प्रसंग क्रमांक 16: नौवें पातशाह के पश्चात आज तक क्यों पछताता है यह नगर? (करहाली नगर का संपूर्ण इतिहास)

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प्रसंग क्रमांक 16: नौवें पातशाह के पश्चात आज तक क्यों पछताता है यह नगर? (करहाली नगर का संपूर्ण इतिहास)

(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)

आज हम इतिहास की उस पीड़ा से संवाद करेंगे, जो समय की परतों में दबी हुई है। आज चर्चा का केंद्र है- गुरुद्वारा करहाली साहिब और उससे जुड़ा वह नगर, जो आज भी अपने अतीत को याद कर मौन पश्चाताप करता प्रतीत होता है।

धन्य – धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का यह पावन सफ़र सैफाबाद से आरंभ होकर मोती बाग पहुँचा और मोती बाग से गुरु साहिब समाणा की ओर अग्रसर हुए। गुरुद्वारा गढ़ी नज़ीर वह ऐतिहासिक स्थल है, जहाँ गुरु साहिब ने रात्रि विश्राम किया था। इसके पश्चात लगभग अठारह किलोमीटर आगे, पटियाला की दिशा में चलते हुए, नहर के किनारे – किनारे हमें शहीदी मार्ग की यह यात्रा गुरुद्वारा करहाली साहिब की ओर ले जाती है।

वापसी मार्ग पर गढ़ी नज़ीर के मुख्य द्वार से आगे बढ़ते हुए हम बाबा बंदा सिंह बहादुर चौक पर पहुँचते हैं, यह चौक बंदा सिंह बहादुर की वीरता के महान प्रतीक की स्मृति में सुशोभित है। हरे – भरे खेतों, गाँवों और पगडंडियों से गुजरती यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक चेतना की यात्रा बन जाती है।

पटियाला शहर से करहाली साहिब की ओर जाते समय मार्ग में एक तख्ती दिखाई देती है, यह मोड़ ‘ननानसू चौक’ के नाम से जाना जाता है। आगे कई गाँव पार करते हुए, एक छोटे से सुआ (नहर से निकली शुद्ध पानी की नाली) को पार कर हम करहाली नगर में प्रवेश करते हैं। सामने ही गुरुद्वारा साहिब की दर्शनी ड्योढ़ी श्रद्धा और गरिमा के साथ विराजमान है। ड्योढ़ी को पार करते ही गुरुद्वारा साहिब साक्षात सामने प्रकट होता है।

आइए, सबसे पहले गुरुद्वारा करहाली साहिब के दर्शन करें, तत्पश्चात गुरु साहिब से जुड़े इतिहास की परतें आपके समक्ष क्रमशः खुलेंगी।
पार्श्व-गायन: समय की धूल हटाती-सी मार्मिक सुर-लहरी, दर्शक को इतिहास की गहराइयों में ले जाती है।

अब हम करहाली नगर के भीतर स्थित गुरुद्वारा चरण कमल साहिब की ओर बढ़ते हैं। जो दृश्य आपके सामने है, वह केवल एक भवन नहीं, बल्कि गुरु-चरणों की स्मृति से अनुप्राणित पवित्र धरती है। आप दर्शन करें गुरुद्वारा चरण कमल साहिब के।
पार्श्व-गायन: गुरु-स्मृति को जागृत करती कोमल, आध्यात्मिक धुन पृष्ठभूमि में प्रवाहित है।

जब इस स्थान के इतिहास की चर्चा होती है, तो हमें यहाँ के बुज़ुर्गों से संवाद का अवसर प्राप्त हुआ। एक स्थानीय बापूजी ने बताया कि दरबार साहिब के समीप, जहाँ आज कड़ाह प्रसाद का काउंटर बना हुआ है, वहाँ कभी एक विशाल बरगद (बोहड़) का वृक्ष हुआ करता था।

डॉ. खोजी ने प्रश्न किया—“हमने सुना है कि वह वृक्ष कटवा दिया गया, बापूजी, आपका क्या कहना है? वह कुआँ और बरगद किस स्थान पर था?”
बापूजी ने उत्तर दिया- “जहाँ आज ज्योत प्रज्वलित हो रही है और कड़ाह प्रसाद का काउंटर बना है, वही स्थान उस बरगद का था।”

