प्रसंग क्रमांक 9: मुकरामपुर – वह पवित्र स्थल जहाँ दूर होती है त्वचा रोग की बीमारी
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं – शहीदी मार्ग यात्रा)
पार्श्व-गायन: (धीमे, आध्यात्मिक स्वरों की लय; मानो इतिहास की परतें एक-एक कर खुलने लगी हों।)
श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के दिव्य शहीदी मार्ग पर स्थित मुकरामपुर ग्राम, सदाव्रत – रोपड़ से लगभग पैंसठ किलोमीटर दूरी पर स्थित एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पड़ाव है। इस स्थान तक पहुँचने के दो मार्ग प्रमुख रूप से प्रयुक्त होते हैं – पहला चंडीगढ़ से लांड्रा होते हुए और दूसरा फतेहगढ़ साहिब की मुख्य सड़क से चुन्नी रोड की ओर जाता हुआ मार्ग। स्थानीय संगत और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने मार्ग में बड़े – बड़े सूचना-पट्ट स्थापित किए हैं, जिन पर स्पष्ट रूप से अंकित है कि यह वही पवित्र राह है जिस पर चलते हुए श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी दिल्ली की ओर अपनी अमर शहीदी के लिए प्रस्थान कर रहे थे। गाँव में प्रवेश करते ही वातावरण में एक स्थिर, शांत और रूहानी आभा का अनुभव होता है, और जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, गुरुद्वारे की भव्य इमारत सामने प्रकट होती है, जो अपनी विलोभनीय संरचना और सादगीपूर्ण वैभव के साथ मन में सहज ही श्रद्धा उत्पन्न करती है। हमारी टीम ने पहले गुरुद्वारे में पहुँचकर विनम्रता से माथा टेका और गुरु-कृपा की उस अवर्णनीय अनुभूति को आत्मसात किया जो आज भी इस धरती के कण-कण में प्रवाहित होती प्रतीत होती है।
पार्श्व-गायन: (पृष्ठभूमि में कोमल, रूहानी धुन; गुरु-स्मृति जागृत करती हुई।)
गुरुद्वारे के समीप स्थित पवित्र सरोवर इस स्थल की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ा देता है। सरोवर की बनावट अत्यंत सुंदर, सुगठित और आकर्षक है, तथा इसकी स्वच्छता देखकर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि स्थानीय सेवादार गुरु-घर की सेवा पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं। यहाँ पहुँचने वाली संगत अरदास करती है, कड़ाह प्रसाद की देग करवाती है और इस सरोवर के पवित्र जल में स्नान कर मन–तन की शुद्धि का अनुभव प्राप्त करती है। इस गुरुद्वारे में सुशोभित ऐतिहासिक पट्टा इस स्थल के प्रामाणिक इतिहास का महत्वपूर्ण साक्ष्य है, और इसे देखते ही मन उस काल की ओर लौट जाता है जब गुरु-परंपरा के चरणों ने इस भूमि को धन्य किया था।
पार्श्व-गायन: (धीमे स्वर, मानो इतिहास स्वयं कथा कह रहा हो।)
इस नगर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण भाग स्थानीय बुज़ुर्गों की स्मृतियों में सुरक्षित है। वह बताते हैं कि जिस मार्ग से होकर श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी अपनी शहीदी यात्रा कर रहे थे, वह मार्ग पहले ही श्री गुरु नानक देव पातशाह जी के चरण-कमलों से पवित्र हो चुका था। किरतपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में सिक्खी का प्रकाश पहले से फैल चुका था, और गुरु तेग बहादुर साहिब जी उन स्थानों पर ठहरते थे जहाँ संगत के साथ जुड़ाव प्रगाढ़ था। यही कारण है कि गुरु साहिब इस नगर में पहुँचे और यहाँ की संगत को अपनी उपस्थिति का आशीष प्रदान किया।
