प्रसंग क्रमांक 15 : समाणा नगर में किस मुसलमान ने श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की सहायता की थी? समाणा नगर का संपूर्ण इतिहास
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
आज हम समाणा नगर के इतिहास से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे। स्क्रीन पर आप भी समाणा नगर के विहंगम दृश्य देख रहे हैं। हम इस नगर के पुरातन इतिहास को जानेंगे, धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का इस नगर में आगमन, तथा सिख इतिहास से जुड़े अनेक प्रश्न, जो समाणा नगर के नाम से अंकित हैं। समाणा नगर पटियाला से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। संतराम शिंगला मार्ग से होते हुए हम अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहे हैं। साथ – साथ हमारे भाखड़ा नहर बहती चली जा रही है। इस समय हम नहर के पुल पर खड़े हैं। यह नहर भाखड़ा नामक बांध से निकलती है। यही वह नहर है जो सरसा नदी को पार करती हुई, रोपड़ से होकर, सरहिंद के समीप से गुजरते हुए, पटियाला नगर के पास से बहती हुई आगे चलकर समाणा नगर को पार करती हुई आगे की ओर प्रवाहित होती है।
जब हम समाणा नगर में प्रवेश करते हैं, तो इस नहर को पार करने के पश्चात ही नगर में प्रवेश संभव होता है। इस नहर के समीप ही गुरुद्वारा गढ़ी नजीर साहिब भी स्थित है। उस समय इस नहर का अस्तित्व नहीं था। जैसे ही हम नहर पार कर समाणा की गलियों में प्रवेश करते हैं, आज भी नगर में पारंपरिक व्यवसाय करते हुए लोग दिखाई देते हैं; कहीं लोहार, तो कहीं पंचर जोड़ने वाले, इस प्रकार विभिन्न पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोग आज भी यहां दिखाई देते हैं। इस नगर के पीछे की ओर गुरुद्वारा साहिब सुशोभित है। आप समाणा नगर के गुरुद्वारे की दर्शन – ड्योढ़ी के दर्शन कर रहे हैं। इस ड्योढ़ी से होकर आगे बढ़ते ही सामने गुरुद्वारा साहिब की विलोभनीय इमारत के दर्शन हो रहे हैं। आइए, सबसे पहले हम गुरुद्वारा साहिब जी के दर्शन करते हैं।
पार्श्व गायन: गुरबाणी-भाव में रची हुई एक शांत, कोमल धुन मन को नतमस्तक कर देती है।
अब हम इतिहास की चर्चा करते हैं। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी गुरुद्वारा मोती बाग से चलकर इस नगर समाणा में पधारे थे। इस स्थान पर रब का एक सच्चा भगत, अल्लाह की बंदगी करने वाला इनायत अली खान, अपनी एक झोपड़ी में निवास करता था। यह वही इनायत अली खान थे, जो गढ़ी नजीर के मालिक मोहम्मद खान के साथ सैफाबाद जाकर पहले भी धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से मिल चुके थे। उस समय श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी सैफाबाद में चौमासा व्यतीत कर रहे थे। रब के इन बंदों की श्रद्धा, प्रेम और आस्था उन्हें स्वतः ही श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के सानिध्य तक खींच लाई थी।
जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इनायत अली खान की झोपड़ी के समीप आकर ठहरते हैं, उस समय समाणा नगर की बड़ी संख्या में संगत गुरु साहिब के समक्ष उपस्थित होकर नतमस्तक होती है। उस समय कुछ कट्टरवादी लोगों के मन में गुरु साहिब के प्रति कोई सद्भावना नहीं थी। जब गुरु साहिब के लिए लंगर (भोजन-प्रसाद) तैयार किया जाना था, तो इन कट्टरपंथी लोगों ने आसपास के कुएँ में गाय की हड्डियाँ और मांस फेंक दिया। यह घटना गुरु भक्त इनायत अली खान को भी अत्यंत पीड़ादायक लगी, क्योंकि वे जानते थे कि संत-महापुरुषों की महिमा क्या होती है।
सिख संगत के आग्रह पर उसी दिन धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के लिए एक छोटी-सी कुंई पुनः खुदवाई गई। उस कुंई से जल प्राप्त हुआ। उस समय जलस्तर आज के समान नीचे नहीं होता था; थोड़ी-सी खुदाई से ही जल उपलब्ध हो जाता था। उसी जल से लंगर तैयार किया गया, जिसका आनंद संगत ने प्राप्त किया।
जब गढ़ी नजीर के मालिक मोहम्मद खान को यह समाचार मिला कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी इस स्थान पर पधारे हैं, तो वे भी गुरु साहिब के दर्शन हेतु वहां पहुंचे।
