प्रसंग क्रमांक 13: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी से संबंधित, गुरुद्वारा मोती बाग साहिब, पटियाला
(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)
संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
संगत जी, अब हम आ चुके हैं ऐतिहासिक नगरी पटियाला में। यह नगर दिल्ली से लगभग 250 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। चंडीगढ़ एयरपोर्ट यहाँ से लगभग 60 से 65 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है। पटियाला शहर में स्थित गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी से रेल्वे स्टेशन की दूरी लगभग 1 किलोमीटर है, जबकि वहाँ से गुरुद्वारा मोती बाग साहिब जी लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी, जब सैफाबाद से प्रस्थान कर इस स्थान, मोती बाग में स्थित इस प्रसिद्ध बाग में पहुँचे, तो यहाँ कुछ समय के लिए ठहरे थे।
पार्श्व-गायन: समय की धूल को हटाती हुई मार्मिक सुर-लहरियाँ, दर्शक को इतिहास की गहराइयों में ले जाती हैं।
नवाब सैफुद्दीन के इस विशाल बाग में उस समय दो गाँव स्थित थे- ग्राम कायमपुर और गाँव बिलासपुर। इन दोनों गाँवों के मध्य स्थित इस स्थान की एक ऊँची जगह (थड़ा) पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने विराजमान होकर विश्राम किया था।
इतिहास में यह उल्लेख मिलता है कि इस स्थान की पहचान महाराजा कर्म सिंह जी, पटियाला को उनके बुज़ुर्गों से प्राप्त जानकारी के आधार पर हुई। बताया जाता है कि जब धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी, भाई मतिदास जी, भाई सती दास जी, भाई दयाला जी, भाई उदय जी, भाई गुरदित्ता जी तथा अन्य सिखों के साथ सैफाबाद में चार महीने का वर्षा-कालीन चौमासा व्यतीत करने के पश्चात वहाँ से चले, तो वे अपने सिखों सहित इस स्थान पर आकर ठहरे थे।
जब इस पवित्र स्थान का स्पष्ट ज्ञान महाराजा कर्म सिंह जी पटियाला को हुआ, तो उन्होंने उस स्थान की सटीक पहचान सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष विधि अपनाई। भाले गाड़े गए, उनके नुकीले सिरे पर लोहे के बने गड़वे (लोटे) रखे गए और सैनिकों द्वारा चारों ओर से तीरों द्वारा निशाना साधा गया। अन्य सभी गड़वों पर तीर सटीक रूप से लगे, परंतु जिस स्थान पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी विराजमान हुए थे, वहाँ रखे गए गड़वे पर किसी भी दिशा से लगाया गया निशाना नहीं लगा। इस प्रकार उस स्थान की पुष्टि हुई। यही वह पावन स्थान है, जहाँ वर्तमान समय में मुख्य दरबार साहिब में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश होता है।
उस कालखंड में महाराजा कर्म सिंह जी पटियाला की ओर से इस स्थान पर एक भव्य निशान साहिब स्थापित किया गया था। उस समय की तकनीक आज भी आश्चर्यचकित करती है। इस निशान साहिब को अत्यंत मज़बूत लोहे की सांखलों द्वारा चारों ओर से खंभों में कसकर बाँधा गया है। इन खंभों में ऐसी विशेष व्यवस्था की गई है कि मौसम के अनुसार इन सांखलों को ढीला या कसा जा सकता है। चाहे कितनी ही वर्षा हो, आँधी-तूफान आएँ, इस निशान साहिब को कोई क्षति नहीं पहुँच सकती। अनगिनत आँधी-तूफानों को सहते हुए भी यह निशान साहिब आज तक पूरी शान और गरिमा के साथ लहराता चला आ रहा है।
यहाँ एक पीड़ादायक तथ्य का उल्लेख करना भी आवश्यक है। पिछले प्रसंग में हमने गुरुद्वारा बहादुरगढ़ साहिब के दर्शन किए थे, जहाँ इसी प्रकार का एक पुरातन निशान साहिब सुशोभित था। दुर्भाग्यवश, हमें यह ज्ञात नहीं कि उस समय वहाँ सेवा कर रहे लोगों के मन में क्या विचार आया कि उस ऐतिहासिक निशान साहिब को समाप्त कर दिया गया। पटियाला के मोती बाग साहिब में स्थित यह निशान साहिब महाराजा के महल की परिसीमा में, उनकी संपत्ति के अंतर्गत होने के कारण सुरक्षित रह गया। यदि उस समय यह स्थान भी कार-सेवा करने वाले बाबाओं के अधीन होता, तो संभव है कि इस अद्वितीय ऐतिहासिक धरोहर का नामोनिशान भी आज देखने को न मिलता।
उस युग का जो पुरातन बगीचा यहाँ निर्मित था, उसी के भीतर से हम अभी आगे बढ़ रहे हैं। इन प्राचीन रास्तों के मध्य से, बगीचे के भीतर होकर संगत का आवागमन हुआ करता था। यह बगीचा अत्यंत सुंदर और सुसज्जित था। आज भी यहाँ लगे जल-फव्वारे इसकी शान और भव्यता में चार चाँद लगाते हैं।
अब सामने गुरुद्वारा साहिब जी के अत्यंत मनोहारी दर्शन हो रहे हैं। जब हम गुरुद्वारा साहिब की ओर माथा टेककर, ऊपर की ओर चढ़ते हैं, तो देखते हैं कि यही ऐतिहासिक निशान साहिब गुरुद्वारा साहिब जी की छत पर सुशोभित है। गुरुद्वारा मोती बाग साहिब, पटियाला में स्थित यह निशान साहिब ऊँचे स्थान पर होने के कारण दूर से ही स्पष्ट दिखाई देता है।
जब हम इस निशान साहिब के पास से होकर आगे बढ़ते हैं, तो एक ओर एन.एस.आई. का कैंप दिखाई देता है और दूसरी ओर गुरुद्वारा मोती बाग साहिब जी के दिव्य दर्शन होते हैं। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही एक ओर जोड़ा घर स्थित है और सामने ही गुरुद्वारा साहिब जी अपने पूर्ण गौरव के साथ दृष्टिगोचर होता है। आइए, सबसे पहले गुरुद्वारा साहिब जी के दर्शन करें, तत्पश्चात आगे के इतिहास से स्वयं को जोड़ें।
पार्श्व-गायन: स्थान के गौरव को उभारती हुई धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।
धन्य-धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी, जब दिल्ली जाकर शहादत देने के लिए अग्रसर थे, तब इस पावन स्थान पर आकर विराजमान हुए थे। यहाँ से आगे उन्होंने समाणा नामक स्थान की ओर प्रस्थान किया।
इसी पटियाला नगर में एक अन्य गुरुद्वारा साहिब—गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी भी स्थित है। परंतु अनेक बार हम भ्रांति में यह कह देते हैं कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी दिल्ली शहादत के लिए जाते समय गुरुद्वारा दुख निवारण साहिब जी में भी आए थे। नहीं, प्यारो। इतिहास के पृष्ठ हम यहाँ विराम देते हैं। इसी सत्य के साथ हम इस प्रसंग को भी यहीं विराम देते हैं और इस शृंखला के अगले प्रसंग में पुनः आपसे भेंट करेंगे।
संगत जी से विनम्र निवेदन
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वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह।
आपका अपना वीर,
इतिहासकार — डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’