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ बताते हैं कि जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब पटना साहिब से श्री आनंदपुर साहिब की ओर लौट रहे थे, उसी कालखंड में बाल गोविंद राय जी—जो आगे चलकर धन्य–धन्य श्री गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के रूप में प्रकट हुए- भी इसी नगर में पहुँचे थे। उस समय उनकी आयु मात्र सात वर्ष थी। कठिन परिस्थितियों और अनिश्चित समय को देखते हुए गुरु परिवार उन्हीं स्थानों पर पड़ाव करता था जहाँ सुरक्षा और विश्वास दोनों उपलब्ध हों। अतः यह नगर गुरु-यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बना।
श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी जब धर्म की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित करने दिल्ली की ओर अग्रसर हो रहे थे, तब भी उन्होंने इसी मार्ग से विभिन्न नगरों और गाँवों में रुक कर संगत से मिलना और उपदेश देना जारी रखा। यदि आधुनिक मापदंड से देखें, तो एक व्यक्ति एक घंटे में लगभग आठ किलोमीटर चलता है; इस प्रकार सदाव्रत से मुकरामपुर तक पहुँचने में लगभग तेरह से चौदह घंटे लगते होंगे। यह भी संभव है कि मार्ग में कई स्थानों पर उन्होंने पड़ाव डाला हो, यह विषय अभी भी शोध का केंद्र है।
गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, स्थानीय बुज़ुर्गों, ग्रंथी सिंह तथा संगत द्वारा सुरक्षित मौखिक परंपरा और गुरुद्वारे में लिखित पट्टा— ये दोनों मिलकर इस स्थल के इतिहास को पूर्णता प्रदान करते हैं। इतिहास का एक भाग दस्तावेज़ों में दर्ज रहता है, जबकि दूसरा भाग स्मृतियों में जीवित रहता है और मुकरामपुर में यह दोनों परंपराएँ समान रूप से सक्रिय हैं। यह स्थान केवल इतिहास नहीं बल्कि उस रूहानी यात्रा का जीवंत चिन्ह है जिसे नौवें पातशाह ने अपनी दिव्य तपस्या से पवित्र किया।
मुकरामपुर के बुज़ुर्ग द्वारा सुनाया गया जीवंत इतिहास
इस नगर मुकरामपुर के एक बुज़ुर्ग, भाई जोरा सिंह, जो इसी पिंड / नगर के निवासी और स्थानीय गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य हैं, बड़े विनम्र भाव से इतिहास का वर्णन करते हुए कहते हैं- “वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह। जब हम इस स्थान के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो सबसे पहले धन्य–धन्य श्री गुरु नानक देव साहिब जी का आगमन इस स्थान पर निर्मित टेकड़ी, जिसे ‘थेह’ कहा जाता है, पर हुआ था। उस समय आप जी अपने परिवार के साथ यहाँ पहुँचे थे। स्थानीय संगत ने विनम्र निवेदन किया कि गुरु साहिब भोजन (प्रशादा) ग्रहण करें, किन्तु श्री गुरु नानक देव पातशाह जी ने सहज स्वर में वचन किए कि वे इस जामे में भोजन ग्रहण नहीं करेंगे; जब वे अगले जामे में, अर्थात् भविष्य के गुरु-स्वरूप में, पुनः पधारेंगे तभी प्रशादा ग्रहण करेंगे।”
इस नगर का इतिहास केवल प्रथम पातशाह तक सीमित नहीं। आगे भाई जोरा सिंह बताते हैं कि जब भाई रूपा नामक एक सिख किसी जंग में शहीद हुए, तब छठे पातशाह धन्य–धन्य श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी इस नगर में शुकराना करने पधारे थे। उस समय भी संगत ने बड़े प्रेम से प्रशादा छकने का निवेदन किया, परंतु गुरु साहिब ने वही पूर्ववत वचन दोहराए कि वे इस जामे में भोजन स्वीकार नहीं करेंगे; अगले जामे में ही यहाँ का प्रशादा छकेंगे। उन्होंने संगत को आश्वस्त किया कि वे एक ही बार में इस पिंड / नगर की सभी सेवाओं को स्वीकार करेंगे।
