प्रसंग 8: पाँच गुरु साहिबान द्वारा पवित्र किए गया इन कुओं का जल
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)
यात्रा का पुनः आरंभ-
पार्श्व-गायन: (गुरु-स्मृति से ओतप्रोत धीमी, पवित्र तान पृष्ठभूमि में बह रही है।)
संगत को नमन करते हुए यात्रा का अगला अध्याय प्रारंभ करते है- “वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह!”। बस्सी पठाना की ऐतिहासिक जेल के दर्शन कर हम अब पुनः रवायती मार्ग की ओर लौट रहे हैं; उसी मार्ग पर, जिस पर चलते हुए इतिहास के पदचिह्न अपने आप उभर आते हैं। यह यात्रा केवल दूरी तय करने का नाम नहीं, बल्कि उन स्मृतियों के दोबारा जगने का अवसर है, जिन्होंने मानवता की चेतना को स्वर दिया।
भट्टा साहिब से गुरू गढ़ तक
जैसे ही हमारा वाहन खंडहर चौक से मुड़कर आनंदपुर साहिब की दिशा में चलता है, सामने रोपड़ नगरी की सीमा उभरती है। कुछ ही क्षणों में गुरुद्वारा भट्टा साहिब जी के दिव्य दर्शन संगत को प्राप्त हो जाते हैं और आगे, पुल उतरते ही, जिस ड्योढ़ी की पहली झलक मन में श्रद्धा जगा देती है—वह है गुरुद्वारा गुरु गढ़ साहिब। क्यों कहा गया इसे ‘गुरू गढ़’? यह प्रश्न अपने आप हमें उस प्राचीन वन / जंगल की ओर ले चलता है, जिसे आज भी सदाव्रत कहा जाता है और जो गुरु-स्मृति का जीवित साक्षी है।
सदाव्रत-वह जंगल जिसकी छाया में गुरु रुके थे
जब हम आज इस स्थल के समीप उपस्थित होते हैं, तो पंछियों की मधुर पुकार और हवा की सरसराहट मन को सहज ही उस युग में ले जाती है, जब यह पूरा क्षेत्र घने जंगल से आच्छादित था। जिस रमणीयता का स्पर्श गुरु साहिबान ने किया होगा, आज उसकी झलक मात्र ही शेष है; सभ्यता ने ऐसे वन-क्षेत्र लगभग विलुप्त कर दिए। इसी स्थान पर अब भव्य गुरुद्वारा गुरु गढ़ साहिब का निर्माण हो चुका है, किन्तु प्रकृति का वह पुरातन स्वर आज भी मानों धरती के भीतर गूँजता है।
छठे पातशाह की चरण-धूल से पवित्र भूमि
इतिहास की स्मृतियों में यह स्थान सर्वप्रथम उस समय अंकित हुआ, जब धन्य–धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी मेहराज की जंग के उपरांत यहाँ ठहरे थे। उस युग का यह क्षेत्र निरंतर वन्य सौंदर्य से भरपूर था। उसी काल की एक अमूल्य धरोहर आज भी यहाँ विद्यमान है, बाउली साहिब, (वावड़ी या सीढ़ीदार कुआँ, Bullock-Driven Water Wheel)। गुरु साहिब के समय निर्मित यह पवित्र कुआँ आज भी अपने स्वच्छ और शीतल जल से गुरु साहिब की याद को जीवित रखे हुए है। कुएँ का जल ऊपरी तल तक भरा मिलता है, जैसे सदियों से वह अपने भीतर गुरु-कृपा का संदेश संजोए खड़ा हो।
पंजाब के जल की स्मृतियाँ और बदलता समय
गुरुद्वारे के बाहर एक पुराना हैंडपंप खड़ा है, मानो पंजाब के बीते दिनों का मौन इतिहास बना हुआ। कभी यह भूमि जल-समृद्ध थी; पानी ऊपरी सतह पर मिलता था, और ऐसे हैंडपंप पंजाब की पहचान थे परन्तु समय के साथ भू-जल नीचे से नीचे उतरता गया और आज यह दृश्य केवल स्मृति के रूप में बचा है। हैंडपंप से निकला शीतल जल जैसे पुराने पंजाब की कहानी कहता है, वह पंजाब, जो आज नशे की लपटों और सामाजिक विषमताओं से घायल है। परिस्थिति का वर्णन लोकभाषा स्वयं करती है—
