प्रसंग क्रमांक 11: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शहीदी मार्ग में नगर / पिंड ननहेड़ी का इतिहास

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प्रसंग क्रमांक 11: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शहीदी मार्ग में नगर / पिंड ननहेड़ी का इतिहास

(सफ़र-ए-पातशाही नौवीं — शहीदी मार्ग यात्रा)

पार्श्व-गायन: समय की धूल हटाती-सी मार्मिक सुर-लहरी, दर्शक को इतिहास के गर्भ में ले जा रही है।

हसनपुर–कबूलपुर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ग्राम ननहेड़ी। इस पावन स्थल तक पहुँचने के लिए कोई चौड़ी या भव्य सड़क नहीं है; छोटी सड़क के बस-अड्डे के समीप से एक मोड़ लेकर ही इस गांव / पिंड में स्थित गुरुद्वारा साहिब तक पहुँचा जा सकता है। वर्ष 2021 में हमारी टीम खोज–विचार इस स्थान पर इतिहास की खोज हेतु पहुँची थी। आज हम इस गांव के निवासी तथा गुरुद्वारा साहिब के हेड ग्रंथी साहब, सरदार गुलजार सिंह जी से मिलते हैं। उनके द्वारा तथ्यों के आधार पर जो वार्तालाप प्राप्त हुआ, उसके अनुसार स्थानीय रिवायतों में यह उल्लेख मिलता है कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का अपने जीवनकाल में इस नगर में आगमन केवल एक ही बार हुआ था।

हेड ग्रंथी सरदार गुलजार सिंह जी– यह नगर/पिंड ननहेड़ी, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ एक ऐतिहासिक स्थान है। जब श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी महाराज अपने परिवार सहित हसनपुर–कबूलपुर पहुँचे, तब वहीं से वह परिवार सहित इस नगर / पिंड ननहेड़ी में पधारे। इसका कारण था उनके एक सिख फतेहचंद का गुरु साहिब के प्रति अपार प्रेम। जब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी महाराज इस नगर में पहुँचे, तो उन्होंने नगर वासियों से पूछा- यह कौन-सा नगर / पिंड है? उस समय स्थानीय निवासियों ने निवेदन किया कि महाराज, इस नगर का नाम नहेड़ी है। तब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने इस नाम के आगे ‘न’ अक्षर जोड़कर इसे ‘ननहेड़ी’ कहकर संबोधित किया। उसी के पश्चात् इस नगर / पिंड का नाम ननहेड़ी साहिब प्रचलित हो गया।

फतेहचंद के प्रेम, श्रद्धा और भावनाओं से अभिभूत होकर गुरु साहिब जी महाराज इस नगर में पूरे सत्ताइस दिनों तक विराजमान रहे। इन सत्ताइस दिनों के निवास काल में गुरु-परिवार के साथ चलने वाले सेवादार और सेवादारणियाँ सेवा में निरंतर संलग्न रहते थे। इसी अवधि में, जत्थे की एक सेवादारनी को नगर के एक व्यक्ति—घोघे—ने चुरा लिया और उसे पुनः गुरु साहिब के पास जाने नहीं दिया। इसके बावजूद, श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने इस नगर में पूरे सत्ताइस दिन निवास किया और तत्पश्चात् इस नगर/पिंड से बीबीपुर की ओर प्रस्थान किया।

गुरु साहिब के प्रस्थान के पश्चात्, सन 1632 ईस्वी में, जब श्री गुरु गोविंद सिंह जी अपनी छह वर्ष की आयु में पटना से चलकर लखनौर पहुँचे—जो उनका ननिहाल था—तब उनके साथ उनके मामा कृपाल चंद भी थे। बाल गोविंद राय जी, मामा कृपाल चंद और अपने जत्थे के साथ इस नगर/पिंड ननहेड़ी में आए। उस समय उनके साथ वही सेवादारणियाँ थीं, जो पहले श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के समय में सेवा में रही थीं। जब यहाँ दीवान सजा, तो स्थानीय निवासी घोघे द्वारा चुराई गई वही सेवादारनी, भरे दीवान में गुरु साहिब के दर्शन हेतु पहुँची। गुरु साहिब के जत्थे की सेवादारणियों ने अपनी पुरानी साथी को तुरंत पहचान लिया।

जब बाल अवस्था में श्री गुरु गोविंद सिंह जी को इस संपूर्ण घटना की जानकारी हुई, तो उनके मुख से वचन निकले—“घोघा कपट का मोघा।” इसके पश्चात् उन्होंने उस घोघे से किसी भी प्रकार की सेवा स्वीकार नहीं की। फिर गुरु साहिब अपनी आगामी यात्रा की ओर अग्रसर हो गए।