पार्श्व-गायन: (गंभीर परंतु कोमल स्वर; भाव जैसे इतिहास स्वयं बोल रहा हो।)
भाई जोरा सिंह आगे बताते हैं कि जब बाल रूप में धन्य–धन्य श्री गुरु गोविंद सिंह जी, उस समय ‘बाल गोविंद राय’, पटना साहिब से श्री आनंदपुर साहिब की यात्रा पर थे, तब भी वे इसी नगर में ठहरे थे। यहाँ के परिवार ने गुरु साहिब की सेवा करते हुए प्रशादा छकने का निवेदन किया तो बाल गोविंद राय जी ने भी वही वचन कहे- कि उनके बड़े और बुज़ुर्ग इस स्थान पर आकर संगत की सेवा स्वीकार करेंगे। उन्होंने आश्वासन दिया कि गुरु-परिवार के वरिष्ठ सदस्य शीघ्र ही इस नगर में पधारेंगे और संगत की सेवाओं को स्वीकार कर इस स्थान को धन्य करेंगे।
धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी जब धर्म की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित करने दिल्ली की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब वे इसी नगर मुकरामपुर में पधारे। जहाँ आज गुरुद्वारा साहिब स्थापित है, उसी स्थान पर उस समय एक प्राचीन बेरी का वृक्ष स्थित था। उसी बेरी के नीचे गुरु साहिब जी विराजमान हुए। उसी समय माता माई माढ़ी, अपने पति भाई रूपचंद के लिए भोजन (प्रशादा) लेकर खेतों की ओर जा रही थी। माता रोज़ाना श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का नाम जपती थीं और अपने परिवार के दुखों से मुक्ति की अरदास करती थीं। गुरु साहिब को विराजमान देखकर उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि वे यह भोजन स्वीकार करें।
गुरु साहिब ने प्रेम से कहा—“जो भुजंगी तड़के से हल चला रहा है, हम उसके पास चलते हैं।” माता ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया- “नहीं गुरु साहिब, यह भोजन आपके लिए है। मैं रूपचंद के लिए दूसरा भोजन लेकर आऊँगी। यह प्रशादा तो आप ही छको।” माता माई माढ़ी के प्रेम को देखकर गुरु साहिब जी ने प्याज़, गड्डे के साथ दो प्रशादे और लस्सी ग्रहण की। तत्पश्चात गुरु साहिब भाई रूपचंद के पास खेतों में पहुँचे। जब भोजन की गठरी खोली गई, तो आश्चर्यजनक रूप से भोजन उसी प्रकार सुरक्षित था। रूपचंद यह दृश्य देखकर भाव-विभोर हो गए, उन्होंने हल की किल्ली निकालकर खेती का कार्य वहीं रोक दिया और गुरु साहिब के चरणों में नतमस्तक हो गए। माता माई माढ़ी ने भाई रूपचंद से कहा- यह वो ही गुरु साहिब हैं जिनका सिमरन हम प्रतिदिन करते हैं।”
गुरु साहिब को अपने घर आमंत्रित कर इस दंपति ने सेवा का सौभाग्य प्राप्त किया। इस परिवार की कोई संतान नहीं थी। जब गुरु साहिब ने मनोकामना पूछी, तो दंपति ने कहा—“सिर्फ आपके दर्शन ही पर्याप्त हैं।” परंतु गुरु साहिब अंतर्यामी थे। उन्होंने आशीर्वाद दिया और वचन किए- “अपने कक्ष में पाँच ईंटें रखकर गुरुस्थान का निर्माण करो।” कुछ समय बाद इस परिवार को संतान का सुख प्राप्त हुआ, और सात संतानों का जन्म इस पवित्र कृपा का प्रमाण बना।