ना रुख रहा, ना सुख रहा, ना जवानी दिसदी है, हर पासे नशियां दी दौड़ लगी, हर पासे दारू विकदी है, जिस पग नूं दाग ना लगदा सी, आज पग हो गई काली है, जैडे़ माँ, पिऊ नू शीश झूकदा सी, आज धक्का ते गाली है।
सातवें, आठवें और दसवें पातशाह के विश्राम स्थल की स्मृति
इस स्थल की पवित्रता केवल एक युग तक सीमित नहीं। धन्य–धन्य सातवें पातशाह श्री गुरु हर राय साहिब जी 2200 घुड़सवारों के साथ यहाँ आकर ठहरे; उनके साथ संगत ने भी इसी स्थान पर विश्राम किया और फिर कीरतपुर साहिब की ओर प्रस्थान किया। इसी तरह आठवें पातशाह, बाल-स्वरूप धन्य–धन्य श्री गुरु हरकिशन महाराज जी, अंबाला से दिल्ली जाते समय इस पावन स्थल पर रुके और फिर वह ऐतिहासिक पल-जब पटना साहिब से बाल गोविंद राय, भविष्य के गुरु गोविंद सिंह जी, लखनौर से आनंदपुर साहिब लौटते हुए यहाँ पहुँचे और इसी बाउली का जल ग्रहण किया। इन पवित्र चरणों की छाप आज भी इस स्थल को दिव्य आभा प्रदान करती है।
नौवें पातशाह की शहीदी-यात्रा का पड़ाव
जब धन्य–धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी अपने बलिदान के लिए दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे- साथ थे भाई मतिदास जी, भाई सतीदास जी, भाई दयाला जी, भाई उदय जी और भाई गुरुदित्ता जी, तब भी यह स्थान उनके विश्राम का पवित्र पड़ाव बना। पाँच गुरुओं द्वारा पवित्र किया गया यह स्थल ‘गुरुद्वारा सदाव्रत’ अथवा ‘गुरुद्वारा गुरु गढ़ साहिब’ गुरु-रहमत का अनंत नूर समेटे हुए है। यहाँ उनके हाथों से बनाए गए कुएँ आज भी मौजूद हैं— कुछ जीवित, कुछ समय की रेत से ढँके।
समापन–दर्शन-दीदार की ओर
पार्श्व-गायन: (गुरु-स्मृति से ओतप्रोत धीमी, पवित्र तान पृष्ठभूमि में बह रही है।)
गुरुद्वारा साहिब के दर्शन से पहले मानो यात्रा का मनोभाव स्वयं संयत हो जाता है। यह स्थान केवल चार या पाँच गुरुओं की स्मृतियों से ही नहीं, बल्कि शिखरता-स्वरूप बाबा जोरावर सिंह जी की पावन स्मृति से भी आलोकित है। अब यात्रा आगे बढ़ती है— गुरुद्वारा साहिब के दर्शन, फिर बाउली साहिब, और फिर इतिहास की उन परतों की ओर, जो आज भी श्वास लेती हैं…
गुरु-स्मृति का प्रतीक-छोटा निशान साहिब और तीन बाउलियाँ
गुरुद्वारा परिसर से कुछ दूरी पर लहराता एक छोटा-सा निशान साहिब—पहली ही दृष्टि में मन को थाम लेता है। यह कोई साधारण निशान साहिब / ध्वज-दंड नहीं; यह उन स्मृतियों का प्रतीक है जिन्हें समय भी फीका नहीं कर सका। बड़े निशान साहिब के सामने विनम्रता से झूलता यह छोटा निशान साहिब बाबा जोरावर सिंह जी, अर्थात श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के दत्तक पुत्र, की पावन स्मृति को समर्पित है। वे स्मृतियाँ जो इतिहास के पन्नों में उतनी विस्तृत नहीं, परंतु इस भूमि की धड़कनों में आज भी जीवित हैं।