रात्रि के समय दीवान सजाए गए। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने उपस्थित संगत को सत्य का संदेश प्रदान किया। जब मोहम्मद खान वापस अपनी गढ़ी नजीर लौटे, तो उन्हें औरंगजेब द्वारा भेजे गए कुछ सिपाही मिले। उन सिपाहियों ने एक परवाना दिखाते हुए कहा कि वे औरंगजेब की ओर से भेजे गए हैं और उन्हें धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी को गिरफ्तार कर दिल्ली ले जाना है। उन्हें ज्ञात हुआ था कि सिख धर्म के नौवें गुरु इस समय समाणा नगर में पधारे हुए हैं।
यह समाचार सुनते ही मोहम्मद खान ने उन सिपाहियों को भ्रमित कर दिया और कहा कि उन्हें इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। इसके पश्चात वे शीघ्रता से घोड़ा दौड़ाकर पुनः धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के पास पहुंचे। मोहम्मद खान ने गुरु साहिब जी से विनम्र निवेदन किया—हे गुरु पातशाह जी, आप मेरे साथ चलिए। मैं जैसा भी हूँ, आपकी सेवा करूंगा। इसके पश्चात मोहम्मद खान, धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को साथ लेकर अपनी गढ़ी नजीर की ओर प्रस्थान कर गया।
वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा कुंई साहिब जी सुशोभित है। संत बाबा बलबीर सिंह जी 96 करोड़ी की देखरेख में इस गुरुद्वारा साहिब की सेवा – संभाल विधिवत रूप से चल रही है। आप दर्शन कर रहे हैं, जब हम अपने हाथों को पवित्र कर गुरुद्वारा साहिब में प्रवेश करते हैं, सर्वप्रथम निशान साहिब के दर्शन करते हैं और तत्पश्चात श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के समक्ष शीश नतमस्तक करते हैं। सामने दरबार साहिब में एक ऊँचे थड़े पर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश किया गया है। उसी थड़े के दर्शन कीजिए, जिस थड़े पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी विराजमान हुए थे। आप गुरुद्वारा कुंई साहिब जी के दर्शन कर रहे हैं।
पार्श्व गायन: पृष्ठभूमि में गुरु-स्मृति को जागृत करती कोमल, आध्यात्मिक धुन प्रवाहित हो रही है।
यह वही कुंई (छोटा कुआँ) है, जिसे धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने उस समय खुदवाया था। ऊपर से खड़े होकर इस कुंई को देखा जा सकता है। दूसरी ओर से सीढ़ियों द्वारा नीचे उतरकर इस कुंई के पवित्र जल के दर्शन कर उसे ग्रहण भी किया जा सकता है।
पार्श्व गायन: स्थान की गरिमा को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।
इसके पश्चात हम गुरुद्वारा गढ़ी नजीर साहिब की ओर प्रस्थान करेंगे। किंतु उससे पूर्व, जब हम इतिहास का अध्ययन कर रहे थे, तो उसमें बड़ी मस्जिद के इतिहास का उल्लेख आता है। अतः हम सर्वप्रथम उसी बड़ी मस्जिद की ओर चलते हैं।
पार्श्व गायन: गुरमत-भावना से ओतप्रोत एक पावन संगीत, जो साँझीवालता के वातावरण को दिव्यता से भर रहा है।
ऐसा बताया जाता है कि इस स्थान पर एक अत्यंत पुरातन दरगाह भी स्थित है। जब हमारी टीम ने उस दरगाह के भीतर प्रवेश किया और प्रेम-भाव के साथ मौलाना साहिब से भेंट की, तो मौलाना साहिब ने भी अत्यंत स्नेहपूर्वक हमारा स्वागत किया और इस स्थान का इतिहास हिंदी एवं उर्दू भाषा में बताया। आइए, इस स्थान का इतिहास मौलाना साहिब की वाणी से जानते हैं—
मौलाना साहिब: “जिस स्थान पर आप खड़े हैं, यह सादात-ए-कराम का क़ब्रिस्तान है, जो एक अत्यंत प्राचीन क़ब्रिस्तान है। इस चिराग़ से जितनी भी औलादें हुईं, वे सभी यहीं दफन हैं। सन 967 हिजरी में, जब बादशाह अकबर का इस स्थान से गुजर हुआ, तब उन्होंने सैयदज़ादा की क़ब्र को मुनस्सम करवाया। जब उन्होंने देखा कि सैयदज़ादा की क़ब्र जर्जर अवस्था में है, तो उन्होंने उसका संरक्षण करवाया। यह जो आप देख रहे हैं, यही उनकी क़ब्र-ए-मुबारक है, और इसके समीप ही उनके वालिदैन की क़ब्र-ए-मुबारक स्थित है। उस समय अकबर बादशाह ने सैयदज़ादा की क़ब्र के सिरहाने एक पत्थर लगवाया था, जो आज भी दीवार में अलामती तौर पर लगा हुआ है।”
डॉ. खोजी: “क्या हम उस पत्थर को देख सकते हैं?”
