वाले आदिकवि चंदबरदाई भी मूलतः इसी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े रहे हैं। यह सब इस सत्य की पुष्टि करता है कि हिंदी की जड़ें केवल किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वह भारतीय सभ्यता के प्रवाह के साथ निरंतर विकसित होती रही है।
सिख गुरुओं के काल में हिंदी को जो संरक्षण और सम्मान प्राप्त हुआ, उसने इसके राष्ट्रीय स्वरूप को और अधिक सुदृढ़ किया। जब पंचम गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव साहिब जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन किया, तब इस युग–युग अटल ग्रंथ में हिंदी के विविध रूपों को भी सम्मानजनक स्थान दिया गया। बारहवीं शताब्दी के भक्त फरीद जी की वाणी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी द्वारा उच्चारित 116 पदों तक, हिंदी और उससे जुड़ी लोकभाषाओं का ऐसा व्यापक समावेश इस बात का प्रमाण है कि गुरु परंपरा ने भाषा को संप्रेषण का साधन ही नहीं, बल्कि जन–जन तक सत्य और धर्म पहुँचाने का माध्यम माना।
धर्म, मानवता और न्याय की रक्षा के लिए जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने पंजाब से लेकर उत्तर–पूर्व तक की ऐतिहासिक यात्राएँ कीं, तब भाषा ने इस अभियान में सेतु की भूमिका निभाई। इस दीर्घ यात्रा में शहीद भाई मती दास जी जैसे बहुभाषाविद विद्वानों को यह दायित्व सौंपा गया कि गुरु साहिब के उपदेशों और वाणियों का सरल, बोधगम्य अर्थ तैयार कर उसे यात्रा–मार्ग में मिलने वाले जनसामान्य तक पहुँचाया जाए और लिखित रूप में सुरक्षित भी किया जाए। उस काल में जब देश के विभिन्न अंचलों में अरबी, फारसी, पश्तो, पंजाबी, संस्कृत, ब्रज, भोजपुरी, मराठी और बंगाली जैसी अनेक भाषाएँ प्रचलित थीं, तब हिंदी ने संवाद और समन्वय की साझा भाषा के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि इतिहासकार मानते हैं—यहीं से हिंदी को एक व्यापक राष्ट्रीय आयाम प्राप्त हुआ।
दशम गुरु, श्री गुरु गोविंद सिंह साहिब जी के काल में हिंदी और भारतीय ज्ञान–परंपरा का यह प्रवाह और अधिक व्यापक हो गया। स्वयं उच्च कोटि के कवि, साहित्यकार और चिंतक होने के कारण उन्होंने भारतीय दार्शनिक ग्रंथों के हिंदी अनुवाद को विशेष प्रोत्साहन दिया। श्री आनंदपुर साहिब जी का दरबार उस समय साहित्य, दर्शन और आध्यात्मिक विमर्श का जीवंत केंद्र बन गया था, जहाँ अनेक भाषाओं में रचित ग्रंथों का अध्ययन, अनुवाद और विवेचन निरंतर होता रहता था। यह सब इस बात का प्रमाण है कि गुरु पंथ खालसा ने भाषा को सत्ता या प्रभुत्व का नहीं, बल्कि सेवा, संवाद और संस्कृति के संरक्षण का साधन माना।
इस प्रकार भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं में हिंदी का महत्व केवल साहित्यिक या भाषाई नहीं अपितु आध्यात्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। गुरु परंपरा और खालसा पंथ ने हिंदी को अपनाकर यह सिद्ध किया कि भाषा तब सबसे अधिक समर्थ होती है, जब वह जन–जन को जोड़ने, विचारों को संप्रेषित करने और मानवता के मूल्यों को स्थापित करने का कार्य करे।
आधुनिक युग में भी पंजाब की भूमि हिंदी साहित्य के संवर्धन और विस्तार में निरंतर सक्रिय रही है। पंजाबी सभ्यता में जीवन व्यतीत करने वाले अनेक साहित्यकारों, कलाकारों और चिंतकों ने हिंदी को केवल अभिव्यक्ति की भाषा नहीं अपितु आत्मीय संवाद का माध्यम माना। भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी विचारक से लेकर मोहन राकेश ‘अश्क’, यशपाल, कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी, बलराज साहनी, बलवंत गार्गी और जगजीत सिंह जैसे रचनाकारों व कलाकारों तक, इन सभी ने अपने – अपने क्षेत्र में हिंदी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि पंजाबी जीवन – शैली में पलने – बढ़ने वाला प्रत्येक व्यक्ति अनजाने ही हिंदी के साथ जागता–सोता है। पंजाबी और हिंदी का यह आत्मीय संबंध भाषा – विज्ञान के स्तर पर भी दिखाई देता है, जहाँ हिंदी का ‘का’ और ‘की’ पंजाबी में ‘दा’ बनकर उसी भाव – भूमि में प्रवाहित हो जाता है। यही सहज भाषिक संगम हिंदी को जन – जन की भाषा बनाता है।