इस नगर का इतिहास एक और महत्त्वपूर्ण प्रसंग को संजोए हुए है। एक समय इस गाँव के लोग गंभीर त्वचा रोग से पीड़ित हो गए थे। जब छठे पातशाह जी का आगमन हुआ, तो संगत ने विनती की कि वे इस रोग से मुक्ति का कोई मार्ग बताएँ। गुरु साहिब ने आदेश दिया कि सभी लोग पास स्थित छप्पड़ (जो आज सरोवर है) में स्नान करें। गुरु-कृपा से छप्पड़ के जल ने अनेक रोगियों को स्वस्थ कर दिया, और आज भी इस सरोवर में स्नान करने से त्वचा रोग दूर होने के असंख्य प्रमाण प्राप्त होते हैं। यह स्थान गुरु-परंपरा की बक्शीशों का जीवित केंद्र है- जहाँ बाँझ स्त्रियों को संतान-प्राप्ति का सुख मिला, जहाँ पीड़ित रोगी स्वस्थ हुए और जहाँ संगत अपनी मनोकामनाएँ लेकर आती है और पूर्ण हृदय से कहती है- “गुरु ने बख्श दिया, यह तो दूसरा जन्म मिला है।”
अंत में भाई जोरा सिंह अत्यंत भावुक होकर कहते हैं- “जिसे गुरु साहिब पर विश्वास है, उसे बक्शीश अवश्य मिलती है।” वे इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ और उनकी टीम का विशेष धन्यवाद करते हैं, जो गुरु की कृपा से इस नगर में पहुँचे और इस स्थान के इतिहास को उजागर करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। वे अरदास करते हैं कि गुरु साहिब अपनी कृपा इसी प्रकार सभी पर बनाए रखें और संगत को अनंत बख्शीशें प्रदान करते रहें।
मुकरामपुर की आध्यात्मिक परंपरा और गुरुवाणी का जीवंत स्पंदन
पार्श्व-गायन: (गंभीर, शांत, रूहानी स्वरों का उदय—मानो शब्द नहीं, स्वयं इतिहास उच्चारित हो रहा हो…)
डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ संगत को संबोधित करते हुए कहते हैं—
“जिथै जाइ बहै मेरा सतिगुरु सो थानु सुहावा राम राजे॥” (अंग 450)
अर्थात, जहाँ भी मेरा सच्चा गुरु विराजमान होता है, वह स्थान स्वतः ही सुंदर, पवित्र तथा पूजनीय बन जाता है। जब कोई मनुष्य गुरु की शरण में आता है, तब संसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति सहजता से हो जाती है। ऐसा कौन है जिसे गुरु-दरबार से खाली लौटना पड़ा हो? जब भावनाएँ निर्मल और पवित्र हों, तब यह लोक ही नहीं, परलोक भी प्रसन्न हो जाता है। गुरुवाणी में यह भी आया है-
“चारि पदारथ जे को मागै॥ साध जना की सेवा लागै॥” (अंग 266)
अर्थात यदि कोई व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पदार्थों की प्राप्ति चाहता है, तो उसे संत जनों की सेवा में अपने मन को जोड़ देना चाहिए। दुनिया की खुशियाँ तो सरलता से प्राप्त हो जाती हैं, वह तो संगत और सेवा के माध्यम से जोड़े (पादुकाओं) की सेवा भर से भी मिल जाती हैं।
डॉ. खोजी आगे कहते हैं- “जब इस स्थान पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी स्वयं हाजिर-नाजिर विराजमान हैं, तब यदि कुछ माँगना है तो वही माँगें जो गुरुवाणी हमें सिखाती है—
‘मंगणा त सचु इकु जिसु तुसि देवै आपि॥’ (अंग 321)
अर्थात, सच्चा माँगना केवल वही है जो परमात्मा स्वयं अपने अनुग्रह से प्रदान करें।” जब कोई मनुष्य गुरु के समक्ष नतमस्तक होकर अरदास करता है, तब अरदास का वास्तविक केंद्र यही होना चाहिए-
“मागना मागनु नीका हरि जसु गुर ते मागना॥” (अंग 1018)
भावार्थ यह कि परमात्मा की बंदगी का मागना ही मनुष्य-जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है। छोटे-छोटे दुख, कष्ट और क्लेश- ये तो सेवा और सच्ची अरदास से स्वयं ही दूर हो जाते हैं। कई लोग इन घटनाओं को करामात कहते हैं, परंतु डॉ. खोजी स्पष्ट करते हैं- “यह करामात नहीं, यह गुरु की बख्शीश है।”