सेवादार सिंह श्रद्धा से भरकर बताते हैं- “साध-संगत जी, यह निशान साहिब कोई साधारण निशान साहिब नहीं हैं। यह गुरुद्वारा परिसर से हटकर बाहर की ओर स्थापित है क्योंकि यह उस दिव्य स्मृति को संभाले हुए है जो गुरु साहिब की वंश परंपरा से अनूठे रूप में जुड़ी है। गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के चार साहिबजादों को जहाँ विधि पुत्र कहा जाता है, वहीं बाबा जोरावर सिंह जी नाती पुत्र थे—अर्थात दत्तक पुत्र, जिन्होंने अपने बाल-हृदय में भी अद्भुत शौर्य और गुरु-भक्ति सँजोई थी।”
इतिहास की शांति को भेदती सेवादार की वाणी आगे कहती है- “बाबा जी चमकौर के युद्ध में गुरु महाराज से बिछुड़ गए थे और अनेक दिनों तक इसी क्षेत्र—कोटला निहंग, खिदराबाद, और सदाव्रत-में भ्रमण करते रहे। उनकी उसी मीठी, मासूम स्मृति के सम्मान में यह निशान साहिब आज भी झूल रहा है लेकिन दुःख इस बात का है कि स्थानीय संगत भी इस इतिहास से अनभिज्ञ है। जिन पुरातन निशानियों के सहारे हम इस स्मृति को समझ सकते थे, वह समय के साथ मिटा दी गईं- कार सेवा के नाम पर कई ऐतिहासिक चिह्नों का विनाश हो गया। सामने की बाउली साहिब, जो अपने मूल, प्राचीन स्वरूप में एक अद्भुत धरोहर थी, उसका संरक्षण भी नहीं किया जा सका। फिर भी, गुरु की रहमत का प्रमाण यह है कि इस बाउली में आज भी पवित्र जल निरंतर लबालब भरा रहता है और अत्यधिक वर्षा होने पर तो वह जल भूमि की सतह तक उभर आता है।”
इतिहास की इस पवित्र भूमि पर कदम बढ़ते ही डॉ. खोजी ध्यान आकर्षित करते हैं— “इस स्थान पर तीन बाउलियाँ थीं। उनमें से एक तो अभी भी फर्श के नीचे दबी हुई है।” गुरुद्वारा साहिब के पीछे जाते हुए एक बड़ा संगमरमर-शिलाखंड दिखाई देता है—उसके भीतर बना गहरा छिद्र उस प्राचीन बाउली का मूक साक्ष्य है।
डॉक्टर खोजी आदरपूर्वक स्थानीय बुज़ुर्ग से पूछते हैं- “बापूजी, यह बाउली साहिब कितनी पुरानी है? और क्या सचमुच यहाँ तीन कुएँ हुआ करते थे?”
बुज़ुर्ग की धीमी, परंतु आत्मविश्वास से भरी वाणी सुनाई देती है- “हाँ यह तीनों कुएँ गुरु साहिब की उपस्थिति में ही बने थे। इस क्षेत्र में पानी की बहुत तंगी थी। संगत ने निवेदन किया तो पहले एक कुआँ, फिर दूसरा और खेती-बाड़ी के कारण तीसरे कुएँ का निर्माण हुआ। गुरु साहिब की कृपा से ही यह भूमि जीवित रही और जल भी, जीवन भी।”
डॉ. खोजी पूछते हैं- “गुरु साहिब के समय इस स्थान की कितनी जमीन थी?”
बुज़ुर्ग बताते हैं- “तब पाँच से सात किल्ले तक भूमि थी। अब समय बची है; केवल चार या साढ़े चार किल्ले शेष रह गई है। यह सारी भूमि अब गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधिन है।”
बात आगे बढ़ती है- “इस कुएँ के जल का उपयोग किस लिए होता था?”
-“पीने के लिए,” बुज़ुर्ग कहते हैं।
फिर सामने वाले कुएँ की ओर संकेत करते हुए वे बताते हैं- “यह क्षेत्र उस मार्ग पर पड़ता है जो नंगल से होता हुआ अंबाला और दिल्ली तक जाता है। आनंदपुर साहिब और कीरतपुर साहिब जाने का भी मुख्य रास्ता यही था। गुरु साहिब तथा संगत जब भी आवागमन करते, तो इन्हीं कुओं के जल से यह क्षेत्र जीवित और धड़कता था।”
डॉ. खोजी ने पुनः प्रश्न किया- “सामने वाले कुएँ का क्या इतिहास है?”