मौलाना साहिब: “जी हाँ, वह पत्थर आज भी दीवार पर मौजूद है। यह वही पत्थर है, जिसे अकबर बादशाह ने लगवाया था। रोज़ा – ए – इमाम, मसद अली बिन हज़रत अली, निसा – ए – हज़र, रमज़ान – ए – मुबारक के महीने में, सन 967 हिजरी (1559–1560 ई.) में इसकी तामीर की गई थी। इस पत्थर पर लिखा हुआ पाठ इस प्रकार है—”
उर्दू (अनुमानित पाठ):
سنہ ۹۶۷ ہجری میں یہ مقام تعمیر ہوا
یہاں اہلِ ایمان نے عبادت کی
اور اس جگہ کو متبرک سمجھا گیا۔
हिंदी (शब्दशः अनुमानित रूपांतरण):
सन 967 हिजरी में यह स्थान निर्मित हुआ।
यहाँ ईमान वालों ने इबादत की।
और इस स्थान को पवित्र माना गया।
मौलाना साहिब: जिस स्थान पर आप इस समय खड़े हैं, इसे इमामगढ़ कहा जाता है। आज भी जब हम काग़ज़ात देखते हैं, तो इसे इमामगढ़ के नाम से ही दर्ज किया गया है।
डॉ. खोजी: इस स्थान को पाँच पीर क्यों कहा जाता है?
मौलाना साहिब: यह स्थान पंच पीर के नाम से ही प्रसिद्ध हुआ है।
डॉ. खोजी: जब बंदा सिंह बहादुर ने समाणा को फ़तह किया था, तब उन्होंने इस क़ब्र की ओर कभी भी बुरी नीयत से दृष्टि नहीं डाली थी।
मौलाना साहिब: नहीं… नहीं… नहीं।
डॉ. खोजी: इसी मोहब्बत, इसी प्रेम और इसी आपसी सम्मान को देखने के लिए हम आज पंच पीर की दरगाह पर पहुँचे हैं। इस दरगाह पर हमने यहाँ के मौलाना साहिब से भेंट की। उन्होंने भी हमें वही प्रेम, वही अपनापन और वही मोहब्बत प्रदान की और अत्यंत प्रसन्न होकर कहा कि उनके हृदय में आज भी प्रेम और सद्भावना जीवित है। संगत जी, हम यह कहना चाहते हैं कि आज मजहब के नाम पर जो लड़ाइयाँ करवाई जा रही हैं, यह फसाद करवाने वाले वह लोग हैं, जिन्होंने कभी मजहब को निकट से देखा ही नहीं। जब हम मौलाना साहिब से मिले तो…
डॉ. खोजी: मौलाना साहिब, आपसे मिलकर अत्यंत प्रसन्नता हुई।
मौलाना साहिब: मोहब्बतें… अल्लाह आपको सलामत रखे, हमेशा खुश रखे, आबाद रखे। वह इंसान ही क्या है, जिसमें इंसानियत शेष न हो। जब आप मुझसे मिले और मैं आपसे मिला, तो वास्तव में यह एक बेहतरीन मुलाक़ात रही। इंसान के लिए सबसे सुंदर बात यही है कि जब वह किसी से मिले, तो उसके दिल में घर बना ले। ऐसा न हो कि जब हम बिछड़ें, तो एक दूसरे का चेहरा देखना भी अच्छा न लगे। निश्चित रूप से मोहब्बत और कुर्बानी इसी का नाम है कि हम इस तरह मिलें कि हमेशा एक दूसरे के दिलों में बस जाएँ। हम एक दूसरे की हमेशा अच्छी बातों और अच्छी आदतों से याद करें।
वाकई आपसे मिलकर मुझे बहुत खुशी हुई है। आप इमामज़ादे के रोज़ा – ए – मुबारक की ज़ियारत, सलामी और हाज़िरी के लिए तशरीफ़ लाए, ख़ुदा आपको सलामत रखे, खुश रखे। आप मुझे अपनी दुआओं में याद रखें और मैं आपको अपनी दुआओं में याद रखूँ।
डॉ. खोजी: बिल्कुल… बिल्कुल।
तो संगत जी, चढ़दी कला टाइम टीवी पर आप जो कार्यक्रम देख रहे हैं, धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का सफ़र-ए-शहादत, हम अब उसी शहीदी मार्ग की ओर आगे बढ़ेंगे, जिस मार्ग से होकर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने अपनी महान शहादत की ओर प्रस्थान किया था।
पार्श्व गायन: धीमे, आध्यात्मिक स्वरों की लय मानो इतिहास की परतों को धीरे – धीरे खोलती चली जा रही है।