डॉक्टर खोजी– संगत जी, इस स्थान का इतिहास हमने भाई गुलजार सिंह जी से श्रवण किया। ऐतिहासिक स्रोतों से हमें यह भी ज्ञात हुआ कि श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी जब अपने शहीदी मार्ग की यात्रा पर थे, तब उस समय भी इस नगर/पिंड में उनके आगमन की संभावना का उल्लेख मिलता है। किंतु इस नगर की रिवायतों और कुछ पुरातन स्रोतों के आधार पर इतिहासकार यह मानते हैं कि गुरु साहिब दूसरी बार इस नगर/पिंड में नहीं आए थे। प्रिंसिपल जसबीर सिंह जी—लेखक ‘इति जनकारी’—के अनुसार भी यही जानकारी प्राप्त होती है।

कुछ स्रोत यह भी लिखते हैं कि घोघा मसंद दूसरी बार गुरु साहिब से मिलने आया था। यह संभव है, क्योंकि पीछे गुरुद्वारा हसनपुर–कबूलपुर के बोर्ड पर अंकित है कि शहीदी मार्ग पर चलते हुए श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी हसनपुर–कबूलपुर आए थे। अतः यह संभावना बनती है कि इस क्रम में ननहेड़ी भी आया हो। टीम खोज–विचार इस तथ्य पर अवश्य शोधपूर्ण मुहर लगाएगी कि क्या श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी दूसरी बार इस नगर/पिंड ननहेड़ी में पधारे थे। हाँ, यह संभव अवश्य है कि जब गुरु साहिब इस स्थान से पटियाला की ओर जा रहे हों—पर उस समय की गुरु की रूहानी रमज़ें, गुरु ही जानें…

पार्श्व-गायन: स्थान के गौरव को उभारती धीमी, श्रद्धामयी धुन वातावरण में उतर रही है।

डॉक्टर खोजी– संगत जी, शहीदी मार्ग का इतिहास अत्यंत जटिल और कई स्थलों पर उलझनों से भरा हुआ है। इतिहास के इस मोड़ पर बड़े-बड़े विद्वान भी भ्रमित हो जाते हैं। कहीं यह उल्लेख भी मिलता है कि श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी को मलकपुर रंगड़ा से गिरफ्तार कर दिल्ली लाया गया था। किंतु, संगत जी, इन ऐतिहासिक तथ्यों पर हमारी कौम का, हमारे विद्वानों का एक मत होना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, इस इतिहास को सही रूप में समझने के लिए गहन खोज और निष्पक्ष अध्ययन अनिवार्य है, ताकि शहीदी मार्ग का एक प्रामाणिक स्वरूप हमारे सामने आ सके।

अब हम घोघा मसंद के पुराने घर की बात करते हैं। आप जो दृश्य स्क्रीन पर देख रहे हैं, नगर वासियों के अनुसार वही स्थान है, जो आज खंडहर में परिवर्तित हो चुका है। घोघा मसंद का परिवार आज भी इस नगर / पिंड में निवास करता है। जब श्राप की चर्चा आती है, तो गुरुवाणी हमें यह स्मरण कराती है—

सतिगुरु सभना दा भला मनाइदा तिस दा बुरा किउ होइ ॥

(अंग क्रमांक 302)

अर्थात् मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है। घोघा मसंद ने जो गलती की, उसका परिणाम उसे स्वयं भुगतना पड़ा। नगर / पिंड की रिवायतों में यह भी उल्लेख मिलता है कि उस परिवार में आज भी एक व्यक्ति ऐसा है, जो रब के रंग में रमा हुआ जीवन जीता है। हम जैसे लोग भले ही उसे पागल कह दें, किंतु वास्तव में वह एक रूहानी अवस्था में जीने वाला व्यक्ति है, जो आज भी इस नगर / पिंड में विचरण करता दिखाई देता है। यह भी इतिहास की एक सच्चाई है।

इन तथ्यों के साथ, इस स्थान के इतिहास के पृष्ठों को यहीं विराम देते हुए, अब हम पटियाला नगर की ओर अग्रसर होते हैं। हमारा अगला पड़ाव बहादुरगढ़ है। उस मार्ग पर धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का क्या इतिहास है? यह हम आगे जानेंगे। इसी मार्ग से होते हुए समाना, गढ़ नज़ीर, करहाली और चिके नामक स्थानों के माध्यम से धन्य श्री गुरु तेग बहादुर पातशाह जी धमतान साहिब पहुँचे थे। जुड़े रहिए टीम खोज–विचार के साथ, खोज–विचार चैनल के माध्यम से।