स्थानीय बुज़ुर्गों ने बताया कि इस स्थान पर कितने ही लोग नतमस्तक होकर अपने दुखों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। कोई विद्वान चाहे कितनी ही पुस्तकें क्यों न लिख दे और अपनी तर्कशक्ति से कहे कि ऐसा होना संभव नहीं, पर जब मन में विश्वास और श्रद्धा आती है- तब क्या असंभव रह जाता है? निश्चित ही अंध-श्रद्धा अनुचित है, परंतु दृढ़ विश्वास मनुष्य का सबसे बड़ा सहारा है। जिस मनुष्य को गुरु साहिब पर भरोसा नहीं, वह कहीं भी चला जाए—उसका कल्याण संभव नहीं।
पार्श्व-गायन: (गंभीर, शांत, रूहानी स्वरों का उदय—मानो शब्द नहीं, स्वयं इतिहास उच्चारित हो रहा हो…)
इस प्रसंग में एक और सेवादार बताते हैं—“मुकरामपुर नगर धन्य–धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के चरण-कमलों से पवित्र हुआ नगर है। इस नगर में गुरु साहिब की और भी निशानियाँ हैं, अन्य गुरुद्वारे हैं, और कई शहीद सिंहों के स्मृति-स्थल भी मौजूद हैं। यहाँ एक पुरातन पट्टा साहिब भी सुशोभित है- हालाँकि वह गुरु साहिब का हस्तलिखित नहीं, बल्कि उस काल में गुरु साहिब के साथ चलने वाले सेवादारों द्वारा लिखा गया है।” उन्होंने यह भी बताया कि सिख मूवमेंट में इस नगर के बहुत लोग शामिल नहीं हुए थे, परंतु सरदार दर्शन सिंह जी- जो आज भी जीवित हैं, उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है; उन्होंने सेवा करते हुए जेल भी भुगती। इस नगर की अन्य विशेषता यह है कि यहाँ अधिकांश परिवार अमृतधारी हैं, नगर लगभग नशामुक्त है और सिख रीति-रिवाजों का पालन बड़ी शुद्धता से होता है।
सेवादार कहते हैं- “यदि कोई भी त्वचा रोगी यहाँ श्रद्धा और सम्मान के साथ सरोवर में स्नान करे और गुरु साहिब के चरणों में नतमस्तक हो, तो निश्चित ही उसे रोगों से मुक्ति मिलती है। हमें तो वैसे भी गुरु के ऐतिहासिक स्थानों पर नतमस्तक होने आना ही चाहिए।”
पार्श्व-गायन: .(गुरु-स्मृति से ओतप्रोत धीमी, पवित्र तान पृष्ठभूमि में बह रही है।)
डॉ. खोजी आगे इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय खोलते हैं—“स्थानीय बुज़ुर्गों ने बताया कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस स्थान पर पधारकर एक प्राचीन बेरी के वृक्ष के नीचे विराजमान हुए थे। संगत जी, बेरी का वृक्ष सामान्यतः अत्यंत दीर्घायु होता है। इसकी जड़ों से कई शाखाएँ पुनः उत्पन्न होकर नए वृक्षों का निर्माण करती हैं। जब हम इस स्थान पर आए, तो पाया कि वह पुरातन बेर का वृक्ष अपने वास्तविक स्थान पर मौजूद नहीं है।”
वह कहते हैं कि कई ऐतिहासिक स्थानों पर यह दुःखद स्थिति देखने में आई है कि जब नए भवनों का निर्माण किया जाता है, तब पुरानी स्मृतियों, वृक्षों और धरोहरों को समाप्त कर दिया जाता है। पश्चात, जब इतिहास धीरे-धीरे लोगों को अपनी अनुपस्थिति से व्यथित करता है, तब स्थानीय लोग ही पछताते हुए कहते हैं- “हमें क्या हो गया था? हम अपनी धरोहर को पहचान नहीं पाए।”
अब डॉ. खोजी इसी विषय पर स्थानीय बुज़ुर्ग सरदार जोरा सिंह से पूछते हैं- “इस स्थान पर जो बेर का वृक्ष था, क्या वह अपने आप समाप्त हो गया?” सरदार जोरा सिंह कहते हैं- “जी नहीं। वह प्राचीन वृक्ष सामने निशान साहिब के समीप ही खड़ा था। अत्यंत घना और छायादार। परंतु जब गुरुद्वारा साहिब का नया निर्माण प्रारंभ हुआ, तो दो राय बनीं- एक समूह चाहता था कि वृक्ष को न छेड़ा जाए, परंतु कमेटी ने निर्णय लेकर उसे उखाड़ दिया। कई संगत-जन इसके विरुद्ध थे, परंतु जिन्होंने यह भूल की- उन्हें उसके कड़वे परिणाम भी भुगतने पड़े।”
डॉ. खोजी पूछते हैं- “अच्छा जी?”