डॉ. खोजी: संगत जी, आप धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से संबंधित समाणा नगर का इतिहास देख और सुन रहे हैं। इसके अंतर्गत हमने गुरुद्वारा थड़ा साहिब जी के इतिहास को जाना। अब हम गुरुद्वारा थड़ा साहिब से आगे बढ़ते हुए, समाणा नगर के मध्य भाग से होकर एक चौक पर पहुँचते हैं, जिसे बंदा सिंह बहादुर चौक के नाम से जाना जाता है। इस चौक के इतिहास से भी हम आपको अवगत कराएँगे कि- बंदा सिंह बहादुर का इस समाणा नगर से कितना गहरा और महत्वपूर्ण संबंध रहा है, यह हम आगे जानेंगे।
जब हम आगे की ओर बढ़ते हैं, तो नहर पार करते ही एक अत्यंत सुंदर और विलोभनीय गुरुद्वारा साहिब के दर्शन होते हैं। यह गुरुद्वारा साहिब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की स्मृति में सुशोभित है।
जब हम नहर के किनारे – किनारे चलते हैं, तो देखते हैं कि संगत इस स्थान पर आकर अपने दिवंगत परिजनों के अस्थि रूपी फूलों का विसर्जन कर रही है। इसका इतिहास क्या है? आइए, इसे स्थानीय बाबा जी से जानते हैं…
बाबा जी: वाहिगुरु जी। जब से इस स्थान पर कार सेवा संप्रदाय के बाबा जी पधारे हैं, तब से गुरु साहिब जी की कृपा से यहाँ चौबीस घंटे निरंतर गुरु का लंगर चलता है। मुसाफ़िरों के लिए रात्रि-विश्राम की भी उत्तम व्यवस्था है।
इसके अतिरिक्त, संत बाबा गुरमेल सिंह जी फुल, (जिनका उपनाम फुल था) जब उनका देहांत हुआ, तो उनके फूल इसी पास की नहर में प्रवाहित किए गए थे। इस नहर को भाखड़ा नहर कहा जाता है। उसी समय से यहाँ फूल प्रवाह की परंपरा चली आ रही है। आज भी हरियाणा और पंजाब के दूर – दराज़ क्षेत्रों से लोग अपने सगे – संबंधियों के अस्थि-फूल प्रवाहित करने के लिए यहाँ आते हैं, जिससे इस क्षेत्र के लोगों को भी लाभ प्राप्त होता है। देखिए जी, इस स्थान पर अनगिनत संगत फूल लेकर आती है और जल-प्रवाह करती है। जो गरीब लोग दूर नहीं जा सकते, उनके लिए यह स्थान एक बड़ा सहारा है। महाराज जी की वाणी का भी यही फ़रमान है—
पिंडु पतलि किरिआ दीवा फुल हरि सरि पावए ॥ (अंग क्रमांक 923)
अर्थात, मेरी अस्थियाँ हरिसर में डाल देना। पिंड – पातल, क्रिया-कर्म और दीया – बाती प्रभु के गुणगान में ही सफल होते हैं।
आने वाले मुसाफ़िर यहाँ रात्रि विश्राम भी करते हैं। अमावस्या के दिन विशेष आयोजन होता है। बैसाखी पर्व तथा संत, महापुरुषों की बरसी भी प्रत्येक वर्ष 24 जनवरी को मनाई जाती है। इस क्षेत्र की संगत को इस स्थान से अत्यंत सुख और संतोष प्राप्त होता है।
इस स्थान के निर्माण और विकास में महापुरुषों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इन महापुरुषों ने यहाँ से बहने वाली घग्गर दरिया पर कई पुलों का निर्माण करवाकर भी महान सेवा की है, जिससे जन-सामान्य को बहुत लाभ पहुँचा है।
डॉ. खोजी: इसके साथ – साथ हम गुरुद्वारा साहिब की दीवार के सहारे चलते हुए दर्शनी ड्योढ़ी के दर्शन कर रहे हैं और आगे गुरुद्वारा साहिब की निर्माणाधीन इमारत के भी दर्शन हो रहे हैं।
यह है गुरुद्वारा गढ़ी नज़ीर साहिब जी, दर्शन करो जी, गुरुद्वारा गढ़ी नज़ीर साहिब जी के…
पार्श्व गायन: स्थान के गौरव को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।
