प्रसंग क्रमांक 72: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की धर्म प्रचार-प्रसार यात्रा के समय ग्राम ख्याला कला का इतिहास।

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‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ग्राम भैणी बाघा से चलकर ग्राम ख्याला कला नामक स्थान पर पहुंचे थे। इस स्थान पर उस पुरातन समय का बेरी का वृक्ष वर्तमान समय में भी मौजूद है। गुरु जी इस बेरी के वृक्ष की छांव में आकर विराजमान हुए थे। इस बेरी के वृक्ष पर उस समय गुरु जी के दर्शन-दीदार करने हेतु ग्रामवासी आना प्रारंभ हो चुके थे। इसी ग्राम का स्थानीय निवासी एक पंडित गुज्जर राम और उसका यजमान भाई मक्का जी भी गुरु जी के दर्शन-दीदार  करने हेतु उपस्थित हुए थे। पंडित गुज्जर राम जी ने विनम्रता से गुरु जी के सम्मुख निवेदन करते हुए कहा कि, गुरु पातशाह जी आप तो प्रत्येक इंसान के दिल की बातों को जानते हो, आप जी मेरे ऊपर अपनी कृपा दृष्टि बनाकर कृपा करो। इस ग्राम में बहुत कम परिवार निवास करते हैं और ग्राम बहुत ही छोटा है। मेरे साथ मेरे यजमान भाई मक्का जी भी उपस्थित है। आप जी इस भाई मक्का जी पर जरूर अपनी कृपा करें। यह भाई मक्का इस ग्राम ख्याल कला का नंबरदार है।

उस समय पंडित गुज्जर राम जी ने अपने घर से काड़नी (कांसे की धातु से बना हुआ लोटा) में लाया हुआ गरम दूध बड़ी श्रद्धा और प्यार से ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ को छकाया था। गुरु जी ने इस जिस छन्ना (कटोरे/प्याला) में दूध पिया था, उस को अपनी निशानी के तौर पर पंडित गुज्जर राम जी को दे दिया था। वर्तमान समय में भी पंडित गुज्जर राम के इस छन्ने को उनकी पीढ़ी ने संभाल कर रखा है। इस ग्राम ख्याला कला में वर्तमान समय में भी पंडित गुज्जर राम के परिवार में जाकर उस छन्ने के दर्शन किए जा सकते हैं।

पंडित गुज्जर राम ने गुरु जी के सम्मुख निवेदन किया कि मेरे साथ आए मेरे यजमान भाई मक्का जी पर भी आप कृपा करो। इस मक्के के घर पर कोई औलाद नहीं है। गुरु जी ने आशीर्वाद वचन करते हुये कहा कि भाई मक्का तुझे पुत्र रत्नों की प्राप्ति होगी और हमेशा तेरे परिवार में नंबरदारी भी बनी रहेगी। 

भविष्य के कालांतर में इस भाई मक्का के घर पर एक बेटी और चार पुत्र रत्नों ने जन्म लिया था।  सच जानना. . . . ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ के वचनों पर जरूर अपने हृदय में श्रद्धा बनाए रखना। ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने जो वचन किए वह सौ प्रतिशत सत्य साबित हुए हैं।  वर्तमान समय में भी यह परिवार अत्यंत खुशहाल है और परिवार में निरंतर, नंबरदारी परंपरागत चली आ रही है। इस इलाके के विभिन्न ग्रामों में इस परिवार के सदस्य निवास करते हैं, उन सभी को विरासत में नंबरदारी मिली हुई है| इन ग्रामों के नाम निम्नलिखित हैं–

ग्राम निबेरा (तलवंडी साबो की) दूसरा ग्राम हरियाणा राज्य का धनपुरा जो की ग्राम कलियां वाली के बिल्कुल समीप है। उसके पश्चात मुक्तसर के समीप ग्राम मक्का के नाम से ग्राम मक्कापत्ती है। साथ ही ग्राम ख्याला कला में भी इसी परिवार की नंबरदारी विरासत में चली आ रही है। उस समय जो गुरु जी ने वचन किए थे वह वचन वर्तमान समय में भी पूर्ण हो रहे हैं।

पंडित गुज्जर राम ने जहां अपना भला किया, वहीं पर अपने यजमान मक्का का भी भला किया था। पंडित गुज्जर राम और यजमान मक्का नंबरदार के परिवारों ने सिख धर्म को ग्रहण कर सिख सज गए हैं। गुरु जी की असीम कृपा से वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा बेरी साहिब मौजूद है।  इस गुरुद्वारे को गुरुद्वारा बेरी साहिब भी कह कर संबोधित किया जाता है। इस पवित्र स्थान पर गुरु जी ने बेरी के नीचे बैठकर छन्ने (कटोरे) में दूध छका था।

जैसा कि हम विगत इतिहास से भली-भांति जानते है की ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ प्रकृति प्रेमी थे। गुरु जी ने पंडित गुज्जर राम को भी वचन किए थे कि इस स्थान पर एक (बरोटा) बरगद का वृक्ष लगाओ और स्वच्छ पानी के उपयोग के लिए एक कुआं भी खुदवाने का महत्वपूर्ण कार्य करो। वर्तमान समय में भी पंडित गुज्जर राम जी द्वारा रोपित बरगद का वृक्ष और बनाया हुआ कुआं मौजूद है। गुरु जी के वचनों अनुसार इस ऐतिहासिक बरगद के वृक्ष और कुएं के दर्शन वर्तमान समय में भी किए जा सकते हैं। इस स्थान पर गुरुद्वारे के सामने स्थित स्थान को गुरुसर के नाम से संबोधित किया जाता है।

प्रकृति प्रेमी ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ अच्छी तरह से जानते थे कि कहां, कौन सा वृक्ष रोपित करना है? जो बोहड़/बरोटा जिसे हिंदी में बरगद का वृक्ष कहा जाता है, जिसे पंजाबी भाषा में प्रेम से बाबा बोहड़ कहकर भी संबोधित किया जाता है। यह बरगद का वृक्ष हमारा राष्ट्रीय वृक्ष है और इस बरगद के पेड़ का उपयोग कर कई दुर्गम एवं बहुत भयानक बीमारियों से मुक्ति पाई जा सकती है। एक विशेष प्रकार की शक्ति का खजाना इस पेड़ को माना जाता है।

‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ की स्मृति में बने अनेक कुएं एवं गुरुद्वारों के इतिहास को हम इस श्रृंखला के माध्यम से जान चुके हैं। साथ ही वीडियोग्राफी/फोटोग्राफी से इन सभी स्थानों के दर्शन भी कर चुके हैं।

इस स्थान पर जब गुरु जी विराजमान थे तो स्थानीय निवासियों ने एकजुट होकर एक विनम्र निवेदन गुरु जी को किया था। वह क्या निवेदन था? जिस कारण से गुरु जी को अपना तीर चलाना पड़ा था। इस समस्त इतिहास से हम इस श्रृंखला के प्रसंग क्रमांक 73 में रूबरू होंगे ।

प्रसंग क्रमांक 73: श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी की धर्म प्रचार-प्रसार यात्रा के समय ग्राम ख्याला कला में सुशोभित गुरूद्वारा तीर साहिब जी का इतिहास।

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