सरदार जोरा सिंह बताते हैं- “हाँ, कई लोग गंभीर बीमारियों से पीड़ित हुए, कुछ कैंसर जैसी बीमारी से भी। उन्होंने फिर अरदास की और गुरु-कृपा से वह वृक्ष पुनः प्रस्फुटित हुआ—अब गुरुद्वारा साहिब के पीछे की ओर हरा-भरा खड़ा है।”
डॉ. खोजी कहते हैं- “संगत जी, कई स्थानों पर ऐसा भी होता है कि वृक्ष की पूजा प्रारंभ हो जाती है और गुरु की महत्ता पीछे रह जाती है। ऐसे समय में संगत को समझने की आवश्यकता है परंतु अक्सर होता इसका उलट ही है।”
बेर के वृक्ष की पुनर्जन्मी स्मृति और गुरु-परंपरा की शाश्वत बख्शीश
मुकरामपुर के स्थानीय बुज़ुर्ग बताते हैं कि जब गुरुद्वारा साहिब के निर्माण के समय लोगों ने पुरातन बेर के वृक्ष को उखाड़ दिया, तब यह भूल केवल प्रकृति के विरुद्ध नहीं थी, बल्कि गुरु-परंपरा की जीवित स्मृतियों को नष्ट करने का दुःखद उदाहरण थी। समझाने के स्थान पर, हम लोगों ने इतिहास को संरक्षित करने की बजाय उसे काटने, फाड़ने और समाप्त करने में अधिक तत्परता दिखाई। भविष्य की पीढ़ियाँ जब पूछेंगी कि गुरु-स्मृतियों का वह वृक्ष कहाँ गया- तो हमारे पास कोई उत्तर नहीं बचेगा। परंतु गुरु साहिब की बख्शीश देखिए- उसी वृक्ष की जड़ों से पुनः एक नई शाखा उभर आई और गुरुद्वारा साहिब के पीछे आज घना, हरा-भरा बेर का वृक्ष खड़ा है, जिसकी ओर संगत श्रद्धा से निहाल होकर दृष्टि करती है।
पार्श्व-गायन: (कोमल, आध्यात्मिक धुन; जैसे प्रकृति स्वयं गुरु-स्मृति का पाठ पढ़ा रही हो।)
डॉ. खोजी कहते हैं—“संगत जी, इस स्थान पर आने वाले श्रद्धालु इस पुनर्जीवित वृक्ष के नीचे बैठकर गुरु साहिब को याद करते हैं। यह स्पष्ट है कि हमारे गुरु साहिब प्रकृति-प्रेमी थे। धन्य–धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने अनेक स्थानों पर अपने कर-कमलों से बूटे और पौधे रोपे, जिनमें से कई आज भी जीवित हैं। जब हम ऐसे ऐतिहासिक वृक्षों को स्वयं ही उखाड़ कर समाप्त कर देते हैं, तो क्या यह गुरु साहिब को दुख नहीं पहुँचाता होगा? क्या गुरु साहिब यह नहीं कहते होंगे कि- ‘तुमने मेरी जड़ों को, मेरे रोपे हुए वृक्षों को क्यों उखाड़ा?’”
कुछ लोग पूछते हैं कि क्या बेरी का वृक्ष सचमुच इतना लंबा जीवन जी सकता है? इसका उत्तर इतिहास स्वयं देता है और इसके लिए हम बढ़ते हैं बिहार के ऐतिहासिक नगर सासाराम की ओर।
पार्श्व-गायन: (गीत-मय श्रद्धा के साथ, स्थान के गौरव को उभारती हुई धुन।)
सासाराम में आज भी पुरातन बेर का वृक्ष खड़ा है, जिसके दर्शन कर मन गुरु-स्मृतियों से आप्लावित हो उठता है। डॉ. खोजी आगे बताते हैं- “जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी मालवे का दौरा करते हुए धमतान साहिब से इटावा पहुँचे और वहाँ से बनारस होते हुए सासाराम में चाचा फग्गू मल के घर पहुँचे, तब इतिहास की अखंड श्रृंखला धड़कते हुए स्वरूप में प्रकट होती है।”
संगत को बताते हुए वे कहते हैं- “उस समय गुरु साहिब ने चाचा फग्गू मल से उनके दसवंद (कीरत कमाई का दसवां हिस्सा) की मांग की। चाचा जी प्रेम से सब कुछ गुरु साहिब के चरणों में अर्पित कर देते हैं परंतु गुरु साहिब वचन करते हैं- ‘चाचा जी, आपने मुझसे एक वस्तु छुपा ली है।’ चाचा फग्गू मल हाथ जोड़कर कहते हैं- ‘महाराज, मैंने सब कुछ आपके सुपुर्द कर दिया है।’ तब गुरु साहिब कहते हैं- ‘नहीं, अभी एक भेंट वस्तु आपके पास है।’”