संगत जी, इस स्थान का इतिहास यह बताता है कि मोहम्मद खान धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का अत्यंत प्रेमी और श्रद्धालु सेवक था। जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी सैफुद्दीन के पास आकर रुके थे, उस समय रब्ब के इन प्रिय बंदों के मध्य एक गहरा प्रेम और आत्मिक संबंध स्थापित हुआ था। यह भी इतिहास में अंकित है कि जब मालवा रटन (देशाटन) कर गुरु साहिब जी पुनः लौटे थे, तब भी मोहम्मद खान ने गुरु साहिब जी की संगत की थी।
जब मोहम्मद खान को यह ज्ञात हुआ कि धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी समाणा नगर में इनायत अली के पास पधारे हुए हैं, तो वह भी इस स्थान पर आकर गुरु साहिब जी के दर्शन करता है। जब वह वहाँ से लौटता है, तो कुछ सिपाही उसे बताते हैं कि वे औरंगजेब की ओर से भेजे गए हैं और श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी जहाँ भी हों, उनकी सूचना देना उसका कर्तव्य है।
जब मोहम्मद खान को यह ज्ञात होता है कि इन सैनिकों को धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को गिरफ्तार करने के लिए भेजा गया है, तो वह उन्हें भ्रमित कर तुरंत धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी के पास पहुँचता है और निवेदन करता है—
हे सच्चे बादशाह जी, आप मेरी गढ़ी में चलें।
धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने वचन किया—
हम तो आज की रात इन फकीरों के साथ ही व्यतीत करेंगे।
उस समय मोहम्मद खान ने पुनः निवेदन किया—
पातशाह जी, औरंगजेब के भेजे हुए सिपाही आपको गिरफ्तार करने आ रहे हैं।
इस पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने वचन किया—
फिर क्या हुआ? मैं तो स्वयं ही शीश अर्पण करने के लिए दिल्ली जा रहा हूँ।
तब गढ़ी नज़ीर के मालिक मोहम्मद खान ने अत्यंत व्याकुल होकर कहा—
पातशाह जी, कल लोग क्या कहेंगे? कहीं ऐसा न कहा जाए कि एक अल्लाह के नेक बंदे ने ही धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को औरंगजेब के सिपाहियों से गिरफ्तार करवा दिया। मैं यह नहीं चाहता कि यह इल्ज़ाम मुझ पर लगे। आप कृपा करें और मेरी गढ़ी में दर्शन दें।
उस समय धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी ने वचन किया—
यदि औरंगजेब को यह ज्ञात हो गया कि मोहम्मद खान ने मुझे उसके सिपाहियों से बचाया है, तो तुम्हें दंड मिलेगा।
इस पर मोहम्मद खान ने उत्तर दिया—
पातशाह जी, आपसे इतनी मोहब्बत है कि इसके लिए मुझे कोई भी सज़ा स्वीकार है। पर मैं यह नहीं चाहता कि मेरे रहते हुए, मेरे नगर में कोई आपको गिरफ्तार कर औरंगजेब के पास ले जाए।
यही थी वह मोहब्बत, यही था वह प्रेम। रब्ब के बंदे कभी जात-पात, धर्म या भेदभाव नहीं देखते। जो उस मालिक से जुड़े होते हैं, उनकी मोहब्बत को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता।
आज जिस स्थान पर गुरुद्वारा गढ़ी नज़ीर साहिब जी स्थित है, उसी स्थान पर गुरु साहिब जी ने विश्राम किया था। कुछ समय पश्चात महाराजा रणजीत सिंह जी की ओर से यहाँ एक छोटा सा गुरु घर बनवाया गया। इसके बाद इस स्थान की सेवा – संभाल हमारे बुजुर्गों द्वारा की जाती रही। उन बुजुर्गों के परिवार के एक सदस्य से हमारी भेंट हुई, जिन्होंने बताया कि इस स्थान पर एक पुरातन कुआँ भी हुआ करता था। महाराजा रणजीत सिंह जी द्वारा निर्मित वह छोटा गुरु घर समय के अनुसार विस्तारित किया गया।
