इस प्रस्तुत श्रृंखला के प्रसंग क्रमांक 71 के अंतर्गत ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ अपनी धर्म प्रचार-प्रसार यात्रा हेतु ग्राम मैसर खाना, ग्राम डिख एवं ग्राम भैणी बाघा स्थान पर पहुंचे थे। इन सभी स्थानों के इतिहास से संगत (पाठकों) को अवगत करवाया जाएगा।
‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ अपनी धर्म प्रचार-प्रसार यात्रा हेतु ग्राम मैसर खाना नामक स्थान पर पहुंचे थे। विगत प्रसंग क्रमांक 69 में हम ग्राम टाहला साहिब जी के इतिहास से परिचित हुए थे। इस ग्राम टाहला साहिब के इतिहास अनुसार एक माता जी ने गुरु जी को स्वयं की गोद भरने हेतु प्रार्थना की थी। गुरु जी की आशीर्वाद से उस माता जी को पांच पुत्र रत्नों की हुई थी और इन्हीं पांच पुत्र रत्नों के नाम से पांच खाने (ग्राम) बने थे। इन पांच ग्रामों में से एक ग्राम का नाम है, मैसर खाना।
इस ग्राम मैसर खाने में ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ पधारे थे। वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा मंजी साहिब पातशाही नौवीं सुशोभित है। इस गुरुद्वारे के निकट एक भौंरा (चबूतरा) मौजूद है। उस भौंरें के अंदर ही गुरु जी की याद में एक थड़ा साहिब (तख़्त) बना हुआ है। इस गुरुद्वारे में गुरु जी से संबंधित अधिक इतिहास उपलब्ध नहीं है।
इस ग्राम से चलकर गुरु जी ग्राम डिख नामक स्थान पर पहुंचे थे। इस ग्राम के बाहरी परिसर में ही गुरु जी की स्मृति में गुरुद्वारा साहिब सुशोभित है। यह स्थान बहुत ही खुशहाल, रमणीक और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर शांत इलाका है। विचार करने वाली बात यह है कि जब गुरु जी यहां पधारे थे तो उस समय इस स्थान पर कैसा माहौल होगा? इस स्थान पर भी ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ ने सिक्खी का प्रचार-प्रसार कर सिक्खी का बूट रोपित कर सिखों को नाम-वाणी से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। साथ ही सिक्खों को उपदेशित कर जात-पात से दूर रहकर एक अकाल पुरख की बंदगी करने हेतु भी प्रोत्साहित किया था।

इस स्थान पर बाबा बलाकी जी के परिवार से एक माता जी ने गुरु जी के सम्मुख उपस्थित होकर निवेदन किया कि गुरु जी अकाल पुरख का दिया हुआ सब कुछ मेरे पास है, एक बेटी भी है परंतु मेरे वंश को आगे बढ़ाने के लिए कोई पुत्र नहीं है। दुनिया की रवायत अनुसार गुरु जी ने वचन किये–
आया सुरा, आया कपूरा, आया हमीरा, आया वीरां।
इस तरह से गुरु जी ने उस समय वचन किए थे, इस घटना के पश्चात इतिहास जानने से ज्ञात हुआ कि माता जी को चार पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई थी और उनके नाम भाई सुरा जी, भाई कपूरा जी, भाई हमीरा जी, और भाई वीरां जी थे। साथ ही उनका भी भविष्य में भरापूरा परिवार हुआ था।
जब ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ इस स्थान पर पधारे थे तो उस समय इस स्थान पर बहुत बड़ा टिब्बा (टीला) मौजूद था। स्थानीय संगत की और से निशानदेही कर इस टिब्बे की मिट्टी को हटाया गया तो गुरु जी की स्मृति में पुराने बुजुर्गों द्वारा निर्मित थड़ा भी इस स्थान पर मिला था। वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा साहिब पातशाही नौवीं सुशोभित है। इस गुरुद्वारे का निर्माण सन् 1917 ई. के पश्चात हुआ था। इस ग्राम डिख में गुरुद्वारा साहिब पातशाही नौवीं की विलोभनीय इमारत सुशोभित है।
इस स्थान से चलकर गुरु जी भैणी बाघा नामक स्थान पर पहुंचे थे। इस स्थान पर गुरु जी के घोड़े की रकाब टूट गई थी। उस समय उस ग्राम के रविदासी भाईचारे को मानने वाले हमारे अपने एक रविदासी भाई ने बहुत प्रेम और श्रद्धा से गुरु जी के घोड़े की नवीन रकाब को बना कर दिया था। उस समय ‘श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी’ बेहिचक होकर इन रविदासी भाइयों के बीच विराजमान हुए थे। जिस रविदासी समाज को पुजारी वाद ने हमेशा दूर रखकर फटकारा था, उसी समाज के सभी भाइयों को गुरु जी ने गले लगाया था। वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा रकाबसर साहिब जी की भव्य इमारत इस जात पात के विरोध में शान से खड़ी होकर कौमी एकता के लिए मिसाल साबित हो रही है।
इस ग्राम के रविदासी समाज के सभी समाज भाइयों ने सिक्खी धारण कर सिख सज कर गुरु जी के सिख बन गए हैं। इस ग्राम में भी गुरु जी के समय से ही सिख धर्म प्रफुल्लित हो रहा है। बड़ी संख्या में इस ग्राम के रविदासी भाइयों ने सिख धर्म को अपनाया है।
इस ग्राम के थोड़ी दूरी पर ही खरड़ वाल नामक ग्राम की माता जी ने गुरु जी और संगत को दूध का लंगर प्यार और श्रद्धा से छकाया था। इस स्थान पर भी गुरु जी पीपल के पेड़ के नीचे विराजमान हुए थे। वर्तमान समय में इस स्थान पर गुरुद्वारा पीपलीसर साहिब जी सुशोभित है।
इस ग्राम बेनी बाघा में गुरु जी की स्मृति में दो गुरुद्वारे साहिब सुशोभित है। गुरुद्वारा रकाबसर साहिब जी एवं गुरुद्वारा पिपलीसर साहिब जी।