चाचा फग्गू मल ने विनम्रतापूर्वक कहा- “महाराज, मैं एक माई के घर भेंट लेने गया था। उसने कूड़ा-कचरा मेरी गोद में डाल दिया। मैंने उसे भी स्वीकार किया। जब मैंने उसे छाना, तो उसमें एक बेर का बीज मिला। वह बीज मेरे पास रह गया था।”
गुरु साहिब ने प्रेम से कहा- “चाचा जी, वही भेंट वस्तु हमें चाहिए।” और उन्होंने उस बेर के बीज को सासाराम में रोपित कर दिया। आज जो विशाल, सुदृढ़ और हरा-भरा बेर का वृक्ष वहाँ खड़ा है, वह उसी बीज की परिणति है- गुरु स्मृतियों का अविनाशी प्रतीक।
डॉ. खोजी कहते हैं- “यदि सासाराम में गुरु साहिब के कर-कमलों से रोपित बेर का वृक्ष आज भी शान से लहरा रहा है, तो क्या कारण है कि इस नगर मुकरामपुर में स्थित वह पुरातन वृक्ष नहीं लहरा सका? इसका उत्तर स्पष्ट है। कुछ लोगों की गलत सेवाओं ने उस वृक्ष को समाप्त किया। परंतु ऐसी गलतियों का परिणाम भी उन्हें भुगतना पड़ा- कई लोग गंभीर बीमारियों से पीड़ित हुए। परंतु गुरु कृपा देखिए- जैसे ही संगत ने सच्ची अरदास की, पुरानी जड़ों से नया वृक्ष उभर आया। यही गुरु की मेहर है कि उनकी स्मृतियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं।”
उन्होंने आगे गुरुवाणी का भाव प्रकट करते हुए कहा-
“बलिहारी कुदरति वसिआ॥ तेरा अंतु न जाई लखिआ॥੧॥ रहाउ॥” (अंग 469)।
अर्थात, मैं उस कुदरत (प्रकृति) पर बलिहार जाता हूँ जिसमें परमात्मा व्याप्त है; उसका अंत कोई नहीं पा सकता।
डॉ. खोजी संगत को संबोधित करते हुए कहते हैं- यदि पंजाब के गाँवों में घने वृक्ष लगते रहते, तो आज बाढ़ जैसी आपदाओं से होने वाला नुकसान इतना बड़ा न होता। हमें गुरु साहिब द्वारा रोपे गए वृक्षों को बचाने का प्रण लेना चाहिए। साथ ही नए वृक्ष रोपने चाहिए ताकि गुरु साहिब प्रसन्न हों और प्रकृति का संतुलन कायम रहे।”
अंत में वे मुकरामपुर की संगत, बुज़ुर्गों और गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का हृदय से धन्यवाद करते हैं। वे बताते हैं- “यह स्थान पटियाला और चंडीगढ़, दोनों के समीप है। जो भी संगत दर्शन करना चाहती है, वह निश्चिंत होकर यहाँ आए। इस स्थान पर लंगर की उत्तम व्यवस्था है, और करीब-करीब चौबीसों घंटे चलता है। कोई भी श्रद्धालु यहाँ भूखा नहीं लौटता। यहाँ की हवा, यहाँ का वातावरण और यहाँ झूलता निशान साहिब- सब बुला रहे हैं कि आओ, गुरु के दर से जुड़ो, और गुरु की बख्शीश को अपने जीवन में उतारो।”
इसरहील नगर – इतिहास, प्रकृति और गुरु-परंपरा के अविनाशी सूत्र
हम आज मुकरामपुर नगर / पिंड में उपस्थित हैं। इस स्थान पर दो गुरुद्वारा साहिब हैं- एक बाहरी ओर और दूसरा भीतर स्थित पुरातन गुरुद्वारा साहिब, जहाँ गुरु-परंपरा के चरणचिह्न अब भी इस धरा को पवित्र करते हैं।
पार्श्व-गायन: (गुरबाणी-रस से भरी हुई शांत, कोमल धुन वातावरण को नमन करवाती है।)
डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ बताते हैं कि अब हम मुकरामपुर से आगे बढ़कर सड़क पार करते हुए इसरहील नगर में पहुँच चुके हैं, जहाँ ऊँचे टीले पर गुरुद्वारा साहिब सुशोभित है। वे स्थानीय बापू जी से पूछते हैं—“इस स्थान का इतिहास क्या है? गुरु नानक देव साहिब जी, गुरु गोविंद साहिब जी, और धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस इलाके में पधारे थे। बाल्यकाल में बाल गोविंद राय जी भी यहाँ आए। साथ ही यह भी बताएँ कि बंदा सिंह बहादुर का इतिहास इस स्थल से किस प्रकार जुड़ता है?”