जब हम समाणा नगर के इतिहास की बात करते हैं, तो यह बताया जाता है कि यह नगर एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना है। प्रारंभ में इस नगर का नाम निरंजन खेड़ था। ईरान से आए ईरानी लोग यहाँ बसते थे। उस समय समाणा में एक कबीला रहता था, जिसकी बेगम समाणा के नाम पर इस नगर का नाम समाणा पड़ा। एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि यह नगर बठिंडा के पट्टी राजा के अधीन आता था।
इस नगर में अमीर खुसरो जैसे विद्वान अध्ययन के लिए आए थे। सरहिंद के अधीन समाणा नगर और इसके आसपास के लगभग दो सौ गाँवों की संपत्ति से प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का कर सरहिंद और फिर दिल्ली तक पहुँचता था। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 22 नवाबों की पालकियाँ समाणा नगर से होकर गुजरती थीं। इसी कारण इस नगर को नवाबों का नगर भी कहा जाता था। बताया जाता है कि समाणा के नवाबों की रिश्तेदारियाँ हैदराबाद और लखनऊ के नवाबों से अत्यंत घनिष्ठ थीं। एक-दूसरे की बहन-बेटियों के आपस में निकाह होते थे। इस नगर से जुड़ा एक और ऐतिहासिक सत्य यह है कि जब धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को दिल्ली के चाँदनी चौक में शहीद किया गया, तब सैयद जलालुद्दीन नामक जल्लाद इसी नगर का निवासी था।
इसी प्रकार, जब धन्य श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो ज्ञात होता है कि छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद की दीवारों में चुनवा कर शहीद करने वाले जल्लाद, शाशल बेग और बाशल बेग भी इसी नगर के निवासी थे। इस प्रकार समाणा नगर अपने ऊपर एक गहरा कलंक धारण कर चुका था।
जब इस तथ्य की जानकारी बंदा सिंह बहादुर को हुई कि यही वह नगर है, जहाँ के जल्लादों ने छोटे साहिबजादों को शहीद किया और जहाँ के नवाबों ने इस पर उपहास किया, तब बंदा सिंह बहादुर ने पंजाब में आते समय नवंबर 1709 ईस्वी में इस संपूर्ण नगर को नष्ट कर दिया। इस नगर की बड़ी – बड़ी हवेलियाँ, जिनसे 22 नवाब पालकियों में सवार होकर निकलते थे, सब ध्वस्त कर दी गईं। समाणा नगर की ईंट से ईंट बजा दी गई।
परंतु उस समय पंच पीर की दरगाह की मस्जिद की ओर उन्होंने आँख उठाकर भी नहीं देखा। जिन लोगों ने सिख धर्म के मार्ग में काँटे बिछाए, उन्हें दंड अवश्य मिला। इस प्रकार समाणा नगर बंदा सिंह बहादुर द्वारा पूर्णतः नष्ट कर दिया गया।
आज जब हम समाणा नगर की गलियों में घूमते हैं, तो ज्ञात होता है कि पुरातन इमारतें समाप्त हो चुकी हैं। जहाँ कभी भव्य महल और विशाल हवेलियाँ थीं, आज वहाँ उनका कोई नामोनिशान शेष नहीं है। परंतु संगत जी, धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी से प्रेम करने वाले इनायत अली की झोपड़ी के स्थान पर आज गुरुद्वारा थड़ा साहिब जी सुशोभित है। इसी स्थान पर हमने गुरुद्वारा खुईं (कुंई) साहिब जी के भी दर्शन किए।
दूसरी ओर, जहाँ कभी मोहम्मद खान की गढ़ी हुआ करती थी, वह समय के साथ समाप्त हो गई। उस स्थान पर पहले महाराजा रणजीत सिंह जी द्वारा एक छोटा गुरुद्वारा साहिब बनवाया गया था। आज आप उसी स्थान पर गुरुद्वारा गढ़ी नज़ीर साहिब जी के दर्शन कर रहे हैं।