पार्श्व-गायन: धीमे, आध्यात्मिक स्वरों की लय मानो इतिहास की परतों को एक-एक कर खोलती जा रही है।

इतिहास के इन पृष्ठों को यहीं विराम देते हैं।
मिलते हैं—अगले प्रसंग में…

संगत जी से विनम्र निवेदन

इतिहास की खोज, स्थलों का अवलोकन, मार्ग-यात्राएँ और विस्तृत दस्तावेज़ीकरण—इन सबमें बहुत बड़ा व्यय आता है। यदि आप इस गुरुवर-कथानक को, यह शहीदी मार्ग प्रसंग को और आगे आने वाले सभी ऐतिहासिक प्रयासों को अपना सहयोग देना चाहें, तो- मोबाइल क्रमांक- 97819 13113 पर संपर्क करें। आपका अमूल्य सहयोग गुरु साहिब की महिमा और इस इतिहास की सच्चाई को जन-जन तक पहुँचाने में अत्यंत सहायक होगा।

आपका अपना वीर- इतिहासकार, डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’
पार्श्व गायन: (गुरु-चरित्र की गरिमा को रेखांकित करती गंभीर, आध्यात्मिक धुन वातावरण में गूँज रही है।)

संगत जी, वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरू जी की फतेह! 

आपका अपना वीर इतिहासकार- डॉक्टर भगवान सिंह खोजी

विशेष सूचना

संगत जी, आज हम आपको एक विशेष जानकारी देना चाहते हैं। महाराष्ट्र के पुणे से पधारे सरदार रणजीत सिंह जी ‘अर्श’ आज हमारे बीच उपस्थित हैं। आप चढ़दी कला टाइम टीवी पर जो भी इतिहास देख रहे हैं, वही संपूर्ण शोध arsh.blog पर भी उपलब्ध है। जैसे ही आप गूगल पर arsh.blog टाइप कर खोलते हैं, MENU में आपको SAFAR-E-PATSHAHI NOVI तथा BHULE-BISARE GURUDHAM शीर्षक दिखाई देंगे। Bhule-Bisare Gurudham स्तंभ में उन ऐतिहासिक स्थलों की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है, जो आज लुप्तप्राय हो चुके हैं। वहीं Safar-E-Patshahi Novi के SUBMENU में श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शहीदी मार्ग का हिंदी, अंग्रेज़ी तथा गुरुमुखी/पंजाबी में लिखित विवरण उपलब्ध है, जिसे आप पढ़ भी सकते हैं और संबंधित वीडियो क्लिप भी देख सकते हैं। यह महान सेवा धन्य श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की कृपा से डॉ. रणजीत सिंह जी ‘अर्श’ द्वारा निरंतर की जा रही है। आइए, उनसे दो शब्द सुनते हैं और फिर हम अपनी आगामी यात्रा की ओर बढ़ते हैं।

डॉ. अर्श
आज का दिवस अत्यंत भाग्यशाली है। आज हम उस पवित्र धरती पर खड़े हैं, जो गुरुओं के चरण-स्पर्श से पावन हुई है—विशेषकर वह मार्ग, जिसे शहीदी मार्ग कहा जाता है। जब गुरु साहिब शहादत देने दिल्ली की ओर जा रहे थे, तब इस नगर की संगत से उनका अत्यंत स्नेह और आत्मीय संबंध था। यहाँ विश्राम कर, संगत से मिलकर, गुरु साहिब ने जाते समय यह संदेश दिया—

भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन॥
(अंग क्रमांक 1427)

अर्थात् न किसी को भय दिखाओ और न ही किसी का भय स्वीकार करो। नानक का कथन है—हे मन, सुन! वही सच्चा ज्ञानी है।

गुरु साहिब मानवता की ज़मीर की रक्षा के लिए इस शहीदी मार्ग से होकर गए थे। यह एक ऐसी शहादत है, जिसमें किसी प्रकार का व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं था—न जल का विवाद, न भूमि का, न सत्ता या सिंहासन का। यह शहादत केवल और केवल इंसानियत की आत्मा की रक्षा हेतु थी। आज टीम खोज–विचार उस शहीदी मार्ग पर उपस्थित है। मैं इतिहासकार डॉ. भगवान सिंह ‘खोजी’ का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मुझे इस पावन स्थल पर बुलाया और इस संपूर्ण यात्रा में साथ रखा। साथ ही, मैं टीम खोज–विचार के सहयोग से इस पूरे शहीदी मार्ग को लिपिबद्ध कर अपने ब्लॉग arsh.blog पर प्रस्तुत करने की सेवा कर रहा हूँ।

धन्यवाद।
वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह!


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