डॉ. खोजी ने पुनः पूछा- “क्या वह वृक्ष अच्छी स्थिति में था?”
उत्तर मिला- “जी हाँ, वह वृक्ष पूर्णतः हरा – भरा और स्वस्थ था।”

“फिर उसे कटवाने का कारण?”
बापूजी ने पीड़ा के साथ बताया- “कार-सेवा वाले सेवादारों ने स्थान के वास्तु का हवाला देकर उसे कटवा दिया। उस समय महापुरुष संत गुरचरण सिंह जी स्वयं यहाँ विराजमान रहते थे।”

डॉ. खोजी ने उल्लेख किया- “इसी प्रकार गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब का बरगद भी कटवाया गया था।”
बापूजी ने आगे जोड़ा- “उन्होंने तो पुरातन कुआँ भी बंद करवा दिया। आज भी गुरुद्वारा छरहटा साहिब में छह रहट (हलटी) चल रही हैं। हमने उनसे विनती की थी कि इस कुएँ और रहट को न बंद करें।”

डॉ. खोजी ने पूछा- “अब सरोवर में जल कहाँ से आता है?”
उत्तर मिला- “अब बोरवेल और मोटर से। पहले नहर से एक सुआ द्वारा जल आता था। जब नहर का जल रुक जाता, तब रहट (हलटी) पर बैल या बछड़ा जोड़कर जल खींचा जाता था।”

एक अन्य बुज़ुर्ग ने कहा- “महाराज करम सिंह जी पटियाला वालों द्वारा निर्मित सभी गुरुद्वारों का मुख उनके राज्य की ओर ही रखा गया था।”

इसके पश्चात हमें 90 वर्षीय बुज़ुर्ग नंबरदार जी से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने अपने हृदय में संचित वेदना (वलवले) व्यक्त करते हुए बताया- “हम 1947 में जिला लायलपुर, तहसील समुद्री (पाकिस्तान) से यहाँ आए थे। तब से देखा कि संत गुरचरण सिंह जी के समय स्थानीय कमेटी ही सेवा – संभाल करती थी। जो भवन आज विशाल रूप में दिखता है, वह तब एक छोटे किले जैसा था, चार-पाँच कमरे, बीच में एक कक्ष में महाराज का स्वरूप विराजमान। सामने वाले कमरे के द्वार पर कुआँ था और पास ही बरगद। आगे एक छोटा सा सरोवर था, जो अब बहुत बड़ा हो गया है। सामने दो निशान साहिब सुशोभित हैं।”

वे भावुक होकर बोले- “आज भवन बड़ा हो गया है, पर उस समय सब कुछ छोटा था, फिर भी यह धरती इतनी पवित्र थी कि जो भी यहाँ दर्शन करके जाता, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती थीं। दूर – दूर से, पाँच सौ किलोमीटर तक से संगत यहाँ आती थी। यह अत्यंत पावन धरती है। आज परिस्थितियाँ बदल गई हैं, कार-सेवा वाले बाबा जी सेवा कर रहे हैं, पर इतिहास आज भी मौन प्रश्न पूछता है।”

स्थानीय सेवादारों की वाणी में वर्षों का अनुभव और हृदय में संचित पीड़ा स्पष्ट झलकती है। वे कहते हैं- हम इस दरबार साहिब को बचपन से देखते आए हैं। पहले यहाँ एक रहट (हलटी) हुआ करती थी, जिसे कभी बैल खींचते थे और कभी हाथों से चलाया जाता था। जल का यह प्रबंध केवल सुविधा नहीं, परंपरा और जीवंत इतिहास का प्रतीक था। परंतु कार सेवा के नाम पर वह सब समाप्त कर दिया गया।
पार्श्व-गायन: स्थान के गौरव को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतरती है।

एक अन्य सेवादार स्मृतियों की परतें खोलते हुए बताते हैं- यहाँ एक विशाल बरगद का वृक्ष था, एक रहट थी, सामने एक दरवाज़ा था और छोटी ईंटों से बनी दीवार खड़ी थी। वह सब ढहा दिया गया।
जब पूछा गया- किसने ढहाया?
उत्तर सीधा और पीड़ादायक था- कार-सेवा वालों ने।