स्थानीय सेवादार: भाई साहिब जी, जब पाकिस्तान से हमारे बुजुर्ग यहाँ आए, तो हमारे दादा जी हरबंस सिंह जी और ताया जी सरदार दिलीप सिंह जी ने बताया कि प्रारंभ में महाराजा रणजीत सिंह जी ने इस स्थान पर एक छोटा सा गुरुद्वारा बनवाया था। जब हमारे दादा जी हरबंस सिंह जी स्थानीय संगत के सहयोग से इस स्थान की सेवा – संभाल करते थे, तब यहाँ एक छोटा सा कुआँ भी था, जिससे रहट के माध्यम से पानी निकाला जाता था। जब उस कुएँ का जलस्तर नीचे चला गया, तो धीरे – धीरे वह कुआँ बंद हो गया।
इसके पश्चात क्षेत्र की संगत ने मिलकर कार-सेवा वाले संतों से निवेदन किया। लगभग 1970-72 ईस्वी के समय संत बाबा जीवन सिंह जी महाराज यहाँ आए और उन्होंने कार-सेवा आरंभ की। उनके पश्चात बाबा बख्शीश सिंह जी और बाबा गुरमेल सिंह जी फुल द्वारा सेवाएँ निभाई गईं। क्षेत्र की संगत के सहयोग से यहाँ बारह गाँवों की मसिया (अमावस्या) का आयोजन होता रहा और नए दरबार साहिब का निर्माण किया गया।
सन 1998 ईस्वी में बाबा जी का देहांत हो गया। इसके पश्चात संत बाबा बलबीर सिंह जी मुखी बने। बाबा हरबंस सिंह जी (दिल्ली वाले) के अधीन यह कार-सेवा चलती रही। वर्तमान समय में जत्थेदार बलबीर सिंह जी इस नई इमारत की कार – सेवा पुनः आरंभ करवा रहे हैं। क्षेत्र की संगत पूर्ण सहयोग प्रदान कर रही है। इस स्थान की कमेटी स्थानीय सेवादारों की है और किसी बाहरी संस्था का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं है।
आज से लगभग तीन वर्ष पूर्व जब दास (डॉ. खोजी) इस स्थान पर आए थे, तब भी कार सेवा चल रही थी। उस समय श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश यहीं होता था। सेवा के कारण अब श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश अन्य स्थान पर किया गया है। कुछ बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि पुरातन स्थान को उसी स्वरूप में संरक्षित रखा जाना चाहिए था।
संगत जी, यही था समाणा नगर का संपूर्ण इतिहास। धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शहीदी मार्ग, हम उन्हीं मार्गों पर आगे बढ़ेंगे, जिन पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी चले थे।
आइए, अब हम चलते हैं करहाली साहिब जी की ओर। क्या इतिहास है गुरुद्वारा करहाली साहिब जी का? उस नगर की पुरातन इमारतों के दर्शन करेंगे, जो समय के साथ समाप्त होती जा रही हैं।
चलते हैं जी…
पार्श्व गायन: धीमे, आध्यात्मिक स्वरों की लय मानो इतिहास की परतों को एक-एक कर खोलती चली जा रही है।
इतिहास के प्रश्नों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं अगले प्रसंग में…
संगत जी से विनम्र निवेदन
इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ तथा विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सभी कार्यों में अत्यधिक व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक, इस शहीदी मार्ग प्रसंग तथा आगे आने वाले समस्त ऐतिहासिक प्रयासों में अपना सहयोग देना चाहें, तो कृपया मोबाइल क्रमांक 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होगा।
वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
आपका अपना वीर,
इतिहासकार — डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’