यदि हिंदी साहित्य के इतिहास पर दृष्टि डालें तो अनेक ऐसे विद्वान सामने आते हैं, जिन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी को वैचारिक गहराई और सामाजिक विस्तार प्रदान किया। डॉ. महीप सिंह, जो हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक, चिंतक, स्तंभकार और पत्रकार रहे, इस परंपरा की एक सशक्त कड़ी हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहते हुए उन्होंने विपुल साहित्य – सृजन किया और हिंदी कथा – साहित्य को समृद्ध किया। इसी क्रम में डॉ. जोध सिंह का नाम विशेष आदर के साथ लिया जाता है, जिन्होंने गुरु पंथ खालसा की परंपरा में रहते हुए जाप साहिब का उत्कृष्ट हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया और दशम ग्रंथ से संबंधित अनेक गंभीर रचनाएँ हिंदी में लिखी। उनके प्रयासों ने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक साहित्य और आधुनिक हिंदी के बीच कोई दूरी नहीं अपितु गहरा अंतर्संबंध है।
साहित्य और सिनेमा के क्षेत्र में सरदार राजेंद्र सिंह बेदी का योगदान भी हिंदी, उर्दू साहित्य की साझा विरासत का अनुपम उदाहरण है। भारत – पाक विभाजन की पीड़ा को शब्दों में ढालने से लेकर सिनेमा के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने तक, उनकी रचनात्मकता ने हिंदी को नई दृष्टि दी। इसी प्रकार जसपाल सिंह भट्टी ने व्यंग्य को जन – सरोकारों से जोड़कर हिंदी टेलीविजन को एक नई पहचान दी। उनकी रचनाओं ने हास्य के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया और आम दर्शक को हिंदी से गहराई से जोड़ा। रेडियो के माध्यम से जसदेव सिंह की ओजस्वी उद्घोषणाएँ भी हिंदी के श्रोताओं के लिए स्मरणीय धरोहर बन गईं, समय ऐसा था कि- तकनीकी साधनों के अभाव में केवल शब्द ही संवेदना का सेतु हुआ करते थे।
हिंदी फिल्म, साहित्य को गीतात्मक ऊँचाइयों तक पहुँचाने वाले गुलज़ार का योगदान भी इस परंपरा में अद्वितीय है। उनकी रचनाएँ हिंदी, उर्दू और पंजाबी के त्रिवेणी संगम का जीवंत उदाहरण हैं, जहाँ भाषा केवल शब्द नहीं अपितु अनुभूति बन जाती है। साहित्य, सिनेमा और गीत तीनों क्षेत्रों में उनका अवदान हिंदी की संवेदनशीलता को समृद्ध करता है।
वर्तमान समय में भी यह परंपरा जीवित है। चंडीगढ़ निवासी डॉ. अमरजीत सिंह वधान ने जीवन भर राष्ट्रभाषा हिंदी की सेवा में स्वयं को समर्पित किया है। उनके शोध, ग्रंथ–लेखन और मार्गदर्शन से अनेक विद्यार्थी और शोधार्थी हिंदी साहित्य की ओर प्रेरित हुए हैं। इसी प्रकार मुंबई निवासी प्रसिद्ध साहित्यकार हरविंदर सिंह सेठी की रचनाएँ भाषा के सौंदर्य और वैचारिक गहराई का अद्भुत उदाहरण हैं। उनकी कृति ‘गुरु तेग बहादुर: एक युग व्यक्तित्व’ हिंदी में लिखे गए सिख इतिहास के महत्वपूर्ण ग्रंथों में गिनी जाती है। कानपुर निवासी सरदार हरभजन सिंह मेहरोत्रा ने अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं को जिस आत्मीयता से प्रस्तुत किया है, उसने हिंदी पाठकों के हृदय में स्थायी स्थान बनाया है।
हिंदी व्यंग्य को समकालीन चेतना से जोड़ने वाले मेरे अग्रज और मार्गदर्शक डॉ. पिलकेन्द्र जी अरोरा और इंदौर निवासी सरदार तीरथ सिंह खरबंदा जैसे रचनाकारों ने यह सिद्ध किया कि व्यंग्य केवल हास्य नहीं अपितु समाज का दर्पण है। वहीं सरदारनी इंद्रजीत कौर जैसी लेखिकाओं ने व्यंग्य के क्षेत्र में स्त्री, संवेदना और सामाजिक विवेक को प्रभावशाली स्वर प्रदान किया है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और समाचार पत्रों के माध्यम से उनकी रचनाएँ हिंदी को निरंतर गतिशील बनाए हुए हैं।
इन सबके अतिरिक्त भी अनेक ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने पंजाबी सभ्यता में रहते हुए हिंदी को अपनी साधना बनाया। उनका यह समर्पण इस बात का प्रमाण है कि हिंदी किसी एक प्रदेश की नहीं अपितु संपूर्ण भारतीय संस्कृति की साझा धरोहर है। ऐसे सभी ज्ञात, अज्ञात साहित्यकारों और हिंदी प्रेमियों को आज के इस पावन अवसर पर सादर नमन।
10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस की आप सभी हार्दिक स्वस्तिकामनाएँ।
-लेखक / ब्लॉगर / व्याख्याता
डॉ. रणजीत सिंह ‘अर्श’
(09 जनवरी 2026).