डॉ. खोजी ने प्रश्न किया- क्या आपको इसका दुख नहीं हुआ?
सेवादार बोले- उस समय सरपंच हरि सिंह जी ने भी इसका विरोध किया था, परंतु उनकी आवाज़ भी अनसुनी रह गई।

डॉ. खोजी की वाणी में आक्रोश और करुणा एक साथ उमड़ पड़ती है- सन 1980 से पहले यहाँ वह बरगद का वृक्ष मौजूद था, जिसकी छाया में धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी विराजमान हुए थे। संभव है उस वृक्ष की आयु अत्यंत दीर्घ होती; पता नहीं वह भविष्य के कितने बसंत देखता। वह वृक्ष ही तो एकमात्र जीवित निशानी था; एक कुएँ की निशानी और एक वृक्ष की निशानी। दोनों को नष्ट कर दिया गया। आज सरोवर साहिब बना है, गुरुद्वारा साहिब की नई इमारत सुशोभित है, संगत दर्शन कर रही है परंतु हृदय में यह प्रश्न चुभता है कि उस समय की पवित्र निशानियों की सेवा – संभाल क्यों नहीं की गई?

पीछे गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब में जो बरगद का वृक्ष था, उसके नीचे यह दास (डाॅ. खोजी) वर्षों तक जाता रहा, उसे भी नष्ट कर दिया गया। आखिर इन वृक्षों से ऐसी क्या तकलीफ थी, जिन्हें काट दिया गया?

एक अन्य सेवादार भी इस इतिहास की पुष्टि करते हुए कहते हैं- कई बार हमें इस बात का गहरा अफसोस होता है कि पुरातन कुओं को बंद कर दिया गया। हम सब चाहते हैं कि उस पुरातन कुएँ को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि आने वाली संगत भी उसके दर्शन कर सके। उपस्थित सभी बुजुर्ग बार – बार इस इतिहास की पुष्टि करते हैं। एक बुजुर्ग बताते हैं कि पुरातन गुरु घर का मुख ननानसू गाँव की ओर था।

डॉ. खोजी संगत को संबोधित करते हुए कहते हैं- परंपरा की रीत मानिए। कुछ इतिहास लिखित रूप में मिलता है और कुछ इतिहास को धरातल पर खोजकर समझना पड़ता है। जब इन बुज़ुर्गों से संवाद हुआ, तो पीढ़ी – दर – पीढ़ी (सीना – बसीना) चले आ रहे मौखिक इतिहास से यह भी ज्ञात होता है कि संभवतः गुरु पिताजी के ऊपर यहाँ आक्रमण हुआ था और पत्थर भी मारे गए थे। इस तथ्य की पुष्टि उस समय के सरपंच ने भी की थी।

इसी क्रम में हमें सरदार गुरसेवक सिंह जी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने हमें गाँव की पुरानी गलियों में स्थित टूटे – फूटे घर दिखाए; ये सभी पुरातन घर छोटी ईंटों से बने हुए हैं। उनका अपना घर भी उसी पुरानी निर्माण शैली का साक्ष्य है। इसी स्थान पर एक पुरातन द्वारा जीर्ण – शीर्ण अवस्था में आज भी अपनी बेबसी बयां कर रहा है। इस द्वार को ‘शेर वाला गेट’ कहा जाता है। यह अब यहाँ शेष बचा एकमात्र पुरातन द्वार है; इसके साथ और भी कई द्वार थे, जो समय की भेंट चढ़ गए।

ऐसा ही एक शेरा वाला गेट पटियाला शहर में भी है। जब करहाली नगर के इतिहास की खोज की गई, तो स्थानीय निवासियों से यह जानकारी मिली कि इस नगर में कभी कुल छह द्वार थे। यदि एक मुख्य द्वार में दो दरवाज़े होते हैं, तो छह द्वारों का अर्थ बारह दरवाज़े हुए। सुरक्षा की दृष्टि से पूरे नगर के चारों ओर दीवार भी पटियाला के महाराजा करम सिंह जी द्वारा बनवाई गई थी। आज न वह दीवार शेष है, न वह किला, केवल यह एक द्वार बचा है।