बापूजी ने उत्तर दिया- “पहले वह एक पुराना कुआँ था। बाद में कार सेवा वाले महापुरुषों ने उसे सुंदर प्रकार से निर्मित किया। बाबा अवतार सिंह जी (टीपी साहिब) ने इस सेवा का नेतृत्व किया था।”
जब चर्चा हलट/रहट की ओर मुड़ी तो बुज़ुर्ग की आँखों में पुरानी मिट्टी की चमक लौट आई-
“इस क्षेत्र में दो हलटें (रहट) चलती थीं। सामने वाली बाउली का जल पीने के लिए था और रहट वाले कुएँ का जल खेती और सिंचाई के लिए।”
गुरु-धाम की स्मृति, पुरातन बाउलियाँ और प्रकृति का दिव्य संयोग
डॉ. खोजी बताते हैं कि हमने अभी एक अन्य स्थानीय बुज़ुर्ग से उस बाउली के संबंध में भी जानकारी प्राप्त की, जो लंगर हॉल के समीप स्थित है। पुराने लंगर घर को ढहाकर नए लंगर हॉल का निर्माण किया गया था। सामने जो छोटा निशान साहिब सुशोभित है और जो बड़ा निशान साहिब आज अपने स्थान पर स्थापित है-उस स्थल पर पहले गुरु साहिब का प्रकाश होता था। सन 2007–2008 में, जब यह पूरा प्रबंधन गुरुद्वारा कमेटी के अधीन आया, तभी नई इमारत का निर्माण हुआ था और गुरु साहिब का प्रकाश उसी नव-निर्मित भवन में स्थानांतरित किया गया।
डॉ. खोजी ने प्रश्न किया-“क्या आपने पुरानी बिल्डिंग देखी है? क्या वह छोटी ईंटों से निर्मित थी?”
स्थानीय बुज़ुर्ग ने उत्तर दिया-“हाँ, जो दूसरा दरबार अभी बना हुआ है, वही पुरानी छोटी ईंटों का बना हुआ ढांचा है।”
डॉ. खोजी ने पुष्टि की-“अर्थात वह ही पुरानी बिल्डिंग है?”
बुज़ुर्ग ने सिर हिलाकर कहा-“जी, वह पुरानी बिल्डिंग है। सामने का संपूर्ण क्षेत्र निचले स्तर पर स्थित है।”
इस प्रकार संकेत मिलता है कि नया गुरुद्वारा बाद में निर्मित हुआ, जबकि पुरानी दिव्य यादें उस ओर के भवन में आज भी जीवित हैं। अब संगत के नेत्र छठे पातशाह के समय निर्मित बाउली साहिब की ओर उठते हैं। वर्षा अधिक होने पर इस बाउली का जल इतना उफान लेता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर निकल आता है। गुरु स्मृति से ओतप्रोत वातावरण में, बाउली के दर्शन के साथ हम मूल मंत्र का पाठ करते है|
पार्श्व-गायन: (पृष्ठभूमि में गुरु-स्मृति जागृत करती कोमल, आध्यात्मिक धुन प्रवाहित है।)
आज भी इस बाउली साहिब से मीठा जल प्राप्त होता है। दूर-दूर से संगत यहाँ आती है, स्नान करती है, और इस पवित्र स्थल की कृपा का अनुभव करती है। इसके पश्चात हम गुरुद्वारा साहिब के अंदर दर्शनों के लिए आगे बढ़ते हैं।
डॉ. खोजी कहते हैं-“जब नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी अपनी अमर शहादत के लिए दिल्ली की ओर रवाना हुए थे, तब भी उन्होंने इस स्थान पर पड़ाव किया था। इसका कारण स्पष्ट है- पंजाब से हिमाचल अथवा श्री आनंदपुर साहिब की दिशा में जाने वाला यह पहला ऐतिहासिक पड़ाव है। तीन कुएँ, बाउलियाँ, और आज भी शेष यह प्राकृतिक जंगल, सब मिलकर इस भूमि को एक प्राकृत और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करते हैं।”
वे आगे बताते हैं- उस समय न हाईवे था, न पक्की सड़कें। कल्पना की जा सकती है कि यह शांत, सुनसान जंगल किस प्रकार लगता होगा। जो भी संगत प्रकृति का सौंदर्य अनुभव करना चाहती है, उन्हें इस स्थान पर अवश्य आना चाहिए, क्योंकि गुरु साहिब स्वयं प्रकृति प्रेमी थे। यही कारण है कि सदाव्रत क्षेत्र में आज एक इको-टूरिज्म क्षेत्र भी विकसित है। गुरुद्वारे के पीछे नहर वाले मार्ग से इस वन तक पहुँचा जा सकता है। प्रकृति की निर्मल छाया में खड़े होकर ऐसा प्रतीत होता है कि पाँच पातशाहियों के चरणों की ध्वनि अब भी हवा में घुली हुई है।