पार्श्व-गायन: (गुरु-स्मृति की दयालु, शांत लहरियाँ मन में उतरती हुई।)
स्थानीय बुज़ुर्ग बापू हरबंस सिंह लंबरदार बताते हैं—“मैं इस इसरहील गांव का निवासी हूँ। हमारे नगर में श्री गुरु नानक देव साहिब जी इस थेह/टीले पर सात दिनों तक विराजमान रहे थे। इस ऐतिहासिक तथ्य का उल्लेख मुकरामपुर साहिब में सुशोभित पट्टे में स्पष्ट रूप से मिलता है। यह वही प्रामाणिक प्रमाण है जो बताता है कि प्रथम पातशाह ने इस धरा पर सात पवित्र दिवस बिताए।”
वे आगे बताते हैं कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर केंद्र सरकार की ओर से उन सभी गुरु-स्थानों के पुनर्निर्माण हेतु निधि प्रदान की गई थी जो गुरु नानक पातशाह जी की यात्रा-स्थली रहे हैं। उसी समय इस टीले पर स्थित गुरुद्वारा साहिब का अत्यंत भव्य रूप में विकास किया गया।
इस स्थल पर खड़े करीर के वृक्ष के बारे में वे कहते हैं—“श्री शिवदयाल जी (डिप्टी कलेक्टर) ने जब इस वृक्ष के इतिहास का अध्ययन किया, तब ज्ञात हुआ कि यह वृक्ष उस 20 फीट ऊँचे टीले पर स्थित था। मेरी आयु 75 वर्ष है और मैंने स्वयं इस करीर के वृक्ष को 44 बीघा भूमि पर फैले हुए देखा है। परंतु एक समय ऐसा भी आया जब लोगों ने इस स्थान से मिट्टी उठानी प्रारंभ कर दी- कोई कार सेवा, कोई पुलिस, और कोई स्थानीय लोग। उस समय करीर के वृक्ष को अज्ञानतावश काटा जाता रहा। मैंने स्वयं देखा कि इसे 20 फीट तक नीचे खोदकर काट दिया गया, फिर भी यह वृक्ष हर बार हरा-भरा हो जाता था।”
बापू जी बताते हैं—“अब प्रशासन की ओर से स्पष्ट निर्देश हैं कि इस करीर के वृक्ष को हाथ नहीं लगाना है। यह वृक्ष श्री गुरु नानक देव साहिब जी के समय का है, इसलिए यह बार-बार हरा-भरा हो जाता है। अब इसके चारों ओर चबूतरा बनाकर इसे संरक्षित कर दिया गया है। 550वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में ही इसकी उचित सेवा-संभाल हुई। निरंतर अनुभव से हमें भी आभास हुआ कि यह वृक्ष किसी साधारण कारण से नहीं, बल्कि गुरु-समय की स्मृतियों के कारण पुनः जीवित होता है।”
बापू जी आगे बताते हैं—“जब स्थानीय पंचायत को फंड प्राप्त हुआ, तब यहाँ गुरु का बाग स्थापित किया गया, जिसका नाम ‘गुरु नानक बाग’ रखा गया है। टीले से मिट्टी उठाने के बाद इस पूरी भूमि को समतल कर मैदान का रूप दिया गया। बाबा हरबंस सिंह जी कार सेवा वालों ने गुरुद्वारा साहिब की भव्य इमारत को नीचे धरातल से 20 फीट उठाकर अत्यंत मजबूत और दिव्य रूप में निर्माण किया है। इस स्थान पर प्रत्येक महीने मस्या / अमावस्या का दिवस बड़ी श्रद्धा, प्रेम और सामूहिकता के साथ मनाया जाता है। आज भी अमावस्या का दिन है- गुरुद्वारा साहिब में कीर्तन की धुनें गूँज रही हैं और लंगर की पवित्र सेवा निरंतर चल रही है। इस दीवान का भोग 11:30 बजे होगा।”
डॉ. खोजी आगे कहते हैं- “अब हम यहाँ से आगे चलेंगे उन ग्राम- हसनपुर, कबूलपुर और नन्हेरी, जहाँ धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी पधारे थे। इन गांवों में आज भी उस मसंद का परिवार निवास करते हैं, जिनकी सेवा और भूमिका उस समय कुछ अलग थी। कल हम इन परिवार से भी भेंट करेंगे। हम उसी मार्ग पर चलेंगे जहाँ गुरु साहिब की निशानियाँ, हुकुमनामे और ऐतिहासिक संदर्भ आज भी विद्यमान हैं। इतिहास के इस अध्याय को यहीं विराम देते हैं परंतु यात्रा अब भी जारी है। अगले प्रसंग में आपसे पुनः भेंट होगी।”
अंत में, संगत को संबोधित करते हुए डॉ. खोजी विनम्रता से कहते हैं- इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण- इन सभी में अत्यधिक व्यय होता है। यदि आप इस ऐतिहासिक कथानक, शहीदी मार्ग यात्रा और आने वाले ऐतिहासिक प्रयासों को सहयोग देना चाहें, तो कृपया मोबाइल क्रमांक 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका छोटा-सा योगदान भी गुरु की महिमा और इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।”
पार्श्व-गायन: (गंभीर, श्रद्धामयी धुन; गुरु-चरित्र की गरिमा और इतिहास की गहराई को उजागर करती हुई।)
संगत जी- वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फ़तेह।
आपका अपना वीर इतिहासकार-
डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’