यह नगर इसलिए भी विशेष है कि इसे एक नहीं, दो – दो गुरु साहिबानों ने अपने चरणों से पवित्र किया है। इस शेष बचे द्वार पर की गई मीनाकारी आज भी अपनी कला-भाषा में इतिहास कहती है। ऊपर की ओर बने दो शेर अब जीर्ण – शीर्ण अवस्था में दिखाई देते हैं। आने वाले समय में यह पुरातन घर भी समाप्त हो सकते हैं। जब इन घरों की बनावट देखी जाती है, तो उनमें अद्भुत साँझीवालता की झलक मिलती है; कहीं रोशनदानों में श्री कृष्ण की आकृति उकेरी हुई है, तो कहीं श्री गुरु नानक देव साहिब की। अब ये रोशनदान भी धीरे – धीरे लुप्त हो चुके हैं।

आज यह नगर विकास की राह पर है। इसी स्थान पर मेरे परम मित्र सरदार हरभजन सिंह जी की हवेली हुआ करती थी; अब उनका देहांत हो चुका है। इस नगर में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का भी आगमन हुआ था और उन्होंने यहाँ लगभग चालीस दिनों तक निवास किया था। सामने ही छठे पातशाह जी के स्थान के दर्शन हो रहे हैं; आइए, अब उस पावन स्थल की ओर बढ़ते हैं।

जो द्वार आज हम इस वीडियो में देख रहे हैं, संभव है भविष्य में उसका नाम भी शेष न रहे। यदि इसकी सेवा – संभाल की गई, तो यही द्वार इस नगर की जीवित विरासत बनकर रह सकेगा; अन्यथा यह भी इतिहास की धूल में खो जाएगा।

इसके पश्चात इस गुरुद्वारा साहिब के हेड ग्रंथी जी ने भी संपूर्ण इतिहास की पुष्टि करते हुए बताया कि यह गुरुद्वारा नगर से कुछ दूरी पर स्थित है। इस पावन स्थान पर श्री गुरु हर गोबिंद साहिब जी का आगमन हुआ था कारण उनके एक सेवक, भाई सुरमुख सिंह जी, कोढ़ के भयानक रोग से पीड़ित हो गए थे। रोग की अवस्था इतनी विकराल थी कि उनका संपूर्ण शरीर गल चुका था, बदबू आती थी, पीक और दूषित रक्त बहता रहता था। उनकी दशा इतनी दयनीय हो चुकी थी कि कोई भी उनके समीप आने को तैयार नहीं था।

लोगों ने उस दुखी, असहाय और रोग ग्रस्त मनुष्य को नगर से बाहर, इस निर्जन स्थान पर छोड़ दिया था। वहीं उन्होंने एक छोटी-सी झोपड़ी बनाकर जीवन बिताना प्रारंभ किया। कोई भोजन दे देता तो ठीक, अन्यथा वे उसी वेदना में गुरु साहिब का स्मरण करते, अरदासें करते रहते। अंततः उनकी अरदास स्वीकार हुई।

श्री अकाल तख्त, श्री अमृतसर से श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी महाराज स्वयं सौ घुड़सवारों के साथ इस स्थान पर पधारे। जब इतनी बड़ी संगत का आगमन हुआ, तो भाई सुरमुख सिंह जी मन में विचार करने लगे- “जहाँ मेरे पास चिड़िया तो क्या, पशु – पक्षी भी नहीं आते, वहाँ आज इतनी भीड़ कैसी?” वे रेंगते – रगड़ते हुए अपनी झोपड़ी से बाहर आए। तभी महाराज ने उन्हें नाम लेकर पुकारा- “भाई सुरमुख सिंह जी, जिन्हें तुम दिन – रात स्मरण करते हो, हम वही हैं।”