यहाँ लगी एक तख्ती पर श्री गुरु अर्जन देव साहिब जी की वाणी अंकित है—
खाक नूर करदं आलम दुनीआइ ॥ असमान जिमी दरखत आब पैदाइसि खुदाइ ॥ (अंग क्रमांक 723)
अर्थात यह सारा आलम एवं दुनिया मिट्टी एवं चेतन ज्योति से परमात्मा ने बनाई है। आसमान, जमीन, वृक्ष एवं पानी सब उस खुदा की पैदाइश है।
यह वाणी इस पर्वतीय वन और बाउलियों वाले क्षेत्र को मानो एक दिव्य चानण से भर देती है।
डॉ. खोजी आगे स्मरण कराते हैं- छठे पातशाह महाराज जी ने यहाँ पड़ाव किया था।सातवें पातशाह श्री गुरु हर राय साहिब जी 2200 घुड़सवारों के साथ यहाँ ठहरे थे।
आठवें पातशाह श्री गुरु हरकिशन महाराज जी दिल्ली की ओर जाते समय इसी स्थल पर रुके थे।
दसवें पातशाह, उस समय बाल-स्वरूप गोविंद राय, पटना से आनंदपुर साहिब जाते हुए यहाँ पहुँचे थे।
और नौवें पातशाह धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब स्वयं दो बार-पटना साहिब से लौटते समय और अपनी शहादत के लिए दिल्ली जाते समय-यहीं ठहरे थे।
इस प्रकार पाँच पातशाहियों के चरण-कमलों से पवित्र यह स्थल सदाव्रत, आज ‘गुरुद्वारा गुरु गढ़ साहिब’ के नाम से जगमगा रहा है। संगत यहाँ आकर नतमस्तक होती है, और इतिहास का हर पृष्ठ इस भूमि पर आकर जीवन्त प्रतीत होता है।
डॉ. खोजी आगे बताते हैं-“यदि आप चमकौर साहिब आते हैं तो मात्र 4 किलोमीटर आगे गुरुद्वारा भट्ठा साहिब स्थित है। गुरुद्वारा परिवार विछोड़ा साहिब भी निकट ही है। रोपड़ से आनंदपुर साहिब की ओर जाते हुए, हाईवे पर स्थित सदाव्रत स्थल पर पहुँचकर आप गुरुद्वारा गुरु गढ़ साहिब के दिव्य दर्शन कर सकते हैं। अभी भी आप इस गुरुद्वारे के दर्शन कर रहे हैं।”
उनकी वाणी आगे के मार्ग का संकेत देती है-“अब हम शहीदी मार्ग के अगले पड़ाव ‘मुकरामपुर’ की ओर बढ़ेंगे, जो यहाँ से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। फतेहगढ़ साहिब से चंडीगढ़ जाने वाले मार्ग पर गाँवों की पगडंडियों से होते हुए हम आपको और भी ऐतिहासिक स्थानों के दर्शन करवाते चलेंगे। इतिहास की यह यात्रा निरंतर जारी रहेगी—आप बस श्रवण करते रहिए, जुड़ते रहिए।”
जैसे ही पार्श्व में मंद, आध्यात्मिक संगीत पुनः उठता है, ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास की परतें स्वयं खुल रही हों।
“इतिहास के पन्नों को यहीं विराम देते हैं। मिलते हैं शहीदी मार्ग के अगले प्रसंग में।”
संगत जी से विनम्र निवेदन
इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सबमें बहुत बड़ा व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक को, यह शहीदी मार्ग प्रसंग को और आगे आने वाले सभी ऐतिहासिक प्रयासों को अपना सहयोग देना चाहें, तो- मोबाइल क्रमांक- 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इस इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक होगा।
आपका अपना वीर- इतिहासकार, डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’
पार्श्व गायन: (गुरु-चरित की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन वातावरण में गूँज रही है।)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरू जी की फतेह!
आपका अपना वीर इतिहासकार- डॉक्टर भगवान सिंह खोजी