भाई सुरमुख सिंह जी ने कहा- “मैं तो गुरु साहिब के अतिरिक्त किसी और का स्मरण ही नहीं करता।” संगत ने उन्हें बताया- “भाई, छठे पातशाह स्वयं हाजिर हैं।” तब उन्होंने महाराज के चरणों में शीश रखकर अपनी व्यथा निवेदन की। महाराज ने करुणा से वचन किए- “उठो, सुरमुख प्रेमी जी, और इस छपड़ी (छोटे तालाब) में स्नान करो। तुम्हारा दुख दूर होगा। केवल तुम्हारा ही नहीं, भविष्य में न जाने कितनों का दुख इस स्थान पर दूर होगा। हम तो तुम्हारे कारण ही यहाँ आए हैं।”

जब भाई सुरमुख सिंह जी ने स्नान किया, तो वे पूर्णतः निरोगी हो गए। उनकी काया कंचन के समान दमक उठी। यह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की बख्शीश थी। इसके पश्चात महाराज ने वरदान दिया कि इस स्थान पर जो भी अठारह प्रकार के कच्चे कोढ़ और चर्म रोगों से पीड़ित व्यक्ति स्नान करेगा, उसकी काया निरोगी होकर कंचन समान हो जाएगी।

इसके बाद भाई सुरमुख सिंह जी महाराज को नगर में अपने निवास स्थान पर लेकर गए। कुछ दिन महाराज वहीं विराजमान रहे। आसपास की संगत ने दर्शन कर अनेक आत्मिक और सांसारिक लाभ प्राप्त किए।

कालांतर में, जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज अपना शीश अर्पण करने दिल्ली की ओर अग्रसर हुए, तो वे अपने गुरु-पिता श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के इस पावन स्थान पर आकर नतमस्तक हुए और कुछ समय यहाँ व्यतीत किया। यह वही शहीदी मार्ग है, जिस पर स्थित गुरुद्वारा करहाली साहिब आज भी विराजमान है। इस प्रकार यह स्थान एक नहीं, दो – दो गुरु साहिबानों के चरण – कमलों से पावन हुआ है; पातशाही छठी और पातशाही नौवीं।

हेड ग्रंथी साहिब जी भावुक होकर बताते हैं- “दास को महाराज साहिब ने इस स्थान पर सेवा बख्शी है। मैंने अपनी आँखों से अनेक चमत्कारिक घटनाएँ देखी हैं। जब मैं पाँचवीं – छठी कक्षा में पढ़ता था, तब मेरी दोनों बाहें कोढ़ रोग से ग्रसित हो गई थीं। एक रविवार मेरे माता – पिता मुझे यहाँ स्नान कराने लाए। किसी महापुरुष ने उन्हें इस स्थान की जानकारी दी थी। नियमित स्नान के पश्चात मेरे शरीर पर फिर कभी कोढ़ का कोई दाग नहीं उभरा। यह घटना स्वयं मेरे जीवन की है। उस समय मुझे यह ज्ञात नहीं था कि सच्चे बादशाह स्वयं मुझे आगे चलकर इसी स्थान की सेवा बख्शेंगे। इस ऋण को मैं इस जन्म में चुका ही नहीं सकता।”

वे आगे कहते हैं- “महाराज की कृपा आज भी उसी प्रकार चल रही है। पहले पंचमी को संगत आती थी, अब तो प्रत्येक रविवार को यहाँ जोड़ मेला लगता है। देश, विदेश की संगत यहाँ आकर लाहा लेती है। यह किसी विशेष रविवार की बात नहीं, यह गुरु साहिब का वचन है। चैनल के वीरों का बहुत – बहुत धन्यवाद, जो इस गुरु घर का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, जिससे विश्व भर की संगत यहाँ दर्शन कर रही है। दास रणजीत सिंह मलिन, इस स्थान पर हेड ग्रंथी के रूप में, महाराज द्वारा बख्शी गई सेवा निभा रहा है।”
पार्श्व-गायन: गुरु-स्मृति जागृत करती कोमल, आध्यात्मिक धुन पृष्ठभूमि में प्रवाहित है।

इतिहास की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए बताया गया कि जब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी इस स्थान पर आए, उस समय यहाँ नाथों का अत्यधिक प्रभाव था। नाथों ने संगत को डराया कि यदि वे गुरु साहिब की सेवा में उपस्थित होंगे, तो उन पर संकट आएगा। उनके बहकावे में आकर कुछ लोग गुरु के दर से दूर हो गए। आज स्थिति यह है कि नाथों के डेरे के नाम पर 90 – 92 किले भूमि होने के बावजूद न वहाँ कोई जीवंत धार्मिक गतिविधि है, न नगर के लिए कोई योगदान।

स्थानीय सेवादारों ने बताया कि आज नाथों के दर पर कोई नहीं जाता; न कोई पूछ – परख, न सेवाभाव। इसके विपरीत, गुरुद्वारा करहाली साहिब के बारे में जिसे भी ज्ञान होता है, वह यहाँ अवश्य नतमस्तक होता है। प्रत्येक रविवार लाखों संगत यहाँ आकर स्नान करती है और तन – मन के रोगों से मुक्ति पाती है।

ऐतिहासिक तथ्य यह भी बताते हैं कि जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस नगर में आए, तो नगर का मसंद सरकार के भय से गुरु साहिब से मिलने नहीं आया और लोगों को भी दूर रहने की हिदायत दी। गुरु साहिब ने यहाँ विश्राम किया और आगे की यात्रा पर चल पड़े। कहा जाता है कि उस समय नगरवासियों ने गुरु साहिब की ओर पीठ फेर ली।

स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि इसी कारण नगरवासी स्वयं को बदनसीब मानते हैं। बाद के समय में धन्य बाबा दया सिंह जी, बाबा विधि चंद की गद्दी के दसवीं मुखी महापुरुषों तथा बाबा सुखबीर सिंह जी ने इस भूल की क्षमा हेतु अरदासें करवाईं। आज भी अखंड पाठ साहिब निरंतर हो रहे हैं, ताकि यह भूल बख्शी जाए।

भाई अवतार सिंह जी (हेड ग्रंथी, राम नगर बक्शीवाला) ने भी पुष्टि की कि पिछले दो वर्षों से निरंतर अरदास की जा रही है। गुरबाणी का फ़रमान है—

जो सरणि आवै तिसु कंठि लावै इहु बिरदु सुआमी संदा|| (अंग क्रमांक 544)

अर्थात जो प्रभु की शरण में आता है, उसकी भूल बख्श दी जाती है।

आज यह स्थान विश्व भर में ख्याति प्राप्त कर रहा है। कहा जाता है कि जो पाँच रविवार या पंज पंचमी को यहाँ स्नान करता है, उसके चर्म-रोग निश्चय ही दूर होते हैं।

प्रचार-प्रसार की दृष्टि से भी यह नगर चढ़दी कला में है। यहाँ शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा संचालित श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी गर्ल्स कालेज कार्यरत है, जहाँ अनेक सिख बालिकाएँ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। डॉ. खोजी ने यहाँ विद्यार्थियों के साथ सेमिनार कर सिख इतिहास की जानकारी साझा की।

अपने व्याख्यान में उन्होंने बताया कि श्री गुरु नानक देव साहिब जी ने लंगर के लिए रूपए नहीं, बल्कि बीस बहलौली दिनार (रजन बन) व्यय किए थे, यह बहलौली दिनार रजत (चाँदी) और पीतल दोनों के होते थे।

कॉलेज के प्राध्यापकों ने डॉ. खोजी के शोध-कार्य की सराहना करते हुए विद्यार्थियों को उससे परिचित कराया और सम्मान व्यक्त किया।

डॉ. खोजी ने समापन करते हुए कहा- हम उन तथ्यों को आपके सामने लाते रहेंगे, जो पुस्तकों में नहीं मिलते। गुरुद्वारा करहाली साहिब से श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी आगे चिका नगर की ओर प्रस्थान करते हैं। वहाँ कौन सा मसंद था? क्या उसने गुरु साहिब का साथ दिया? इन प्रश्नों के उत्तर हम अगले प्रसंग में खोजेंगे।

इतिहास के पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं अगले प्रसंग में…

संगत जी से विनम्र निवेदन

इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ तथा विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सभी कार्यों में अत्यधिक व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक, इस शहीदी मार्ग प्रसंग तथा आगे आने वाले समस्त ऐतिहासिक प्रयासों में अपना सहयोग देना चाहें, तो कृपया मोबाइल क्रमांक 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।

वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।

आपका अपना वीर,
इतिहासकार — डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’


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